प्रारब्ध की लेखनी ही
तय करती है
किसी मनुष्य का
जग में अकस्मात चले आना
मगर स्वयं-लिखी
कर्मों की किताब का
उपसंहार ही
अंत में बताता है
वहाँ उसके होने में थी भला
कोई कभी सार्थकता,
नियति जबकि
निर्धारित कर देती है, बेशक
बहुत पहले से वो समय
जब तय है
उसका लौट जाना।
मिटाये कहाँ मिटते हैं
यह प्रारब्ध और नियति-द्वय
जिनसे रहता है जीवन चक्र बंधा;
और वश में कहाँ अपने होता है
किसी का जग में आना-जाना।
वो लिखी हुई
किताब की जिल्द, मगर
और उसमें कैद
रहस्य और रोचकता भरी
कोई आत्मकथा,
जरूर बांध कर रखती हैं
प्रारब्ध की संभावना भरी
शुरुआत को
नियति के पूर्व-आदेशित
समापन काल तक,
कर्मों के हिसाब भरे
उन्हीं पन्नों के फैलाव से।
Beautifully written ❤️
भारतीय दर्शन ,अध्यात्म,कर्म और पुरुषार्थ को एक लड़ी में पिरो कर , आज के पाठकों को एक शानदार मंजर पेश करती कविता।
आदरणीय सर,
प्रारब्ध, नियति एवं जीवन चक्र से जुड़ी सारगर्भित कविता के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई सर जी।
आदरणीय सूर्य कांत जी व नीलिमा जी, मुझे प्रसन्नता है कि कविता के भावों ने आपके हृदय को छुआ। अपने विचार सांझा करने और प्रोत्साहन के लिए धन्यवाद। किसी कवि, लेखक के लिए पाठकों से सीधे जुड़ना और उनकी राय जानना एक सुखद अनुभव होता है।