है आशिकी के बीच, सितम देखना ही लुत़्फ
मर जाना आंखें मूंद के, यह कुछ हुनर नहीं।
मीर
दीपावली की पूरी रात बिना नींद के कट गयी। बीती नहीं काटी किसी तरह से। कभी लगता कि हाथ की नसों में खिंचाव है,तो कभी लगता पैर की नसें ऐंठ गयीं हैं। बार बार उठ कर पानी पीया। दिन जैसे बिना खाना खाये गुजरा हो, वैसे ही नींद बिना रात कटी। कोई कह सकता है कि क्या सोच लग लगी है तुम्हें।
कुछ नहीं। दिमाग में दिन भर घमड़-भमड़ चलता है। दिल्ली की हवा का ज़हर बढ़ गया था। हवा की पैमाइश करने वाली मेट्रो पर लगी मशीन लाल रंग की इमरजेंसी दिखा रही थी। मेरे फेफड़े और दिमाग दोनों के पास आक्सीजन की कमी थी।
दिमाग में कोई चेहरा,कोई बात, कभी कुछ कभी कुछ।
भीतर से एक ही कसक उठती है।
कोई बात करे। कोई ताज़ी हवा चले। कोई साथ में चाय पीये। जिन्दगी और दुनिया इतनी उलझी न हो। कोई यूँ बात करे जैसे कोई जीवन को सहेज रहा हो, कहे कि उसे जीवन से प्यार है। हमने ये कैसी दुनिया बना ली है जिसमें सिर्फ शोर है। उस रात लिखा-
एक पूरे चाँद की रात
ओस बरसाती है।
और झन्न से लगती है,
जैसे त्वचा पर तेज़ाब के छींटे हों।
हरसिंगार झरता है रात भर
क्यों लग रहा कि पृथ्वी की कब्र पर बिछी ये चादर
मैली,बदरंग है।
लाखों टूटे घर, घर के सपनें,सपनों के घर,
महकार की टिटकारी इतनी फूहड़ नहीं लगी।
आह! नींद में भागते शहर में घर एक जमा बिस्तर है,
प्यार कुछ मिनटों का कुलबुलाना
शोक में दग्ध खबरों के हिस्से एक छोटा सा मौन नहीं।
दुनिया के नायाब इत्र माँ के दूध से महकते बच्चों की हत्या हो,
दूध खून में मिल जाये,इत्र हो जाये चिरांध,
और कोई पूछे और सब कैसा है?
हम कहें सब मस्त है!
दिल-दिमाग से न तो देश-दुनिया की खबरे पढ़ी जा रही थी और न ही तसवीरें देखी जा रही थी। सबके जीवन के काले वन है,मेरे दिमाग का भी एक काला वन घिरता जा रहा है। उससे निटपने के लिए मैं बाजारों में सड़कों पर भटकती हूँ, पैर में दर्द हो जाता है। पता नहीं दुनिया का कौन सा कारोबार देखती हूँ। कई बार थके हारे चेहरे को किसी छोटी सी खुशी पर ठहाका लगाते देखती हूँ तो खुश हो जाती हूँ। कई बार उन चेहरों को देखती हूँ जिनके जीवन को देखकर संदेह हो जाये कि आखिर इतना जीना क्यों हैं। हर बार उन्हीं को देखकर वजह पाती हूँ। इस भटकने में एक मरहम मिलता है। बहुत सारी भीड़ में गुम हो जाना होता है। मुझे कोई नहीं पहचानता, मैं किसी को नहीं पहचानती। बाज़ार या इन बाज़ारों की गलियों में लोग चल रहे होते हैं। उनके हाथ पाँव किसी अदृश्य ताकत के भरोसे होते हैं। वह ताकत कौन सी है लोगो को इस पर भी नहीं सोचना होता है। भाग्य देवता-भाग्य की नदी के किनारे बैठा, लोगों को रास्ता दिखाता है। और शिकायतों को डायवर्ट करता है। लोगों की आँखे बाज़ार में दुनिया का चमत्कार देखती हैं। कपड़े,जूते बैग और असली-नकली गहने। उनका सौन्दर्य अप्रतिम होता है। वह हर भावी ग्राहक को वो खींचते हैं। ग्राहकों को अपनी जेब के बारे में पता है कि वहाँ खाली सिक्के खनखना रहे है या फोन के एप में पैसे फुदक रहे हैं। हर दुकानदार को उसके ग्राहक का पता है और हर ग्राहक को अपनी औकात। फिर भी दुकानों में एक मजाकिया खेल चलता है। लेकिन ये खेल भी कब तक देखती। दिमाग का काला वन घना होता जा रहा था।
मुझे सख्त जरूरत थी घुमकक्ड़ी के उस मरहम की ओर जाऊ, जहाँ दिल को थोड़ा सुकूंन मिले। मुझे अकेले घूमना था। अपने को थिर करने के लिए। ये मेरा अजमाया हुआ पुराना तरीका था। मुझे तो किसी टपरी पर चाय पीना भी प्रोहिबिटेट स्पेस में घूमने जैसा लगता है। कोई भी जान सकता है की मनाही को तोड़ने में कितना सुख प्राप्त होता है।
बाल-बच्चेदार परिवार को बताना कि अकेले जाना चाहती हूँ कुफ्र जैसा लगता है। कोई दूसरा कहे उसके पहले मेरे भीतर बैठी माँ भी तो है अब तो मैं पहले जैसी अकेली नहीं हूँ। सच तो ये है कि कहीं कुछ अच्छा खा लिया तो भी लगता है कि भई बच्चों ने तो ये खाया नहीं। फिर अपने भीतर बैठी माँ को समझाती हूँ कि उनका समय उनका है और मेरा समय मेरा भी होना चाहिए। ये एक अभ्यास है जो हर माँ को अपने बच्चे को प्यार से कराना पड़ता है।
परिवार भी धीरे धीरे आपका मिजाज समझने लगता है। मैंने परिवार में बताया, उन्होंने मुझे आश्वस्त किया कि सबलोग मजे से रह लेंगे। सच तो ये है कि इस यात्रा की मेरी कोई प्लानिंग नहीं थी। बस अचानक से एक दिन पहले पता चला कि अगले हफ्ते विश्वविद्यालय बंद है। ये मेरे लिए किसी वरदान से कम नहीं था। अगले दिन पिठ्ठू में कपड़े रखे और बस अड्डे पहुँच गयी। जहाँ जाना था उसकी कौंध कई बार मेरे दिमाग में आती थी। ठीक वैसे ही जैसे बरसों पहले देखा हर्षिल कौंधता है। दिमाग में बरसों पहले का नौकुचिया ताल बसा था। एक शांत गरिमामय सौन्दर्य से भरी जगह। जहां ताल के सारे कोने को किसी एक कोने में बैठ कर कोई अपनी तस्वीर देख सकता है। त्यौहार के बाद का समय था तो पूरी उम्मीद थी कि ठहरने की जगह मिल जायेगी। मेरी पुरानी घुमक्कड़ी की आदत में हर तरह की सवारी रही है। बस अड्डे जाकर पता चला कि साधारण बस सेवा और ज्यादा साधारण हो गयी है। पूरा दिन बस में बीत गया। यात्रा करते समय वाहन के चुनाव से, उसकी गति से, दृश्य और दृश्यों के प्रति संवेदना बदल जाती है। हवाई जहाज से घर,नदी,पहाड़ क्रमश लकीरों में बदल जाते हैं। वहाँ से कौन किस हाल में है उससे एक बेइन्तहा दूरी बन जाती है। रेल,बस और कार तीनों वाहन की यात्रा में दृश्यों की दुनिया बदल जाती है। सबकुछ तेजी से भागता है-बदलता जाता है। मुझे याद है कि एक बार दक्षिण से लौटते समय मुझे सीट के नीचे सोना पड़ा था। मजेदार बात थी कि जिन लोगों ने स्लीपर बोगी में कब्जा किया था उन्होंने ने ही दया करके सीट के नीचे पूड़िया और अचार भी दिया था। वो शायद दो हजार एक के कुम्भ स्नान की भीड़ थी। मध्य प्रदेश के आसपास रात को एक पूरी भीड़ आयी और पूरी बोगी आलू के बोरे में बदल गयी। जो भी हो घुमक्कड़ी सिर्फ मंजिल का मजा नहीं है वो रास्ते की खुशियां है। अजब-गजब लोगों से मुलाकातें हैं। रास्ते में रामपुर पड़ा। पहले तो जी किया यही उतर कर एक बार यहां कि लाइब्रेरी देखी जाये। मन मसोस कर गयी। सच तो ये है कि बेफिक्र सी दिखती घुमक्कड़ी करती औरत बहुत सावधान होती है। वह पूरे समय पूरे हालात का जायजा लेती रहती है।
हल्की शाम घिर आयी थी हल्द्वानी में। हल्द्वानी शहर हर शहर की तरह बहुत पहले से शुरू हो गया। उसके खेत जंगल से पहले की मुलाकातें मुझे याद थी वो अब वहां नहीं था। खैर पहली रात वही बिताई। फिर समझ आया कि जिस भड़ाम भड़ाम से घबरा कर यहां आयी हूँ वो तो यहाँ भी बहुत ज्यादा है। पूरी रात तेज पटाखों की आवाज से शहर गूंजता रहा। लेकिन इसके बाद भी हवा में एक ताजगी थी। मेरे फेफड़े खुश थे। और दिमाग के तरल पदार्थों की दुनिया थोड़ी संतुलित हो गयी थी।
अगली सुबह मुझे किराये पर दो पहिया गाड़ी चाहिए थी। टू व्हीलर बहुत ही अजमाया हुआ जरिया रहा है। गोवा हो या माउन्ट आबू सब जगह पूरी आजादी मिल जाती है। मुझे नौकुचिया ताल में रूकना था। वहाँ पहुँच कर पता चला कि यूथ हास्टल वाला शेयरिंग रूम का विकल्प बहुत ठीक नहीं है। पहले तो वहाँ रूम शेयरिंग के लिए लड़कियां नहीं थी दूसरे पूरी डारमेट्री में दरवाजा बंद करने की सुविधा नहीं थी। मैंने ताल के पास ही एक छोटा सा होटल देखा। उसकी खिड़की से ताल दिखता था। वही पर बुकिंग कर ली।
अब मैं थी और गुलची के फूलों की लटकन,चाँदनी के फूलों का छाता,कत्थई गुड़हल पर झुकी,चमक बैंगनी फूलसुंघनी। इनमें कुनमुनाती ठंड। अभी सुबह अलसा कर उठ रही थी। पूरा दिन आसपास घूमती रही।
शाम को नीचे ताल के पास रही। वहाँ पीपल के पत्तों की खुसरपुसुर हो रही थी। पानी में एक दूसरे पर सिर टिकायें पहाड़ियाँ उतर आयीं। पेड़ सिर जोड़कर झांकने लगे। रोशनी पत्तों की तरह कांप रही थी। पेड़ से एक फल टूटा एक बड़ी गोल आवृत्ति का घेरा बन गया। तुरंत ही कुछ और हलचल हुई, उसी के बीच से एक दूसरी आवृत्ति बनने लगी। हवा बहने लगी। पत्तों की सरसराहट और झिंगूर की झनझन ने एक रहस्यमय वातावरण बना दिया। एक बिल्ली बेवजह छुप कर घात लगाकर बैठी थी। उसे किसी को देखकर परेशानी हुई। अपनी चमकीली आँखों से उसने घूर कर मुझे देखा। यहाँ क्या कर रही हो?का सवाल दागा। मुझे डर वाला रोमांच हुआ।
मैं ताल से ऊपर सड़क तक आ गयी और बेंच पर बैठ गयी।
बेंच पर एक लड़का आकर बैठ गया। वो कुछ गपशप करना चाहता था। उसने पहला ही सवाल पूछा-आप सोलो ट्रैवलर हैं?
मैं कुछ कहना चाहती थी, लेकिन चुप रही। मैंने टिपिकल जवाब दिया-यात्री हूँ।
लड़के को लगा कि मैं थोड़ी अजीब हूँ और उठकर चला गया। मुझे उसका बिना कुछ बोले जाना अच्छा ही लगा।
रात ने पूरे वातावरण को थोड़ी ही देर में अलग दुनिया के लिए रिजर्व कर लिया। अगले दिन नौकुचिया के ऊपर के जंगल घूम रही थी। मेरे साथ हरेन्दर जी थे।
इतनी देर हो गयी थी। हरेन्दर जी ने एक भी सवाल नहीं पूछा था। अमूमन लोग पूछ ही लेते हैं कि आपका नाम क्या है?कहाँ रहती हैं? किसके साथ आयीं है? अकेले आयीं हैं! क्यों? पर उन्होंने कुछ भी नहीं पूछा। वह ऐसा क्यो कर रहे हैं,ये सोच कर मुझे थोड़ा अटपटा लगा लेकिन चलो अच्छा ही है। कई बार ज्यादा बक-बक करने से मेरे जबड़े में दर्द हो जाता है और दिमाग खाली लगने लगता है। न वो बोल रहे थे न मैं।
हरेन्दर जी मुझे चाय की दुकान पर मिले थे। मैं चाय वाले से जंगल का पता पूछ रही थी। चाय वाला बहुत साल से इस जगह पर काम कर रहा था। उसे हर तरह के लोगों की आदत थी। उसने रास्ता बताया और साथ में बड़े प्यार से सलाह दी।
अरे अकेले जंगल में कहाँ जायेंगी। भटक जायेंगी और किसी को साथ ले लो।
मैंने थोड़ा आत्मविश्वास दिखाते हुए कहा- अरे भइ्या, मैं घूमती रहती हूँ।
चाय वाले ने कहा- अरे दीदी आप ना अपने साथ अंकल को ले जाओ। अंकल भी दिन भर यहाँ खड़े रहते हैं,वो रास्ता भी दिखा देंगे और खुद भी थोड़ा घूम लेंगे। आपको जो ठीक लगे दे दीजियेगा।
मुझे बात ठीक लगी। झट पूछा अंकल कितना पैसा लेंगे।
बुजुर्गवार ने बड़ी ही गंभीरता से कहा- जो मन आये दे देना। मेरा भी घूमना हो जायेगा ।
हम दोनों साथ चलने लगे। अंकल जितने सुस्त लग रहे थे उतने तो कतई नहीं थे। तेज़ तेज़ कदमों से एक खड़ी चढाई चढ गये,मेरी सांस फूलने लगी। मैं थोड़ा घुटने की ओर झुक कर सांस लेने लगी।
बल मेरी भी सांस फूलती है।
ये हमारे बीच पहली बातचीत थी। मैंने कहा-आपकी क्यों फूलती हैं, मैं तो धुंआ खाकर आयीं हूँ,आपको तो पूरा आक्सीजन मिलता है?
बल मैंने पूरी उमर धुँआ खाया है। जब सांस फूलने लगी तो यहाँ आ गया। ये सुनना था कि मेरा मन हरेन्दर जी बात करने में रम गया। हमलोग बात करते हुए दूर जंगल में निकल आये।
उनकी दस साल की उमर से कलिन्जरी करते हुए ड्राइवर बनने की कहानी थी। उन्होंने विस्तार से बताया कि कैसे मेरठ वो अपने रिश्तेदार के साथ भाग गये थे। माँ के न रहने पर पिता ने दूसरी शादी कर ली थी। अपना वो सारा किस्सा बताते रहे। लेकिन उन्होंने मुझसे कुछ भी नहीं पूछा। मुझे संदेह है कि उन्हें मेरा नाम भी पता चला या नहीं। वो बात कर रहे थे जैसे मुझे नहीं इन घने जंगलों को अपनी कहानी बता रहे हो।
रास्ते में हमे एकाध लोग मिले।
जंगल के रास्ते में ज्यादा अंदर न जाओ!
अबकी ये हिदायत थी। तभी उनके एक और जानने वाले मिल गये।
राम-राम जी, बल आगे नई जाना।
के हो गये।
कल मेरी बीबी घास काटने आयी थी, मैं ऊपर रास्ते पर बैठा था तभी मेरा ध्यान गया कि किसी चीज़ की आँख चमक रही है। बाघ उसे सूंघकर ऊपर आ रहा था। मैं जोर से चिल्लाया। मेरी बीबी गठ्ठर फेंक के भागी। बाघ भी तेजी से नीचे उतर गया।
हरेन्द्र जी थोड़ा घबरा गये। उनके लिए बाघ असली बात थी मेरे लिए रोमांच का हिस्सा। (पहाड़ में लेपर्ड और गुलदार को लोग बाघ ही बुलाते हैं।)
अरे वाह, फिर क्या घबराना अब तो बाघ भी मिलेगा। मैंने चहक कर कहा। आपको मेरी आदत बचकानी लग सकती है लेकिन मुझे भूत प्रेत जानवर(जंगल वाला) बहुत ही रोमांचकारी लगता है।
उन्होंने जवाब नहीं दिया। हम रास्ते पर बढते जा रहे थे। जंगल से एक रास्ता दूसरी ओर कट रहा था। थोड़ी देर पहले हरेन्दर जी ने दिखाया था कि मेरा गाँव यहीं पर है। मैंने बात बदलने के लिहाज पूछा-आपका घर यहीं है।
हाँ!आवाज़ में थोड़ी नाराजगी थी। अरे हरेन्द्र जी मजाक कर रही थी। मुझे भी तो बाघ से डर लगता है।
हरेन्दर जी ने पानी का एक घूंट इतनी देर में एकबार लिया और बोले-मैं नौ साल का था जब मेरी माँ मर गयी थी। घास लाने जंगल गयी थी। बाघ ने हमला कर दिया, बचने के चक्कर में खाई में गिरकर मर गयी थी।
पैसठ साल के ऊपर के आदमी की आँखें नौ साल के बच्चे में बदल गयी थी।
उन्होंने जिस तरह से कहा उसके बाद मेरे पास कहने के लिए कुछ नहीं था। हमने तय किया कि उनके घर चलकर खाना खायेंगे फिर मैं होटल लौट जाऊँगी। हरेन्दर जी के घर में उनकी पत्नी बसंती और बहू और नवजात पोते से मुलाकात हुई। आलू का थिचोड़,भात और तिल मूली की चटनी की दावत मिली। लौटते समय बसंती जी ने कुछ फूलों के बीज दिये। हरेन्दर जी नीचे तक छोड़ने आये। मैंने उनके हाथ में कुछ पैसे रखे उन्होंने उसे खोल कर नहीं देखा।
बस बड़े प्रेम से बोले- खूब घूम भुली, लेकिन बाघ का ख्याल रखना।
होटल पहुँचने तक शाम घिर चुकी थी। पास के एक रेस्त्रां में खाना खाया। और रात में चाय का लुफ्त लिया। रेस्त्रा में सेहरा बेल चारो ओर लटकी थी और बहुत ही हलकी कोई धुन बज रही थी। बीच में घर पर बात की। दोस्तों से बात की। आदत के अनुसार रात होटल के कमरे में सिटकनी और कुंडिया चेक की और खिड़की के बाहर से दिखते ताल को देखा। ठंड ने असर किया और कंबल में लपेट कर सो गयी।
अगली सुबह फिर किराये पर दो पहिया गाड़ी ली। आज सारे ताल देखने थे। कुछ के नाम जाने, कुछ के अनजाने थे। नल-दमयन्ती ताल पर पहुँची तो किसी ने कहा बताया कि यहाँ कत्युरी वंश की कई मूर्तियां मिली थी तो किसी ने कहा कि यहाँ तो सुसाइड करने जोड़े आते हैं। वैसे ये जोड़े इतनी सुन्दर जगहों पर सुसाइड करने क्यों आते हैं। मुझे मसूरी का भी सुसाइड प्वाइंट याद आ गया। जो भी हो ये ताल बहुत शांत था। कोई टूरिस्ट नहीं। कई बार कितना अच्छा होता है कि जगहों की सिंथेटिक टूरिस्टों से दूर बनी रहें। आज पूरे पांच ताल की यात्रा हो चुकी थी। सात ताल के भीतर के जंगल की घूमाई की। जंगल में अंदर जाने पर एक जगह लिखा हुआ था गुलदार से सावधान। अब तो वापस आना था।
बाहर आकर खाना खाया। रास्ते में ताजा माल्टे का ग्लुकोज डाल कर जूस पिया। जंगल से गुजरती सड़क बिलकुल चुपचाप थी। कुछ पत्ते नाचते गाते अपने पेड़ों को विदाई दे रहे थे। तभी पास में एक जगह थोड़ी आबादी वाली जगह दिखी। एक हवा का झोंका तरोताजा कर गया। लगा कि नींबू से धुल कर हवा पास से गुजर गयी है। पेड़ पर लटके माल्टा और नींबू का असर खूब होता है। ये खट्टे फलों का मिजाज़ कैसा होता है, ये जहाँ हैं वहाँ की हवा भी उनका पता देगी।
भीतर एक ख्याल आया ये खुशबू में बसी हवा किसी रूह को लेकर उड़ती है। इंटर कालेज में हवा पर ज्यादा बात करो तो मेरी दोस्त खालिदा कहती थी कि हवा की खुशबूओं में रूह रहती है। मुझे ये रूह वाला किस्सा भी बड़ा अच्छा लगता था। इत्र महके तो अच्छी रूह, नाली की बदूब आये तो खराब रूह। वैसे रूह की बात से याद आया कि बहुत साल पहले देवबंद-सहारनपुर घूमने की इच्छा हुई थी। मैं देखना चाहती थी कि फतवा कैसे लिखा जाता होगा। वहाँ एक सहेली के साथ गई थी। हमें वहीं के स्टुडेंट ने घुमाया था। सीढ़ियों पर चढ़ते हुए उसने हमसे कहा कि यहाँ इंसान ही नहीं, रूहें भी पढ़ने आती है। फिर उसने ये भी बताया कि उसके बगल वाले कमरे में एक आलिम रहते थे,खूब पढ़ते थे लेकिन उन्हें बहुत साल बाद पता चला कि वो कमरा खाली है। जिनको वो रोज पढ़ते देखते थे, वो एक जिन्नात थे। उसने एक बड़े से कबूतर की ओर इशारा करते हुए कहा कि आपको ये कबूतर लग रहा है लेकिन ये भी जिन्नात हो सकता है। यकीन मानिये मेरी सहेली ने हलके से मुझे चिकोटी काटी और इशारा किया कि भलाई इसी में है कि यहाँ से फूट लिया जाय। वैसे भानगढ़-राजस्थान किले में होली के एक दिन पहले मैंने जो भूत प्रेत का खेल देखा था उसके आगे ये बातें कुछ नहीं थी। लग ही नहीं था कि आर्कायेलाजिकल डिपार्टमेंट के हाथ में ये किला है। हर जगह यज्ञ और सिर झटकते लोग मिले थे। चमगादड़ों को पकड़ के किले के अंदर हो रहे यज्ञ में जलाया जा रहा था। वही पर कुछ आदमी औरत नाक में कुछ कुछ बोल रहे थे। मुझे वहाँ भी लगा था कि भूत प्रेत के इस खेल में मुझे आत्मा समझा जा सकता है। भला हो कि वहाँ हम लोग ग्रुप में थे। बहरहाल यहाँ हाल दूसरा था। सामने एक घाटी की ओर मुँह करके एक छोटी सी दुकान थी। मैने गाड़ी खड़ी की और वहाँ मिली दो लड़कियों की बातें सुनते हुए चाय पीने लगी।
पहाड़ में दुकान बातों से चलती है। यहाँ चाय और तला आलू मिलता है। बातों बातों में पता चला कि आठ साल पहले इस रास्ते पर अकेले यही दुकान थी। छोटी सी दुकान जिसकी पिछली खिड़की से घाटी दिखती थी और इठलाती हुई गोला नदी।
मुझे लगा कि मेरी ओर किसी का ध्यान नहीं है। मैं मज़े से तला आलू और चाय और उसके साथ गप्पें सुन सकती हूँ।
लेकिन ये ख्याली बात है। अनजानी जगह में हर कोई एक दूसरे को नोटिस करता है। बस देखकर अनदेखा करता है। उसी जगह पर साउथ कोरिया के दो लड़के थे और उनके साथ मलयाली लड़का संतोष था। वे सब बातें कर रहे थे। उन्होंने मुझसे पूछकर अपनी गप्प मुझे लगा लिया। बातों बातों में पता चला कि वो भी नौकुचिया में एक ओर रूके हैं। शाम को एक छोटा सा कार्यक्रम करेंगे।
मैं उनके कार्यक्रम में गयी। कार्यक्रम कमलताल के एक किनारे पर था। छह सात बज रहे थे। झील में कुछ बत्तियां झिलमिलाने लगी थी। गुलाबी रंग का कमल ताल के बीच में तैर रहा था। कोरियन लड़का बोल रहा था -उसका छोटा भाई गिटार पर कुछ धुन बजा रहा था। कार्यक्रम का नाम था -पापा की याद में। उनके पिता साउथ कोरिया में कभी किसी डेमोक्रेटिक मूवमेंट के साथ थे। इंडिया घूमते रहते थे। उन्होंने बच्चों के इंटर करने के बाद पैसा दिया कि चाहो तो हायर स्टडीज में जाओ या जो ठीक लगे वो करो। उन दोनों का म्यूज़िक में मन लगता था,वे म्यूजिशियन बन गये। पापा की आखिरी इच्छा थी कि उनकी राख झील से सटे जंगल में बिखेर दी जाय। हमने वही किया।
संगीत की धुन पर कुछ गीत के साथ वो बीच बीच में बोल रहे थे।
जिन्दगी ऐसी भी होती है क्या। मुझे तो लगा किसी स्वप्नीली दुनिया की बातें सुन रही हूँ।
मेरे दिमाग में एक औरत की जिन्दगी में बनी चौहद्दियों के चित्र बन बिगड़ रहे थे। फिर लगता कि एक इंसान की जिन्दगी में कितनी चौहद्दियां है। हर देश की सरहद पर उस देश की सेना तैनात है। दुनिया के सबसे ज़हीन दिमागदारों ने ऐसे हथियार बनाये है कि कितनी जिन्दगियां उनके लिए एक टैब पर है। उनकी बंदूकों के ट्रिगर हमेशा आन रहते थे। वहाँ कैसे कोई संगीत के बारे में सोचता होगा। कैसे ये ख्याल आया होगा कि इन जंगलों में उसकी राख बिखेर दी जाय। मुझे एलिजाबेथ टाउन फिल्म की याद आ गयी जिसमें एक लड़का अपने पिता की प्रिय जगहों पर उनकी राख बिखेरता है और उन्हें याद करता है। कैसी बचकानी बात है उस दिन मैंने अपने बच्चों को याद करने के बजाय सिर्फ अपने पापा को याद किया। खैर रात हो रही थी,खाना खाकर गुडबाय किया। अपने कमरे में आयी। सिटकनी चेक की,कुंडी चेक की और सो गयी।
अगली सुबह रामगढ़ होते हुए मुक्तेश्वर जाना था। जल्दी से तैयार हुई। किराये पर मिली दो पहिया मेरी आवारगी को बढ़ा रही थी। इस बीच दिमाग में आ रहा था कि नैनीताल तो देखा नहीं। बहुत पहले देखा था। रास्ते में एक ताल का और पता चला कि जंगल के बीच में है। वैसे तो सारे ताल आपस में जुड़े हैं लेकिन कुछ ताल ने अपने को जंगल में छुपा कर रखा है। बहुत ही छोटा सा शांत ताल। न तो उसे टुरिस्ट चाहिए थे और न टुरिस्टों को वो चाहिए था। फिर मुक्तेश्वर पहुँची। दूर बर्फ के पहाड़ और उन पर सूरज की गिरती किरणों ने दुलार दिया। हवा ठंडी हो गयी। दिमाग में तैरते गरम तरल पदार्थों की दुनिया ठंडी हो चली थी। चेहरे पर बार बार मुस्कुराहट आ जा रही थी जैसे खट्टी ईमली रूक रूक के घुलती है और बेवजह मुस्कुराहट की एक लहर चेहरे पर तैरने लगती है। तभी एक आत्मीय फोन आया। कहां घूम रही हो। फोन मेरे पिछले कालेज के सीनियर प्रोफेसर का था। उन्हें मेरी दोस्त ने बता दिया था कि मैं उधर गयी हूँ। मैंने बताया बताया कि रामगढ़ के करीब हूँ। उन्होंने कहा कि हम भी वही हैं। उनके साथ उनके परिवार के लोग भी थे। मजेदार बात थी कि उनकी मंडली में उनके परिवार के सभी पुरूष थे और एक भी महिला नहीं थी। उनके रिश्तेदार पुरूषों ने उनसे बाद में पूछा भी कि मैं अकेले क्यों घूम रही थी। मैंने उनके साथ चाय पी। तब तक चार बज चुके थे। उन्होंने बड़ी आत्मीयता से कहा कि अब होटल लौट जाओ, शाम होने वाली है। उनकी आत्मीयता और कन्सर्न दोनों का सम्मान करते हुए मैंने गाड़ी मोड़ ली। लेकिन गाड़ी मोड़ने से दिमाग कहाँ मुड़ता है। घुमक्कड़ी की भूख बड़ी भुक्खड़ होती है। इतनी जल्दी पेट नहीं भरता है। दिमाग में एक नाम और था। वह था भुवाली का सैनोटोरियम। उन्नीस सौ बारह में बना ये टी.बी. सेनोटोरियम एक एतिहासिक जगह है।
पुरानी दीवारों के बीच से नन्हें पौधों का जंगल उग आया था। सेंनोटोरियम के पीछे चीड़ के पेड़ों का घना जंगल है। उसी में बना है भवाली का सैनोटोरियम। वहाँ जाने वाली सड़क एकदम से ऊँची है स्टीप ढलान का उलटा। किराये की गाड़ी के एक्सीलेटर पर भरोसा तो करना ही था। वहाँ तक पहुँच गयी। ऊँचाई पर पहुँचने पर सामने एक पुरानी इमारत थी। बाउन्ड्री के दूसरी ओर कुछ औरतें खाट डाल कर मूँगफली छील रही थी। उनसे दूरी ज्यादा थी।
उन्होंने ही एक आदमी भेजा।
जय हिन्द मेडम!किस विभाग से हैं?आदमी ने पूछा।
मैं कहना चाहती थी आवारगी आफ्टर फोर्टी फाइफ। लेकिन बस कहा अरे भइ्या सैलानी हूँ। ये जगह देखना चाहती हूँ।
अरे आओ जी कहके उन्होंने अस्पताल घुमाया। पुरानी इमारत के आगे फौव्हारा और सीढीयों के बाद कमरे बने थे। सामने एक छोटा सा कमरा था। वो कमरा जिसमें कमला नेहरु रहीं थी। अपने जीवन के आखिरी दिन उन्होंने वहां बिताये थे। मेरे सामने एक पतली-दुबली अकेली औरत का चेहरा घूम गया। इसे अकेले सुनसान बियावान में कोई कैसे रह पाता होगा। मेरी आँख भर आयी। मेरे दिमाग में मेघे ढ़ाके तारा की नायिका की तसवीर घूम गयी। कैसे वो ऐसे ही किसी सेनोटोरियम में थी। पूरी जिन्दगी अपने रिश्तों के लिए देती रही फिर एक दिन उसका शरीर थक गया। वो अंत में अपने भाई से कहती है- दादा मैं जीना चाहती हूँ।
सेनेटेरियम शब्द मैंने किस उपन्यास, किस कहानी में पढा था याद नहीं लेकिन कब इस्तेमाल किया था याद है। दसवीं मे ट्यूबरकुलोसिस हुई थी। इलाहाबाद प्रसिद्ध डाक्टर संतोष सक्सेना से ट्रीटमेंट हो रहा था। एक दिन बड़ी बहन से लड़ाई हुई उन्होंने गुस्से में कहा कि तुम्हें टीबी है-वही फैलाओगी। वैसे तो मैंने भी फुल लड़ाई की लेकिन ये बिलो द बेल्ट बात हो गयी। मैंने पापा से कहा मुझे सेनोटेरियम भेज दीजिये ।
पापा की सीधी-सरल दुनिया में ये नाम ही जटिल था। उन्होंने डाक्टर को ये बात बता दी। वहाँ क्या हुआ ये फिर कभी बताऊंगी।
सैनेटोरियम के पीछे विशाल चीड़ का जंगल था। शाम उतर रही थी। साथ में चल रहे भाई जी ने बताया कि पिछले तीस साल से वो यहाँ चौकीदार है। कहीं मुरैना या ऊरई से आये थे फिर वापस नहीं गए। उन्होंने ही बताया कि कोरोना के दौरान यहाँ आइसोलेशन सेन्टर बना था। अभी भी यहाँ कभी कभी ओ पी डी होती है। वो मुझे बड़े करीने से सूचना दे रहे थे। बातों के बीच में तनख्वाह न बढने, रखरखाव की समस्या और मँहगाई भी बता रहे थे। हो न हो उन्हें लगा कि मेडम किसी सरकारी विभाग से है।
शाम ढ़ल रही थी। भाई जी को मैंने विदा कहा और नीचे आ गयी। लेकिन नैनीताल तो रह गया। नीचे उतरी तो बोर्ड देखा अरे इतने करीब फिर क्या। पहुँच गयी नैनीताल। अफर अफर करके मोम्मो और गर्म लावा चाकलेट खाया। दुकान वाला मेरा मुँह देख रहा था। सारी बत्तियां जल चुकी थी। बकौल वसु मालवीय शाम हुई झील में उतर पड़ा शहर। शहर झील में थरथरा रहा था। मैंने गुडबाई कहा और गाड़ी के तेल की टंकी फुल की। हेलमेट ग्लब्स और जैकेट को कसा और वापसी का रास्ता लिया। दुकानवाले ने कहा कि बस बाघ का खतरा है। वैसे बाघ तो मेरे लिए रोमांचकारी शब्द था। एकबार दिख जाय तो कितना मजा आयेगा। जी हाँ जाहिर है बाघ को। लेकिन वापसी में थोड़ा बाघ से डर लगा। लग रहा था कि अगले मोड़ पर मेरा इंतजार कर रहा होगा कि आओ घुमम्मन! तुम्हें बताता हूँ। लेकिन वो नहीं मिला और मैं दस बजे तक नौकुचिया अपने होटल में पहुँच गयी।
मेरी ऊँगलियाँ मानो फ्रीज कर गयी हों। ग्लब्स के भीतर भी ऐसी ठंडी जैसे फ्रिज में रखकर सेकी हो। आते ही मैंने खाना कमरे में मँगाया। अमूमन मुझे रेस्त्रां में बैठकर खाना खाना पसंद है लेकिन थकान और ठंड अपने चरम पर थी। मैंने जल्दी-जल्दी खाना खाया। बगल वाले कमरे से जोर जोर की आवाज आ रही थी। मुझे लगा कि थोड़ी देर में सब ठीक हो जायेगा। उस दिन भारत ने कोई क्रिकेट मैच जीता था। हो सकता है उसी का उत्साह हो। सुबह तक बगल का कमरा खाली था। बारह बजते बजते बगल के कमरे से अजीब आवाजे आनी शुरू हुई। समझ आ गया कि पांच छह लड़के हैं और ड्रिंक कर रहे हैं। एक दूसरे की माँ- बहनों को भरपूर याद कर रहे थे। शराब के बारे में दो बातें समानान्तर सुनी थी। स्पिरिट वासेज स्पिरिट और दूसरी की जो जिसके भीतर होता है वो बाहर आ जाता है। वैसे एक तीसरी बात भी थी वो ये कि पुरूष पीकर दर नाटक करते हैं। आवाज तेज होती जा रही थी जितनी बेहूदी बात कर सकते थे, उतनी कर रहे थे। बीच बीच में उनके आई फोन की घंटी बज रही थी जो उनकी दौलत और रसूख का पता दे रही थी। मेरा कमरा ठीक बगल में था। मैंने होटल मालिक को फोन किया कि शोर कम करायें। उसने होटल में काम करने वाले एक टीन एजर बच्चे को बगल वाले कमरे में भेजा। मुझे आवाज सुनाई दे रही थी। छोटे लड़के ने उनका दरवाजा खटखटा कर कहा कि भइया आप लोग थोड़ा सा कम शोर कीजिए। बगल में भी लोग हैं। लड़कों ने उस बच्चे को एक भद्दी सी गाली दी और जोर का ठहाका लगाया। लड़का चला गया।
मुझे बगल के कमरे का सारा हंगामा सुनाई दे रहा था। उनकी गालियां डरावनी लग रही थी। वो जिस तरह की बात कर रहे थे उससे सिर्फ घबराहट हो रही थी। मैं उसके विस्तार में नहीं जाना चाहती। मैंने होटल मालिक को फिर फोन लगाया कि अगर आप नहीं चुप करायेंगे तो मुझे पुलिस को काल करना पड़ेगा। लेकिन होटल मालिक ने कहा कि वो यहाँ नहीं है। उसकी डयूटी नौ बजे खतम हो जाती है। होटल में सिर्फ दो कर्मचारी हैं। एक कुक और एक छोटा टीनएजर लड़का। शोर और गालियां बढ़ती जा रही थी। पूरे साढ़े तीन बज चुके थे। इस बीच मैंने पांच काल की लेकिन होटल मालिक ने फोन नहीं उठाया। बगल के कमरे में लड़के फोन पर पुलिस का साइरन बजाने लगे और आपस में भयंकर फूहड़ बातचीत करने लगे। पूरी रात मैं जागती रही।
सुबह छह बजे दरवाजा खोला। होटल मालिक साढ़े नौ बजे आया। बगल में जो लड़के थे, वो छह बजे से पहले जा चुके थे। मैंने चुपचाप खाने का बिल चुकाया। होटल मालिक आया। उसने कहा कि मैंम लोग होटल तो मौजमस्ती करने आते हैं, मैं किस किस को रोक सकता हूँ। मैंने कहा कि ये कैसी मौज मस्ती है जिसमें अगले की खुशी और सुरक्षा की कोई परवाह नहीं है। होटल वाले को इससे क्या मतलब था। उसे मोटा पैसा मिला था। रास्ते में कई लोगों ने बताया था कि अब नौकुचिया पहले जैसी नहीं रही। मुझे याद है कि हम उत्तराखंड में लड़कियों के ग्रुप और अकेले कितना घूम हैं। लेकिन अब उसका हाल माउंट आबू की तरह हो गया है। मैंने बस इतना कहा कि मैं आपकी कमप्लेन करूँगी।
होटल वाले के लटके-झटके अंग्रेजी दा टाइप के थे, उसे यकीन नहीं था कि मैं कम्प्लेन करूँगी। उसने कहा जाओ जो करना है कर लो। किसी सीओ का नाम लेकर बोला वो मेरे मामा हैं।
मैंने अपना बैग उठाया और पैदल मुख्य सड़क तक आ गयी। आगे एक बाइक वाले को आगे कुछ रूपये दिये और भीमताल पुलिस स्टेशन आ गयी। वहाँ पर आकर फोन काल और बगल के कमरे से आती रिकार्डिंग सुनवाया। पुलिस वाले ने तो पहले कहा कि आप अकेले क्यों घूम रहीं हैं। मुझे हंसी आ गयी। मेरे भीतर का टीचर मोड जाग गया। उसे जितने कायदे से पढ़ा सकती थी स्त्री और एक नागरिक के कानूनी अधिकार वो पढ़ाया। फिर एक छोटी सी धमकी भी दी कि आपके यहाँ कि एस एस पी रहीं रचिता जुयाल मैडम मेरी स्टुडेंट रही हैं और मेरा सम्मान करती है। भला हो कि उसने विनम्रतापूर्वक पढ़ लिया मेरे कहते ही कि पैतालिस साल पूरे होने के बाद भी ये सवाल मेरे लिए आपकी पूरी टूरिज्म इंडस्ट्री पर सवाल है। वो थोड़ा नार्मल हो गया। उसने होटल वाले को फोन किया। इस पूरे वाकिये में होटल वाले के ऊपर दस हजार का चालान हुआ। और मुझे अमूल्य सुकूंन मिला।
अब वापस आना था। सवालों से घिरे दिमाग से घूमने गयी थी और सवालों से घुमड़ते दिमाग से एक कार पूल से लालकुँआ तक वापस आ गयी। वहाँ से वापसी की ट्रेन थी। कार में तीन कालेज के लड़के लड़कियाँ थे। वे लखनऊ के थे। रास्ते भर कचर कचर कर रहे थे। वे सब कैंची धाम आये थे।
वे आपस में बार बार कह रहे थे कि अखबार में छपा था कि हल्द्वानी के ऊपर के जंगलों मे बाघ घूम रहा है। तभी एक ने पलट कर मुझसे पूछा- मैडम आपको बाघ दिखा? हम लोग तो डर के मारे जंगल की ओर गये ही नहीं।
मैंने कहा-हाँ दिखा। रात के साढ़े दस से सुबह के चार-साढे तक था वो भी झुंड में। वो सारे मेरी तरफ आश्चर्य और रोमांच से देखने लगे और मुझे जोरों की हँसी आ गयी।
सविता जी
आपका यात्रा वृत्तांत पढ़ा।
बाघ से मुलाकात के रोमांच के चक्कर में पूरा यात्रा वृतांत पढ़ लिया। अंत में जाकर पता चला कि बाघ से मुलाकात सिर्फ बातों में ही हुई।
हमारी अपनी सोच है कि अकेले यात्रा करना उतना आनंद नहीं दे पाता है जितना किसी के साथ होने पर। साथ खुशी को दुगना कर देता है।पर ऐसा हम सोचते हैं।
आपका अकेला घूमना भी साहसिक महसूस हुआ।आपके साहस को सलाम।
भविष्य में भी ऐसी यात्राओं के लिये आपको शुभकामनाएँ!
पर एक जिज्ञासा है……
आप में बार-बार बाघ के मिलने की चाहत थी। अगर आपको वास्तव में बाघ मिल जाता तो?…….