1 रात
रात ये निःशब्द है,
फिर भी शोर कर रही;
कितनी बेचैनियों को,
ले कर है चल रही !!
रात ये सुनसान सी,
सज-धज के बैठ गई;
कितनी उमंगों को,
ख़्वाहिशों से जोड़ रही !!
रात ये निस्तब्ध सी,
सन्नाटे तोड़ती ;
कितने जज़्बातों में ,
हौसलों को फूंकती !!
रात अपने आँचल में,
तारे समेटती ;
ओढ़ शीतलता को,
ओस ये बिखेरती !!
रात निःशब्द है,
रात सुनसान है,
रात निस्तब्ध है,
जितनी ये प्यारी है ;
उतनी अजीब है।।
रात ये अजीब है
रात ये अजीब है …
2. बरसात
स्याह आसमान से,
जो बूंद बूंद झर रही;
मन प्रसन्न हो रहा,
गीत कोई गा रहा।
देखो आज भीग कर,
सूर्य की ये रश्मियाँ;
नाचती सी आ गयी,
बन धरा पर बिजलियाँ।
कौंधते आकाश से,
हिल के पेड़ पूछता;
कौन सी दिशा में,
जा रहे हो तुम देवता।
मेघराज के लिए,
अब नहीं तरसना;
कागजों की नाव पर,
सवार होगा बचपना।
मुंडेर पर चढ़े, कुछ
खेल के मैदान में ;
बहक रहे हैं कुछ मन,
यौवनी उल्लास में।
फैलाए पर वो अपने ,
घोंसलों में बैठ गए;
सह रहे थे धूप जो,
आराम वो फरमा रहे।।
नाम : बोधमिता
१०४ अंसल प्रधान एन्क्लेव , E -8 एक्सटेंशन , बावरियाकलां , भोपाल
फोन नं 7000500170

कवियत्री द्वारा बरसात कविता में बहुत ही सुंदर तरीके से शब्दों का चयन किया गया है।
लाजवाब !
बोधमिता की कविताएं दिल में उतरती है….निशब्द रात के शोर की बात बहुत गहरी अनुभूति की अभिव्यक्ति है….
आसान नहीं होती ऐसी अनुभूति
और न ही आसान होती है
ऐसी अभिव्यक्ति…!
हार्दिक बढ़ाई इस सफल काव्य रचना के लिए।