Monday, February 23, 2026
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दीपक गिरकर की कहानी – सात जन्मों का रिश्ता

आज मेरे जीवन का सर्वाधिक स्वर्णिम दिन उदित हुआ था। मैं और गौरी,  हम दोनों ने बारहवीं की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की थी। हर्ष से अभिभूत होकर आई ने घर में भगवान की मूर्ती के समक्ष शक्कर अर्पित की। मैंने श्रद्धापूर्वक आई-बाबा तथा आजी-आजोबा के चरण स्पर्श किए। उनके स्नेहिल करों का स्पर्श और आशीर्वचनों की वर्षा से मेरा हृदय कृतज्ञता से भर गया। 
“आई, मैं ओझर होकर आता हूँ,”  मैंने विनम्र स्वर में कहा, “तीन-चार दिनों में पुनः लौट आऊँगा।”
तभी मेरे बाबा ने स्नेह और चिंता मिश्रित स्वर में पूछा – “गिरीश, पर तुम्हें कोचिंग कक्षा भी तो प्रारम्भ करनी है, है न?”
“हाँ, ” मैंने कोमल स्वर में उत्तर दिया, “परंतु एक बार जब मैं पुनः अध्ययन में तल्लीन हो जाऊँगा, तब शायद गाँव जाना संभव न हो पाए। दादासाहब और माई की स्मृतियाँ बार-बार मन को व्याकुल कर रही हैं।”
मेरी छोटी बहन तनूजा ने कहा – “हट लबाड़! ऐसा क्यों नहीं कहता कि मुझे गौरी मौसी की याद आ रही है।”   
इतना कहकर मेरी छोटी बहन मुझे जीभ निकालकर चिढ़ाते हुए दूसरे कमरे में भाग गई।  
आई ने स्नेहिल मुस्कान के साथ कहा – “अच्छा, जब तुम गाँव जाओ तो साथ में कुछ मिष्ठान अवश्य ले जाना। ऐसा करो, तुम मेरे लिए गुलाब जामुन का मावा ले आओ। मैं शीघ्र ही ताज़े गुलाब जामुन बना दूँगी। तुम्हें ज्ञात है न, गौरी को गुलाब जामुन अत्यंत प्रिय हैं।”
आई के शब्दों में केवल ममता ही नहीं, अपितु परिवार के प्रति जुड़ाव और अपनत्व की मधुर सुगंध भी घुली हुई थी।
“आई, आपको तो केवल गौरी की ही पसंद-नापसंद ज्ञात रहती है, मेरी नहीं। मुझे भी गुलाब जामुन अत्यंत प्रिय हैं,” मैंने हँसते हुए हल्की शिकायत की।
आई ने स्नेहिल दृष्टि से मुझे देखा और बोलीं – “अरे बाबा, मुझे सब मालूम है। तुम दोनों ही मेरे लिए समान हो। अब अधिक तर्क न करो; शीघ्र ही बाज़ार जाकर मावा ले आओ, ताकि मैं तुरंत गरमागरम गुलाब जामुन बना सकूँ”
आई के स्वर में अपनापन, अधिकार और ममता का अद्भुत संगम था, जिसने घर के वातावरण को और भी मधुर बना दिया।
अगले दिन मैंने आई से आज्ञा लेकर एस.टी. बस द्वारा ओझर के लिए प्रस्थान किया। लगभग पाँच घंटे की यात्रा थी। बस जैसे ही मार्ग पर तीव्र गति से दौड़ने लगी, मैंने नेत्र मूँदकर कुछ विश्राम करने का प्रयास किया; किंतु निद्रा मेरी पलकों पर ठहर न सकी। बार-बार गौरी का मुखमंडल ही आँखों के सम्मुख उभर आता था।
गौरी का जन्म ओझर में हुआ था। वह अत्यंत रूपवती, चंचल और प्रखर बुद्धि की बालिका थी। आरंभ से ही संवेदनशील, धैर्यशील और गंभीर स्वभाव की गौरी अध्ययन में विलक्षण थी। वह प्रायः प्रत्येक कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त करती, शासकीय विद्यालय में आयोजित समस्त कार्यक्रमों में उत्साहपूर्वक सहभागिता करती और विविध उपक्रमों में अग्रणी रहती। इन्हीं गुणों के कारण वह समस्त अध्यापकों की प्रिय शिष्या थी।
सरल, मितभाषी और सौम्य स्वभाव की गौरी विद्यार्थियों के बीच भी अत्यंत लोकप्रिय थी। मैं और गौरी बाल्यकाल से ही अभिन्न मित्र थे। उसे देखे हुए सात वर्ष व्यतीत हो चुके थे, परंतु बाल्यावस्था की वही छवि आज भी मेरे मन के दर्पण में अंकित थी।
वह मेरी बचपन की सहेली थी। हम साथ में घर-घर खेला करते थे, उन खेलों में कभी-कभी हम आपस में झगड़ते भी। पर वह झगड़े केवल क्षणिक थेअक्सर देखते-देखते हम एक-दूसरे के हृदय में धीरे-धीरे बसने लगे थे।
हमारे मन में उस समय अपने भावी घर और साझा जीवन का सपना बनने लगा था, पर हमें स्वयं भी इसका अहसास नहीं था। बचपन की मासूमियत और खेल-कूद के भीतर ही हमारे भीतर भविष्य की छाया पल रही थीएक अनजाने प्रेम की, जो धीरे-धीरे वास्तविकता का रूप लेने वाली थी।
बचपन में गौरी प्रायः परकर-पोलका पहनती थी, जिसमें वह अत्यंत सुसज्जित और मनोहर प्रतीत होती। ओझर मेरी आई का मायका था और गौरी मेरी सगी मौसी थी। बाल्यकाल में हम दोनों खेल-कूद में ऐसे तल्लीन हो जाते कि समय का भान ही नहीं रहता। 
गाँव की गलियों में मैं गौरी को अपनी साइकिल पर बिठाकर घुमाया करता था,  अधिकतर उसे आगे की डंडी पर बैठाता।
जब भी गौरी मेरी साइकिल की आगे की डंडी पर बैठती, उस क्षण मुझे मानो स्वर्गिक आनंद की अनुभूति होती; जैसे निष्कपट बालस्नेह की वह मधुर स्मृति आज भी मेरे हृदय में सुवासित होकर जीवित हो।
मैं ओझर पहुँचा। दादासाहब और माई घर पर नहीं थे; घर में केवल गौरी ही मिली। मुझे देखते ही उसके मुख पर प्रसन्नता की उजली आभा फैल गई। मैं क्षणभर उसे निहारता ही रह गया।
उसका गौर, गुलाबी वर्ण मानो नवप्रभात की अरुणिमा से आलोकित था। कमल-पंखुड़ियों से सुसज्जित से प्रतीत होते उसके बड़े-बड़े नेत्र, आकर्षक गुलाबी अधर, कपोलों पर पड़ती मनोहर खली, सुडौल चाफेकली-सी नासिका, संतुलित देहयष्टि, मधुर वाणी और कमर तक लहराते केश, सब मिलकर उसकी छवि को अद्वितीय बना रहे थे। उसकी हँसमुख आँखों में सहज आत्मीयता झलकती थी। साधारण परिधान में भी उसका सौंदर्य और अधिक निखर उठा था।
गौरी ने बताया कि दादासाहब और माई किसी विवाह समारोह में बाहर गाँव गए हैं। तब मैंने मुस्कराते हुए कहा—
“हम दोनों प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण हुए हैं; क्यों न इस शुभ अवसर पर तुम्हारे विठोबा के मंदिर में दर्शन कर आएँ?”
वह तत्परता से बोली – “मैं अभी शीघ्र तैयार होकर आती हूँ।”
कुछ ही क्षणों में वह सुसज्जित होकर मेरे सम्मुख आ खड़ी हुई। अधरों पर लज्जित मुस्कान थी और मुखमंडल पर अनुपम आभा। उसके रूप का तेज जैसे वातावरण में प्रस्फुटित हो उठा था। उसे देखते हुए मेरे मन में अनायास विचार उठा,  मानो ईश्वर ने उसे विशेष अवकाश के क्षणों में अत्यंत मनोयोग से रचा हो।
हम दोनों विठोबा के मंदिर की ओर चल पड़े। मंदिर घर के निकट ही स्थित था। दर्शन के पश्चात् हम मंदिर के ओटले पर बैठकर बातचीत करने लगे। लगभग सात वर्षों के अंतराल के बाद यह मिलन हुआ था; अतः समझ में नहीं आता था कि कितना कहें और कितना मन में ही रहने दें।
आज गौरी मानो आनंद से उन्मुक्त हो उठी थी। सात वर्ष पूर्व की वह बालिका अब अनुपम यौवन-लावण्य से दीप्त एक सुकन्या बन चुकी थी। बचपन से ही वह निःसंकोच और स्वाभाविक थी; वही सहजता आज भी उसके व्यक्तित्व में विद्यमान थी।
उसे देखकर मेरा मन अनायास ही प्रफुल्लित हो उठता। उसके साथ बिताया प्रत्येक क्षण मुझे आंतरिक ताजगी से भर देता था। मेरे संग होने का उसे भी जैसे मौन हर्ष था,  वह कुछ कहती नहीं, पर उसकी आँखों की चमक बहुत कुछ व्यक्त कर जाती थी।
हमने अध्ययन, भविष्य की योजनाओं और जीवन की अनेक बातों पर विस्तार से चर्चा की। वार्तालाप करते-करते कब संध्या ढलकर रात्रि में परिवर्तित हो गई, इसका भान ही न रहा।
अंततः हम घर लौट आए। रात्रि में दादासाहब और माई भी वापस आ गए। मैंने श्रद्धापूर्वक उनके चरण स्पर्श किए। मुझे देखकर उनके मुखमंडल पर प्रसन्नता की उजली आभा फैल गई; वर्षों बाद का यह स्नेहिल मिलन पूरे घर में आनंद का संचार कर रहा था।
दूसरे दिन प्रातः मैं निश्चिंत भाव से जागा। स्नानादि से निवृत्त होकर मैंने कांदे-पोहे का स्वादिष्ट नाश्ता किया और माई द्वारा स्नेहपूर्वक बनाए गए बेसन के लड्डुओं का आस्वाद लिया। घर का वह सादा, आत्मीय वातावरण मन को अत्यंत प्रिय लगा।
नाश्ते के उपरांत मैंने दादासाहब की साइकिल बाहर निकाली और मुस्कराकर गौरी से कहा –
“क्या तुम मेरे साथ साइकिल पर चलोगी? चलो, खेतों की ओर घूम आते हैं।”
वह हल्की संकोचभरी हँसी के साथ बोली –   “अब मैं तुम्हारी साइकिल पर नहीं बैठूँगी।”
मैंने आश्चर्य से पूछा – “क्यों, क्या मुझसे कोई भूल हो गई?”
वह बोली –  “नहीं, ऐसी कोई बात नहीं। अब मुझे संकोच होता है… और दादासाहब भी मुझे खेत तक जाने की अनुमति नहीं देंगे। ऐसा करते हैं, हम ऊपर छत पर बैठकर आगे की पढ़ाई और भविष्य की बातें करते हैं।”
वह अध्ययन में सदैव कुशाग्र रही थी। मैंने ग्यारहवीं से गणित विषय चुना था। अवसर पाकर मैंने उससे कहा – “मैं एन.डी.ए. उत्तीर्ण कर भारतीय वायुसेना में सम्मिलित होना चाहता हूँ।”
उसके नेत्रों में गर्व की चमक उभर आई। वह बोली –  “यह तो अत्यंत श्रेष्ठ संकल्प है। तुम भी दादासाहब की भाँति वायुसेना में जाकर देश-सेवा करोगे।”
गौरी ने कला-विषय चुना था और आगे चलकर बी.ए. करने का निश्चय किया था। घर में मेरी उपस्थिति से उसे एक विशेष आत्मीयता का अनुभव होता था। वह स्वभाव से सेवा-भावी थी; घर के प्रत्येक सदस्य की सहायता करने में उसे संतोष मिलता।
कुछ क्षण मौन रहकर उसने प्रसन्न स्वर में कहा  –  “संध्या को हम नदी के घाट पर चलेंगे। वहाँ की शांति में बैठकर बातें करने का अपना ही आनंद है।”
उसके शब्दों में एक सरल आमंत्रण था  और मेरे मन में उस संध्या की प्रतीक्षा अनायास ही अंकुरित हो उठी।
दादासाहब भारतीय वायुसेना से सेवानिवृत्त हो चुके थे। देशभक्ति का प्रथम संस्कार मैंने उन्हीं से प्राप्त किया था। उनके व्यक्तित्व में अनुशासन, साहस और राष्ट्रनिष्ठा का अद्भुत समन्वय था। विस्तृत कृषि-भूमि और समृद्ध व्यवस्था के कारण उनका परिवार ग्राम के संपन्न एवं सम्मानित परिवारों में गिना जाता था।
दोपहर के भोजन के उपरांत दादासाहब ने स्नेहपूर्ण किंतु गंभीर स्वर में मुझसे पूछा – “गिरीश, अब आगे तुम्हारा क्या विचार है?”
मैंने विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया – “दादासाहब, मेरा संकल्प है कि मैं एन.डी.ए. उत्तीर्ण कर भारतीय वायुसेना में प्रवेश करूँ। इसके लिए मैं प्रवेश परीक्षा की तैयारी करूँगा और कोचिंग कक्षा भी जॉइन करूँगा। आगे समय अत्यंत सीमित हो जाएगा, इसलिए आप सबके दर्शन और आशीर्वाद लेने हेतु ही मैं यहाँ आया हूँ।”
मेरी बात सुनकर दादासाहब ने स्नेह से मेरी पीठ थपथपाई और दृढ़ स्वर में कहा –
“वेरी गुड! मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है। तुम निश्चय ही सफल होगे। देश-सेवा का मार्ग कठिन अवश्य है, परंतु वही जीवन को सार्थक बनाता है।”
उनके इन शब्दों ने मेरे अंतर्मन में उत्साह और आत्मविश्वास की नई ज्योति प्रज्वलित कर दी।
संध्याकाळ को गौरी और मैं नदी के घाट की ओर पैदल चले। घाट पर पहुँचकर हम चुपचाप पानी में पत्थर फेंकने और लहरों की हल्की आवाज सुनने में रम गए। नदी की ठंडी हवा और चारों ओर की शांति ने हमारी बातचीत को और मधुर बना दिया। समय का पता ही नहीं चला; क्षण एक-दूसरे में घुलते गए।
फिर गौरी ने हल्के स्वर में एक गीत गाना शुरू किया। “ये रातें ये मौसम नदी का किनारा…” उसका स्वर नदी की कल-कल करती धारा में घुला हुआ प्रतीत हो रहा था,  मधुर, कोमल और सहज। मैं बस उसकी आवाज़ में खो गया  और यह अनुभव ऐसा था मानो प्रकृति और उसका संगीत दोनों ही मेरे भीतर समा गए हों।
उस गाने की मधुरता और उसके स्वर की आत्मीयता ने हमारे उस संध्या के पल को अविस्मरणीय बना दिया।
गाना समाप्त होते ही उसने मुझसे प्रश्न किया – “कैसा लगा तुम्हें यह गीत?”
मैंने मुस्कराते हुए कहा – “बहुत ही सुंदर!”
उसकी आँखों में झलकते उत्साह को देखकर मैं थोड़ा हिचकिचाते हुए, पर सच्चाई से बोला – “गौरी मौसी,  तुम मुझे बहुत पसंद हो। मैं तुमसे प्रेम करता हूँ।”
“अब तो मौसी बोलना बंद करो।” उसने मेरी पीठ पर धौल जमाते हुए कहा।
गौरी ने गंभीर लेकिन आत्मविश्वास भरे स्वर में उत्तर दिया – “अगर तुम वास्तव में मुझसे प्रेम करते हो, तो पहले अच्छे से पढ़ाई करो और वायुसेना में प्रवेश प्राप्त करो। तभी मैं तुम्हारे साथ विवाह करूँगी। मैं तब तक तुम्हारा इंतजार करूँगी।”
तीसरे दिन,  मैंने औरंगाबाद के लिए प्रस्थान किया। उस संध्या गौरी के साथ बिताए गए क्षण मेरे मन में गहरे अंकित हो गए थे,  एक ऐसा स्मरण, जो भविष्य की चुनौतियों और सपनों में प्रेरणा बनकर मेरे साथ रहेगा।
मैंने एनडीए की कोचिंग क्लासेस ज्वॉइन कीं और पूरे मनोयोग से अध्ययन में तल्लीन हो गया। पढ़ाई करते समय हमेशा गौरी की स्मृति मेरे मन में जीवित रहती।  उसकी वह मधुर वाणी गूँजती रहती, “गिरीश, तू बहुत मेहनत कर और एनडीए उत्तीर्ण कर के एअरफोर्स जॉइन कर, मैं तुम्हारा इंतजार करूँगी।”
पहले ही प्रयास में मुझे एनडीए में प्रवेश मिल गया। दो वर्षों तक मैंने खडगावासला के कॉलेज में अध्ययन किया और साथ ही ट्रेनिंग भी प्राप्त की। दो वर्षों की कड़ी मेहनत और अनुशासन के बाद मुझे भारतीय वायुसेना में सेकंड लेफ्टिनेंट का पद मिला। मेरी पोस्टिंग लेह में हुई।
इस बीच, गौरी ने बी.ए. फर्स्ट डिवीजन में उत्तीर्ण किया। लेह जाने से पहले, एक दिन मैं ओझर गया और गौरी से मिलने आया। समय ने गौरी पर भी अपनी जादूगरी छेड़ी थी; वह अब और भी सुंदर और आकर्षक हो गई थी।
उसके मादक नेत्रों में मैं पूरी तरह खो गया था।  मेरी दृष्टि वहीं अटक गई  और मेरा हृदय उसकी आँखों की मोहक झील में पूरी तरह डूब गया। उसके रूप, उसकी आँखों की गहराई और उसकी सहजता ने मुझे मंत्रमुग्ध कर दिया।
मैंने लेह में अपनी पोस्टिंग ज्वॉइन कर ली थी। प्रारंभ के कुछ दिनों तक मन बिलकुल ठीक नहीं था। घर की यादें बार-बार सतातीं, माँ और गौरी की मुस्कान, उनका स्नेह, सब मेरी आँखों के सामने घूमता रहता। अकेलापन और नई जिम्मेदारियों का भार मन पर भारी लग रहा था। परंतु समय के साथ, धीरे-धीरे मैं लेह की कठोर परंतु मनोहारी वायु, ऊँचाईयों की शांति और अपने कार्य की गंभीरता में रम गया। अपने कर्तव्य में मन लगने लगा  और घर की यादें अब प्रेरणा बन गईं।  गौरी की प्रतीक्षा और परिवार की आशा ने मुझे हर चुनौती का सामना करने की शक्ति दी।
एक दिन, पड़ोसी दुश्मन देश ने अचानक हमारे देश पर आक्रमण कर दिया। उस समय मैं अपने फायटर विमान में आसमान की नीली गहराइयों में तैनात था। अचानक मेरी दृष्टि में दुश्मन देश के दो फायटर विमान प्रकट हुए। बिना एक पल गंवाए, मैंने उनमें से एक पर तीव्र हमला किया और उसे सफलतापूर्वक नीचे गिरा दिया।
परंतु उसी क्षण, मेरे विमान पर दुश्मन के विमानों ने सामूहिक और रणनीतिक हमला कर दिया। उनकी गति और आक्रमण की तीव्रता भयावह थी। वायु में घूमते हुए विमानों की गरजती आवाज़, गनफायर की झड़प  और बम फटने की गूँज,  सब मेरे मन और शरीर में चरम तनाव पैदा कर रहे थे।
उस क्षण, मेरे हृदय में साहस की ज्वाला प्रज्वलित थी और दिमाग युद्ध-कौशल की तीव्र सोच में लीन था। हर निर्णय, हर मोड़,  सबका प्रभाव न केवल मेरी जान पर, बल्कि देश की सुरक्षा पर भी था। एक पल की चूक जीवन के लिए घातक हो सकती थी  और देश के प्रति मेरा कर्तव्य मेरे कंधों पर भारी था।
अपने प्रशिक्षण और साहस की पूरी शक्ति लगाकर मैंने दुश्मन देश के सभी फायटर विमान सफलतापूर्वक मार गिराए। अंततः, थकान और जोखिम के बावजूद, मैंने अपना फायटर विमान सुरक्षित रूप से लेह में उतारा। उस क्षण जब मैं विमान से बाहर निकला, तो हृदय गर्व और संतोष से भर गया।  देश की सेवा और अपने कर्तव्य की पूर्ति की अनुभूति में हर सांस गौरव से झूम रही थी।
अगले दिन, दुश्मन देश के दर्जनों फायटर विमान हमारी सीमा पर मंडरा रहे थे। हमारी देशभक्त वायुसेना के साहसी पायलटों ने बिना झिझक, दुश्मन के विमानों पर ताबड़तोड़ हमले शुरू कर दिए। मैं भी अपने फायटर विमान में दुश्मन के आकाश में प्रवेश करके तबाही मचा रहा था।
लेकिन अचानक, मेरा विमान डावाडोल हो गया। विमान अनियंत्रित होकर दुश्मन देश में गिर पड़ा। उस क्षण, मैं अपने होश खो बैठा और अंधकार में डूब गया।
जब मैं धीरे-धीरे होश में आया, तो पाया कि मुझे दुश्मन देश के सैनिकों ने पकड़ लिया था। मेरी आँखों के सामने उनके सशस्त्र रूप, कठोर निगरानी और जाल जैसी सुरक्षा व्यवस्था थी। मुझे गिरफ्तार कर उनकी जेल में बंद कर दिया गया। चारों ओर सन्नाटा, ठंडी दीवारें और दुश्मन की चेतावनी भरी निगाहें,  सब मेरे मन और शरीर में भय और तनाव का संचार कर रही थीं।
मैं उस समय न केवल अपने जीवन की अनिश्चितता का सामना कर रहा था, बल्कि देश के प्रति अपने कर्तव्य की चिंता और अपने परिवार और गौरी की याद में भी डूबा हुआ था। हर क्षण मेरी आत्मा को चुनौती दे रहा था।  कैसे मैं इस जेल से बाहर निकलूँ और अपने देश की सेवा फिर से कर सकूँ?
दुश्मन देश के सेना के अधिकारी रोज़ मुझे अत्यंत कठिन परिस्थितियों में रखते थे। उनका उद्देश्य केवल मेरा भय उत्पन्न करना नहीं था, बल्कि हमारे देश के सैनिक अड्डों और सेना से संबंधित गोपनीय जानकारी प्राप्त करना था। हर दिन उनके क्रूर प्रश्न और शारीरिक पीड़ा की घड़ियाँ मेरे साहस और धैर्य की परीक्षा लेती थीं। जेल की ठंडी दीवारें और अंधेरा मेरे चारों ओर एक बंद शिकार की तरह महसूस हो रहे थे। परंतु, मेरे हृदय में देशभक्ति की लौ कभी बुझी नहीं। हर यातना के बीच, मैं अपने देश की सुरक्षा और अपने कर्तव्य को याद करता,  यह विचार मेरे भीतर अदम्य साहस और अडिग आत्मविश्वास का संचार करता। मेरे मन की आवाज़ थी कि, चाहे शारीरिक रूप से कितना भी पीड़ा सहनी पड़े, मैं अपनी मातृभूमि के रहस्य किसी कीमत पर उजागर नहीं करूँगा। हर कठिनाई, हर यातना मेरे साहस को और अधिक दृढ़ करती गई। और इसी अदम्य साहस ने मुझे भीतर ही भीतर यह विश्वास दिलाया कि एक दिन मैं इस बंदी जीवन से मुक्त होकर फिर से अपने देश की सेवा में लौटूँगा।
जब दुश्मन देश में सरकार बदली, तो दोनों देशों के कैदियों की अदला-बदली का निर्णय लिया गया। इतने लंबे समय तक जेल में बंद रहने के बाद सात वर्ष और चार माह बाद मुझे आज़ादी का अवसर मिला।
सात वर्ष चार माह की कठिनाई और संघर्ष के बाद, जब मैं अपने देश लौट आया, तो मेरे कदम घर की ओर बढ़ रहे थे, पर दिल धड़क रहा था,  हर धड़कन में उम्मीद और अधीरता घुली हुई थी। जैसे ही मैं घर के द्वार के पास पहुँचा, मेरी नजर उस दृश्य पर पड़ी जिसने मेरी सारी थकान और पीड़ा एक पल में मिटा दी।
मेरे घर पहुँचने से पहले ही मेरे आगमन का समाचार वहाँ पहुँच चुका था।
बाहर, खुले आकाश के नीचे  मेरी आई, मेरे बाबा,  आजी-आजोबा, माई,  दादासाहब, मेरी छोटी बहन तनूजा और गौरी सभी साथ बैठकर मेरा इंतज़ार कर रहे थे। आई की आँखों में वर्षों की चिंता और राहत के आँसुओं का मिश्रण चमक रहा था। पर सबसे बड़ा अद्भुत दृश्य था, गौरी का, जिसकी आँखों से गंगा, नर्मदा और सरस्वती बह रही थी। उसका चेहरा उज्जवल और गुलाबी था, आँखों में चमक और मुस्कान में वह मधुर आत्मीयता।
जैसे ही गौरी ने मुझे देखा, उसके चेहरे पर खुशी और आश्चर्य की लहर दौड़ गई। उसके कदम अपने आप बढ़ने लगे  और मेरी ओर दौड़ आई। हवा में उसके बाल लहराते और उसकी साड़ी की किनारियाँ जैसे मेरे स्वागत में झूम रही थीं।
मैंने उसे देखा और मेरा हृदय ऐसा फूला कि मानो वर्षों की दूरी, यातना और संघर्ष सब एक ही पल में खत्म हो गए हों। मैं भी दौड़ता हुआ उसके पास पहुँचा और दोनों ने एक-दूसरे को गले लगाया। उसका सिर मेरी छाती पर टिक गया  और मुझे उसकी गर्म साँसों का एहसास हुआ।  एक-दूसरे की यादें, सपने, उम्मीदें  और सारी भावनाएँ उस आलिंगन में समा गईं।
वह रोई भी, लेकिन उसकी आँसुओं में दुख नहीं, बल्कि वर्षों की प्रतीक्षा का आनंद और राहत झलक रही थी। मैंने उसके हाथों को थाम लिया  और दोनों की नजरें एक-दूसरे में गहराई से समा गईं। उस क्षण समय जैसे थम गया था,  सिर्फ हम, हमारी आत्माएँ  और वह अटूट बंधन जो वर्षों की दूरी और संघर्ष के बावजूद नष्ट नहीं हो सका।
मैंने गौरी से कहा – “युद्धभूमि से लौटते हुए, मृत्यु की सीमारेखा के कगार पर खड़ा होकर मुझे बार-बार यही अनुभूति हो रही थी,  तुम मेरी लिए प्रार्थना कर रही होगी। और वास्तव में, तुम्हारी वह प्रार्थना ही थी जिसने मुझे अंधकार और विपत्ति से जीवित रखा। मुझे ज्ञात है कि इन वर्षों की दूरी में भी तुम मेरी प्रतीक्षा कर रही थी। पर अब मैं जीवित लौट आया हूँ। हृदय में गर्व और आँखों में आंसू लिए मैं तुम्हारे सामने खड़ा हूँ।  तुम्हारे हाथ में हाथ डालने के लिए  और सात जन्मों के बंधन को दृढ़ करने के लिए। गौरी, इस क्षण में सभी पीड़ा, युद्ध की थकान और भय,  सब कुछ पीछे रह गया है। केवल तुम और मैं  और हमारे बीच का अटूट प्रेम। मैं तुम्हारे हाथों में हाथ डालकर, वर्षों की प्रतीक्षा और कठिनाइयों का फल अनुभव करना चाहता हूँ।”
मेरे बाबा ने मुझसे कहा – मैंने और तेरी आई ने गौरी को समझाया था। “गौरी, तेरे जीवन का वह अध्याय अब पूर्ण हो चुका है। अब गिरीश की यादों को पीछे छोड़, अपने नए जीवन के पन्नों पर एक सुनहरी शुरुआत लिख। नए अरमानों, नए सपनों और नए उम्मीदों के साथ अपने जीवन की नई राह चुन।” लेकिन गौरी को पूर्ण विश्वास था कि एक दिन उसका गिरीश उसके पास आयेगा।
मेरे बाबा ने कहा – “गौरी रोज़ अखबारों की खबरें पढ़ती रहती। रेडियो पर समाचार सुनते हुए उसकी नजर हमेशा एक ही नाम पर टिकती – “लेफ्टनेंट गिरीश देशमुख।” हर खबर, हर घोषणा उसके लिए उस एक प्रतीक्षा का संकेत बन चुकी थी। और तेरी आई के देवघर में एक दीया अखंड जलता रहता, उसकी मंद रोशनी घर के हर कोने में शांति और आशा भरती। तेरी आई और गौरी के ओठों पर हमेशा मुस्कान और प्रार्थना की झलक रहती,  जैसे उनके शब्द न कहे भी, मन में सतत तुम्हारी सलामती और सफलता के लिए जप चलता रहता। हर समाचार पत्र, हर रेडियो की खबर, हर उजली दीया,  सब गौरी और तेरी आई की उस निःशब्द प्रार्थना और प्रतीक्षा का प्रतीक बन गई थी।”
आई भी हमारे पास आई और दोनों को अपने हाथों में लेकर आशीर्वाद दिया। उस दिन, उस क्षण, मुझे अहसास हुआ कि प्रेम, धैर्य और देशभक्ति, सभी बाधाओं के बावजूद  अखंड और अजर हैं।
मेरा और गौरी का विवाह हो गया। वही नदी, वही घाट… और उस पावन साक्षी के सामने, हमने जीवनभर के लिए अपने पाँव एक-दूसरे में बाँध लिए।
शादी के बाद मैंने गौरी को साइकल के अगले डंडे पर बैठाकर पूरे गाँव की गलियों में घुमाया, हर कोने में उसकी हँसी की गूँज सुनाई दी। गौरी ने घर और परिवार की जिम्मेदारियों को प्रेम और धैर्य से सँभाला, जबकि मैंने देशसेवा की राह को अपनी आत्मा का मार्ग बना लिया।
लेकिन हर वर्ष, हमारे विवाह की वर्षगांठ पर, हम दोनों हाथ में हाथ डालकर विठोबा के मंदिर की ओर बढ़ते। मंदिर की शांति और देवता की छाया में, हम धीमे स्वर में कहते – “हमारा बंधन केवल इस जन्म का नहीं है… यह सात जन्मों से भी गहरा  और समय की हर सीमा से परे अटूट है।”
दीपक गिरकर
कथाकार
28-सी, वैभव नगर, कनाडिया रोड,
इंदौर- 452016
मोबाइल : 9425067036
मेल आईडी : [email protected]
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