प्राननाथ
चरन स्पर्श
आज यह चिठिया तुम्हें खास बजह से लिख रही हूँ। मैंने एक बड़ा काम कर दिया है। सोचा आपको भी बता दूँ। आप सुनेंगे तो अपनी रमकल्लो की प्रशंसा किए बिना न रह सकोगे।
हरबी जिज्जी की मौड़ी है न… अरे वही सरोजी। तीन साल से ससुराल नहीं गई थी। सबने मनाया पर वह नहीं मानी। उन दोनों के बीच ऐसी फाँस पड़ गई थी कि वह पति के साथ रहने को तैयार ही न थी।
ससुराल पक्ष के अनेक लोग आए, उसे समझाते रहे पर वह तो साफ नहियाँ पर उतर आई थी। सबने उन्हें राजी करने की कोशिश की पर बात न बनी। लड़का उसे रखना चाहता था लेकिन सरोजी उसके साथ रहने को तैयार न थी।
सारे प्रयास विफल हो गए थे। अब यही एक रास्ता था कि वे परिवार-परामर्श केन्द्र पर जाकर अलग होने की तहरीर दे दें। यह सुनकर सरोजी डिड़कार छोड़कर रो पड़ी थी। उसे सात भाँवर गेरे पति के छूटने का गम था या निकट भविष्य की चिन्ता, कहना मुश्किल था। उसके चेहरे पर विषाद के लक्षण साफ दिखाई दे रहे थे।
मैंने सरोजी के मन की थाह लेने की चेष्टा की, पर सफल न हो सकी। जब ज्यादा खोदकर पूछा तो उसने बताया कि हम दोनों की लड़ाई हो गई थी। बताव ले, लड़ाई तो किसके घर में नहीं होती है? सबके घर में होत। कहीं कोई पति को छोड़ता है या पति, पत्नी को छोड़ता है।
इनका एक खेत फोरलेन में चला गया था, जिसका मुआवजा उन्हें मिला था। सरोजी चाहती थी कि उन रुपयों से कस्बे में मकान खरीद लिया जाए जबकि लड़का
खेत खरीदना चाहता था। बस हठधर्मिता बढ़ गई। न यह पीछे हटी और न वह। गुस्सा में उसने सरोजी को पीट दिया। वह मायके आ गई।
सरोजी के मायके आ जाने से लड़का बायफेल हो गया। उसने दारू पीनी शुरू कर दी। शराब के साथ वह जुए के फड़ पर भी बैठ गया। दो-तीन महीने में ही सारे रुपये चील के मूत कर दिए।
हरबी जिज्जी बेटी के साथ खड़ी हो गई। उसे और बल मिल गया। मैंने हरबी जिज्जी को कई बार समझाया कि जिज्जी उनके बीच की खाई को ज्यादा गहरी न कर। गुस्सा भारू जो हो गया, उस पर धूल डालो।
जिज्जी गुस्सा में थी। मेरी बात से वह और भड़क गई, “रमकल्लो, पराए घर की तू क्या जाने? इस संडा ने मौड़ी को मुहल्ला के सामने नंगौ-उघरारौ करके पीटा। यह अपमान बर्दाश्त से बाहर है। मैं कहे देती हूँ कि मौड़ी जीते जी वहाँ न जाएगी, मरे बाद कौआ हाड़ भले ले जाए। मुझे जलम भर छाती पर धर के खिलाना पड़े तो मैं खिलाऊँगी।”
सरोजी पढ़ी-लिखी तो थी नहीं, जो कहीं जाकर नौकरी कर लेती। गाँव में ही मेहनत-मजदूरी करने लगी।
पतित्यक्ता की स्थिति समाज में अच्छी नहीं होती है। मनचले उसे कामुक दृष्टि से देखते हैं। उसी दिन मखना का लड़का कलुआ रात को घुस पड़ा था। गब्बे भी उसे बुरी नजर से देखता था। हरबी जिज्जी यहीं कच्ची पड़ जाती थी।
मुहल्ला की औरतें भी पीछे नहीं रहती हैं। जरा से झगड़े पर ठ्वासरे मारती है कि रड़ो ऐसी भली होती तो खसम काहे को छोड़ता, फारकती की नौबत काहे आती। सरोजी चुप ही रहती।
लड़ाई-झगड़े वाली बात हो या प्यार मुहब्बत की, दोनों ही स्थितियों में सरोजी ही उनके केन्द्र में रहती। भौजाई चुहल करती कि सरोजी बिन्नू जाड़े में लला अकेले हैं, उनका मुँह तो हेर लो। कोई कहती कि कल आए तो थे, मिलाप नहीं हुआ क्या?
सरोजी क्या कहती। आता तो है, यहाँ उसकी पहले से ही रिश्तेदारी है। वहीं आकर ठहर जाता है। भौजाई है कि मानती ही नहीं, “बिन्नू ऐसे नहीं रूठा जाता है | हमारे वे हमसे दो-तीन दिन न बोलें, तो जी न जाने कैसा होने लगता है।”
सरोजी निपट अकेली और भौजाइयों की फौज… कैसे निभाव होता। वे ऊसर मन को उर्वरा बनाने के वास्ते देशी खाद (संयोग की बातें) को मिलाती रहतीं पर जिसे पूरी तरह से त्याग दिया हो, उससे काहे का नेह।
सरोजी अन्त जाने को राजी नहीं थी। कहीं किसी से प्रेम-व्रेम समझ नहीं आ रहा था। गब्बे उसे परेशान करता तो सरोजी उसका विरोध कर देती थी। वह विरोध जरूर करती थी किन्तु आशंकाएँ उसे डरा रही थी। जिज्जी भी परेशान रहने लगी थी।
लड़की को लेकर वह कहाँ जाए? जवान बेटी पेट में तो नहीं समा सकती है।
हरबी जिज्जी उसी का रोना लेकर बैठ जाती। अपना सारा गुस्सा दामाद पर उतारती। वह दामाद को गालियों से सराबोर कर देती। मैंने समझाया,” जिज्जी अब गालियाँ बकने का क्या औचित्य है? सारे सम्बन्ध तुमने खत्म ही कर दिए हैं। बिटिया की अन्त विदा कर दो, काहे अपने ऊपर भार लादे हो?”
प्राननाथ, हरबी जिज्जी तो मुझ पर बिगड़ गई। वह चट से बोली, “काए री! अपनी आंतजाई कहीं भार होती है। बड़ी आई अन्त पहुँचाने वाली, तू ही क्यों नहीं चली जाती है?” मैंने कपार ठोंक लिया। बताव ले, भलाई का ये जमाना है। इनकी इन्हीं बातों से लोग सरोजी की राय-बात नहीं चलाते हैं। जली-कटी सुनने की किसी को गुंजाइश नहीं है।
लड़का हर आठें रोज यहीं पड़ा रहता था। पर यह डायन (हरबी) मौड़ी को उसके पास फटकने भी न देती थी। वह गुस्से में बड़बड़ाती कि अब हमारा इससे क्या रिश्ता है, जो यहीं पड़ा रहता है। लड़के के रिश्तेदारों से भी लड़ गई थी कि क्यों उसे अपने घर रुकाती हो? बेचारे वे ब्याज में गाली सुनते।
सरोजी रिश्ते में मेरी बेटी लगती है। मैं उससे क्या बात करती? वह भी संकोच करती थी, मुझे भी झिझक होती थी।
वह मेरे यहाँ मट्ठा लेने आई थी। मैंने उसे बैठा लिया और उसके मन की टोह लेने के लिए लड़के वाली बात शुरू कर दी। उसने न हूँ कहा और न हाँ। मठा जैसा घूँट पीकर रह गई।
मैंने उसे समझाया कि सरोजी घर न छोड़, लड़का बुरा नहीं है। उससे गलती हो गई है, वह पछता रहा है। मुझे कह रहा था कि चाची मैं उसके पैर पकड़कर माफी माँग लूँगा। वह एक बार मुझे माफ कर दे।
“चाची, उसने खेत के पैसे क्यों बरबाद कर दिए?” वह कठोरता से बोली, “मैं उस हरामी के साथ न रहूँगी।”
बाई बोली तो, पर छाती फार बोली। मैंने उसे समझाया कि लरकदौंद थी, उससे गलती हो गई, तू उसे माफ न करेगी? उसके भैया-भाभी तो यही चाहते हैं कि तू कभी न आए, तो उन्हें उसका हिस्सा मिल जाए। मैंने उसे प्यार से फटकारा, “मेहेरिया, मुंसवा को प्रेम से रहते तो बनता नहीं है। चार दिन की जिन्दगी में आदमी न जाने कितने खटराग करता है।”
वह कुछ न बोली। मट्ठा लेकर घर चली गई।
लड़का गाँव आता-जाता रहता था। एक दिन मैंने उसे घर बुला लिया। आदर-सत्कार के बीच मैंने उससे वही बातें कही, जो सरोजी से कही थी। लड़का बोला, “चाची, वह जैसे में राजी होना चाहे, मैं वैसे में तैयार हूँ। मैं उसे भूल नहीं पा रहा हूँ।” उसके स्वर में दर्द छलक आया, “चाची, कुछ भी हो, मैं दूसरा ब्याह न करूँगा।”
उसके दर्द ने मुझे भी द्रवित कर दिया था। जरा सी बात पर बेचारे कैसे भटक रहे हैं। लड़का हर तरह से नबने को तैयार था। मैंने संकोच को परे धकेलकर पूछा, “इतने दिन आते-जाते हो गए, कभी तुम्हारा आमना-सामना हुआ?”
“हुआ चाची, काहे नहीं हुआ।” वह बोला, “पहली बार मैंने उसे दो हजार रुपये का नोट देने की कोशिश की थी कि खर्च के लिए रख ले, किसी की मजदूरी करने मत जाना। उसने मुझे बुरी तरह से झिड़क दिया था। गालियाँ भी बकी थी। पिछली बार उसने रुपये ले लिए थे।”
मैं समझ गई कि सरोजी का मन इसके प्रति लरजने लगा है। अकड़ कितने दिन चल सकती है? एक साल, दो साल… तीसरी साल लग गई। अब तक तो नदियों में न जाने कितना पानी बह गया होगा? उसी के साथ सरोजी का आक्रोश न बहा होगा ? बिलकुल बह गया होगा।
मैं उसे अन्दर वाले कमरे में बिठाकर हरबी के घर चली गई। काम के बहाने सरोजी को अपने घर ले आई। घर में उसे बैठा देखकर पहले तो वह अचकचानी, फिर वहीं बैठ गई। मैं बाहर निकल आई थी।
घंटे भर क्या बातें हुईं, वे तो मुझे पता न चली पर इतना जान चुकी थी कि उनके गिले-शिकवे दूर हो चुके थे।
उसी दिन वह सरोजी के लिए कपड़े-लत्ते खरीद लाया था। हरबी का मरा प्रतिरोध उनके प्यार के बीच दम तोड़ गया। अब लड़का हरबी के घर ही आने-जाने लगा था। सरोजी ससुराल पहुँच गई है। देखना है, अब उनका गृहस्थ जीवन कैसे चलता है। एक बार भूंज-भुगत लिया है, ठीक ही चलेगा।
प्राननाथ, हरबी जिज्जी भी खुश है। वह मुझे गरियाती है कि सारे गुना तेरे ही गोंठे है। मैंने कहा, “जिज्जी बुरा थोड़े किया?”
“बुरा तो नहीं किया, पर मुझसे छिपाकर तू यह सब करती रही। मुझे बता तो देती।”
” जिज्जी, मैं डर रही थी कि बात बिगड़ न जाए।”
“तू कैसी है री! अपने बारे में कुछ नहीं सोचती है, बस दूसरों के लिए सोचती रहती है।”
प्राननाथ मुझे सुकून का अनुभव हो रहा है। अब मैं तुम्हें भी समझा रही हूँ कि जल्दी लौट आओ, वरना चिरइया किसी दिन फुर्र हो जाएगी। फिर पीछे-पीछे दौड़ते रहोगे, कहे देती हूँ।
अरे हाँ… एक बात और, नत्थू का ब्याह है। दो-चार दिन के लिए तो जाना पड़ेगा। आप इजाजत दे दोगे, तो चली जाऊँगी। न हो तो आठ-दस दिन के लिए तुम्हीं चले आना। काफी दिन हो गए तुम ससुराल नहीं गए। मैं इन्तजार करूँगी।
आपकी ही
रमकल्लो


वाह री रमकल्लो!
न जाने किस मिट्टी की बनी है। किसी के घर में कैसी भी व्याधा हो उसे सुलझाने के चक्कर में पढ़ने की उसे आदत है। अरे किस घर में समस्याएं नहीं होती। पर उसका संवेदनशील हृदय इतना नरम है कि वह औरों की परेशानियां देख नहीं सकती। स्वयं तो अपने प्राननाथ के बिना अकेली रह रही है लेकिन गांव में हरबी जिज्जी की बेटी सरोजी की उसके पति से अनबन होने के कारण पति से अलगाव की बात ने उसे इतना बेचैन किया कि हरबी जिज्जी से झड़प होने के बावजूद भी रमकल्लो ने सरोजी व उसके पति को आपस में सुलह कराकर ही दम लिया।
गांव की स्त्रियां सरोजी का मजाक बनाने में लगी हुई हैं, उसकी भाभियां उसे ताने मारती हैं, अकेली लड़की देखकर अड़ोस पड़ोस के निखट्टू लड़कों की गंदी नजर सरोजी पर टिकी रहती है। रमकल्लो से यह सब न देखा गया। उसके विचलित मन ने वह काम कर दिखाया जिसमें सरोजी व उसकी माँ हरबी का अहम रोड़ा बना हुआ था। भला ऐसी भी जिद या अहम किस काम का? कितनी ही शादियां इसी अहम की वजह से दम तोड़ देती हैं। फिर बाद में पछताने से क्या जब चिड़ियां चुग जाएं खेत। उसने हरबी से दस बातें सुनने की परवाह किए बिना सरोजी और उसके पति का मिलाप करा ही दिया। इस पाती को पढ़कर लगता है कि रमकल्लो एक अच्छी मैरिज काउंसलर भी बन सकती है। उसकी तरह ही यदि कुछ और लोग भी हों समाज में तो न जाने कितने और शादी-शुदा जोड़ों के बीच समस्याएं सुलझ जाएं।
सरोजी वाले मामले को सुलझाने के बाद रमकल्लो अपने प्राननाथ को भी चेतावनी देना नहीं भूलती। पाती में बड़ी चतुराई से अपने प्राननाथ से कह ही देती है कि वह भी उसके पास आने में इतना समय न लगाएं कि किसी दिन पता चले कि चिड़िया उड़ गई और वह टापते ही रह जाएं। इसीलिए समय-समय पर वह किसी बात का जिक्र करते हुए उसे वापस गांव आने का आग्रह करती रहती है। इस बार भी मौका देखकर अपने मरगिल्ले भतीजे नथुआ की शादी में आने को कहना नहीं भूलती।
लखनलाल जी, रमकल्लो की पाती पढ़कर हर कोई उसके गुण गाते हुए उसके सम्मोहन के जाल में फंसता जा रहा है। गांव वही, लोग भी वही पर हर बार रमकल्लो की पाती पढ़ते हुये उसके बारे में कोई न कोई नई बात चौंका देती हैं। आपकी कल्पना व लेखन पर आपको बहुत बधाई।
-शन्नो अग्रवाल, लंदन
आदरणीया शन्नो जी, आप पाती की एक-एक खूबी को इस अंदाज में व्यक्त कर देती हैं कि लगता है उसे पढ़ते ही रहें। आपका बिंदास अंदाज रचना को तथा रचनाकार को एक स्टार लगा देती हैं। *मरगिल्ले भतीजे नथुआ* वाली बात पर तो मैं काफी देर तक हंसता रहा।
इतनी बढ़िया टिप्पणी के लिए आपका बहुत-बहुत आभार शन्नो जी
*समाधान बनती रमकल्लो*
अपनी रचनात्मकता के साथ रमकल्लो चौदहवीं पाती लेकर फिर उपस्थित हुई है। इस पाती में रमकल्लो नव विवाहित दंपति के परिवार को टूटने से बचने का सराहनीय प्रयास करती दिखाई देती है।
सिद्धहस्त कथाकार लखनलाल पाल ने इस पाती में ससुराल छोड़कर मायके में रहनेवाली सरोजी, उसकी हिमायती माँ हरबी और पड़ोसी महिलाओं के चरित्र को जिस प्रकार से गढ़ा है ऐसा लगता है लेखक अपने भोगे हुए समय को चित्रित कर रहा हो…
अक्सर देखने में आया है विवाहित बेटियों की ससुराल में अनबन के तमाम कारणों में मायकेवालों खासतौर पर बेटी की माँ की हठधर्मिता तथा स्वयं विवाहित बेटी की छोटीसी बातों को लेकर ससुराल छोड़ कर मायके आ जाना प्रमुख कारण हैं। गाँव के पिछड़े तथा अनपढ़ परिवारों में प्रायः बेटियाँ ससुराल छोड़ मायके आ जाती हैं। वे भूल जातीं हैं कि वे स्वयं अपने हँसते खेलते जीवन में अँगारे डाल रहीं हैं। माँ और मायके की सह पर वे दंभी व झगड़ालू स्वभाव कीं भी हो जाती हैं। ऐसी लड़कियाँ ससुराल और पति को तवज्जो नहीं देतीं। परिवार टूटने का यह भी एक बहुत बड़ा कारण है।
कथाकार लखन लाल पाल ने इस बात को प्रकारांतर से इस पाती में उठाया भी है।
थोड़ी बात रमकल्लो की…..
रमकल्लो ने अपनी बुद्धिचातुर्य से सबसे गाँव में आने वाले सरोजी के पति के हृदय टटोला, सरोजी के प्रति उसकी नेक मंशा को भाँपकर उसने सरोजी और उसके पति को आपस में मिलाने का निर्णय न केवल बुद्धि से लिया बल्कि रमकल्लो ने अपने विवेक से हरबी तक को नतमस्तक किया है। वास्तव में हरबी जैसे कठिन चरित्र को समझाने में भी रमकल्लो सफल हुई है।
. अभी तक जो रमकल्लो सामाजिक बुराइयों के प्रति संवेदनशील थी तथा कभी कभार विद्रोही तेवर अपनाती थी। अब वह सामाजिक समस्याओं को लेकर बखेड़ा खड़ा न करके उनके समाधान की ओर चल पड़ी है।
अँधेरी सुरंग में रोशनी की लकीर खींचती हुई…
एक खुद्दार,जुझारू और न्यायप्रिय आदर्श महिला रमकल्लो के मानवीय गुणों का चारित्रिक विकास तथा उनका सामाजिक रूप में प्रकटीकरण होना साधारण बात नहीं है।
मुझे लगता है कहानी के पैरोकारों और विमर्शकारों को रमकल्लो की इस पाती में स्त्री विमर्श के सात्विक सूत्रों के उद्गम को अवश्य देख लेना चाहिए।
जन्म जन्म एबाती रहे रमकल्लो।
समाधानमूलक सृजन के लिए आदरणीय लखन लाल पाल को बधाई।
रामशंकर भारती
आदरणीय डॉ रामशंकर भारती जी, आपकी समीक्षा रमकल्लो के चरित्र को ही उद्घाटित नहीं करती है बल्कि चरित्र में उसकी मंशा को भी व्यक्त कर देती है। *स्त्री विमर्श के सात्विक सूत्रों के उद्गम* वाली बात आपने रमकल्लो के चरित्र के माध्यम से कहकर उसे विशिष्टता प्रदान की है।
बढ़िया समीक्षा के लिए आपका बहुत-बहुत आभार भारती जी
बिटिया रमकल्लो
खुश रहो ,
हमार बहुत-बहुत आसिरबाद र लेव बिटिया,
यह बेर की तोहरी पाती पढ़िके तो तुम का जेतना आसिरबाद देंय सब कम है।
सरोजी कां उनके दूलहा के साथे ,उनके अपने घरे में भेजिके तुम जौन पुन्य कै काम किहिउ है बिटिया ,वह के बदे हम तुम्हरी जौन तारीफ करैं सब कम है।
हजारन बरिस से यह दुनियां कें बढ़ियां से चलावत आए रही,ई सादी के मंड़वे में लगी गांठि अब दिन-दिन ढीली होत जात है। छोट-छोट बातिन पर मियां -बीवी कोरट- कचहरी पहुंच जात हैं और तलाक लेके बैइठि जात हैं, चाहे बाद में सारी जिंनगानी रोवै का ही पड़ै।
इहां तो तुम्हरी बिटिया लगै वाली, सरोजी भी बहुतै बढ़ियां काम किहिस है, नैहरे आइ के बैठि गई और जबले वहि की तसल्ली नाहीं भई कि मियां जी सुधरि गए हैं,तब तक धीरज धरि के बैठी रही। बीए- येम्मे पढ़ी सहरी बिटियन से तो हमरी सरोजी ही बढ़ियां रही, जौन दूल्हा को भी सुधारि लिहिस और आपन घर भी बचाय लिहिस।
अरे ,सादी बियाह दुइ हाड़ -मास के मनई के बीच का रिस्ता है कौनो काठ-पाथर का नाही, गलती केहू से भी होइ सकति है। यहि का ई मतलब तो नाहीं कि सात जनम कै कसम तोड़ि दिहा जाए। अरे, मान -मनौउवल, फरियाद -सिकायत , दण्ड -जरीमाना,
सब करौ, लेकिन घर तौ न बर्बाद करौ!
यह कलजुग मां टूटे घरन मां पलि रहे बालक बड़े हुइ के कइस समाज बनइ हैं ,ई केहू नाहीं सोचत।आपन बुढ़ापा बिगरिहै सो अलग। यही सब सोचिके बिटिया हमारा जीउ तो करि रहा है कि दौउरि के तोहका करेजा से लगाइलें । लेकिन ई हुइ नाहीं सकत, सो तुमका यहीं से असीस रही हैं। भगवान तोहरे जइस बिटिया सबही कां देयं।
अउर अपने प्राननाथ का भी तुम बढ़ियां से सनकारि(संकेत कर दिया है)दिहे हौ कि तोहसे जल्दी आइके मिलि लेंय , नाहीं तो तुमहूं अपने नइहरे जाइके बैइठि जइहौ, तोहरे लगे तौ उहां ठने बियाह का बहाना भी है ना।
राम जी चहिहै तौ तुम्हार मनसेधू(पति) चिट्ठी पावत ही घरे चलिए अइहैं।
बस बिटिया ,अब ई बुढ़ापा मां हम इतनी लंबी पाती लिखिके थक गई हैं।
एक बार फिर से तोहका हमार असीस।
आदरणीया सरोजिनी पाण्डेय जी, आपकी मनमोहक टिप्पणी पढ़कर अभिभूत हो गया हूं। आप रमकल्लो को इतने गहरे तक समझ रही हो यह रचनाकार के लिए सौभाग्य की बात है।
इतनी बढ़िया टिप्पणी के लिए सरोजिनी पाण्डेय जी आपका बहुत-बहुत आभार
विगत कुछ समय से वरिष्ठ लेखक लखन लाल पाल की कथा श्रृंखला रमकल्लो की पाती धारावाहिक के रूप में प्रकाशित हो रही है। यह पुस्तकाकार रूप में भी प्रकाशित हो चुकी है। विगत दिनों इसके कुछ अंश पढ़ने का सुअवसर प्राप्त हुआ। कल ही इसकी चौदहवीं कड़ी पुरवाई पत्रिका में प्रकाशित हुई है। सोंधी बुंदेली की छटा से युक्त एक अल्पशिक्षित प्रोषितपतिका महिला रमकल्लो द्वारा अपने पति को लिखी गई चिट्ठियों में आधुनिक ग्रामीण परिवेश साकार होता दिखाई देता है। इन चिट्ठियों के माध्यम से आधुनिक और आत्मनिर्भर होती महिला की छवि भी हमारी आंखों के सामने मूर्तमान होती है। इन चिट्ठियों में पति के घर पर न रहने पर पत्नी के समक्ष आने वाली चुनौतियों और समस्याओं का खाका तो है ही, साथ ही उनके रोचक समाधान भी देखने को मिलते हैं। यह पाल जी की नवोन्मेषी दृष्टि का कमाल है कि उनकी रमकल्लो तेज़ी से परिपक्व होती जा रही है और चौदहवीं कड़ी तक आते आते वह बुन्देली के देशज शब्दों को छोड़कर प्रशंसा, विषाद, चेष्टा, भविष्य, हठधर्मिता, अनुभव, परित्यक्ता, औचित्य, सत्कार, द्रवित, आक्रोश, प्रतिरोध इत्यादि जैसे क्लिष्ट और तत्सम शब्द भी बेझिझक प्रयोग कर रही है। इक्कीसवीं सदी की आधुनिक भारतीय ग्रामीण समाज की महिला की छवि के दर्शन करने हों तो आप रमकल्लो से संपर्क कर सकते हैं।
आदरणीय प्रोफेसर पुनीत बिसारिया जी, आपकी प्रतिक्रिया रमकल्लो के क्रमिक विकास के साथ एक ग्रामीण महिला के आत्मनिर्भर और उसकी जिजीविषा को रेखांकित करती है। आपने गहनता के साथ उस पात्र के व्यक्तित्व का स्पष्ट खाका खींच दिया है। साहित्य समाज में लेखक की इसे स्वीकार्यता कही जाएगी। इस महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया के लिए आपका हृदय से आभार
आदरणीय लखनलाल पाल जी,
सरोजी बैठीं नहीं रह सकतीं है , रमकल्लो की पाती का चौदहवां हिस्सा मनोयोग से पढ़ने के बाद कुछ तथ्य उजागर हुए हैं जो इस प्रकार है –
वर्तमान परिदृश्य में विवाहित नारी की स्थिति को रचनाकार ने स्पष्ट किया है और विवाहिता की मनोदशा का विवरण भी प्रस्तुत किया है. विवाहिता के इस आचरण के लिए कौन जिम्मेदार है इस बात के संकेत दिए हैं.
सरोजी और उसके पति में कौन गलत है और कौन सही है इसका निर्णय करना मुश्किल है इसलिए हमारे मतानुसार दोनों अपने अपने स्थान पर सही है.
रमकल्लो सरोजी में स्वयं को देखतीं है और पति जब दूर होता है तो उस औरत की ओर देखने का समाज का नजरिया कैसा होता है यह बताना जरूरी नहीं है.
सरोजी के दर्द को देखते हुए रमकल्लो खुद दुःखी हो जाती है और वह सरोजी को उसके पति की पुन:प्राप्ति कराने में कामयाब भी होती है और अंत में अपने प्राण नाथ को उलाहना देते हुए कहती है की कहीं देर न हो जाए!!
आप की पाती की महक में दिन-प्रतिदिन इज़ाफ़ा हो रहा है, बकौल मंजूर हाशमी –
तेरे खतूत की खुशबू तो अब भी जिंदा है,
पढूं तो अब भी महकती हैं उंगलियां मेरी!!
बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं
सादर
प्रो. विजय महादेव गाडे
आदरणीय प्रोफेसर विजय महादेव गाडे जी, आपने रमकल्लो की सहृदयता का बहुत सटीक विश्लेषण किया है। *रमकल्लो सरोजी में स्वयं को देखती है* यह वाक्य पूरी पाती का सार कह देता है।
इतनी बढ़िया प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत-बहुत आभार सर
सर जी!
रमकल्लो ने सही लिखा। उसने वाकई बड़ा काम किया है।
रामकल्लो की चिट्ठी का यह भाग प्रभावित कर गया। वाकई उसने प्रशंसनीय काम किया है। तारीफ करनी तो बनती है। जिस माँ की बेटी का उजड़ा घर बस गया, बसाने वाले के प्रति उसकी दुआ दिल से निकलती है।
प्राणनाथ भी प्रशंसा किए बिना नहीं रहेंगे।
इसके लिए रमकल्लो बधाई की पात्र है। हमारी तरफ से भी।
तारीफ इस बात की है कि उसने बहुत ही समझदारी के साथ अपने काम को अंजाम दिया। और काम बन गया।
अब प्राणनाथ के सतर्क होने की बारी है क्योंकि रामकल्लो ने कह दिया है-
*अब मैं तुम्हें भी समझा रही हूँ कि जल्दी लौट आओ, वरना चिरइया किसी दिन फुर्र हो जाएगी। फिर पीछे-पीछे दौड़ते रहोगे, कहीं देती हूँ।*
अब प्राणनाथ के सतर्क होने की बारी है।
अबकी बार इस पाती में गाँव की बोली और देशज शब्दों का प्रयोग भरपूर हुआ। कहानी और अधिक जीवन्त हो गई।
नहियाँ,बायफेल हो गया,डिड़कार छोड़ कर ,चील के……।(पुराने समय में हमारे यहां भी यह कहावत बहुत चलती थी। जब बच्चे कोई ऐसी चीज माँगते थे जो उनके लिए देना मुश्किल हो तो घर की बुजुर्ग महिलाएँ ऐसा ही कहती थीं- बाए तो चील को…चइये। पाती में बर्बाद करने से अर्थ है) मारे बाद कौवा हाड़ भले ले जाए,ठ्वासरे,फारकती
*ऊसर मन को उर्वर बनाने के वास्ते*,(वाह जैसा लगा) जवान बेटी पेट में नहीं समा सकती(क्या बात है),आंतजाई,कपार ठोंक लेना,लरकदौंद,
ठ्वासरे का अर्थ समझ नहींआया।
एक वाक्य जो बहुत अच्छा लगा- *अब तक तो नदियों में न जाने कितना पानी बह गया होगा। उसी के साथ सरोजी का आक्रोश न बहा होगा।*
मरा प्रतिरोध दम तोड़ गया।(काश प्रतिरोध इसी तरह मरा करें)
बहुत-बहुत बधाई इस पाती के लिये ।
प्रस्तुति के लिए तेजेन्द्र जी का शुक्रिया।
पुरवाई का आभार।
आदरणीया नीलिमा करैया जी, आपने पाती का बहुत गहराई से विश्लेषण किया है। उसमें प्रयुक्त लोकभाषा के शब्दों पर आपने विशेष दृष्टि डाली है। लोकभाषा के परिचित शब्द किसी न किसी रूप में हमारे विगत जीवन को सामने लाकर खड़ा कर देते हैं।
*ठ्वासरे मारने* का अर्थ है कि सामने वाले को गुस्से में कठोर शब्दों का प्रयोग करके उसे आहत कर देना।
बढ़िया प्रतिक्रिया के लिए नीलिमा करैया जी आपका बहुत-बहुत आभार