Monday, February 23, 2026
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पद्मा मिश्रा की कहानी – हँसुली

बाबूजी चुपचाप चौकी के एक कोने पर बैठे हुए थे। उस शब्दहीन सन्नाटे ने मानो उनकी आवाज़ ही छीन ली थी।
शाम के चार बज रहे थे। और कोई दिन होता तो माँ उनके आवाज़ लगाते ही तुरंत चाय लेकर हाज़िर हो जाती। पर आज तो उनकी जीवनसाथी सारी ममता, नेह और नाते तोड़ न जाने कहाँ जा छिपी थी। अब तो वे लाख आवाज़ें लगाएँ, वह नहीं आएगी। एक दिन में ही वे कितने अकेले और बूढ़े नज़र आने लगे थे। पत्नी के साथ मिल-बैठ सुख-दुःख बाँटने का समय आया तो वह साथ ही छोड़ गई—उन सूनी दीवारों के बीच उन्हें अकेला छोड़कर।
बस… कुछ घंटे और।
अंतिम संस्कार के बाद उसकी यह नश्वर देह भी नष्ट हो जाने वाली है। सभी भतीजे, बेटे-बहुए बाहर से आ गए हैं। जीवन भर माँ की पूछ नहीं की, अब आज्ञाकारी बेटे होने का समाज से प्रशस्ति-पत्र जो लेना था। उनका मन वितृष्णा से भर गया था।
वे उठकर आँगन तक आए, जहाँ माँ बाँस की चटाई पर शांत सोई हुई थी। वे खंभे का सहारा लेकर एकटक उन्हें देखते जा रहे थे। माँ का नख से शिख तक शृंगार किया जा रहा था—चूड़ी, बिंदी, लाल साड़ी, सिंदूर… सुहागन जो मरी थी। बाबूजी को वहाँ देख बड़ी भाभियाँ दहाड़ मारकर रो उठीं—
“हाय! अम्मा जी… बाबूजी को अकेला क्यों छोड़ गईं?”
उन्होंने हाथों के इशारे से उन्हें रोका और माँ के कमरे की ओर चले गए। उनकी गीली आँखें कुछ ढूँढ रही थीं—पलंग के गद्दे के नीचे, आलमारी में, पुराने कपड़ों की संदूकची में—पर निराशा ही हाथ लगी।
मेरी पत्नी गरिमा कमरे के अंदर गई और उन्हें सहारा देते हुए बोली,
“क्या खोज रहे हैं, बाबूजी?”
वे रुंधे गले से बोले,
“तुम्हारी अम्मा की आख़िरी निशानी—उनका एकमात्र गहना, गले की हँसुली। करीब सात–आठ तोले की। वही नहीं मिल रही है।”
गरिमा उनकी लाड़ली बहू थी। उससे वे खुलकर अपने मन की बातें कह लेते थे। सभ्य, शालीन, संस्कारी परिवार की बेटी को पसंद कर अम्मा ही तो इस घर में लाई थीं।
गरिमा ने उनका हाथ पकड़कर एक कुर्सी पर बैठाया—
“बाबूजी, इस समय? बाद में खोज लेंगे।”
“नहीं बेटा, मैं नहीं चाहता कि किसी लोभ या लालचवश वह किसी के हाथ लगे और उसका दुरुपयोग हो।”
बाहर सभी व्यस्त थे, पर बाबूजी का वहाँ न होना मुझे चौंका गया। मैं माँ के कमरे में गया और आवाज़ दी—
“बाबूजी!”
गरिमा ने शांत रहने का संकेत किया। मैं भी वहीं बैठ गया।
बाबूजी बोलते जा रहे थे—
“तुम तो जानते ही हो न बेटा… वह गहना उनके तन का शृंगार कम बना, पर दूसरों की विपत्ति का उपादान ज़्यादा। सारे गहने बेटों की पढ़ाई, उनके शादी-ब्याह और घर बनवाने में चले गए। बस यह एकमात्र आख़िरी गहना शेष रहा—उनकी अनमोल निशानी।”
बोलते-बोलते वे चुप हो गए। उनकी साँस फूलने लगी थी। शून्य में देखती आँखें पत्नी की यादों के भँवर में घिरने लगी थीं। गरिमा चुपचाप बाहर चली गई।
सारी तैयारियाँ हो चुकी थीं। पूरा गाँव उमड़ पड़ा था। सबसे अधिक संख्या उन दलित महिलाओं की थी, जो अपने सुख-दुःख की साझीदार रही, विपत्ति में उद्धारकर्ता बन परेशानियों से उबार लेने वाली मालकिन को अंतिम विदा देने आई थीं। न जाने कौन-कौन से नेह-नाते जोड़ रखे थे माँ ने उनसे कि सबकी आँखें आँसुओं से सराबोर थीं। यही तो जीवन भर कमाया था माँ ने।
बेटे-बहुओं के नकली आँसुओं के बीच संवेदना, ममत्व या लगाव का रंच मात्र भी सत्य नहीं था। क्या यह बात बाबूजी नहीं जानते थे?
बड़े भाइयों के बच्चों को माँ का प्यार देकर परवरिश की, पढ़ाया-लिखाया—पर वे सभी कर्तव्यविमुख हो उसकी उपेक्षा करते रहे। आज लकदक सफ़ेद कपड़ों में वे अति व्यस्त और दुखी नज़र आ रहे थे। और जो उसके कुछ नहीं लगते थे, वे आज शोक में डूबे उदास थे।
उस ब्राह्मण-बहुल गाँव में, जहाँ हरिजनों और दलितों को सम्मान देना तो दूर, उन्हें अपने कुएँ से पानी भरने देना या घर में प्रवेश कराना भी वर्जित था—वहीं माँ बिना किसी की परवाह किए सबको आदर देती और अपने आँगन के नल से मीठा पानी लाकर देती थी। क्योंकि सभी कुओं का पानी मीठा नहीं होता था, और उनके मोहल्ले का सरकारी नल हमेशा सूखा ही रहता था। तालाब का पानी इतना गंदा रहता था कि लोग वहाँ जाने से भी डरते थे। ऐसे में उन गरीब, मजबूर महिलाओं का सहारा माँ ही बनती थी।
उस समय हमारे घर के बोरिंग वाले नल का पानी मीठा होता था, जिससे दाल आसानी से पकती थी। यह बात सच थी या नहीं, पर रोज़ सुबह दाल पकाने के लिए पानी लेने हरिजनों के मोहल्ले से छोटी बच्चियाँ और औरतें ज़रूर इकट्ठा हो जाती थीं। और माँ कभी किसी को निराश नहीं करती थी। कभी किसी छोटे बच्चे को रोटी या गुड़ का बड़ा टुकड़ा थमा देती, तो कभी थोड़ा-सा भात तरकारी के साथ निकालकर देती—
“जाओ, घर जाकर खाना।”
इसका परिणाम यह हुआ था कि उस रोटी या गुड़ पाने के लालच में अक्सर छोटे बच्चों को लेकर महिलाएँ आतीं और जानबूझकर उन्हें रुलातीं, ताकि माँ उन्हें कुछ खाने को दे दे। कभी-कभी कोई पुरानी धोती या साड़ी चुपके से उन्हें थमा देतीं—बाबूजी और मेरी नज़र बचाकर। इस तरह उदास चेहरों पर खुशी की एक मुस्कान लाकर वह मानो ममता और स्नेह का बहुत बड़ा ख़ज़ाना पा जाती थी।
एक बार की घटना मुझे याद है।
शाम का धुँधलका छा रहा था। हल्की जाड़ा पड़ रहा था। अतः मैं घर के बरामदे में चादर ओढ़े पढ़ रहा था। माँ अभी-अभी चाय बनाकर दे गई थीं। घर के सामने वाले दरवाज़े की ओर मेरा ध्यान नहीं था, तभी लगभग सत्तर–अस्सी साल की एक वृद्धा रोती हुई घर में घुसी। घूँघट में ढँका चेहरा मैं पहचान नहीं पाया।
पहले तो मैं चौंका, फिर यह सोचकर आश्वस्त हो गया कि होगी कोई दादी-चाची, जो माँ को अपना दुखड़ा सुनाने आई होंगी। यह तो बाद में पता चला कि सुखिया दादी का पोता बीमार था और उनके पास दवा-दारू के भी पैसे नहीं थे। पूरे गाँव में किसी ने भी उनकी मदद नहीं की थी, और दरवाज़े पर खड़े रहने की अनुमति भी नहीं दी। गाँव का डॉक्टर बिना पैसे लिए इलाज करने को तैयार नहीं था। फिर उसने भी हाथ खड़े कर दिए—
“शहर ले जाओ, तभी कुछ हो सकता है।”
वह माँ के पास स्नेह और मान के रिश्ते से अपना अधिकार समझ मदद माँगने आई थीं। फिर माँ भला कैसे इंकार करती?
पर पैसे कहाँ थे घर में? घर के अनाज से तो गुज़ारे भर का ही हो पाता था। बेटों के पैसे भी अब देर से आते थे। अब रह गया था उसके तन का एकमात्र गहना—वह हँसुली, जो उसे प्राणों से भी प्रिय थी।
बड़े प्रेम से दादी के आँसू पोंछकर, उनके आँचल में छिपाकर अपनी माँ की आख़िरी निशानी—अपना प्यारा गहना—रखते हुए माँ ने कहा,
“जाओ, इसे गिरवी रख कुछ पैसे उधार ले लो।”
इसके बाद उनके पोते की जान तो बच गई थी, पर सुखिया दादी कई महीनों बाद ही वह गहना लौटा पाईं।
जब बाबूजी ने पूछा था—
“अगर सुखिया दादी वह हँसुली नहीं लौटा पातीं तो क्या होता?”
वह हँसकर बोली थीं—
“होता क्या? उसका पोता बच जाता। वही मेरे लिए सबसे कीमती गहना हो जाता। वह मुझे भी तो दादी कहता है न!”
बाबूजी उस पल निरुत्तर हो गए थे। और मुझे अपनी माँ पर गर्व हो आया था।
पर उसके बाद तो यह सिलसिला ही कायम हो गया था। किसी की बेटी की शादी हो या बीमारी में इलाज—वह हँसुली बराबर किसी न किसी के काम आती रही।
मैं यह सोच-सोचकर हैरान रहता था कि माँ कितनी कुशलता से हर बात को संभाल लेती थी। जब वह ब्राह्मण टोले की महिलाओं के साथ बैठती, तो पक्की आचार-नियमों वाली संस्कारी ब्राह्मणी ही नज़र आती। और जब हरिजनों और सामाजिक मुद्दों की बात होती, तो उनके ही स्वर में स्वर मिला देती। पर इसी बहाने कोई ऐसी बात कह देती कि सबकी सहानुभूति उन दीन-हीन दलितों के प्रति हो जाती।
शायद महिलाएँ मन के दुख-सुख आपस में बाँटकर एक नई दुनिया गढ़ लेती हैं, जहाँ उनके अनसुलझे प्रश्नों के समाधान खुद-ब-खुद होते चले जाते हैं।
जब कोई कहता—
“काहे अम्मा, इन छोटे लोगों को क्यों मुँह लगाती हो?”
तो वह राम-कथा सुनातीं और शबरी के जूठे बेर और केवट प्रसंग के वर्णन से सबको रुला देतीं। कथा का अंत हमेशा इसी बात से होता—
“जब रामजी ने कोई भेदभाव नहीं किया, तो हम तो उनके चिरई-चुनमुन हैं। हमारी क्या औकात? ज़रा-सा पानी ही तो लेते हैं। उसके बाद मैं गंगाजल छिड़ककर शुद्ध भी तो कर लेती हूँ।”
इस बात पर पूरी महिला बिरादरी सहमत हो जाती कि गंगाजल से बड़ा और क्या हो सकता है! और वे सब संतुष्ट मन से वापस लौट जातीं।
माँ को ये सुंदर गुण-कथन अपने पिता से मिले थे। वे रामकथा के गायक और उदारवादी ब्राह्मण थे। अतः यह उदारता माँ के रोम-रोम से छलकती रहती थी। खुद भूखी रह जातीं, पर किसी बेटी-बहू की भूख शांत कर आत्मिक सुख का अनुभव करती थीं।
शायद अपनी बेटी को असमय खोने का दर्द वह कभी भूल नहीं सकीं। नई ब्याहता बेटी के जलकर या जलाकर मार देने का प्रसंग माँ के मन में कैंसर की तरह घर कर गया था।
…माँ की यह अवस्था देखकर बाबूजी भीतर ही भीतर टूटते चले गए थे। वह जो जीवन भर सबका संबल बनी रही, आज स्वयं एक गहरे अवसाद में डूब चुकी थी। बेटी के जाने के बाद माँ जैसे जीवन से ही विरक्त हो गई थीं। न पहले जैसी हँसी, न वह चहल-पहल। घर में रहकर भी वह कहीं बहुत दूर चली जाती थीं।
जब कुछ संभलीं तो गाँव की हर बेटी के गौने में अपने हाथों से बनाए पंखे, तकिए के खोल, चूड़ियाँ, बिंदिया, सिंदूर अवश्य देती थीं। शायद मन में कहीं एक लालसा शेष थी कि किसी बेटी की दुआ उसकी बेटी तक पहुँच जाए—वह जहाँ भी हो, सुखी रहे। उस पगली को यह कौन समझाता कि जो एक बार चला गया, वह न लौटता है, न कोई जान पाता है कि वह कहाँ है।
तब से माँ के स्वभाव में एक विलक्षण परिवर्तन आ गया था। वह स्वयं के लिए कुछ भी इच्छा नहीं रखती थीं। बस एक ही साध मन में बस गई थी—
“मेरा नरेंद्र जब नौकरी करेगा, उसकी गृहस्थी सजेगी, तब उसके विवाह के अवसर के लिए एक हल्का गहना बनवाकर ज़रूर पहनूँगी।”
जब उन्होंने यह इच्छा बाबूजी से कही थी, तो उनकी आँखें भर आई थीं। अपनी असहायता में मेरा मन कई बार रोया था। सात-आठ तोले की वह हँसुली माँ पहन भी नहीं पाती थीं—बहुत भारी थी। मुझे अभी नौकरी नहीं मिली थी। मैंने कई बार कहा कि हँसुली तुड़वाकर हल्का गहना बनवा देते हैं, पर उन्होंने कभी उसे हाथ तक नहीं लगाने दिया। भला वह, जो सबकी भाग्यविधाता बनी रही, अपना दानपात्र यूँ ही लुटा देती?
दिन पर दिन बीतते गए। न पैसे हुए, न गहना बन सका। बेटे समान पाले गए भतीजों से माँगना तो दूर, उन्हें इसकी भनक तक नहीं लगने दी। बाबूजी ने भी जीवन भर माँ के स्वाभिमान की रक्षा की थी।
मेरी नौकरी लगी, विवाह भी हुआ, पर नई-नई व्यस्तताओं और परेशानियों के बीच माँ की यह लालसा पूरी नहीं हो सकी। जब उसे पत्नी गरिमा की अगवानी के समय उसका चिर-प्रतीक्षित गहना देना चाहा, तो उसने मुस्कराकर वही हँसुली अपनी बहू को सौंप दी।
अब उसका शरीर शिथिल और अशक्त हो चुका था। कुछ पहनने की चाह भी जैसे बुझ गई थी। शायद बेटी को खोकर एक बेटी पाने की खुशी में उसने अपने सारे सपने पूरे मान लिए थे।
माँ के श्राद्ध के सारे कार्य पूर्ण हो जाने के बाद बाबूजी ने सबको बुलवाया और माँ की हँसुली की बात सबके सामने रखी। पहली बार उसके पाले हुए बेटे उदास दिखाई दिए। भाभियों ने किसी सुनार को बुलवाकर हँसुली तुड़वाने और बराबर बाँटने की सलाह दी।
तभी गरिमा उठी।
उसने बाबूजी के पाँव छुए और लाल कपड़े में लिपटी वह हँसुली—माँ का एकमात्र गहना—उनके हाथों में देते हुए बोली—
“नहीं बाबूजी, हमें कोई गहना नहीं चाहिए। हमारा असली गहना तो सासू माँ के दिए संस्कार हैं, उनका प्यार है, उनके आदर्श हैं। वही उनकी शेष पूँजी है, जिसे हम आगे बाँटना चाहेंगे।”
सब निरुत्तर होकर उसकी ओर देखने लगे। उसकी अनोखी सोच पर सब हैरान थे। पर मैं खुश था—और गर्वित भी—कि माँ की पसंद गरिमा ही वह कीमती गहना थी, जिसे माँ उत्तरदायित्व में पूरे परिवार को सौंप गई थी।
गरीबों की मसीहा का वह अनुपम दान आज भी न जाने कितनों की इच्छाएँ पूरी कर रहा होगा…
–  पद्मा मिश्रा
   जमशेदपुर


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