Wednesday, February 11, 2026
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लखनलाल पाल की कलम से – रमकल्लो की पाती : रमकल्लो की परीक्षा (भाग – 13)

प्राननाथ
चरन स्पर्श।
चुनाव की बजह से बोर्ड परीक्षाएँ आगे खिसक गई थीं। मैंने हाईस्कूल का फार्म भरा था न, उसका प्रवेश पत्र पन्द्रह दिन पहले आ गया था। शुरुआत में  तो बहुत जी घबड़ा रहा था कि कैसे परीक्षा दे पाऊँगी। मुझे शरम भी आ रही थी। लोग क्या सोचेंगे कि यह इतनी बड़ी परीक्षा दे रही है। प्राननाथ, बड़ी कहाँ हूँ मैं, वह तो पहनने-ओढ़ने से बड़ी दिखने लगी हूँ।
तुमने कहा था कि परीक्षा दे देना। काम के मारे ज्यादा पढ़ भी तो नहीं पाई, फिर भी मैंने परीक्षा दे दी।
पहले पेपर में मैंने कापी में रोल नम्बर गलत लिख दिया था। बरगए मास्टर ने मुझे बहुत हड़काओ। मो लाल मुँह पड़ गया था। पेपर न दे रही होती, तो मास्टर को ऐसा सुधारती कि हड़काना भूल जाता। तुम्हीं बताव, कितने दिन हो गए पढ़ाई छोड़े, एकाध बार गलत हो ही जाता है। मास्टर को सबर न हुआ, वहाँ सबके सामने मेरी बेइज्जती कर दी। परीक्षा दे रहीं लड़कियाँ मुँह दाबकर हँस रही थीं।
पेपर तो ठीक बन गए हैं पर दो पेपर खराब हो गए। इनमें कुछ ज्यादा कड़ाई कर दी थी मास्टरों ने। फिरउँ विकल्प पूछने से थोड़े रोक पाए वे। 4321 और 1342 के संकेत से पूरे प्रश्न सही कर लिए थे। प्राननाथ 4321 का मतलब था कि पहले प्रश्न का चौथा विकल्प सही है, दूसरे प्रश्न का तीसरा, तीसरे का दूसरा तथा चौथे का पहला
विकल्प सही है। घर आकर किताब से मिलाया तो सारे प्रश्न सही थे।
प्राननाथ, ये दो पेपर न बिगड़ते तो फस्क्लास पास हो जाती। मैंने कापी में सौ-सौ के लोट धर दिए हैं। हो सकत एक्जामनर लम्बर दे दे। प्राननाथ, कापी तो मैंने पूरी भरी, एक भी प्रश्न नहीं छोड़ा। तुम्हें चिठिया लिखत रहत सो लिखने का खूब अभ्यास हो गया है। और प्रश्न तो सहल हते पर एक प्रश्न कठिन पड़ गया। मैंने खूब समझने की कोशिश की पर वह मेरे मगज में न चढ़ा। मैंने उसे अपने मन से लिख दिया। सही हो गया, तो लम्बर मिल जाएँगें, नहीं तो क्या ले जाएगा। सौ रुपये का लोट मैंने इसी प्रश्न के लिए रख दिया था। एग्जामनर को ज्यादा पढ़ने का समय कहाँ होता है। एक मास्टर एक दिन में सौ कापी चैक करेगा, तो तुम्हीं बताव, वह कितने उत्तर पढ़ता होगा ?
अरे हाँ… मैं तुम्हें एक बात तो बताना ही भूल गई। एक पेपर में फ्लाइंग स्कॉट आ गया था। मेरी छाती धक-धक होने लगी थी। पहलूँ तो मैं यहाँ-वहाँ मुँह मटका लेती थी, उन्हें देखकर मैं बिलकुल शन्ट बैठ गई। यहाँ-वहाँ हेरती तो वे नोट न लगा देते। बेकार में साल बरबाद होती। कमरे में ऐसी शांति थी मानो सबको साँप सूँघ गया हो।
चार-पाँच लोग कमरे में धड़धड़ात भए घुस आए। उसमें एक मैडम भी थी। वह मेरी तरफ काफी देर तक दिखत रही। मैं तो चुप्पा अपनौ पेपर हल करत रही। मैं उससे ज्यादा चतुर थी। बीच-बीच में मैं ऊपर को मुँह उठाकर घोकने लगती थी ताकि वह समझ जाए कि मैं सोच-सोचकर प्रश्न हल कर रही हूँ। सोचती तो होगी कि यह लुगाई पेपर दे रही है। पढ़ाई की कछु उम्मर थोड़े होत, जब चाहो तब पढ़ाई शुरू कर दो।
पेपरों भर बड़ी परेशानी रही। सुबह चार बजे जागकर पढ़ना, साथ में घर के काम निपटाना मामूली बात नहीं थी। भैंस को सानी-पानी देकर जाती थी। सुबह सात बजे घर से निकलती, तो ग्यारह बजे घर लौट पाती। चार घंटे भैंस खूँटे से भूखी थोड़ी बंधी रहती। हड़बड़ी में कई काम छूट जाते थे। फिर भी मैंने परीक्षा दे दी। किसी का सहारा नहीं था।
पेपरों के बीच गैप मिल जाने से सहूलियत हो गई थी। पढ़ भी लेती थी और घर का काम भी संभालती रहती थी। महीना भर में छैः पेपर हुए। अब समझ लो, पेपरों के बीच कितना अन्तराल रहा होगा।
पढ़ने को समय खूब मिल गया था। रात को पढ़ती रहती थी। उस समय मन अच्छा लगता था। दिन में तो कोई न कोई आ जाता था। क्या करूँ उनकी न सुनती, तो बाहर गीत गातीं कि दिन भर मुँह में किताब ही लगाए रहती है।
एक दिन सरबत चाची पूछ रही थी कि रमकल्लो पेपर कैसे जा रहे हैं। मैंने कहा, चाची ठीक जा रहे हैं। पढ़कर जाती हूँ इसलिए कोई दिक्कत नहीं आती है।
चाची मुँह बाए मेरी ओर ताकने लगी थी। उन्हें लगता था कि मैं झूठ बोल रही हूँ। अपनी कमी को छुपाने के लिए बड़ी-बड़ी बातें कर रही हूँ। चाची को धैर्य भी तो नहीं है। दो महीने बाद रिजल्ट आ जाएगा, सो सब कुछ साफ हो जाएगा। चाची तो हना पर सब कुछ चाहती है।
चाची के लिए यह बात नहीं है। वे तो अविश्वास को पाले बैठी है। अगर मैं ये कह देती कि पेपर बिगड़ गए हैं तो उन्हें विश्वास हो जाता कि मैं सच बोल रही हूँ। वे दोबारा कुछ पूछती भी नहीं। मैं उनकी सोच के उलट बोल देती हूँ इसलिए सामंजस्य बिठाने में दिक्कत आ रही थी। सही तो है, गाँव का जोगी जोगड़ा, आन गाँव का सिद्ध होता है। ये लोग अपनों से चमत्कार की आशा नहीं करते हैं।
खैर… छोड़ो इन बातों को।
प्राननाथ, पिसिया मैंने हार्वेस्टर से कटवा ली है। भूसा भी बनवा लिया है। घर में अनाज-भूसा दोनों आ गए हैं। फुरसत मिले तो दो-चार दिन के लिए हो जाना और दाल-बड़ी ले जाना। डिल्ली में दाल बहुत मँहगी होगी। इन चीजों के लिए काहे पैसा बहाते रहोगे।
मैं इन्तजार करूँगी।
आपकी ही
रमकल्लो
 
लखनलाल पाल 
जन्मतिथि- 2 जुलाई सन 1968 
जन्म स्थान- ग्राम व पोस्ट इटैलिया बाजा जिला हमीरपुर उत्तर प्रदेश 
शिक्षा – b.sc गणित M.A हिंदी b.ed पीएच-डी हिंदी 
प्रकाशित रचनाएं- हंस, कथादेश, कथाक्रम ,लमही ,युद्धरत आम आदमी, सृजन समीक्षा, पुरवाई आदि में कहानियां प्रकाशित। 
सम्प्रति – रमकल्लो की पाती उपन्यास धारावाहिक रूप से पुरवाई पत्रिका में प्रकाशित 
प्रकाशित पुस्तकें – बाड़ा ऋतदान, रमकल्लो की पाती (उपन्यास) पंच बिरादरी , कोरोना लॉकडाउन और लड़की (कहानी संग्रह )
 वर्तमान पता- कृष्णाधाम के आगे नया रामनगर उरई जिला जालौन उत्तर प्रदेश 28 5 001 
ई-मेल – [email protected]


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17 टिप्पणी

  1. यह अत्यंत उत्कृष्ट रूप से रचित है, जो ग्रामीण परिवेश एवं लोक व्यवहार का सजीव चित्र प्रस्तुत करता है।

  2. अरे वाह! रमकल्लो तो बड़ी छुपी रुस्तम निकली। हम तो समझते थे कि वह गांव में पल-बढ़कर शायद पांचवी-छठी तक ही पढ़ी होगी। और इसीलिये अपने प्राननाथ को पाती वगैरा लिख लेती है लेकिन उसकी आज की पाती ने अचंभित कर दिया। कि वह अब हाई स्कूल की परीक्षा भी दे चुकी है। और उसके परिणाम का इंतजार कर रही है

    छात्र कभी-कभार हड़बड़ाहट में कोई गलती कर बैठते हैं तो रमकल्लो से भी रोल नंबर गलत भरने की गलती हो गई थी जिस पर उसे शर्म आई थी। इस पाती में उसने परीक्षा के दिनों की सभी बातें खुलकर लिखी हैं। सुबह तड़के उठकर परीक्षा के लिये रिवीजन करना फिर भैंस को सानी-पानी देने से लेकर घर के सारे काम-काज निपटा कर परीक्षा देने जाना आदि, आदि। पहली बार उसने अंग्रेजी का शब्द ‘गैप’ भी इस्तेमाल किया है। एक महीने में छह पेपर होने से उसे समय मिलता रहा जिससे उसे घर के काम-काज और परीक्षा की तैयारी करने में किसी तरह की कोई समस्या नहीं हुई।

    लेकिन वह चिंतित है कि उसके दो पेपरों के उत्तर गलत हो गये हैं। फिर भी वह किसी तरह कॉपी भर आई। कुछ सवालों के मन गढ़ंत्त उत्तर लिखकर सौ-सौ के दो नोट भी कॉपी के अंदर रख आई। अब वह उम्मीद कर रही है कि एक्जामिनर शायद पैसा देखकर उसे कुछ लम्बर दे देगा। सोचती है कि तकदीर आजमाने में क्या हरज? आजकल हर जगह रिश्वत का बोलबाला है इस बात से वह अनजान नहीं। लेकिन सबसे अच्छी बात यह है कि कुल मिलाकर उसके पेपर अच्छे हुये हैं और वह पास हो जायेगी। तब गांव वालों के लिये यह बड़ी बात होगी। अभी उसकी बातों पर सरबत चाची भी यकीन नहीं कर रहीं।

    अब तक खेती-बाड़ी से संबंधित सब काम भी निपट गये हैं। अब वह निश्चिंत है। ऊर्जा से भरी रमकल्लो ने हर काम को सहजता से निपटाना सीख लिया है। अकेली रहकर एक स्त्री को हिम्मत करनी ही पड़ती है। लेकिन उसे अपने प्राननाथ हमेशा एक ढाल की तरह ही लगते हैं। उनसे अपनी पाती में अपने मन की सारी बातें लिखकर सुकून मिलता है।

    लखनलाल जी, रमकल्लो की इस पाती को पढ़कर तो मैं उसके लिये कुछ सपने भी बुनने लगी हूँ। कहीं ऐसा न हो कि इतनी जहीन रमकल्लो एक दिन राइटर बन बैठे। पाती की जगह उपन्यास लिखने की ठान ले।
    आपके brainchild ‘रमकल्लो की पाती’ पर आपको बहुत-बहुत बधाई।

    • आदरणीया शन्नो जी, आपकी प्रतिक्रिया इतनी आत्मीय होती है कि कभी-कभी लगता है कि कहीं रमकल्लो आकर ये न कहने लगे कि मेरी लिखी पाती न केवल गांव शहर बल्कि देश विदेश में भी पढ़ी और सराही जा रही है। प्राननाथ को लिखी गई ये व्यक्तिगत पातियां सार्वभौमिक रुचि में बदल जाएंगी ये मैंने न सोचा था।
      शन्नो जी आपकी प्रतिक्रिया में रमकल्लो के लिए जो अपनत्व है उससे मैं अभिभूत हूं। बढ़िया प्रतिक्रिया के लिए बहुत-बहुत आभार शन्नो जी।

  3. आदरणीय लखनलाल पाल जी
    रमकल्लो की परीक्षा इस पाती से हमें हमारे अतीत के कुछ पृष्ठ जो परीक्षा के संदर्भ में हैं याद आए.
    परीक्षा का वह डरावना माहौल आंखों के सामने उजागर हुआ.
    आप की रमकल्लो पढ़ाई लिखाई के खातिर आज भी तत्पर है यह बात अच्छी लगी.
    हम खुद विश्वविद्यालय स्तर पर कार्यरत हैं इसलिए अगर कोई छात्र ग़लत आसन क्रमांक लिखता है तो न केवल उसे अपितु विश्वविद्यालय को भी रिजल्ट के समय परेशानी का सामना करना पड़ता है और उसका रिजल्ट रिजर्व रहता है.
    दूसरी बात पास होने के लिए पैसे का इस्तेमाल करना ठीक नहीं है.
    हालांकि इस बात का पता उम्र के इस मोड़ पर आकर चलता है इसलिए आप की रमकल्लो जो भी सोचती है वह सहज और स्वाभाविक ही है इसके प्रति कोई दो राय नहीं है.
    परीक्षा देने के लिए रमकल्लो को कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं यह भी महत्वपूर्ण है जिसका आप ने यथोचित विवरण दिया है वह काबिले तारीफ है.
    इंसान की जिंदगी में ऐसे मुकाम आते हैं और मुस्तकबिल में वह अपनी फतह का परचम लहराता है और रमकल्लो भी एक दिन कामयाब होगी इस दुआ के साथ,

    मीर तकी मीर का अशआर है –
    मत सहल हमें जानों फिरता है फलक बरसों,
    तब ख़ाक के पर्दे से इंसान निकलते हैं!
    सादर
    प्रो विजय महादेव गाड़े

    • आदरणीय प्रोफेसर विजय गाडे जी आप रमकल्लो की मानसिक स्थिति का बढ़िया विश्लेषण करते हैं। रमकल्लो के जमीनी स्तर से लेकर उसकी भावभूमि तक की विशिष्टता एकदम मुकम्मल हो गई है।
      आपने मीर तकी साहब के इस अशआर से रमकल्लो के उत्तरोत्तर मानवीय विकास को अच्छे से रेखांकित कर दिया है- *तब खाक के पर्दे से इंसान निकलते हैं*
      बढ़िया प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत-बहुत आभार सर

  4. रामकल्लो की पाती, धीरे-धीरे दिल में उतरती जा रही है । उत्कृष्ट एवं रोचक । बधाई

    • सुदर्शन रत्नाकर जी, आपको पाती पसंद आ रही है।, पाती पढ़ने के लिए आपका बहुत-बहुत शुक्रिया।

  5. रमकल्लो की पाती * इस बार अत्यंत रोचक प्रेरक और उत्साह वर्धक लगी।एक सुखद आश्चर्य भी हुआ कि हमारी रमकल्लो पढ़ाई का सपना भी देखती.है। आम तौर पर गांव की.लडकियों को.मनचाहे सपने देखने की इजाजत भी नहीं थी ,पढाई तो दूर की बात। खेती बारी घर गृहस्थी के बीच भी उसने मैट्रिक की परीक्षा दे ही दी। पर परीक्षा देने पढने और उसकी तैयारी करने के क्रम में जिस रोचकता की सृष्ट हुई है वह अद्वितीय है।सचमुच ऐसे ही तैयारी करना और परीक्षा केंद्र से परीक्षक तक की घटनाए बहुत कुछ याद दिला रही हैं।मुझे सचमुच बहुत आनंद आया इस पाती में।मैने भी भी हमीरपुर बुंदेलखंड में बी ए की परीक्षा दी थी। वहां इतिहास के पेपर के दिन ऐसी ही भागदौड मची थी।बिना डरे सभी छात्र निश्चित परीक्षाएं दे रहे थे।फ्लाइंग दस्ता के आने पर हडबडी में मानों खिडकियोः से छोटी छोटी.चिटों की बारिश होने लगी।मेरे पिताजी के पास भी जांचने के लिए बी ए एम ए की हिन्दी की कापियां आती थीं।किसी में सौ का नोट तो किसी में पत्र कि मेरा.विवाह होणे वाला है ,मुझे पास कर दें*।रमकल्लो के सपनों ने अब आकाश छूना आरंभ कर दिया है। वह अकेले रहकर भी अपने सपनों को परवान चढाने के साथ गाय अपने कर्तव्य भी महीं भूलती। खेत बथान दुनियादारी सब निभाना और संभालना जानती है।यही है एक भारतीय नारी का आदर्श, उसकी कर्मनिष्ठा और सशक्त व्यक्तित्व। बहुत सुंदर संदेश भी है आज की पीढ़ी के लिए। सपनों खो साकार करने के लिए किसी सहारे की जरूरत नहीं ,बस अपने हौसले बनाये रखें।हार्दिक बधाई, अशेष शुभ कामनाए आदरणीय सर।अगली पाती की प्रतीक्षा है।
    पद्मा मिश्र

    • आदरणीया पद्मा जी, आपने पाती का बहुत गहराई से विश्लेषण किया है। इस विश्लेषण से पाती में निखार आ गया है।
      यह जानकर खुशी हुई कि आपने बुंदेलखंड के हमीरपुर से बी.ए. की परीक्षा पास की है। यह मेरा जिला है।
      इतनी बढ़िया समीक्षा के लिए आपका बहुत-बहुत आभार पद्मा जी

  6. *बरगए मास्टर ने बहुत हड़काऔ*

    इस बार रमकल्लो की पाती देर से पढ़ पाया.
    यह पाती भी रमकल्लो की उस जिजीविषा का जीवंत दस्तावेज है जो रमकल्लो के भीतर बैठी हर उस स्त्री की प्रगतिशीलता की छटपटाहट है, जो पुरुषसत्तात्मक वर्चस्व को दरकिनार निरंतर आगे बढ़ाने के लिए कसमसा रहीं हैं। उत्तर प्रदेश में बुंदेलखंड में नकल उद्योग सन 75 से शुरू हुआ तो फिर फलता फूलता ही रहा। 80 के दशक में एक-एक दौर ऐसा भी जब कुछ कॉलेजों में परीक्षाओं में पेपर और कापी छात्र घर लेकर तक चले जाते। पेपर समाप्ति के समय के बाद जमा करने आते थे। तो होती थी ऐसा भी दूर था काफी और प्रश्न पत्र बढ़ते ही छात्र उनका घर लेकर चले जाते थे और परीक्षा का समय होने के बाद से आधे घंटे बाद तक जमा करने आते ….
    एक कामकाजी महिला के रूप में
    रमकल्लो का चरित्र चित्रण जिस खूबसूरती से लेखक ने किया है उस पर बहुत कुछ कहा जा सकता है। किंतु टिप्पणियों की भी अपनी एक सीमा है। कुल मिलाकर बरगए, हड़काओ, शन्ट, पिसिया, लम्बर जैसे टकसाली शब्दों के प्रयोग रमकल्लो के सौंदर्य के और भी खालिस बनाते हैं।
    कथाकार भाई लखनलाल पाल की किस्सागोई को क्या कहूँ…
    काबिलेतारीफ।
    डॉ० रामशंकर भारती

    • आदरणीय डॉ रामशंकर भारती जी , आपकी टिप्पणी सार्थक और मजेदार होती है। आप टकसाली शब्दों को पकड़ने में माहिर हैं। चुटीली प्रतिक्रिया के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद भारती जी

  7. बिटिया रमकल्लो,
    खुस रहौ
    अबकी बेर तोहरी चिट्ठी पढ़ि के तो हम हैरान रहि गए। तू कब ई परिच्छा का फारम भरीं, कब प्रबेस पत्र आवा, तोहका परिच्छा के पहले वाकी कोऊ चिंता नाहीं रही, इस सब बातें तुम अपने प्राणनाथ से कबहुं नाही कीन्हेव, बड़े पोढ़ करेजा वाली हो बिटिया!!
    हमें तो लागि रहा है कि तुम कौनो दुसरे दुनिया की बिटिया हो, कहां यहि गांव गिराव में आए बसी हौ। कहूं और पैदा भई होतीं तौ लाट-गवन्नर बनतीं।
    भगवान करै तुम पास हुइ जाव, लेकिन बिटिया हम एक बात कहत हैं, बहुत ढेर न उड्यो कि तोहरे पंख टूटि जांए या कउनो बहेलिया तोहिका धइ लेय । सोचि समझि के क्दम धर्यौ।

    भगवान कै असीस तुम्हरे सिर पर रहै।
    जै राम जी की।

    • आदरणीया सरोजिनी पाण्डेय जी, आपकी टिप्पणी में कितना ममत्व भरा है। आपकी टिप्पणियां पढ़कर मुझे लगने लगता है कि ये मानस रचना रमकल्लो मेरे मानस से उतरकर आपकी सीख के लिए धन्यवाद कहने न उतर आए।
      इतनी प्यारी टिप्पणी के लिए सरोजिनी जी आपका बहुत-बहुत आभार

  8. सर जी!

    इस बार की पाती तो चौंकाने वाली रही, एकदम अप्रत्याशित! लेकिन सच! बहुत खुशी हुई। लगातार पढ़ते हुए रमकल्लो पुरवाई की एक जीवित पात्र बन गई है। ऐसा लगता है मानो उसे जानने के लिए कुछ शेष नहीं रह गया।
    उसके दुख से दुख होता है ,उसकी खुशी से खुशी होती है।
    जानकर खुशी हुई कि हमारी रमकल्लो दसवीं की परीक्षा दे रही है।

    कितनी मासूमियत से उसने कहा कि,*”बड़ी कहाँ हूँ? वह तो पढ़ने ओढ़ने से बड़ी दिखने लगी।”*

    एक बात उसने बहुत समझदारी की कही कि, *”पढ़ने-लिखने की कोई उमर नहीं होती।”*

    रमकल्लो की बातों से ऐसा लगता है जैसे कि सब कुछ अपने आसपास और अपने सामने ही हो रहा है।

    कई प्रसंग ऐसे रहते हैं जिन्हें पढ़कर ऐसा लगता है कि अरे हम भी तो इधर से ही गुजरे। गाय भैंसों को सानी देना,तब 4भैंसें थी हमारे यहाँ, कंडे थोपना,सार झाडना ,सार की सफाई करना। कच्चा घर था तो हफ्ते 15 दिन में लीपना । यह सब हमने भी किया। घर के सारे काम करते हुए परीक्षा देने हम भी गए।
    स्कूल में पहला बोर्ड एग्जाम होता है दसवीं का इसलिए गलतियाँ होना स्वाभाविक है। नियमित बच्चों को तो स्कूल में बता दिया जाता है लेकिन प्राइवेट वालों के साथ दिक्कत आती हैं। बेचारी से रोल नंबर गलत लिखा गया। मास्टर बेवकूफ था। सीधे से भी कह सकता था कि सुधार लो। कोई बात नहीं। हड़काने की क्या जरूरत थी?

    लेकिन यह बात सही है की प्राइवेट वाले बच्चों के लिए परेशान तो होना पड़ता है। क्योंकि उन्हें सही जानकारी नहीं होती।

    फर्स्ट इयर के एग्जाम में घबराए हम भी। दो कुर्सी आगे एक लड़का बैठा था जो नकल लेकर आया था। इनविजिलेटर को आते देखा उसने सामने देखते हुए पीछे फेंका तो हमारे साइड आ कर गिरा। हम इतना अधिक घबरा गए नई-नई शादी हुई थी। हालांकि हमें डर नहीं था, पर इज्जत का सवाल था। गर्ल्स स्कूल में जॉब भी कर रहे थे। अगर इसके लिए खड़ा भी कर दिया जाता तो यह हमारे लिये प्रेस्टीज इशू वाली बात थी। जिंदगी में अब तक ऐसा कोई मोड़ आया नहीं था।ससुर फ्रीडम फाइटर थे, नाम था खानदान का।
    यह तो बाद में पता चला कि उस स्कूल के मेंबर भी थे कमेटी के। हमें यह डर था कि हमें न खड़ा कर दें।
    वैसे उसे फेंकते हुए देख लिया गया था।
    हम बाल बाल बचे पर घबराहट तो अपनी जगह थी ही।
    कई बार ऐसा होता है कि अपन किसी को नहीं जानते लेकिन अपने को सब जानते हैं।
    ससुराल में जाओ तो पहली बार में यही स्थिति बनती है।
    इस बार तो रमकल्लो ने हमें 1969-70 में पहुँचा दिया भई।
    दो पेपर अच्छे नहीं गए लेकिन कॉपी बराबर भरी यह बहुत अच्छा किया।
    कॉपी में पेपर रखने वाली बात भी नई नहीं है। बोर्ड के पेपर जाँचते हुए कई कॉपी में पैसे निकलते थे और पास करने की रिक्वेस्ट रहती थी। कॉपी तो अपने हिसाब से जँचती थी लेकिन उन पैसों से सब लोगों का नाश्ता हो जाता था।
    दसवीं की कॉपी में तो एक स्टूडेंट ने पूरी कॉपी में सिर्फ चार शब्द लिखे थे और पूरी कॉपी भरी थी-अगड़म,तगड़म,सगड़म, बगड़म। बहुत सुंदर हैंडराइटिंग के साथ, चार शब्दों के बाद पूर्ण विराम शब्दों के बीच में कॉमा। कॉफी खोलते ही हैंडराइटिंग देखकर जो खुशी हुई थी पढ़ना शुरू करते ही हँसी में बदल गई।अब ऐसे में अगर कोई पैसे भी रख देता तो कॉपी जाँचने वाला क्या करे?
    पर रमकल्लो कोई पहली नहीं है पैसे रखने वाली। उससे कहना कोई बात नहीं रख दिए तो रख दिए।

    यादें भली हैं सालों पीछे लौट के जाने में भी कोई खर्च नहीं लगता।

    अच्छा है रमकल्लो स्कूल के बाद कॉलेज भी पढ़ ले तो ।आगे देखो और क्या-क्या करने की हसरत है उसकी। प्राणनाथ और क्या-क्या करने की इजाजत देते हैं। ईश्वर उसकी सारी इच्छाएँ पूरी करें।
    बहुत-बहुत बधाई सर आपको। एक पुरुष स्त्री की भावनाओं को इस पाती में स्त्री की तरह व्यक्त कर रहा है यह बड़ी बात है।
    प्रस्तुति के लिए तेजेंद्र जी का शुक्रिया।
    पुरवाई का आभार।

    • आदरणीया नीलिमा करैया जी, आपके कमेंट में रमकल्लो के लिए बहुत अपनापन होता है। आप हर पाती में उसे अपने नजदीक पाती है।
      ये बात आपने सही कही है कि पुरुष होकर एक स्त्री की भावनाओं को व्यक्त कर देना बड़ी बात है।
      हरिवंशराय बच्चन जी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि हर पुरुष में आधी स्त्री होती है। यही बात स्त्री के लिए भी है। भौतिक रूप से देखा जाए तो पुरुष की आधी से ज्यादा जिंदगी स्त्री के साथ ही व्यतीत होती है। मां की गोद , फिर बहन के साथ खेल कूदकर बड़ा होना, शेष जीवन पत्नी के साथ रहना। कहने का मतलब स्त्री से वह दूर है ही नहीं है। स्त्री की भावनाओं को वह स्त्री से ज्यादा समझ जाता है।
      दूसरी बात स्त्री पर लिखने के लिए साहित्यकार को स्त्री बनना पड़ता है तभी वह अच्छे से व्यक्त कर पाता है।
      आपने बढ़िया टिप्पणी लिखी। इसके लिए नीलिमा करैया जी आपका बहुत-बहुत आभार

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