पापा का निधन हुए आज तीसरा दिन था. शाम को तीये की बैठक थी. घर की बड़ी – बूढ़ी तमाम वर्जनाओं / अनुमतियों के कायदेकानून लगा रही थीं. भाभी नहा कर आईं, बाल बनाए और बिंदी लगाने लगीं तो बड़ी बुआ का तीखा स्वर घर में गूँजा अरे बहू ! तू बिंदी क्यों लगा रही है, जब तक बारहवाँ नहीं हो जाता तब तक घर की बहुएँ बिंदी नहीं लगातीं, हाँ, बहन – बेटी लगा सकती हैं.
मैं जो तीन दिन से सिर के ऊपर तक रजाई खींचकर – खींचकर आँसुओं के साथ दिन – दिन भर बिस्तर में पड़ी थी. बुआ की तेज आवाज़ सुनकर मैंने रजाई से मुँह उघाड़ा और बुआ की बात का प्रतिकार करते हुए बोली. “बुआ, लगाने दो न भाभी को बिंदी”. फिर बस बुदबुदा कर रह गई कि “कैसी बात है हम जो जन्म से अपने पापा को देखते आए हैं, जिन्होंने हमें पाला है हमें ये सब बनाव शृंगार करने की छूट हैं क्योंकि अब हम तो इस घर की रही नहीं, पराई हो गईं हैं. लेकिन जो भाभी अभी चार वर्ष पहले इस घर में आई हैं उनको ये सब करने की छूट नहीं है. क्या सच में पापा के न रहने का हमें भाभी से कम दुःख है ? हमारे अन्दर आज भी पापा का खून है. आज पापा होते तो उनसे पूछती कि पापा, क्या हम सचमुच पराई हो गई हैं ?
बहुत बढ़िया लघुकथा है अनुपमा जी