होमकहानीसुदर्शन रत्नाकर की कहानी - कोहरा कहानी सुदर्शन रत्नाकर की कहानी – कोहरा By Editor March 8, 2026 0 63 Share FacebookTwitterPinterestWhatsApp जैसे जैसे रात गहरा रही थी कोहरा और भी घना होता जा रहा था। उसे नींद नहीं आ रही थी। लिहाफ़ से निकल कर उसने कंबल ओढ़ लिया। एक नज़र सावित्री पर डाली, वह निश्चिंत सो रही थी। वह धीरे से किवाड़ खोल कर बाहर आ गया; लेकिन कोहरे के कारण उसे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। स्ट्रीट लाइट की ट्यूब की हल्की–सी चमक दिखाई दे रही थी। बरसों पहले ऐसा ही कोहरा पड़ा था। उस दिन शाम से ही धुँधला शुरू हो गया था और फिर रात होते–होते चारों ओर कोहरे की चादर ने सारी धरती को अपने आग़ोश में ले लिया था। उस दिन खेत में पानी लगाने के लिए उसे वहीं रुकना था। हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा था। वह पानी क्या देता। खेत में बनी कोठरी में उसने वह भयावह रात अकेले ही बिताई थी। उसके मन में कोई डर, कोई भय नहीं था; लेकिन आज वह भीतर ही भीतर भय से काँप रहा है, जबकि वह बड़ी कोठी में है। पत्नी उसके साथ है पर उसे नींद नहीं आ रही क्योंकि आज डर का कारण और है। उसके दोनों बेटे अभी घर नहीं लौटे। शाम से ही मौसम ठीक नहीं था। उसने उन्हें जाने के लिए मना भी किया था; लेकिन वे माने ही नहीं। उसकी सुनते ही नहीं। समय ने उन्हें कितना बदल दिया है। दोनों की एक दूसरे से लय–तान नहीं मिलती। छोटी–छोटी बात को लेकर झगड़ते रहते हैं, लेकिन जब दोनों के स्वार्थ एक होते है तो उनके स्वर मिल जाते हैं। मना करने पर भी वे दोनों चले गए थे और अब तक नहीं लौटे। इतने कोहरे में तो दुर्घटना का भी डर है। यह सोच कर वह विचलित हो गया। जीवन की गाड़ी पटरी पर सीधी सपाट चल रही थी, सुख–दुख तो रहते हैं। पर वह खुश था। पाँच एकड़ ज़मीन से वह अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के खर्चे निकाल ही लेता था। जब वह छोटा था तो अपने बापू के साथ खेत में जाकर उसकी मदद करता था। गाँव के स्कूल में भी जाता था। पर वह अधिक पढ़ नहीं पाया। थोड़े दिन बीमार रहने के बाद बापू चल बसे थे और फिर माँ, बहनों की ज़िम्मेदारी उसके कंधों पर आ गई थी। पहले वह बापू के साथ काम करवाता था, फिर माँ उसके साथ काम करवाने लगी थी। बड़ी बहनों की शादियाँ हो गई थीं। माँ अब बुढ़ाने लगी थी। शरीर में शिथिलता आने लगी थी। तभी सावित्री उसके जीवन में आ गई थी। तब उसका जीवन ही बदल गया था। माँ घर का काम–काज देखती। सुबह वह बैलों की रस्सी हाथ में लेकर निकलता तो सावित्री उसको चुपके से जाते देखती रहती। उसका ऐसे देखना उसे अच्छा लगता। काम करते करते जब वह थक जाता तो बरगद के पेड़ के नीचे सुस्ताने लगता। उस समय सावित्री उसके लिए खाना लेकर आती थी। रोटी खाकर और लस्सी पीकर वह तृप्त हो जाता। गर्मी की लम्बी दोपहरें वह ऐसे ही उसके साथ बिता देता था। सर्दी की गुनगुनी धूप में बैठ कर वे खुली आँखों से कितने सपने देखते थे। फ़सल अच्छी होने पर वे खुश हो जाते थे। पर हर बार उन्हें खुशी नहीं मिलती थी। कभी वर्षा की अधिकता, कभी पाला तो कभी सूखे की मार उनके सपनों को बिखेर देती थी। पर ये तो किसान के साथी हैं। लहलहाती फ़सलें जहाँ सुख के झूले में झुलाती हैं वहीं प्राकृतिक आपदाएँ उसे दुख के सागर में डुबो देती हैं। लेकिन किसान का धैर्य उसे संतुलित बनाए रखता है। धीरे–धीरे उसका परिवार बढ़ रहा था। पहले संतोष फिर राघव और उसके बाद मनेन्द्र और मँजू। चार बच्चों के परिवार में आ जाने से उसके खर्चे भी बढ़ गए थे। उसको पूरा करने के लिए वह और परिश्रम करने लगा था। खेत जोतने के नए साधन, सिंचाई, खाद अच्छे बीज सबकी जानकारी लेकर कोऑपरेटिव बैंक से ऋण ले लिया था। उसकी फ़सलें तीन गुणा बढ़ गई थीं, जिससे उसकी ज़रूरतें पूरी होने लगीं। घर में ख़ुशहाली थी। दूर–दूर तक फैली हरी फ़सलों को देख कर उसका सीना गर्व से फूल जाता था। जिस वर्ष फ़सल अच्छी नहीं होती थी, तब भी वह निराश नहीं होता था। अपनी ज़रूरतें कम कर लेता। अभाव में जीवन जी लेता था। वह तब भी खुश रहता था। घर में शांति थी। सावित्री का साथ था। माँ का आशीर्वाद उसके साथ था। बच्चे उसकी बात मानते थे। सुबह वे स्कूल जाते। वापस आने पर लड़कियाँ माँ के काम में हाथ बँटाती और राघव–मनेन्द्र उसके साथ खेत में जाते थे। सभी ओर सुख–शांति थी। उसका कंबल एक ओर से उतर गया था, उसने अच्छी तरह से ओढ़ लिया। सर्दी उसके भीतर तक जाकर कंपकंपा रही थी। बाहर कुत्ते के भौंकने की आवाज़ आई। वह सतर्क हो गया। शायद राघव और मनेन्द्र लौट आए हों। लेकिन वह उसका भ्रम था। वह फिर से उकड़ूँ होकर बैठ गया। मन था कि सँभल नहीं रहा था। सौ–सौ उफनती लहरों से घिर रहा था और वह डूब रहा था नीचे धरातल में। उसने आसमान छूने की कोशिश कभी नहीं की। उड़ान भरी थी, पर उतनी ही, जितनी वह भर सकता था। जितने में वह परिवार का पालन–पोषण कर सके। ज़रूरतें पूरी कर सके। सुखी–शांत जीवन जी सके। ऐसा तो सभी सोचते हैं। उसने उठ कर कमरे में झाँका। सावित्री करवट बदल रही थी। किवाड़ खोलने की आवाज़ से वह जग गई थी। अंधेरे में ही उसने पहचान कर पूछा, “सोय नाहीं का। बाहर का करने गए थे?” “नींद नाहीं आ रही थी सावित्री, ऐसे ही उठ कर बाहर चला गया था। घना कोहरा है। देखने में अच्छा लग रहा था। सो बैठ कर देखता रहा।” “कोहरा देखना भी का अच्छा लगे है। मैं जानू हूँ राघव के बापू तोरे मन पर बोझ है, मोको बताओ न, का बात है?” “कछु नाहीं तुम सो जाओ। मोहे नींद आवेगी तो मैं भी सो जाऊँगा।” “राघव–मनेन्द्र आ गए का?” सावित्री ने पूछा। “ना, अभी तक तो नाहीं आए।” उसने कहा। “आ जावैंगे, चिंता मति करो। बच्चे नाहीं रहे वो, बड़े हो गए हैं।” “तुम्हरे कारण ही बिगड़ रहे हैं दोनों।” “मैं भला काहे बिगाड़ूँ सू। पैसा उन्हें बिगाड़ रहा है। मैं माँ हूँ, उनका बुरा तो नाहीं चाहूँ।” “भला बुरा किस में है यह सब मैं जानूँ। पर बेबस हो गया हूँ। कितनी दूरियाँ हो गई हैं हम सब में। तुम भी तो लड़कों का साथ देवो हो, मैं कितना अकेला हो गया सू।” कहते कहते उसका गला रुद्ध गया। सब कुछ होते हुए भी यह अकेलापन उसे सालता है। ईंट, गारे, पत्थर से बना यह मकान, बहुत बड़ा मकान है। ज़रूरत का, साज–सजावट का सब सामान है। पर घर नहीं है। घर तो वो होता है, जिसमें सब मिल–जुल कर प्रेम से रहें, आपसी सहयोग हो, एक दूसरे का सम्मान हो, आदर हो। पर यहाँ तो कुछ भी नहीं है। घर तो उसका तब था, जब वह अपने गाँव में रहता था। कच्ची मिट्टी की दीवारें और गाय के गोबर से लीपा चौका था। आँगन में एक ओर बँधी चितकबरी गाय और दूसरी ओर वहीं खेलते बच्चे। उन्हें पुकारती हुई माँ की आवाज़ें और सावित्री का प्यार था। एक–दूसरे के प्रति विश्वास और ईश्वर में आस्था थी। अब कुछ भी तो वैसा नहीं रहा। सब कुछ बदल गया है। सब कुछ बिखर गया है। न वह घर रहा और न ही वे लहलहाते खेत। न पानी का कुँआ न कोई पेड़, जो चिलचिलाती धूप में ठंडक पहुँचा सकें। न कोई आँगन है, जहाँ सर्दियों की गुनगुनी धूप में बैठ कर अपने जर्जर होते शरीर को ताप सकें। क्या से क्या हो गया है। क्या होता जा रहा है। उसका मन इन सब को पाने के लिए तरसता रहता है। उसका जन्म गाँव की मिट्टी में हुआ। वहीं बड़ा हुआ, खेला, खेतों में जी तोड़ मेहनत की। उसके नथुनों में उस मिट्टी की सोंधी गंध आज भी आती है, वह उस सुगंध के पीछे भागता है, पर उसे पकड़ नहीं पाता। मृगतृष्णा है यह। वह जानता है, पर वह न तो इससे पीछा छुड़ा पाता है और न ही तृप्त हो पाता है। कंकरीट के ये जंगल उसके थके मन को विश्राम नहीं दे सकते। उसके अशांत मन पर मरहम नहीं लगा पाते। तब वह भीतर ही भीतर तड़पता है, छटपटाता है, पर उसकी यह तड़पन, यह छटपटाहट कोई भी देख नहीं पाता। उस पीड़ा को वह स्वयं ही झेलता है। वह औरों जैसा क्यों नहीं हो पाता। इस परिवर्तन, इन परिस्थितियों से वह समझौता क्यों नहीं कर पा रहा है। शायद यह उसका अपनी धरती, अपनी ज़मीन से अतिरेक मोह है जिससे वह छुटकारा नहीं पा रहा है। वह भी औरों की तरह इस सबको स्वीकार क्यों कर लेता। उसे वह दिन याद है, जिस दिन गाँव की चौपाल पर उसे यह समाचार सुनने को मिला था कि उसके गाँव की ज़मीन पर एक बहुत बड़ा कारख़ाना बनने जा रहा है, जिसके लिए सभी किसानों की ज़मीन का अधिग्रहण कर लिया जाएगा। उन्हें रहने के लिए मकान तथा हर परिवार के एक सदस्य को उस कारख़ाने में पक्की नौकरी पर भी रख लिया जाएगा। उसके मन में एक हूक–सी उठी थी। अपनी ज़मीन, अपने दिल के टुकड़े को, पूर्वजों की धरोहर को किसी और के हाथ बेच देना होगा। वह तो उसे अपनी माँ के समान समझता है, उसकी पूजा करता है। वह ऐसा नहीं कर सकता। पैसा तो आना–जाना है। आज नहीं तो कल ख़त्म हो जाएगा। धरती तो उसकी अपनी है। बाप–दादा से मिली है। आगे की पीढ़ियाँ उसे सम्भालेंगी। यही ज़मीन उन सबका पालन–पोषण करेगी। उसने विरोध भरे स्वर में कहा था, “का ज़रूरी है, सभी अपनी ज़मीन कारख़ाने के लिए बेच दें?” “हाँ, भाई यह ज़रूरी है। एक बड़े कारख़ाने के लिए ज़मीन भी तो बड़ी चाहिए। यह तो सरकार का हुक्म है। वह ही तो कारख़ाना बनाने जा रही है। मना तो नहीं कर सकें हम। फिर सरकार हमें हमारी ज़मीन के ऊँचे दाम भी दे रही सू। कड़ी मेहनत करके हम का पा लेते हैं। दो बख्त की रोटी, बस। कभी कभी वह भी नहीं मिल पाती। अभावों में जीते जीते यूँ ही ज़िंदगी बीत जाती है।” सरपंच ने कहा। बहुत से किसानों ने उसकी बात का समर्थन किया था। जिन्होंने नहीं किया, उनके विरोध करने की गुंजाइश ही नहीं थी। अधिग्रहण तो होना ही था। छोटे किसान खुश थे। बहुत बड़ी रक़म उनके हाथ में आने वाली थी। इतना पैसा तो उन्होंने जीवन में देखा ही नहीं था। पर वे इस बात से अनभिज्ञ थे कि आगे चल कर इसकी बहुत बड़ी क़ीमत उन्हें चुकानी पड़ेगी। छह मास के भीतर ही सरकार ने उनकी ज़मीन का अधिग्रहण कर लिया। अंतिम बार बड़े मनोयोग से उसने रबी की फ़सल बोई थी। गेहूँ और चने के बीजों को अंकुरित होने से लेकर लहलहाते पौधों तक उसने दिन–रात देखभाल की थी। अपनी ज़मीन से फ़सल काटते हुए उसका दिल डूबने लगा था। धरती की माटी को माथे से लगा कर वह रो पड़ा था। बस यहीं से उसका सब कुछ बदल गया। बड़े ज़मींदार तो पहले ही शहरों में रहते थे। अपनी ज़मीन की देखभाल करने के लिए कभी कभार आ जाया करते थे। उन्हें कोई अंतर नहीं पड़ा। पैसा पहले भी था। करोड़ों और मिल गए जिससे उन्होंने दूसरे गाँव में और ज़मीन ले ली। शेष पैसों को किसी व्यवस्था में लगा दिया। मुश्किल तो छोटे किसानों के लिए थी जो न तो ऊँचे दामों पर कहीं और ज़मीन ले पाए और न ही कोई और काम कर पाए। पैसे मिलने पर उनके दिल भी बड़े हो गए थे। ज़रूरतें बढ़ीं तो ख़र्च भी बड़े हो गए। कोई गाँव में ही रह गया तो कोई अन्यत्र चला गया। बरसों से साथ रहते लोग अलग अलग हो गए। स्थिति सबकी एक जैसी थी। किसी ने परिस्थितियों के साथ समझौता कर लिया तो किसी ने मन मार लिया। लेकिन वह न तो समझौता कर पाया और न ही मन मार पाया। यह नहीं था कि उसने कोशिश नहीं की थी। कोशिश की थी उसने। पर उसकी परिस्थितियों ने उसे तोड़ दिया। वह बिखर गया। उसका घर भी बिखर गया। जिस दिन उसे ज़मीन का मुआवज़ा मिला था, उसी दिन परिवार के सदस्यों के बीच दरार पड़ गई थी। उसने चाहा था, उसी पैसे से वह ज़मीन ले ले। इस तरह जायदाद भी बनी रहेगी और वह शेष जीवन पहले की तरह खेती–बाड़ी करके गुज़ार देगा। लेकिन राघव और मनेन्द्र ने उसके सपनों को तोड़ दिया था। राघव ने बिना भूमिका के ही सीधे उससे कह दिया था, “बापू और कहीं ज़मीन लेने की तो तुम सोचो ही नाहीं । तुमने तो अपनी ज़िंदगी इसी में खपा दी, क्या मिला, दो जून की रोटी, बस। हम अपनी ज़िंदगी, यह काम करके ख़राब नहीं कर सकें।” “खेती–बाड़ी से ज़िंदगी ख़राब नाहीं होवे। किसान तो अन्नदाता होवे है। उसकी मेहनत से ही दुनिया का पेट भरे है। हर कोई यही सोचेगा तो दुनिया को खाने से कहाँ से मिलेगा।” उसने कहा था। “ये आपके विचार हैं बापू, मैं यह काम नहीं कर सकूँ। आप मेरे हिस्से के पैसे मुझे दे दें। मैं अपना कोई और काम करूँगा।” राघव ने कहा था। राघव की मूँछें भी नहीं फूटी थीं कि वह अभी से बँटवारे की बात करने लगा था। उसे देख कर मनेन्द्र ने भी अपने मन की बात कह दी थी। जो लड़के आज तक खेती–बाड़ी में उसकी मदद करते आ रहे थे। पैसा देख कर उनकी नज़रें बदल गईं, मन बदल गए। विचार बदल गए। सोचता– यह पैसे की ही शक्ति है, जिसने रिश्तों में भी दरार डाल दी। लड़कों ने तो अपना हिस्सा माँग ही लिया था। दोनों ब्याहता लड़कियाँ भी पीछे नहीं रहीं। दोनों रक्षाबन्धन पर भाइयों को राखी बाँधने आईं तो उसके कान में बात डाल गईं। संतोष ने तो सीधे ही कह दिया था, “बापू ये कह रहे थे कि आज कल तो छोरियों का भी जायदाद में हिस्सा होवे है। इतना पैसा मिला है तो हमें भी उसमें से कुछ मिलना चाहिए।” वह आश्चर्यचकित हो उसे देखता रहा। उसे सबसे अधिक आश्चर्य तो तब हुआ जब सावित्री ने भी बच्चों की बातों का समर्थन किया था। “राघव के बापू, बच्चे ठीक ही तो कहवै हैं। सबको अपनी मर्ज़ी कर लेने दो। जीवन भर हम तो टोटे में ही जीते रहे। चार पैसे आएँ हैं तो उन्हें खुशी–खुशी जीने दो।” पैसे–पैसे उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसा कौन–सा कुबेर का ख़ज़ाना मिल गया है, जिसे जीवन भर खाते रहेंगे। कोई काम धन्धा नहीं करेंगे या बैंक में पैसा नहीं रखेंगे तो सब ख़त्म हो जाएगा। वह कोई और काम नहीं कर सकता। राघव को अभी नौकरी मिली नहीं, उसका विश्वास भी नहीं मिलेगी या नहीं। सब इस पैसे के बल पर आसमान छू लेना चाहते हैं। औँधे मुँह गिरेंगे नहीं तो और क्या है! गाँव का कच्चा मकान छोड़ कर वे लोग पक्के बड़े मकान में आ गए। फ़र्नीचर, टी.वी., फ्रिज, कार, मोटर साइकिल जीवन की हर सुख–सुविधा का आधुनिक सामान उन्होंने ख़रीद लिया था। रहन–सहन का स्तर ऊँचा हो गया है, लेकिन उसके साथ ही उनमें उच्छृंखलता भी आ गई है। सारा दिन दोस्तों की घमाचौकड़ी घर में बैठेगी या वे बाहर जाएँगे। देर रात घर से निकलते हैं। निरुद्देश्य सड़कों पर घूमते हैं, मोटर साइकिल चलाते हैं। पिछले महीने ही ऐसे ही तेज़ी से मोटरसाइकिल चलाते हुए मनेन्द्र ने पैदल चलते एक वृद्ध को टक्कर मार दी थी। वह बच तो गया; लेकिन बेचारा लहूलुहान हो गया था। पुलिस केस बना। पैसा ले देकर छुटकारा मिला था। यह कोई एक दिन की बात नहीं। हुड़दंग बाज़ी रोज होती रहती है। पढ़ाई के नाम पर स्कूल–कॉलेज जाते हैं, लेकिन मटरगश्ती कर के वापिस आ जाते हैं। घर पर खाना बना पड़ा रहता है। बाहर से खाकर आ जाते हैं। यह रोज का काम हो गया है। देर रात तक बाहर रहते हैं फिर सुबह देर से उठते हैं। दोनों को उसका कोई डर नहीं रहा। आँख की शर्म नहीं रही। उसके समझाने पर दो टूक जवाब देते हैं। उसके द्वारा दिए सारे संस्कार तिरोहित हो गए हैं। वह जब निराश–उदास हो जाता है तो उसे कहेंगे, “बापू सारा दिन घर में मातम मति मनाया करो। गढ़े मुर्दे उखाड़ने से कुछ नहीं होने वाला, जो है उसे स्वीकार करो बापू, स्वयं भी जीयो और हमें भी जीने दो, जीवन में जो सुख मिला है, उस सुख को भोगो।” कल के जन्मे बच्चे उसे दार्शनिकों की तरह समझाते हैं। पर वह अपने मन को नहीं समझा पाता। बरसों से काम करने की आदत उससे छूटती नहीं। ज़मीन का मोह वह नहीं छोड़ पा रहा। बड़े–बड़े लोग और सरकार यह क्यों नहीं समझती कि विकास के लिए कारख़ानों या बड़ी–बड़ी इमारतों की ज़रूरत है तो उसके लिए बसे –बसाए किसानों को उजाड़ने की क्या ज़रूरत है। पैसा, घर, नौकरी का लालच देना, उनकी भावनाओं के साथ खिलवाड़ करना है। उन्हें ज़मीन के बदले ज़मीन मिलनी चाहिए या कारख़ाने में उनका हिस्सा होना चाहिए, जिससे वह आपाधापी की आर्थिक ऊँच–नीच में स्वयं को सुरक्षित समझें, उनकी आय का साधन बना रहे। न परिवार बिखरें, न ही उनके सपने टूटें। उसे किवाड़ खुलने की आवाज़ सुनाई दी। वह बाहर आ गया। देखा राघव और मनेन्द्र बहकते कदमों से अपने कमरे में चले गए थे। उन्होंने यह पूछना ज़रूरी नहीं समझा कि बापू तुम अभी तक जाग क्यों रहे हो। सोये क्यों नहीं? उसने अपनी आँखों में आँसुओं को पोंछ कर अंदर झाँक कर देखा। सावित्री गहरी नींद में सो रही थी। वह भी पलंग पर लेट गया। पर उसे नींद नहीं आ रही थी। बाहर कोहरा और घना हो गया था, लेकिन उसके मन पर छाए कोहरे से अधिक नहीं था। बाहर का कोहरा सूर्य के निकलते ही छँट जाएगा। सुबह साफ़ हो जाएगी, लेकिन उसके मन का कोहरा जाने कब छँटेगा। सारे बंधनों को तोड़ कर उसका मन अपनी ज़मीन पर जाने के लिए छटपटाने लगा, जहाँ दिन–प्रतिदिन ऊँची होती कारख़ाने की इमारत के अतिरिक्त और कुछ नहीं था। न ज़मीन थी, न लहलहाते खेत थे। यह सोच कर उसके मन का कोहरा और गहराने लगा। सुदर्शन रत्नाकर ई-29, नेहरू ग्राउंड, फ़रीदाबाद – 121001 मो.- 9811251135 Share FacebookTwitterPinterestWhatsApp पिछला लेखसुषमा मुनीन्द्र की कहानी – शासन-अनुशासनअगला लेखकृष्ण कुमार गुप्ता की दो कविताएँ Editor RELATED ARTICLES कहानी सुषमा मुनीन्द्र की कहानी – 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