Wednesday, February 11, 2026
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‘समाज में साहित्य की भूमिका’ – प्रो. कमलेश कुमारी

 

समाज में साहित्य की भूमिका पर बात करने से पूर्व हमें समाज के स्वरूप तथा साहित्य का समाज से क्या सम्बन्ध है, इस विषय पर विचार करना चाहिए।    

(प्रो. कमलेश कुमारी)

समाज क्या है? उसका स्वरूप क्या है? इन प्रश्नों के उत्तर में यह कहा जा सकता है कि समाज व्यक्तियों का वह समूह है जिस स्थान पर मानव एक साथ उठ-बैठकर अपने सुख-दुःख को बाँटता है, वही स्थान जिसमें व्यक्ति स्वयं को सुरक्षित पाता है, जहाँ रहकर उसके अस्तित्व की पहचान बनती है, उसके व्यक्तित्व का विकास होता है। जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त ही समाज से उसका सम्बन्ध विच्छेद होता है।  समाज के भिन्न-भिन्न रूप हमारे समक्ष उपस्थित होते हैं। समाज में भिन्नता जाति, वर्ग सम्प्रदाय के आधार पर हो सकती है और इन्हीं विभिन्नताओं के आधार पर किसी समाज का स्वरूप तय होता है।

साहित्य में किसी भी समाज की परम्पराओं, रीति-रिवाजों, संघर्षों नियमों को लिखित रूप में देखा जा सकता है। एक सजग साहित्यकार समाज में घटित परम्पराओं, विचारों को अनुभूत करके शब्दों के माध्यम से वर्णित करता है। इस रूप में साहित्य समाज का प्रतिबिम्ब ही प्रस्तुत नहीं करता वरन् उसके भविष्य की दिशा एवं दशा की ओर भी संकेत करता है।

साहित्य तथा समाज का सम्बन्ध अटूट. है। यदि साहित्य समाज की उपेक्षा करके कालजयी नहीं बन सकता तो किसी भी समाज को सही दिशा देने में तत्कालीन साहित्य का महत्वपूर्ण योगदान भी रहता है। कहना न होगा कि साहित्य की संवेदना समाज की संवेदना होती है। किसी भी समाज की उन्नति-अवनति, परम्पराएँ, गुण-दोष साहित्य में मुखरित होते हैं। समाज में नित्यप्रति घटित होने वाली घटनाओं और उनकी संस्कृति को साहित्यकार अपनी लेखनी द्वारा साकार करता है।

प्रत्येक युग में यदि समाज का रूप साहित्य में चित्रित होता है तो साहित्य ने भी युगों को प्रभावित किया है। इस संदर्भ में कहा जा सकता है कि साहित्य तथा समाज का सम्बन्ध अन्योन्याश्रित है। साहित्यकार समाज से अर्जित अनुभवों को ज्यों का त्यों वर्णित नहीं करता वरन् वह कल्पना के रंगों में अपने अनुभवों को रंगकर परोक्षरूप में समाज के समक्ष प्रस्तुत करता है। कोई भी साहित्यिक रचना जिन हाथों में आकार ग्रहण करती है उन्हें संचालित करने वाली चेतना के निर्माण में समाज की महत्वपूर्ण भूमिका रहने के कारण तो रचना में समाज उतरता ही है, रचनाकार के अपने साक्षात्कारों और जीवनालोचन में समाकर भी साहित्य में समाज साकार होता है। यही कारण है कि परोक्ष-अपरोक्ष रूप से साहित्य समाज को संचालित करने का दायित्व निभाता है।

समाज में साहित्य की भूमिका के विभिन्न पहलुओं पर दृष्टि डालें तो पता चलता है कि प्रत्येक युग में साहित्य ने सजग प्रहरी की भाँति जागकर समाज को जगाने का सफल कार्य किया है। यदि हम साहित्य के इतिहास पर नजर डालें तो पायेंगे कि तत्कालीन समाज की सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक व आर्थिक परिस्थितियाँ क्या थीं? वीरगाथा काल हो, भक्तिकाल, रीतिकाल अथवा आधुनिक काल सभी कालों में साहित्य द्वारा समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन देखे जा सकते हैं। यह कहना अनुचित न होगा कि यदि साहित्य द्वारा समाज में परिवर्तन होता है तो समाज भी साहित्य के लिए अक्षय ज्ञान-सामग्री प्रस्तुत करता है।

आदिकालीन साहित्य के पृष्ठों को पढ़ने से पता चलता है कि किस प्रकार समाज में कलह होती थी। उस कलह का कारण क्या था? वीरगाथा काल में राजाओं की प्रशंसा तथा युद्ध के कारण क्या थे? ‘पृथ्वीराज रासो’ तथा आदि कालीन साहित्य इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है कि तत्कालीन समाज की स्थिति क्या थी।

लोक जीवन और वर्ग संघर्ष की खोज के लिए साहित्य का उपयोग सदा से होता रहा है। शायद साहित्य की इसी भूमिका को ध्यान में रखकर ही ऑस्टिन वारेन ने लिखा है : “साहित्य और समाज के सम्बन्धों के अध्ययन का सबसे आसान तरीका है साहित्यिक कृतियों को सामाजिक दस्तावेज़ मानकर, सामाजिक यथार्थ की कल्पित तस्वीर मानकर उसका अध्ययन करना।”

सामाजिक यथार्थ की यह तस्वीर प्रत्येक युग के साहित्य में देखी जा सकती है। भक्तिकालीन साहित्य जो 14वीं शताब्दी से लेकर 17वीं शताब्दी तक भक्ति की विभिन्न निर्गुण-सगुण धाराओं को प्रवाहित करते हुए समाज को आंदोलित करता है, को देखा जा सकता है। एक ओर कबीर ने अपने युगीन समाज को लक्ष्य करके जाति-भेद, वर्ग-भेद, छुआछूत, बाह्याडम्बर पर कठोर प्रहार करते हुए एक समाज चेता का सच्चा रूप प्रस्तुत किया है। उन्होंने समाज में फैले ऊँच-नीच के भेद-भाव के लिए हिन्दू-मुस्लिम दोनों को खरी-खोटी सुनाई है-

काँकर पाथर जोरि कै, मसजिद लई बनाय।

तापर मुल्ला बाँग दे, बहरा हुआ खुदाय।।

यहाँ समाज का यर्थाथ रूप वर्णित कर एक स्वस्थ समाज की संकल्पना हम कबीर साहित्य में देख सकते हैं। कबीर जब मोह-माया, लोभ, क्रोध, स्वार्थ, असंतोष व घृणा के स्थान पर प्रेम, करुणा, सत्य, संतोष एवं मानवतावाद जैसे मूल्यों को जीवन में उतारने की बात करते हैं तो निश्चित रूप से उनकी वाणी समाज को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने का पुनीत कर्म करती है।

ठीक इसी प्रकार अन्य संतों ने भी अपनी वाणी द्वारा एक स्वस्थ समाज की परिकल्पना हेतु मानव-मन के परिष्कार पर बल दिया है। उन्होंने व्यष्टि के माध्यम से समष्टि सुधार की कामना करते हुए साहित्य के लोकहितकारी तथा प्रभावकारी रूप को प्रस्तुत किया है।

सगुण भक्तिधारा में तुलसी साहित्य को इसी परिप्रेक्ष्य में देख सकते हैं। तुलसी का ‘रामचरित मानस’ विश्व साहित्य में अपना बेजोड़ स्थान रखता है। ‘मानस’ के विश्वव्यापी मूल्य- राजा-प्रजा संबंध, पिता-पुत्र, पति-पत्नी, भाई-भाई के सम्बन्धों के आदर्श रूप को प्रस्तुत करते हैं जो तत्कालीन समाज में ही नहीं आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। अर्थात ‘मानस’ सदृश कालजयी साहित्य ने न केवल अपने युगीन समाज में भूमिका निभाई वरन् विश्व-समाज में आस्था के नये आयाम स्थापित किये।

जायसी, सूर, मीरा-साहित्य में प्रेम की जो अजस्र धारा प्रवाहित हुई वह जनमानस के हृदय को सराबोर करती रही है और समाज में अपनी महत्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज कराती है। कौन है जो सूर और मीरा के पद सुनकर आत्मविभोर नहीं हो जाता। भौतिक तपन से मुक्ति हेतु भक्त हृदय आज भी सूर, तुलसी, मीरा-साहित्य में अपने मन को संतुष्ट एवं शांत करता है। निश्चित रूप से भक्तिकालीन साहित्य ने समाज में अपनी एक विशेष छवि बनाई है।

17वीं शताब्दी से लेकर 19वीं शताब्दी तक मुगल साम्राज्य का बोलबाला था। राजा भोग-विलास में लिप्त रहते थे। इसी का प्रतिबिम्ब तत्कालीन साहित्य में मिलता है। नारी का नख-शिख वर्णन, संयोग शृंगार में कामुकता आदि का चित्रण स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ता है। ऐसे समाज में कवि राजदरबारों का आश्रय प्राप्त करके अपने आश्रयदाताओं की प्रशंसा में ही कविता लिखते थे। इसीलिए रीतिकालीन साहित्य तत्कालीन वैभव-विलासिता को ही प्रदर्शित करता है। उसमें समाज को उचित मार्गदर्शन करने की प्रवृत्ति उतनी प्रखर रूप में नहीं मिलती-

सेज़ है, सुराही है, सुरा और प्याला है।

सुबाला है, दुशाला है, विशाल चित्रशाला है।

समाज में साहित्य की भूमिका के संदर्भ में आधुनिक काल के साहित्य को विशेष रूप से देखा जा सकता है। यह भारतीय गुलामी का काल था। समाज में आज़ादी हेतु छटपटाहट एवं क्रांति-बीज आधुनिक काल के साहित्य में स्पष्ट दिखाई देते हैं। 19वीं शताब्दी से लेकर आज तक का साहित्य अपने युगीन समाज की समस्याओं का चित्रण प्रस्तुत करके समाज के यथार्थ रूप को उपस्थित करता रहा है।

भारतेन्दु युगीन साहित्य ‘भारत दुर्दशा’, ‘वैदिकी हिंसा, हिंसा न भवति:’ आदि साहित्यिक विधाओं में तत्कालीन भारतीय समाज की दोहरी दुर्दशा चित्रित हुई है। साहित्य के गद्य-पद्य दोनों रूपों में तत्कालीन समाज की समस्याएँ मुखरित हुई हैं। मातृभाषा के प्रचार-प्रसार एवं देशभक्ति की भावना का स्वर साहित्य में स्पष्ट सुनाई पड़ता है

मातृभाषा उन्नति अहै, सबै उन्नति को मूल।

बिन निज भाषा उन्नति के, मिटै न हिय को सूल।।

आदिकाल से लेकर आधुनिक काल के साहित्य और समाज पर दृष्टिपात करने से पता चलता है कि साहित्य संवेदना शून्य हो ही नहीं सकता। समाज की सोच, समस्याएँ, हलचल साहित्य में व्यक्त होंगी ही।

यह संभव नहीं कि देश और समाज जलता रहे और साहित्यकार चैन की वंशी बजाता रहे। साहित्यकार के लिए ऐसा कर पाना संभव ही नहीं। वह अपने सामाजिक परिवेश तथा परिस्थितियों से बेखबर रहे, यह मानने का अर्थ होगा कि वह हृदयहीन है। यदि ऐसा नहीं है तो वह अपनी संवेदना पर समाज की  दस्तक को अनसुनी नहीं कर सकता। यह बात अलग है कि कभी-कभी साहित्यकार समाज से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ता है तो कभी अप्रत्यक्ष रूप से। साहित्य की समाज में भूमिका का निष्कर्ष यह नहीं निकाला जा सकता कि सामाजिक हलचल में वह अपने व्यक्तिगत सुख-दुःख को भुला दे। जब भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया जा रहा था तो प्रकृति और परमसत्ता के साथ सम्बन्ध की अनुभूति के गीत गाने वाले छायावादी कवि सार्वजनिक सरोकारों को लेकर भी रचना कर रहे थे।

साहित्य केवल समाचार पत्र नहीं है। किसी भी समय के सामाजिक मुद्दे मानव नियति के संबंध में झकझोर देने की क्षमता से सम्पन्न होकर साहित्य के लिए प्रासंगिक होते हैं। सामाजिक जीवन में समय-समय पर जो हलचल होती है उसमें साहित्यकार की रुचि सामयिक नहीं होती – उसकी कल्पनाशीलता में अंर्तनिहित संदृष्टि उसमें मानवीय अभिप्रायों का साक्षात्कार करती है। रांगेय राघव की ‘गदल’ कहानी में लेखक ने मूल घटना की क्रूरता के भीतर प्रेम की दुर्धर्ष प्रेरणा शक्ति का साक्षात्कार कर करुण परिणति प्रदान की है। इस प्रकार सामाजिक जीवन के क्षेत्र में घटी हुई घटना कहानी में ढलने पर व्यक्ति चरित्र के भीतर नितांत मानवीय अभिप्राय को जन्म दे गई है।

इसी आलोक में प्रेमचन्द का साहित्य देखा जा सकता है। उनका साहित्य इस बात का प्रमाण है कि समाज में साहित्य की भूमिका निःसंदेह महत्वपूर्ण है। उनके उपन्यास और कहानियों के पात्र समाज के समक्ष चुनौतियाँ पैदा करते हैं, समस्याएँ दर्शाते हैं, प्रश्न पूछते हैं, संघर्ष करते हैं। अज्ञेय की कविता ‘हिरोशिमा’ को इस संदर्भ में समझ सकते हैं। अमेरिका द्वारा जापान पर अणुबम गिराये जाने पर अज्ञेय ने न तो राजनीतिक दादागीरी का प्रश्न उठाया है, न आँकड़े ही दिये हैं और न ही उसके दुष्परिणाम की गणना की है। ऐसा कुछ न करके उन्होंने मानव के मानव-विरोधी कार्य की विडम्बना को निर्माण की ध्वंसात्मक परिणति के रूप में अंकित कर ऐतिहासिक घटना को मानवीय अभिप्राय में ढाल दिया है-

मानव का रचा हुआ सूरज

मानव को भाप बनाकर सोख गया।

पत्थर पर लिखी हुई यह

जली छाया

मानव की साखी है।

यही बात दुष्यन्त कुमार की गज़लों के विषय में कही जा सकती है। उन्होंने सत्ता और जनता के बीच बढ़ती हुई खाईं का तथ्यात्मक विवरण प्रस्तुत न करते हुए उसके सम्बन्ध में अपनी संवेदनात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त की है –

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,

इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।

आज यह दीवार पर्दों की तरह हिलने लगी,

शर्त लेकिन थी कि बुनियाद हिलनी चाहिए।

हर सड़क पर हर गली में, हर नगर, हर गांव में

हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,

मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

मेरे सीने में नहीं, तो तेरे सीने में सही,

हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

इस गज़ल की प्रभावशक्ति संवेदनात्मक अभिव्यक्ति नहीं वरन् इसके द्वारा समाज में टकराव का रूपान्तर एक नई संकल्प कामना में प्रकट हुआ है। इसी आलोक में अन्य साहित्यिक रचनाओं और उनके सामाजिक दायित्व को भी समझ सकते हैं। समाज में साहित्य की भूमिका के संदर्भ में शमशेर बहादुर सिंह का कथ्य सटीक प्रतीत होता है- “साहित्य का दायित्व अपनी भावनाओं में, अपनी प्रेरणा में, अपने आंतरिक संस्कारों में समाज-सत्य के मर्म को ढालना- उसमें अपने को पाना है, और उस पाने को अपनी पूरी कलात्मक क्षमता से पूरी सच्चाई के साथ व्यक्त करना है।”

यह कहना अनुचित न होगा कि साहित्य और समाज एक सिक्के के दो पहलू हैं। समाज अनुभवों की एक व्यापक उर्वरक भूमि है, जहाँ से साहित्य को सामग्री मिलती है। उस सामग्री का सदुपयोग श्रेष्ठ साहित्यकार ही कर पाता है। वह अपनी कल्पना शक्ति के माध्यम से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से एक आदर्श समाज की परिकल्पना करता है।

इतिहास साक्षी है कि समय-समय पर साहित्यकारों की रचनाएँ समाज को आंदोलित, उद्वेलित, परिवर्तित करती रही हैं तथा सैनिकों की भाँति साहित्य ने हर युग में मोर्चा संभाला है और अपनी कलम से एक साथ लाखों लोगों को भी घायल किया है, कभी चेताया है, तो कभी झकझोरा है, तो कभी समाज में प्रेम के गीत भी गाये हैं। वास्तव में मानवीय मूल्यों की रक्षा करते हुए उसे जनमानस तक ले जाने का सिद्ध कार्य साहित्य ने ही किया है। यदि साहित्य समाज के प्रति अपने दायित्व से मुँह मोड़ता तो क्या आज विश्व शिरोमणि भारतीय-सांस्कृतिक मूल्य जीवित रह पाते? निःसंदेह समाज को दिशा और दशा देने में साहित्य की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

एक ओर यह कहना भी अनुचित न होगा कि आज साहित्य के मूल्य और उसका दायित्व अपनी सही दिशा में नहीं है। आज ‘फार्मूलेबाजी’, व्यक्तिगत कुंठा एवं विचारधाराओं के आतंक ने साहित्य को उसकी ऊँचाईयों से कुछ हद तक गिराया भी है। ऐसी स्थिति में आज का अधिकांश साहित्य अपठनीय बनता जा रहा है। निश्चित रूप से साहित्यिक पतन का प्रभाव समाज पर पड़ा है।

आज का साहित्य समाज में, आशा की कोई किरण जगाने में असमर्थ-सा हो गया है जो निश्चित रूप से चिंता का विषय है। तो दूसरी ओर सामाजिक जीवन में साहित्यकार कोई हलचल पैदा करना चाहे तो वह तभी कर सकता है जब उसकी रचनाओं को रुचिपूर्वक पढ़ने वाला भी हो, अन्यथा उसकी सिद्धांतनिष्ठा, समाजनिष्ठा कितनी ही प्रबल क्यों न हो और सार्वजनिक जीवन के सम्बन्ध में उसकी जानकारी कितनी ही अच्छी क्यों न हो, उसके साहित्य को सूंघने वाला कोई न हुआ तो उसके ‘अस्त्र’ में जंग ही लगता रहेगा।

 

प्रो. कमलेश कुमारी

प्रोफेसर – (हिन्दी-विभाग)

शहीद भगत सिंह कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय (दिल्ली)

Email: [email protected]

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