Monday, March 9, 2026
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सुषमा मुनीन्द्र की कहानी – शासन-अनुशासन

यह शहर जब से एजूकेशन हब बना, लोगों ने दो-तीन कमरे बनवाकर बाहरी विद्यार्थियों को लपक लेने की आकांक्षा बना ली है। सुजान महिलायें टिफिन सेंटर खोलकर अनहाइजीनिक भोजन सस्ती दरों पर विद्यार्थियों की भोजन नली में पहुँचा रही हैं। शहर का कमानी मोहल्ला खास ख्यात है। विद्यार्थियों के अभिभावक ठिकाना ढूँढ़ने सर्वप्रथम यहीं आते हैं। आर0पी0 (राम प्रसाद) का दो मंजिला मकान और श्रीमती पाराशर का टिफिन सेंटर चर्चा में है। आर0पी0 के अड़ियल अनुशासन और श्रीमती पाराशर के प्रचुर पानी वाले भोजन को विद्यार्थी ऊधौ मोहि बृज बिसरत नाहीकी तरह नहीं भुला पाते। अपने अनुशासन में विद्यार्थियों को लपेटने में आर0पी0 एकला ही सक्षम हैं जबकि श्रीमती पाराशर के टिफिन सेंटर ने ऐसा बिस्तार ले लिया है कि श्रीमान पाराशर छोटी नौकरी तज कर अनाज, किराना, दूध, सब्जी लाने, हिसाब देखने, कलछुल चलाने जैसी प्रमुखता के साथ मैनेजरी पर हैं। 
एजूकेशन हब वाले शहर का पूरे प्रांत में व्यापक असर है। बाहरी विद्यार्थियों को एतबार है – सफलता यहीं आकार ग्रहण होगी। छोटे शहर हुजूर से जो विद्यार्थी यहॉं आते हैं व्यापक असर को हुजूर तक यूँ पहुँचा देते हैं कि हुजूर के बारहवीं उत्तीर्ण विद्यार्थी वहॉं जाने का लक्ष्य बना लेते हैं। यही लक्ष्य एक साथ पढ़े-बढ़े निर्बाध, जटाशंकर, कमलापति और सज्जन का है। बी0 कॉम में दाखिला लेंगे, साथ ही सी00 की कोचिंग करेंगे। चारों में सज्जन वस्तुतः सज्जन हैं जबकि उसके पिता ओझा जी मामला जमाने में अग्रणी हैं। ओझा जी ने अपने परिचित जिनका पुत्र मुकुटधर एजूकेशन हब वाले शहर से ज्ञान अर्जित कर अच्छी कमाई वाले पद पर स्थापित हैं, से जानकारी हस्तगत की। परिचित ने खुलकर इत्तिला दी –
‘‘ओझा जी आप सबसे पहले कमानी मोहल्ला जायें। आर0पी0 सर दो मंजिले मकान में नीचे रहते हैं। ऊपर छात्रों को रखते हैं। उनका अनुशासन ऐसा जबर है कि बच्चों के निरंकुश होने की आशंका शून्य प्रतिशत है। वैसे बाहर की हवा खाते ही बच्चों के बिगड़ने में देर नहीं लगती। मैंने देखा है छोटी जगह का संकोच और घबराहट लेकर गये विद्यार्थी विचित्र पहनावे और हेयर कट वाला ऐसा हुलिया बना कर लौटते हैं जैसे इंग्लैण्ड से सीधे लैण्ड कर रहे हैं।’’
‘‘ठीक कहते हैं।’’
‘‘मुकुट, आर0पी0 के कड़े रुख के कारण परेशान रहता था। अब कीर्ति गाता है कि आर0पी0 सर ने अनुशासित रहने का जो अभ्यास करा दिया है, बड़ा काम आ रहा है।’’
‘‘ठीक कहते हैं।’’
ओझा जी के नेतृत्व में चारों विद्यार्थी घर नामक अनुबंध से छूट कर आवारा बनने की इस मंशा के साथ रात्रिकालीन रेल यात्रा कर एजूकेशन हब वाले शहर पहुँचे कि बाहर की हवा खाकर बिगड़ने, मॉल देखने, लड़कियों से मित्रता करने जैसे उत्साहवर्धक अनुभव मिलेंगे।
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कमानी मोहल्ला।
पाँच सदस्यीय दल सुबह दस बजे आर0पी0 के घर पहुँचा।
छोटे परिसर वाला दो मंजिला मकान।
परिसर में प्रवेश के लिये बाहरी लौह गेट है। गेट से एक-डेढ़ फुट की दूरी पर खड़ी सुर्ख लाल रंग की कीमती कार ने परिसर के मुख्य भाग को घेर रखा है। बाकी बची जगह बड़ी हौज ने घेर ली। सरकारी विभाग से नल में दो वक्त आने वाला पानी इस हौज में भरता है। आर0पी0 का घरेलू चाकर प्रभु जिसे वे प्रभु जी पुकारते हैं, हौज में मोटर लगाकर पानी को हजार लीटर क्षमता वाले ओवर हेड टैंक में चढ़ा देता है। हौज से थोड़ी दूरी पर ऊपरी फ्लैट में आरोहण के लिये कुल सोलह सीढ़ियाँ हैं। आर0पी0 ने दल को बैठक में बैठाया। प्रभु जी तत्परता से बहुत साफ गिलासों में बहुत साफ (आर00 वॉटर) पानी ले आया। विद्यार्थियों ने ऊपरी संजीदगी बनाये रखते हुये कनखी से सत्तर साल के आर0पी0 के आकर्षक हुलिये को देखा। ब्रैण्डेड काली टी शर्ट और हाफ पैण्ट। संकेत प्रेषित हुआ – ओल्डी फैशनदार है। आर0पी0 ने विद्यार्थियों से नाम के अलावा कुछ नहीं पूँछा। वे उन्हें मुकम्मल जवाब देने के काबिल नहीं समझ रहे थे। अलबत्ता ओझा जी से जो गहन पूँछ-ताँछ की विद्यार्थी उसे आपस की भाषा में इन्ट्रो (इन्ट्रोडक्शन) कहते हैं। 
‘‘कहॉं से आये हैं ?’’
‘‘हुजूर।’’
‘‘मुझे हुजूर नहीं सर कहें। मैं होम टाउन पूँछ रहा हूँ।’’
‘‘वही बता रहा हॅू। मेरे शहर का नाम हुजूर है।’’
‘‘ओह ……….
‘‘ये चार बच्चे हैं।’’
‘‘बच्चे नहीं विद्यार्थी हैं।’’ आर0पी0 लड़कों को विद्यार्थी कहते हैं ‘‘ मैं चार से अधिक विद्यार्थी नहीं रखता। कुछ लोग अच्छी तादाद में विद्यार्थियों को रख कर मुनाफा कमा रहे हैं। मुझे मुनाफा नहीं चाहिये। अधिक विद्यार्थियों में सामन्जस्य नहीं बैठता। पढ़ते कम, लड़ते अधिक हैं।’’
‘‘बजा फरमाते हैं।’’
 ‘‘सर, ये चारों बचपन से एक स्कूल में पढ़े हैं। अच्छा सामन्जस्य है।’’
‘‘एक साथ पढ़ना और एक साथ रहना अलग मसला है।’’
मुझे किसी विद्यार्थी की एक्टीविटी गलत लगती है तो मैं उसे तलब नहीं करता। उसके पिता को फोन कॉल करता हूँ। देखता हूँ आज के विद्यार्थी बाइक के बिना एक कदम नहीं चलते। पहले ही बता दूँ मेरे घर में बाइक रखने की जगह नहीं है।’’
‘‘यहॉं से कॉलेज, कोचिंग, बाजार पास में है। टिफिन सेंटर ठीक सामने है। इन्हें बाइक की जरूरत नहीं है।’’
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‘‘विद्यार्थियों, अभिभावकों के आधार कार्ड की फोटो काँपी, स्थानीय पता, सम्पर्क नम्बर, डिपॉजिट जमा कर दें।’’
‘‘जी सर।’’
मामला निर्धारित कर ओझा जी विद्यार्थियों को लेकर होटेल आ गये। आर0पी0 का अनुशासन ओझा जी को प्रतिश्रुति दे रहा था – 
‘‘मुझे जगह पसंद है।’’
विद्यार्थियों के लिये यह व्यतिक्रम था। बाहर की हवा का लुत्फ लेने आये हैं पर आर0पी0 का सलूक बताता है नहीं ले पायेंगे। सज्जन बोला – 
‘‘पापा, अंकल बहुत बंदिश लगायेंगे। कितना बोलते हैं।’’
‘‘सज्जन, वे व्यवहार में स्पष्ट हैं। मुकुटधर उनकी सराहना करता है।’’
किताबें, कपड़े, कुछ अन्य जरूरी सामान लिये मलिन मुख बनाये कंधे झुकाये चार विद्यार्थी फ्लैट में पधारे। सामान सेट किया। दिनचर्या तय हो गई। 
कमलापति ने मीमांसा की ‘‘सोचता था आने-जाने, छींकने-अॅंगड़ाई लेने पर कुदृष्टि रखने वाले जनक-जननी यहॉं नहीं होंगे। हम लोग तमाम लड़कों की तरह एक-दूसरे के घर जाकर रहेंगे। पढ़ेंगे। पर हुजूर बहुत हानिकारक हैं।’’
नामकरण पर जटा शंकर मोदमग्न हो गया ‘‘हुजूर बंदिश लगायेंगे। हम ट्रिक लगायेंगे। मेरे अम्मा-बाबू आज भी नहीं जानते स्कूल से बंक मारकर मैं कब इंडियन कॉफी हाउस गया, कब नदी में तैरा, कब एक्स्ट्रा क्लास के बहाने मूवी देखी।’’
निर्बाध ने अनुमोदन किया ‘‘हम ऐसी उम्र में हैं जब लगाम तोड़ने को जियरा मचलता है। जियरा करता है तमाम लड़कों की तरह देर रात तक मोहल्ले में आवारागर्दी करूँ। छात्रों को दखल दूँ। कोचिंग के बाद लड़के-लड़कियॉं कितना डिसकस करते हैं। हम भाग देते हैं कि हुजूर ठीक नाइन पी0एम0 पर आउटर गेट में ताला लटका देंगे।’’  
यही अफसोस जटा शंकर को है ‘‘कॉलेज और कोचिंग सेंटर की लड़कियों को देखकर हम कितना ललकते हैं। यहॉं की लड़कियॉं कितनी सुंदर हैं। लड़कों में कितनी रुचि लेती हैं। हमारे स्कूल की घमंडी लड़कियॉं सीधे मुँह बात नहीं करती थीं।’’ 
सज्जन ने सतर्क किया ‘‘लड़कियों से मित्रता न करना। कोई हमसे मिलने आ गई तो हुजूर सीधे पापा को फोन कॉल कर देंगे कि आपका लाड़ला बर्बादियों में जा गिरा है।’’
निर्बाध ने व्यथा कही ‘‘जेनब बर्थ डे पार्टी देने वाली है। लड़के बताते हैं पार्टी में लड़कियॉं बहुत इठलाती हैं। ताले के डर से हम नहीं जा सकेंगे।’’
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सज्जन ने सानत्वना दी ‘‘स्टूडेन्ट्स उपद्रवी होते हैं। अंकल को तमाम अनुभव मिले होंगे इसलिये अनुशासन पर जोर देते हैं लेकिन हम पार्टी में जायेंगे। नौ का मतलब पौने नौ या सवा नौ हो सकता है।’’
पार्टी से लौटते हुये दस बज गये।
बाहरी दुआर पर लगा ताला जाहिर कर रहा था नौ का मतलब पौने या सवा नौ नहीं, शुद्ध नौ होता है। सज्जन बोला –
‘‘पार्टी अटैण्ड कर हमने बेवकूफी की।’’
निर्वाध निस्तेज हो गया ‘‘हमारा कितना मजाक बना। पार्टी जोरों पर थी। हम भाग चले। जेनब खिल्ली उड़ा रही थी हुजूर वाले भगोड़े हैं।’’
जटा शंकर बोला ‘‘मैंने जेनब से कहा हुजूर बड़े सख्त हैं लेकिन उसने विश्वास नहीं किया। बोली कोई ऐसा सख्त नहीं होता कि थोड़ी सी मोहलत न दे। वह नहीं जानती हमारे प्राण हलक में रहते हैं।’’
सज्जन को विकल्प चाहिये ‘‘क्या करें ?’’
जटा शंकर बोला ‘‘हुजूर को कॉल करो।’’
पॉंचवे कॉल पर आर0पी0 ताला खोलने आये। उनके मुख की तनी लकीरों में हमेशा एक किस्म का प्रतिरोध और अधीरता रहती है जैसे कैफियत माँगने के लिये भीतर कोई कुरेद रहा है। वाणी ऐसी प्रबल मानो बोल नहीं रहे हैं घोषणा कर रहे हैं। लेकिन वे कैफियत इत्मीनान से मॉंगना पसंद करते हैं। ताला खोलकर तेजी से लौट गये। विद्यार्थियों ने इसे अपनी फतह माना। जटा शंकर अजेय भाव में बोला –
‘‘ताला खोलना पड़ा। हुजूर हम लोगों को बहुत दखल नहीं दे पायेंगे। हमने खासा डिपॉजिट दिया है। इतना किराया देते हैं। मुफ्त में नहीं रहते कि …………
सज्जन ने शीतल किया ‘‘हुजूर ने कुछ नहीं कहा। जटा तुम बेकार बोल रहे हो। चुपचाप सो जाओ। सुबह बात करेंगे।’’
सुबह। 
वार्निंग वॉक पश्चात ग्रीन टी सेवन के आर0पी0 कैफियत मॉंगने अचानक पहुँचे।
विद्यार्थी खफा हुये लेकिन जोहार की –
‘‘नमस्ते अंकल ………
‘‘फिर कहता हूँ, विद्यार्थी मुझे सर कहते हैं।’’
‘‘नमस्ते सर।’’
‘‘नमस्ते।’’
आर0पी0 फाइबर चेयर में स्थापित हो गये ‘‘मुझे मुद्दे पर बात करने की आदत है। यह शहर शिक्षा के लिये ही नहीं अपराध के लिये भी प्रसिद्ध है। प्रभु जी खाना बना कर आठ बजे चले जाते हैं। मैं नौ बजे आउटर गेट बंद कर देता हूँ।’’
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तीनों विद्यार्थियों ने सहायतार्थ सज्जन को विलोका। चूँकि तुमने हुजूर की विचारधारा अपने दिमाक में बैठा ली है, कुछ नीति वचन कर कर इन्हें रफा-दफा करो। सज्जन ने प्रसंग कहा –
‘‘जेनब की बर्थ डे पार्टी थी। जाना पड़ा। सॉरी सर।’’
आर0पी0 तन गये ‘‘जेनब कौन है ?’’
‘‘कोचिंग क्लास में आती है।’’
‘‘तुम लोग पढ़ाई में नहीं लड़कियों में रुचि ले रहे हो। लड़कियॉं, लड़कों के वित्त में चित्त रखती हैं।‘’ 
‘‘सर, हम लोगों का लड़कियों से खास परिचय नहीं है।’’
 ‘‘इस इलाके में लड़कियों को लोग मकान नहीं देते हैं। इनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी कौन ले ? लेकिन लड़कियॉं नहीं मानतीं। टू व्हीलर पर सवार हो विद्यार्थियों से मिलने आती रहती हैं। तुम लोगों को सतर्क रहने की जरूरत है।’’
उनके जाने के उपरांत और भी बहुत कुछ कह कर आर0पी0 चले गये। जटाशंकर बोला –
‘‘हुजूर, लड़कियों की कितनी निंदा करते हैं। जैसे स्त्री चरण पड़ेंगे तो इनकी बिल्डिंग नापाक हो जायेगी।’’
निर्बाध ने अनुमान लगाया ‘‘हुजूर लड़कियों से नफरत करते हैं। किसी लड़की ने जरूर इन्हें धोखा दिया है। या अनुशासन से खौफ खाकर अर्धांगिनी भाग गई होगी।’’
कमलापति ने अनुमान को पुख्ता किया। हमारी इतनी इनक्वायरी करते हैं लेकिन हम इनका अबाउट फेमिली नहीं जानते। एक-दो बार मैंने प्रभु जी से जानने की कोशिश की। चैकोर चेहरे वाला जीव इनकी तरह अनुशासन का मारा है। कुछ नहीं उगलता।’’
अलग किस्म के माँस-मज्जा से बने सज्जन ने दुराशय पर आपत्ति की 
‘‘कमला अपना बी0पी0 मत बढ़ाओ। सर ऐसा कुछ नहीं कहते हैं कि हमारे शरीर पर घाव हो जायेंगे। उनकी बातों को मुद्दा बनाते रहोगे तो अशांत रहोगे।’’
‘‘मैं हाथ-पैर बॉंध कर नहीं रहूँगा। घर और बाहर में फर्क ही नहीं है। मैं जब तक गुस्सा किसी पर न उतार लूँ अशांत रहता हूँ। यह मेरी बचपन की अदा है।’’
वाष्प सी छोड़ते हुये कमलापति ने गुस्सा उतारते हुये ट्वायलेट के द्वार पर लात मारी।
जर्जर कब्जे-कुंदे न टिक सके। एक पल्ले वाला द्वार अररा कर गिर गया। कमलापति चीख कर दीवार से चिपक गया। जटा शंकर ने उसके मुँह पर हथेली रखी ‘‘चीखो मत। सुनकर हुजूर आ जायेंगे कि तुम लोग एक-दूसरे का वध कर रहे हो क्या ?’’
कमलापति मंद हुआ ‘‘दरवाजे का क्या करूँ ?’’
निर्बाध ने मार्ग दर्शन दिया ‘‘शो पीस की तरह बैठक में सजा दो या कारपेन्टर ढूँढ़ो।’’
मास बीत गया।
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बढ़ई न मिला।
आर0पी0 नियमित दखल देने चले आये।
सज्जन नहीं जानता उसने यह उत्तम बात क्यों कही –
‘‘सर, हम लोग पढ़ रहे हैं।’’
आर0पी0 की विलक्षण दृष्टि ने खुली किताबें नहीं खुला ट्वायलेट देखा –
‘‘तुम लोग ट्वायलेट का दरवाजा बंद क्यों नहीं करते ?’’
सज्जन ने यथार्थ कहा ‘‘ठीक से बंद नहीं होता था। कमला ने जोर से बंद किया। टूट गया।’’
‘‘असुविधा नहीं होती ?’’
‘‘मौका पड़ने पर दरवाजे को उठा कर सामने टिका लेते हैं।’’
‘‘फ्लैट छोड़ने का इरादा है ?’’
सज्जन ने तेजी दिखाई ‘‘नो सर।’’
‘‘मालूम है विद्यार्थी मेरे अनुशासन से खफा रहते हैं। कुछ जड़ और जिद्दी विद्यार्थी फ्लैट छोड़ने से पहले ऐसी रचना रच जाते हैं जो अकल्पनीय लगती है। सीलिंग पर बने काले गोल धब्बे देखते हो ?’’
निर्बाध ने ऊपर निहारा ‘‘सर, यह डिजाइन कैसे बनाई गई ?’’
‘‘मोमबत्ती जलाकर।’’ कहते हुये आर0पी0 ने जटा शंकर को संदिग्ध की तरह देखा ‘‘विद्यार्थी सोचते हैं मुझे बेवकूफ बना रहे हैं। दरअसल वे अपनी एकाग्रता और ऊर्जा को कम कर रहे हैं। रिपेयर करा दूँगा। बढ़ई को मेहनताना दे देना। सुनो तुम लोग यहॉं उत्‍पात करने नहीं पढ़ने आये हो। पढ़ो।‘’
‘’जी सर।‘’
आर0पी0 के जाते ही विद्यार्थी चर्चारत हुये। कमलापति बोला –
‘‘हुजूर की सख्ती देखो। मेहनताना हमें देना होगा।’’
जटा शंकर ने स्पष्ट कहा ‘‘हमें नहीं, कमला तुम्हें। इतने जरूरी स्थान का दरवाजा तोड़ा। आगे से सावधान रहना।’’
निर्बाध का अलग मत ‘‘हजूर कहते हैं पढ़ने आये हो। प्‍ढ़ो। हॉं हम जानते हैं पढ़ने आये हैं। असामाजिक गतिविधि करने नहीं आये हैं।’’
गर्म पानी से नहाने वाले शीतोष्ण दिवस।
निर्बाध नहाने के लिये बिजली की छड़ को बाल्टी के पानी में डुबो कर पानी तपा रहा था। बिजली चली गई। छड़ को सॉकेट में लगी छोड़ स्विच बंद किये बिना अधतपे पानी को स्नानगृह में ले गया। तपे पानी के अभाव में विद्यार्थी बिना नहाये महाविद्यालय चले गये। बिजली आने पर लाल भभूका छ़ड़ ने वहीं रखे जाली वाले बड़े थैले में ठुँसे गंदे वस्त्रों को जद में ले लिया। वस्त्र के संदर्भ में समान लम्बाई वाले चारों पतले विद्यार्थी मिलनसार थे। एक-दूसरे की कमीज पहन लेते। इतवार को सामूहिक धोने के लिये गंदी कमीजें जाली वाले थैले में डाल देते। यदि धुली कमीज नसीब न होती, थैले से कमीज निकाल, स्प्रे का 
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छिड़काव कर पहन लेते। तीक्ष्ण घ्राण शक्ति वाले आर0पी0 ने ऊपरी फ्लैट से आ रही जलने की गंध ग्रहण की। चारों विद्यार्थियों के मोबाइल नम्बर लगाये। कल्पना नहीं थी क्लास छोड़ कर, सेल ऑफ कर विद्यार्थी मूवी देखने में लिप्त हैं। अधीरता में वक्त गुजरा। विद्यार्थियों की पद चाप सुनते ही निर्णायक बने आगे-आगे सीढ़ियाँ चढ़ने लगे। पूरी तरह अचम्भित विद्यार्थियों ने विसंगति देखी। सज्जन के मुख से सलीके वाली कमजोर चीख निकली –
‘‘हमारे कपड़े ………
आर0पी0 ने सॉंस नहीं फुँफकार छोड़ी ‘‘लंका दहन किसने किया ?’’
निर्बाध पर आरोप तय था लेकिन कमलापति ने भाईचारा बनाये रखा ‘‘पता नहीं सर।’’
‘‘एफ0आई0आर0 लिखाने थाने नहीं जाऊॅंगा। बताओ।’’ आर0पी0 ने भर्त्‍सना की ‘‘ठीक बगल में लकड़ी की अलमारी है। उसके पीछे बिजली के तार हैं। तुम लोग कितने लापरवाह हो।’’
आर0पी0 के पर्यवेक्षण में विद्यार्थियों की बुद्धि तत्काल प्रभाव से निलम्बित हो जाती है। सज्जन ने बिना सिर-पूँछ वाला उत्तर दिया –
‘‘सॉरी सर। हमें आपकी अलमारी का इस्तेमाल नहीं करना चाहिये। सुबह अलमारी को आपके घर में शिफ्ट ……….
आर0पी0 के चेहरे का प्रतिरोध पराकाष्ठा पर –
‘‘अलमारी एक उपद्रवी विद्यार्थी की है। विद्यार्थियों की मानसिकता ताड़ने में मुझे लम्बा समय लगता है फिर भी पूरी तरह नहीं ताड़ पाता हूँ। इन्हें मानसिकता छिपाने और बदलने का अभ्यास होता है। पुरानी बात है। मैं विद्यार्थियों से डिपॉंजिट नहीं लेता था। विद्यार्थी चार माह से किराया नहीं दे रहे थे। प्रभु जी किराया लेने जाते। विद्यार्थी मायूसी दिखा देते कि दो विद्यार्थियों के घर में पैसे की दिक्कत हो गई है। दोनों के हिस्से का किराया हम दें हमारे घर से इतने पैसे नहीं आते। इंतजाम होते ही पूरा दे देंगे। मुझे लगा विद्यार्थियों की तकलीफ जायज है पर वे शातिर थे। थोड़ा-थोड़ा सामान किसी विद्यार्थी के यहॉं शिफ्ट कर रहे थे। एक दिन गये फिर नहीं लौटे। मैंने एक विद्यार्थी के पिता को फोन कॉल किया। मालूम हुआ पैसा निरंतर भेजा जा रहा है। मैंने फ्लैट का ताला तुड़वाया। यह अलमारी मिली। तब से मैं डिपॉजिट लेने लगा।’’
विद्यार्थियों के मुख स्वाहा हुये वस्त्रों की भॉंति स्वाहा थे। सज्जन ही बोला –
‘‘विद्यार्थियों ने गलत किया सर।’’
‘‘मैं एक्स स्टूडेन्ट्स की मक्कारियाँ उन्हें बदनाम करने के लिये नहीं, तुम लोगों को सचेत करने के लिये बताता हूँ पर तुम दरवाजा तोड़ते हो। कपड़े जलाते हो। पता नहीं कितने अनुभव मुझे मिलेंगे।’’
आर0पी0 चले गये।
विद्यार्थियों की समीक्षा बैठक हुई।
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‘‘निर्बाध, अलमारी, वायरिंग, घर जल जाता तो हुजूर हम सबका डिपॉजिट जब्त कर लेते कि रिपेयरिंग में पैसा लगेगा।’’
‘‘डिपॉजिट जब्त कर गेट आउट कर देते।’’
‘‘डिजायनर कमीजें जल गई।’’
निर्बाध ने ललाट थाम लिया ‘‘चुप हो जाओ तीनों। हुजूर का इतना दखल है कि मैं न ठीक से पढ़ पाता हूँ, न सो पाता हूँ, न सोच पाता हूँ। गलती तो होगी ही। जी में आता है हुजूर की सूरत न देखॅू।’’
सूरत देखनी पड़ी।
चारों विद्यार्थी महाविद्यालय जाने से पहले भोजन करने पाराशर टिफिन सेंटर जाते हैं। वहॉं खाने पर गरम रोटियाँ मिल जाती हैं। रात का खाना श्रीमती पाराशर का कर्मचारी टिफिन, जिसे खरीदते समय शिनाख्त के लिये विद्यार्थियों ने अपने नाम उकेरवा लिये हैं, में पहुँचा जाता है। विद्यार्थियों ने देखा टिफिन सेंटर में ठीक सामने की मेज पर आर0पी0 आसीन हैं। 
विद्यार्थियों को देखकर आर0पी0 को लगा यहॉं होने का कारण बताना उचित होगा ‘‘प्रभु जी जब अपने गाँव जाते हैं, मैं यहॉं खाता हूँ। बैठो।’’
विद्यार्थी आज्ञाकारी भाव में बैठ गये। पॉंच थालियाँ आ गयीं। आर0पी0 ने श्रीमती पाराशर को मार्गदर्शन दिया – 
‘‘श्रीमती पाराशर आप, दाल, सब्जी में इतनी मात्रा में पानी डालती हैं। विद्यार्थी अपना घर छोड़कर पढ़ने आये हैं। मॉं से अधिक मॉं के भोजन को याद करते हैं। क्वालिटी ठीक रखें।’’
विद्यार्थियों के सम्मुख भोजनालय को घटिया बताना श्रीमती पाराशर को अनुचित लगा। मुकाबला सा करते हुये बोलीं ‘‘स्टूडेन्ट्स पैसे नहीं बढ़ाते। कम पैसे में बहुत अच्छा खाना नहीं दिया जा सकता। हॉं अच्छा दिया जा सकता है और देती हूँ।’’
आर0पी0 की हाजिरी में खाना विद्यार्थियों की भोजन नली में नहीं उतर रहा था। आधा-अधूरा खाकर कॉलेज चले गये।
कॉलेज से लौट कर विद्यार्थियों ने देखा कार स्टार्ट करने में आर0पी0 बल लगा रहे हैं जो कि स्टार्ट नहीं हो रही है। निर्बाध ने पूँछा –  
‘‘क्या हुआ सर ?’’
‘‘कार स्टार्ट नहीं हो रही है।’’
सज्जन उत्साहित हुआ ‘‘मैं देखूँ ?’’
आर0पी0 को अतिरंजना का भान हुआ ‘‘चलाना जानते हो ?’’
‘‘मामा की कार खूब चलाता हूँ।’’
‘‘देखो क्या फॉल्‍ट है।’’ सज्जन चालक सीट पर रहनुमा की भॉंति बैठ गया। तीन विद्यार्थी धक्का देकर कार को सड़क पर ले आये। सज्जन बोला –
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‘‘धक्का लगाओ।’’
तीनों ने दौड़ते हुये पूरा जोर लगाया। कार स्टार्ट हो गई। पहली बार था कि आर0पी0 ने विद्यार्थियों से स्पष्टीकरण नहीं सहयोग मॉंगा –
‘‘सज्जन, तुम पहले विद्यार्थी हो जो मेरे काम आओगे।’’
‘‘जी ?’’
‘‘सामने से आते प्रकाश के कारण रात में कार चलाने में मुझे दिक्कत होती है। अक्सर पार्टी में नहीं जा पाता। तुम कार चलाओ तो जा सकता हूँ।’’
‘‘जी।’’
आर0पी0 कार लेकर चले गये।  
दूसरे ही दिन आर0पी0 ने सज्‍जन के मोबाइल पर कॉल किया –
‘‘सज्जन, आज शादी में जाना है समय निकालोगे ?’’
‘‘जी।’’
‘‘आठ बजे चलो। वेडिंग डेस्टीनेशन दूर है।
‘‘जी।’’
मोबाइल ऑफ कर सज्‍जन हुलहुला गया – 
‘‘आज मैं शादी में तर माल खाऊॅंगा।’’
जटाशंकर ने हताश किया ‘‘हुजूर का अनुशासन याद रखो सज्जन। तुम्हें चालक सीट पर चिपका कर वे तर माल उड़ाने चले जायेंगे।’’
‘‘जटा, हुजूर ऐसा नहीं करेंगे। उन्हें अनुशासन से ही नहीं सभ्यता से भी लगाव है। मैं तो तरमाल खाऊँगा।‘’ 
वेडिंग पार्टी से सज्‍जन आर0पी0 के साथ देर रात लौटा।
निर्बाध दाह में था ‘‘सज्जन ग्यारह बज चुके हैं।’’
‘‘निर्बाध, पार्टी में समय लगता है।’’
‘‘हुजूर को पार्टी में समय लगता है लेकिन हम लोग नौ बजे वाले ताले के डर से पार्टी में देर तक नहीं रुक पाते।’’
‘‘क्योंकि हम लोग हुजूर नहीं, विद्यार्थी हैं। कमला मुझे मजा मिल रहा है। रहीस लोग, हाई-फाई लड़कियॉं, मस्त खाना। सर बता रहे थे डेढ़ हजार रुपिया प्रति प्लेट खाना था।’’
‘‘डेढ़ हजार ?’’ जटाशंकर अचेत हो जायेगा। 
‘‘तुम लोगों ने देखा ही क्या है ? तीन हजार रुपिया पर प्लेट भी होता है।’’
‘‘सज्जन तुम मॅंहगा खाना खाते हो। हम तीनों टिफिन सेंटर का भूसा खाते हैं।’’
सज्जन, गहरे एहसास में था ‘‘क्योंकि जटा तुम लोग कार चलाना नहीं जानते।’’
निर्बाध बोला ‘‘पार्टी अटैण्ड करना जानते हैं। हमारी इमेज कितनी खराब है। लड़के कहते हैं गिफ्ट न देना पड़े इसलिये ये हुजूर वाले पार्टी अटैण्ड नहीं करते। अब मैं अपने ग्रुप की कोई पार्टी मिस नहीं करूँगा।’’
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सज्जन ने स्मरण कराया ‘‘ताला ?’’
निर्बाध की बंकिम मुस्कान ‘‘हुजूर के पास अनुशासन है। मेरे पास चतुराई है। लड़के देर रात तक कमानी मोहल्ले में घूमते हैं। लड़कियॉं उनसे मिलने आती हैं। हमारी उम्र बर्बाद हो रही है।’’
जटाशंकर का मंतव्य ‘‘हुजूर को मादा से बैर है। गुरुवार को मांडवी बुक लौटाने आई। मैं आउटर गेट पर खड़ा उससे बात कर रहा था। हुजूर की घ्राण शक्ति ही नहीं, श्रवण शक्ति भी बेमिसाल है। नारी स्वर सुने होंगे। गेट पर आकर सीधे मांडवी की खाल खींची क्यों आई हो ?’ बोली बुक लौटाने।बोले बुक कॉलेज में लौटाओ। मोहल्ले में इतने विद्यार्थी रहते हैं। कोई अफवाह उड़ा देगा तो रोती फिरोगी।मांडवी क्लास में लोट-पोट होकर बता रही थी हुजूर हम चारों को ब्रम्हचारी बनने का प्रशिक्षण दे रहे हैं। पार्टी में जाकर मैं बता दूँगा ब्रम्हचारी नहीं माचो मैन हूँ।’’
सज्जन सहमत न हुआ ‘‘जटा मैं पार्टी में नहीं जाऊँगा।’’
कमलापति ने उसका दाहिना कंधा ठोंका ‘‘सज्जन, हुजूर की विचारधारा तुम्हारे दिमाक में बैठ गई है। तुम बत्ती जलाकर पढ़ना। हुजूर को शक न होगा।’’
सज्जन घर में।
गुलछर्रे उड़ा कर देर रात लौटे निर्बाध और कमलापति ने पूर्व छात्रों से आधे मूल्य पर क्रय क्री गई अपनी-अपनी बाइक को पास में रहने वाले महेन्द्र के घर में रखा (स्थानाभाव के कारण बाइक महेन्द्र के परिसर में रखते हैं।) और तीनों घर आ गये। सज्जन अचम्भित –
‘‘बजरंगबली की तरह उड़कर आ गये ?’’
कमलापति युक्ति पर न्योछावर था ‘‘आउटर गेट की छड़ों में पंजे फॅंसाये। कार के ऊपर चढ़े फिर उतर कर आ गये। हुजूर क्या, हुजूर के अनुशासन को पता न चलेगा।’’
लेकिन आर0पी0 की विलक्षण गुप्तचर दृष्टि।
सुबह कार पर जूतों के चिन्ह देख, कॉलेज जा रहे विद्यार्थियों को रोका –
‘‘क्या तुम लोग कार के ऊपर चढ़े थे ?’’
फरेब में सिद्ध जटाशंकर ने अचम्भा व्यक्त किया –
‘‘नो सर।’’
‘‘जूतों के निशान बने हैं।
‘‘चोर होंगे। कुछ चुराया तो नहीं ?’’
‘‘नहीं।’’
‘‘सर कोई दिक्कत हो हमें फोन कॉल कर लें।’’
आर0पी0 के मुख में प्रतिरोध के स्थान पर चिंता देख विद्यार्थियों को निष्ठुर आनंद मिला। टिफिन सेंटर में धीमे स्वर में बोलते रहे –
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‘‘हुजूर डाल-डाल, हम पात-पात। चरण कमल के निशान रुमाल से पोंछ दिया करेंगे।’’
सज्जन ने जटाशंकर की निंदा की ‘‘जटा, यह गलत है।’’
निर्बाध ने अभाव कहा ‘‘सज्जन, तुम तर माल खाते हो। कभी हमें भी डेढ़ हजार रुपये प्लेट वाली दावत उड़ाने का मौका दो।’’
सज्जन शालीन है ‘‘सर या होस्ट देख लेंगे। भद्दा लगेगा।’’
‘‘बता रहे हो ढाई-तीन हजार लोग होते हैं। होस्ट क्या हमारा आधार कार्ड चेक करेगा कि हम बिन बुलाये मेहमान हैं।’’
‘‘ठीक है कमला, किसी दिन अपना जलवा दिखाऊॅंगा।’’
जलवा।
वेडिंग डेस्टीनेशन का पता बता कर सज्जन, आर0पी0 के साथ चला गया। अच्छी कमीजें धारण कर जल्दी ही तीनों विद्यार्थी पहुँचे। उन्हें आते देख सज्जन ने इधर-उधर दृष्टि डाल कर आर0पी0 की टोह ली। वे सदा की तरह परिचितों में दत्त थे। सज्जन बोला –
‘‘खाओ और फूट लो।’’
जो स्‍टॉल सामने दिखे तीनों वहीं  टूट पड़े। हड़बड़ी में बड़े कौर ठूँसते हुये वे सज्जन को वंचित से लगे। ठीक बात है। इनके खाने से होस्ट की तिजोरी नहीं लुट जायेगी। कभी-कभी बुला लूँगा। एहसानमंद रहेंगे।।
विद्यार्थियों को दावत उड़ाने की लत हो गई। दिनों तक पार्टी न होती तो उदासी घेरने लगती। पार्टी के दिन तीनों सज-धज, राजा बाबू बन कर पहुँचते। नहीं जानते थे आज की पार्टी में गिने-चुने बिग शॉट्स ही आमंत्रित हैं। खाना खाकर तीनों झिझकती चाल से इधर-उधर ताड़ते हुये लौट रहे थे। प्रवेश द्वार पर खड़े चार सम्पन्न लड़कों ने संदेह के आधार पर घेर लिया। सर्वप्रथम कमलापति जद में आया –
‘‘आपका नाम ?’’
‘‘कमलापति।’’
‘‘किसका पति ?’’
‘‘कमला।’’
‘‘यह नाम हमारी लिस्ट में नहीं है।’’
‘‘इन्वीटेशन पर आया हूँ।’’
आपदा सम्मुख हो तो व्यक्ति सबसे पहले खुद को सुरक्षित करना चाहता है। निर्बाध और जटाशंकर तेज गति से जाने लगे। संदेह पुख्‍ता हो गया। दो लड़कों ने उन्‍हें रोका। लड़के पूँछ रहे थे। भयभीत विद्यार्थी मुकम्मल बात नहीं बता पा रहे थे। लड़के उन्हें पीटने लगे। हिंसा अब किसी को नहीं चैंकाती। लोग उन्हें पिटते देख रहे थे। सज्जन के पैर काँपने लगे। यदि सर को पता चलेगा, कहेंगे सज्जन तुम इनफारमर हो वरना इन्हें कैसे मालूम हुआ यहॉं दावत है। लेकिन तीनों जिस तरह बेरहमी से पीटे जा रहे हैं ……… 
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आर0पी0 से फेवर नहीं मिलेगा पर वे आखिरी उम्मीद हैं। उसने उनके मोबाइल पर कॉल कर स्थिति बताई। आर0पी0 के चेहरे की आभा एकदम उतर गई लेकिन आखिरी उम्मीद की तरह आये। देखा पिटते हुये घटिया लग रहे तीनों विद्यार्थी खुद को छुड़ाने में बल लगा रहे हैं लेकिन लड़कों की पकड़ मजबूत है। डूब मरने वाली लज्जा महसूस कर रहे आर0पी0 संहारकों से बोले –
‘‘क्या है जनाब ?’’
एक लड़का बोला ‘‘सर उठाईगीर हैं। मुफ्त में खाते हैं। जेब काटते हैं। बदनामी हमारी होगी कि इनके आयोजन में जेबें कटीं ……….. पुलिस को कॉल करता हूँ …………।’’
आर0पी0 के भीतर कोई कुरेद रहा था पर वे आखिरी उम्मीद बने – 
‘‘उठाईगीर नहीं, विद्यार्थी हैं। मेरे घर में किराये से रहते हैं। मैं रात को ठीक से कार नहीं चला पाता इसलिये इसे (सज्जन) साथ में लाता हूँ। आज इन तीनों को ले आया कि मेरे सर्किल का ठाट-बाट देखें। यह सज्जन है, यह कमलापति, जटाशंकर, निर्बाध।’’
संहारकों ने आर0पी0 को धिक्कार से देखा – पॉंच सौ का लिफाफा थमा कर कुनबा समेट लाये।
‘‘सॉरी सर। मालूम नहीं था।’’
‘‘अरे ऐसी निर्ममता …….. तीन प्लेट खाना कितने का है ? तीन हजार ……… चार ……… छः …….।  आप लोगों के लिये यह राशि कुछ नहीं है।’’
‘‘सर कुछ उठाईगीर इसी तरह खाते और लूटते हैं।’’
‘‘मैं विद्यार्थियों की ओर से क्षमा मॉंगता हूँ। विद्यार्थियों गाड़ी में बैठो। आता हूँ।’’
बिखरे बाल, मुसी कमीज वाले विद्यार्थी घर लौट आये। कुछ देर बाद सज्जन आया। चेहरा ऐसा हो रहा था मानो सामरिक क्षेत्र से गुजरा है। बोला – 
‘‘सर ने हम लोगों को सुबह बुलाया है।’’
पतन में डूबे निर्बाध ने पूँछा –
‘‘कुछ कहा तुमसे ?’’
‘‘एक शब्द न बोले। लेकिन हमें यहॉं नहीं रहने देंगे।’’
जटाशंकर पस्त था ‘‘घर छोड़ने का घर वालों को क्या कारण बतायेंगे ?’’
सज्जन कटुता से बोला ‘‘कह देना हम भूखों मर रहे थे। पार्टी में चले गये। आप अपने जरूरी खर्च में कटौती कर हमें जो पैसे भेजते हैं उससे हमारा पेट नहीं भरता। आइने में सूरत देखो। सचमुच उठाईगीर लग रहे हो।’’
जटाशंकर की देह लहक रही थी ‘‘भैसों ने ऐसा मारा।’’
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सज्जन बोला ‘‘सर ने प्रोटेक्ट किया वरना भैंसे पुलिस बुलाते। डेरा – सामान रात में बॉंध लो। सुबह सर सिर्फ दो शब्द बोलेंगे गेट आउट’’
मार्निंग वॉक, ग्रीन टी सेवन के पश्चात् आर0पी0 ने सज्जन के सेल पर कॉल किया। विद्यार्थी आर0पी0 की बैठक में पहुँचे। देखा आर0पी0 का स्वर और चेहरे का प्रतिरोध शिथिल है।
‘‘आओ, बैठो।’’ कह कर आर0पी0 देर तक चुप रहे। जैसे स्वयं से जूझ रहे हैं।
उनकी चुप्पी साजिश की तरह लग रही थी। सज्जन ने साहस किया –
‘‘सर, हमारे घर में कॉल न करें। यह हमारी आखिरी गलती है।’’
आर0पी0 बोले – ‘‘सज्जन, गलती कभी भी आखिरी नहीं होती। इंसान जीवन भर गलती करता है। कभी करता है। कभी हो जाती है।’’
‘‘सॉरी सर। हमारे कारण आपको एम्बेरेसमेन्ट हुई।’’
‘‘तुम्हारी जनरेशन ने सॉरी को फैशन समझ लिया है। जैसे सॉरी का कोई अर्थ नहीं है। सॉरी बोलो और गलतियाँ करो।’’
‘‘सॉरी सर।’’
‘‘यह गलती करने की उम्र है पर बनने की उम्र भी यही है। अभी नहीं बन पाये तो कभी नहीं बनोगे।’’
 ‘‘…………’’
‘‘यहॉं कई विद्यार्थी आये और गये। मैंने अपनी कहानी किसी को नहीं सुनाई। तुम लोगों को सुनाता हूँ।’’
‘‘ …………’’
‘‘रिटायर्ड आर्मी ऑफीसर हॅू। युद्ध लड़े हैं। मार-काट, लहू, गोली-बारूद देखा है पर सार्वजनिक स्थल पर इस तरह पिटना …………कितनी गलतियाँ करोगे ……………
रिटायर्ड फौजी ? इसीलिये अनुशासित हैं।
‘‘ ………. मैं अपनी ड्यूटी के प्रति बहुत समर्पित था। मेरी पत्नी सोचती थी मैं उन्हें उपेक्षित करता हूँ। हमारा एक बेटा था। पत्नी ने उसका मोह नहीं किया। तलाक ले लिया ………..
पारिवारिक विश्रृंखलता। इसीलिये लड़कियों को पसंद नहीं करते हैं।
‘‘ ……………. मैं पोस्टिंग पर रहता था। अपने दादा-दादी के साथ रहता बेटा लापरवाह और जिद्दी हो गया। गलत सोहबत पकड़ ली। दुकानों से हफ्ता वसूलता। लड़कियों को परेशान करता। मैं नहीं जानता वह दुर्घटना थी या किसी की दुर्भावना। बरही रोड वाले अंधे मोड़ पर उसकी बाइक को कार ने टक्कर मारी। फिर वह घर नहीं लौटा। जिस फ्लैट में तुम लोग रहते हो उसके लिये बनवाया था …………
आर0पी0 के प्रतिरोध वाले चेहरे में विद्यार्थियों ने आलोड़न देखा।
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‘‘ ………….. खत्म होने पर आता है तो अचानक खत्म हो जाता है। मैं पूरी रात भटकता रहा पर बेटे को नहीं ढूँढ़ सका। डाँक्टर कहते थे उसकी मौत ठंड से हुई वरना बच जाता ………..
यह है शेष हुये संबंधों की पृथक दुनिया।
‘‘ ……….. इतने बड़े मकान में अकेला क्या करूँ ? परिवार से मुझे नफरत है इसलिये परिवार वालों को नहीं रखता। विद्यार्थियों को रखने लगा कि ये किसी के बेटे हैं। आपत्ति लगाता हूँ कि किसी पिता का बेटा राह भटक कर एक दिन मेरे बेटे की तरह ………….। अनुशासन करते-करते मैं शासन करने लगता हूँ। यह मेरा स्वभाव बन गया है ……………..
कुछ खुलासे मानसिकता को झिंझोड़ डालते हैं। आर0पी0 हानिकारक नहीं आदरणीय लग रहे हैं।
‘‘ …………..विद्यार्थियों से मुझे इतने किस्म के अनुभव मिलते हैं लेकिन उन्हें रखना बंद नहीं करता कि फ्लैट से आती आहटें और प्रकाश मुझे मेरे होने का आभास कराते हैं। पार्टियों में जाता हूँ कि व्यर्थता बोध को कुछ देर के लिये भूल जाऊॅं। पर अब परिचितों से नजर मिलाने में शर्म आयेगी ………… मैंने बचा लिया। हर बार तुम्हें बचाने कोई नहीं आयेगा।’’
चोटिल विद्यार्थी।
खुद को अभिव्यक्त कर चुके आर0पी0
विद्यार्थी भाग कर किसी अॅंधेरी खोह में छिप जाना चाहते थे। आर0पी0 ने असमंजस भॉप लिया –
तुम लोग कॉलेज जाने की स्थिति में नहीं हो। आज रेस्ट करो। सज्जन कुछ चाहिये तो बताना।’’
‘‘जी सर।’’
आउटर गेट अब भी नौ बजे बंद हो जाता है।
चारों विद्यार्थी नौ से पहले लौट आते हैं।
…………………………..
सुषमा मुनीन्द्र
द्वारा श्री एम. के. मिश्र
जीवन विहार अपार्टमेंट्स 
द्वितीय तल, फ्लैट नं0 7
महेश्वरी स्वीट्स के पीछे,
रीवा रोड,, सतना (म.प्र.)-485001
मोबाइल: 8269895950
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