Wednesday, February 11, 2026
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संपादकीय : लेखक ग्राम – परिकल्पना से उद्घाटन तक

लेखक गांव के संरक्षक डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक ने बताया कि 25 अक्टूबर से शुरू हुए  स्पर्श हिमालय महोत्सव-2024 का उद्देश्य साहित्य, संस्कृति व कला का संरक्षण एवं प्रोत्साहन है। कहा कि इसी प्रयासों के तहत लेखक गांव की स्थापना की गई है। उन्होंने आगे कहा कि लेखक गांव का आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी संग एक समझौता हुआ है। अभी एक लाख पुस्तकें इस गांव के पुस्तकालय में रखी जा रही हैं। हमें नालंदा के पुस्तकालय की याद है। ठीक उसी की तरह बाद में ज्ञान, विज्ञान, धर्म, दर्शन, शोध आदि से संबंधित करीब 10 लाख पुस्तकें लेखक गांव में रखी जाएगी। उनके हिसाब से  नई शिक्षा नीति हिंदी की स्थिति को बदलने में गेम चेंजर साबित होगी।

भाई रमेश पोखरियाल निशंक जी से एक अनूठा सा रिश्ता बन गया है। दो वर्ष पहले जब उनके लेखन पर एक भव्य कार्यक्रम का आयोजन ऋषिकेश में किया गया था, वहीं से यह रिश्ता मज़बूती पकड़ता गया। मैंने महसूस किया कि निशंक जी मूल रूप से एक संवेदनशील कवि, लेखक एवं कथाकार हैं। उनकी सौ से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं और लेखकों के लेकर उनके दिल में संवेदनशीलता गहरे तक भरी है। 
उन्होंने ऋषिकेश में ही बताया था कि उनकी एक पुस्तक के लोकार्पण के समय पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी की आंखें गीली हो आई थीं। उन्होंने उस समय के युवा नेता रमेश पोखरियाल से कहा कि वे श्याम नाराय़ण पांडेय एवं निराला जी जैसे महान कवियों के अंतिम दिनों की दशा के बारे में सोच कर अपराध-बोध से ग्रस्त हो जाते हैं। कभी किसी भी सरकार या निजी संस्था ने लेखकों के बारे में कुछ नहीं सोचा। 
देहरादून के निकट थानों गाँव में स्थित – लेखक ग्राम।
युवा रमेश पोखरियाल जी के मन में यह बात गहरे तक पैठ गई कि अपने राजनीतिक गुरू की इच्छा को मूर्तरूप कैसे प्रदान किया जाए। इस बीच निशंक जी शिक्षा मंत्री भी बने और नई शिक्षा नीति भी लागू की। मगर उनके दिल में लेखकों के लिये एक ऐसा स्थान बनाने की कल्पना उन्हें बार-बार भीतर से कचोटती कि कुछ तो करना होगा। 
उत्तराखण्ड देवभूमि है तो ज़ाहिर है कि लेखकों के लिये यदि कुछ भी किया जा सकता है तो वो देवभूमि से ही होना संभव था। गंगाजी के तट से कुछ ही दूरी पर और देहरादून के बाहरी छोर पर थानों गाँव में रमेश पोखरियाल निशंक को एक ऐसा प्लॉट भी दिखाई दे गया जहां वे अटल बिहारी वाजपेयी जी के सपनों का ‘लेखक ग्राम ’ स्थापित कर सकते थे। 
उस समय परमार्थ निकेतन के स्वामी चिदानन्द जी भी मौजूद थे। मुझे निशंक जी की आँखों में वो दृढ़ विश्वास दिखाई दे रहा था जो मुझे आश्वस्त कर रहा था कि यह इन्सान किसी भी तरह भागीरथ से कम नहीं है। ये गंगा की धार के निकट अपने सपनों का लेखक ग्राम स्थापित किये बिना मानेगा नहीं। 
हालांकि सवाल बहुत से थे। क्या यह लेखक ग्राम केवल बूढ़े, बीमार और अशक्त लेखकों के लिये एक आश्रम बन कर रह जाएगा या फिर यह किसी प्रकार का टूरिस्ट अट्रैक्शन तो नहीं बन जाएगा। ज़ाहिर है कि ये सब विचार निशंक जी के दिमाग़ को भी मथ रहे होंगे। इन सबसे बचते-बचाते 25, 26 और 27 अक्तूबर को जब लेखक ग्राम का उद्घाटन हुआ उस समय 6 लेखक कुटिया और करीब 16 ऐसे कमरे बन कर तैयार हो चुके हैं जिनमें लेखक आकर ठहर सकते हैं और प्रकृति की गोद में रहकर सृजन कर सकते हैं। एक लाख पुस्तकों का एक पुस्तकालय भी बन रहा है। भविष्य में एक अस्पताल बनाने की भी योजना है। 
वरिष्ठ लेखकों के लिये – लेखन कुटीर।
लेखक ग्राम का उद्घाटन संयुक्त रूप से पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, उत्तराखंड के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के अध्यक्ष प्रसून जोशी ने किया।
इस अवसर पर पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कहा, “उत्तराखंड अपने नैसर्गिक सौंदर्य और विविधताओं से भरा हुआ है।” उन्होंने पूर्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक को लेखक गांव की परिकल्पना को साकार करने पर धन्यवाद दिया। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई को याद करते हुए कहा कि – “उनकी कविताएं मन मस्तिष्क पर असर डालती थी। उनकी कविताओं में गहराई भरा संदेश होता था। उनकी कविताओं की तरह साहित्य और संस्कृति को साकार करने का काम रमेश पोखरियाल निशंक कर रहे हैं।” उन्होंने ज़ोर दे कर कहा लेखक गांव आने वाले समय में उत्तराखंड का नया टूरिस्ट डेस्टिनेशन बनेगा।
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री श्री सी.एम. धामी ने कहा कि लेखक ग्राम के निर्माण में पत्रकारों की लेखनी का अहम योगदान है। उनकी सरकार साहित्यकारों को लाइफ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार दे रही है। स्वामी अवधेशानंद ने कहा, पुस्तकें जीवन में भ्रम, विकारों और दुखों को दूर करने में सच्चे मित्र की भूमिका निभाती हैं। वो पिछले 11 वर्षो से हर रोज़ एक लेख जरूर लिखते हैं।
लेखक गांव के संरक्षक डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक ने बताया कि 25 अक्टूबर से शुरू हुए  स्पर्श हिमालय महोत्सव-2024 का उद्देश्य साहित्य, संस्कृति व कला का संरक्षण एवं प्रोत्साहन है। कहा कि इसी प्रयासों के तहत लेखक गांव की स्थापना की गई है। उन्होंने आगे कहा कि लेखक गांव का आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी संग एक समझौता हुआ है। अभी एक लाख पुस्तकें इस गांव के पुस्तकालय में रखी जा रही हैं। हमें नालंदा के पुस्तकालय की याद है। ठीक उसी की तरह बाद में ज्ञान, विज्ञान, धर्म, दर्शन, शोध आदि से संबंधित करीब 10 लाख पुस्तकें लेखक गांव में रखी जाएगी। उनके हिसाब से  नई शिक्षा नीति हिंदी की स्थिति को बदलने में गेम चेंजर साबित होगी।
निशंक जी के अनुसार ने लेखक गांव में लेखन कुटीर, संजीवनी वाटिका, नक्षत्र और नवग्रह वाटिका, पुस्तकालय, कला दीर्घा, प्रेक्षागृह, योग-ध्यान केंद्र, परिचर्चा केंद्र, गंगा और हिमालय का मनमोहक संग्रहालय, भोजनालय आदि सभी व्यवस्थाएं की गयी हैं। उन्होंने कहा कि लेखक गांव में आकर लेखक एक ही स्थान पर प्रकृति, संस्कृति और ज्ञान-विज्ञान से साक्षात्कार कर विविध विषयों पर नए दृष्टिकोण प्राप्त कर सकेंगे।
उन्होंने बताया कि 65 से अधिक देशों के लेखन, कला और संस्कृति से जुड़े लोग इसमें प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से शामिल हो रहे हैं जिनमें से 40 देशों से लोग यहां आए हैं। इनमें देश और दुनिया से आए छात्र भी शामिल हैं जो लेखकों से जुड़ना चाहते हैं। स्वामी चिदानंद, रवीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय के संतोष चौबे, जवाहर कर्नावट आदि ने भी अपने विचार रखे। 
कार्यक्रम में निशंक जी की दो पुत्रियों विदूषी निशंक एवं आरुषि निशंक ने सक्रिय सहयोग किया। वहीं बेचैन कांडियाल और आशना कांडियाल ने तो केन्द्रीय भूमिकाएं निभाईं। हर मेहमान को होटल से आयोजन स्थल तक पहुंचाने की ज़िम्मेदारी आशना के युवा कंधों पर थी। 
केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के अध्यक्ष प्रसून जोशी ने कृत्रिम बौद्धिकता को लेकर चिन्ता व्यक्त की मगर साथ ही कहा कि चैट जीपीटी शब्द तो दे सकती है मगर उन शब्दों में इमोशन नहीं भर सकतीं। उन्होंने ये भी कहा कि सृजनात्मक माहौल के लिए लेखक गांव जैसा एकांत स्थान चाहिए जहां आप स्वयं के अस्तित्व में डूबकर मोती निकाल सकें। उन्होंने अपनी दो कविताओं का मंच से पाठ भी किया। 
सक्रिय लेखकों के ठहरने के लिये विश्राम गृह।
इस आयोजन के दौरान भिन्न सत्रों में साहित्यिक चर्चाएं हुई जिनमें भारत और विदेश के बहुत से साहित्यकारों ने भाग लिया। समाचारपत्रों के लिये राजनीतिक हस्तियां महत्वपूर्ण होती हैं तो साहित्यिक पत्रिका का उत्तरदायित्व बनता है कि कम से कम साहित्यिक हस्तियों के नाम तो अवश्य लिखे जाएं जिनकी उपस्थिति ने आयोजन को सही मायने में वैश्विक बनाया। 
प्रवासी भारतीय लेखकों में सुरेश चन्द्र शुक्ल (नॉर्वे), जय वर्मा (ब्रिटेन), स्नेह ठाकुर (कनाडा), अनिता कपूर एवं इंद्रजीत शर्मा (अमरीका), श्री जूरी (यूक्रेन), गोपाल शर्मा (नीदरलैंड) व अन्य शामिल थे तो भारत से ममता कालिया, बुद्धिनाथ मिश्र, लीलाधर जगूड़ी, इंद्रजीत सिंह, राकेश पांडेय, डा.सविता मोहन, सुधा जुगरान, प्रो. राजेश कुमार, अलका सिन्हा, लक्ष्मी शंकर वाजपेयी, बी.एल. गौड़, लालित्य ललित, अनिल जोशी, पीयूष गोयल, यास्मीन मूमल, अनिता वर्मा ने अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई।  शिक्षा जगत से अन्य लोगों के अतिरिक्त डॉ. रमा (हंसराज कॉलेज, दिल्ली), डॉ. सत्यकेतु साँकृत, प्रो नवीन लोहनी,  डॉ. किरण खन्ना, डॉ. किरण ग्रोवर, डॉ कन्हैया त्रिपाठी, डॉ. विवेक शर्मा, डॉ. कुसुम कुंज मालाकर (गौहाटी), लता चौहान (हैदराबाद) भी मौजूद थे। 
पहला कदम रख दिया गया है। रमेश पोखरियाल निशंक ने माननीय श्री अटल बिहारी वाजपेयी की आँखों में महसूस किये दर्द को साकार रूप देने की शुरूआत कर दी है। अब ज़रूरत इस बात की है कि इस लेखक गाँव को किसी सरकारी संस्था की तरह लालफीताशाही के चक्कर में फंसने ना दिया जाए। और ना ही इसे किसी निजी व्यापारिक संस्था की तरह मुनाफ़ा कमाने की मशीन बनने दिया जाए। जिन उच्च आदर्शों को लेकर इस ग्राम की नींव रखी गई है उन्हीं संवेदनाओं के साथ यह भारत और प्रवासी भारतीय लेखकों के लिये एक सृजन कुंज का काम करता रहे। 
तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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54 टिप्पणी

  1. लेखक गांव… पढ़ते ही आंखों की चमक बढ़ गई।
    ये लेख स्वयं में सुखद समाचार है ।

  2. एक प्रश्न बार बार मन में उठा कर अतिथियों को लेखक ग्राम में नहीं अच्छे होटल्स में ठहराया गया। यदि व्यवस्था नहीं थी तो समय आगे का चुना जाना चाहिए था। लेकिन यदि यहां हिंदी की भविष्य है तो साधुवाद।

  3. बहुत ही सुंदर प्रयास…भारतीय साहित्य एवं संस्कृति को सदा के लिए जीवित रखने में सफल हो अत्यंत सराहनीय

  4. ‘लेखक गांव – परिकल्पना से उद्घाटन तक ‘ संपादकीय के माध्यम से आपने उस हकीकत से रूबरू कराया है जो हर साहित्यकार अपनी कल्पनाओं में एक इस तरह का कल्पना लोक लिए विचरण करता रहता है। इसको हकीकत में बदला है प्रसिद्ध राजनेता एवं साहित्यकार रमेश पोखरियाल निशंक जी ने। भारत जैसे विशाल देश में सब कुछ है। लेकिन साहित्य के लिए ऐसा कुछ नहीं था जिस पर गर्व किया जा सके । साहित्य के लिए भी पर्यटन होगा यह कल्पना से परे था। अगर राजनेता सच्चा साहित्यकार है , उसका साहित्य से गहरा जुड़ाव है तो लेखक गांव निश्चित बनेगा ,यह निशंक जी ने साबित करके दिखा दिया। उनकी जितनी तारीफ की जाए कम ही है।
    मैं निशंक जी को तब से जान पाया हूं जब हंस में उनकी कहानियां छपती थीं। उनके पते पर मुख्यमंत्री उत्तराखंड लिखा देखकर मैं चौंक गया था। मेरे मन में पहले से या कहूं कि पूर्वधारणा थी कि राजनेता खासकर हमारे समय के साहित्य लिख ही नहीं सकते हैं। फिर दिमाग में आता था कि मुख्यमंत्री होने के कारण तो नहीं संपादक ने इन्हें छाप दिया है। लेकिन नहीं, ऐसा संभव नहीं था। इसका कारण था कि लेखक और संपादक दोनों ही विचारधारा में एक दूसरे के विपरीत ध्रुव थे। अन्य संपादकों की बात होती तो मान सकते थे। राजेन्द्र यादव जी जैसे हंस के संपादक से ऐसा सोचा भी नहीं जा सकता है। रचना पढ़ी तो हैरान रह गया। रचना बहुत दमदार थी। मैंने हंस में उनको दो-तीन बार पढ़ा है। उनके बारे में इससे ज्यादा मैं नहीं जानता था। अब पुरवाई के संपादक आदरणीय तेजेन्द्र शर्मा जी की संपादकीय से उनके विजन को जान पाया हूं। उनका यह विजन साहित्य के लिए अद्वितीय है, अद्भुत है। मैं उनके विजन से आज बहुत प्रभावित हुआ हूं। लेखक गांव से परिचय कराती संपादकीय के लिए आपको बहुत बहुत बधाई।

    • भाई लखनलाल जी आपकी टिप्पणी में कही गई बात बहुत से लोगों के मन की बात हो सकती है। ऐसी सारगर्भित टिप्पणी के लिए दिल से शुक्रिया और आशीष!

  5. शानदार कितना अलौकिक रहा होगा काश हम भी वहां मौजूद होते। लोगों से मिल पाते साहित्य मनीषी गंगा में डुबकी लगा सकते पढ़कर हृदय गदगद हो गया।

  6. बहुत ही अहम और समीचीन विषय पर लिखा गया संपादकीय। हृदय सम्राट एवं स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेई जी के विचारों पर आधारित और आदरणीय डॉक्टर रमेश निशंक द्वारा सृजित लेखक गांव एक सत्यता बने,इसी को रेखांकित करता हुआ सहज संपादक एक रिपोर्ताज और समीक्षात्मक आलेख को समेटे एक सिल्वर लाइनिंग को दर्शाता है।
    लेखक गांव की अवधारणा और राष्ट्रीय पुस्तक न्यास की जुगलबंदी एक सुखद पठनीय समाज सृजना की आस बंधाती सी प्रतीत होती है। पुस्तक नियामक और नीति की भी अपनी महत्वता है ,इस संपादकीय में कहीं ना कहीं इसे भी कवर किया जाना चाहिए।तभी लेखक और पाठकों के बीच टूटे संवाद के तार जुड़ सकेंगे। यूं तो भारत विश्व के पहले पांच टॉप प्रकाशकों या देशों में आता है। खैर यह संपादकीय लेखक गांव और उस से संबंधित सार्थक जानकारी को बहुत ही सहज सरल और प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करता है।
    उम्मीद है इस हाशिए पर रहे विषय यथा पुस्तक और पुस्तक जगत पर आदरणीय संपादक की कलम च as लेगी और वह भी विशेष रूप से निजी क्षेत्र प्रकाशकों पर या भी लेखक गांव पर इस संपादकीय की दूसरी किश्त भी पढ़ने को मिले।

    • भाई सूर्यकांत जी, आपकी राय सिर माथे। प्रयास रहेगा। सार्थक टिप्पणी के लिए हार्दिक आभार।

  7. एक राजनीतिक होते हुए भी लेखन में निरन्तरता बनाए रखना अपने आप में विशेष है। आदरणीय निशंक जी ने स्वर्गीय अटल जी के स्वप्न को साकार करने की शुरुआत कर दी है । यह महोत्सव साहित्य व साहित्य से जुड़े लोगों के लिए अपने आप में विशेष रहा। सभी को बहुत बहुत शुभकामनाएँ

    • प्रिय ऋतु, वहां का माहौल साहित्यमयी था। वैसे उत्सव के बाद ही गंभीर काम शुरू होते हैं।

  8. लेखक गांव, सुनकर, जानकर बेहद अच्छा लगा, एक आत्मिक खुशी का अनुभव का अनुभव हुआ, एकदम से एक अपनापे का भाव उमड़ आया, इस प्रयास के लिए निशंक जी साधुवाद के पात्र हैँ,

    • जी सही कहा। निशंक जी एक genuine व्यक्तित्व के मालिक हैं। लेखक ग्राम को लेकर उनसे निरंतर संपर्क बनता रहेगा ‌

  9. यह संपादकीय कम उस कार्यक्रम की रिपोर्ट ज्यादा लग रहा है। इस कलम का पैनापन गायब रहा ।

    • हार्दिक आभार नीलिमा जी। आपकी प्रतिक्रिया हमें भविष्य में बेहतर लिखने के लिए सतर्क करती रहेगी। कुछ लोगों को संपादक की राय इस संपादकीय में भी दिखाई दे रही है। मगर मेरे लिए पुरवाई के संपादक मंडल के किसी भी सदस्य की राय महत्वपूर्ण होती है। एक बार फिर धन्यवाद।

  10. क्या ही स्थान का नाम हैं। सुंदर। हमेशा की तरह लिखा भी आपने बहुत मन से है। लगा जैसे हम वहीं स्थल की मनोरमता देख रहे हैं।

    • आपको संपादकीय पसंद आया कल्पना जी, इसके लिए दिल से धन्यवाद! अपनी प्रतिक्रिया भविष्य में भी देती रहें।

  11. अहा, लेखक गांव की कल्पना खुद में ही कैसी मनोरम है! और आपने तो उसे साकार देखा है। पढ़कर आनंद आ गया।

    स्नेह,
    प्रकाश मनु

    • सर, अभी हमने जो देखा वो उत्सव था। अब कुछ समय बाद लेखक ग्राम सक्रिय रूप से काम करने लगेगा। स्पर्श हिमालय ट्रस्ट को निरंतर जुटा रहना पड़ेगा ताकि कार्य सुचारू रूप से चल सके।

  12. निशंक जी ने स्वर्गीय अटल जी के स्वप्न को साकार करने की ठानी और उसे पूरा कर दिखाया, यह बहुत बड़ी बात है।
    आपने उक्त समारोह का आँखों देखा वर्णन के साथ बहुत अच्छा, जानकारी से युक्त संपादकीय लिखा है। सकारात्मकता का वलय सा बना दिया। बहुत अच्छा।
    लेखकों व साहित्य से जुड़े लोगों के लिए विशेष सुखद खबर है यह। सभी को बहुत बहुत शुभकामनाएँ!

    • अनिता जी आभार। चुनौती यह थी कि किसी आयोजन की जानकारी को संपादकीय रूप में कैसे ढाला जाए। पहली बार ऐसा प्रयास किया। आपकी टिप्पणी के लिए हार्दिक आभार।

  13. बहुत वृहद कार्यक्रम । लेखक गाँव की परिकल्पना को श्री रमेश पोखरियाल निशंक जी ने जीवन्त कर दिया। उस पर आप जैसे लेखकों ने अपनी विशेष उपस्थिति से कार्यक्रम को सार्थक किया। कार्यक्रम का आँखों देखा दृश्य आपने अपनी कलम से प्रस्तुत किया है वो अद्भुत है। कुछ चित्र और जोड़े जा सकते हैं।

    • अनीता जी शुक्रिया। दरअसल संपादकीय में तो चित्र लगाने में बहुत कंजूसी करनी पड़ती है। वरना सीधी सीधी रिपोर्ट बन जाती है।

  14. लेखट ग्राम का सजीव चित्रण ही नहीं बल्कि उसके भावी चरणों की आहटभी ये सुनिश्चित करेगी कि लेखन, लेखनौर अनुकूल परिवेश इसको कितना सफल बनाता है। साहित्य शांत और अनुकूल वातावरण में सार्थक सृजन ही करेगा बशर्ते कि व्यापरियों की दृष्टि न पड़ जाय।

  15. लेखक ग्राम के बारे में अच्छी जानकारी मिली। निशंक जी के प्रोजेक्ट के लिए हार्दिक शुभकामनाएं हैं मेरी।

  16. एक अच्छे आयोजन के लिए आयोजकों को हार्दिक बधाई। अन्यत्र व्यस्तता के कारण सम्मिलित नहीं हो सका, अन्यथा सबसे मिलकर और साहित्य की सात्त्विक धारा में सम्मिलित होकर हार्दिक प्रसन्नता होती।

    आदरणीय निशंक जी के इस साहित्यिक अवदान के लिए उन्हें साधुवाद!

    • आपसे मिल कर बहुत अच्छा लगता अशोक भाई। जब भी मौका लगे अवश्य जाएं। निशंक जी तक आपकी भावनाएं प्रेषित कर दूंगा।

  17. Your Editorial of today speaks of the inauguration of a place meant for both writers n general public as it will be giving a library of one lakh books for public readers and housing facilities for invited writers.
    The pictures that you have presented in your Editorial are heartwarming.
    A commendable gift indeed.
    Warm regards
    Deepak Sharma

    housing authors and write
    a very great gift for the writers

    • Deepak ji it was such a unique experience of feeling the Natural surroundings of Dehradun. To think that writers could actually stay there and indulge in creative writing is so reassuring! Thanks so much for your reaction!

  18. आदरणीय तेजेंद्र जी !
    आज के संपादकीय का आपका विषय बहुत अपेक्षित था। जब लेखक ग्राम का नाम सुना था तब से इसके बारे में जानने की जिज्ञासा थी!तीन दिनों में जितने भी कार्यक्रम हुए उन सब की जानकारी मिल जाए यह तीव्र इच्छा भी थी। कार्य-कारण और उद्देश्य भी जानना चाहते थे आज आपके संपादकीय को पढ़कर सारी जिज्ञासाएँ शांत हुईं।
    अटल बिहारी वाजपेई के सपनों को साकार करने का जो बीड़ा आदरणीय रमेश पोखरियाल निशंक जी ने ह
    उठाया है वह प्रशंसनीय है। इसका उद्देश्य महत् है।
    यह एक अच्छी पहल है, बल्कि काबिले तारीफ और अकल्पनीय भी। एक स्वप्न सा महसूस हो रहा है। नालंदा और तक्षशिला की तर्ज पर अगर यहाँ काम होता है तो निश्चित ही यह एक अद्वितीय पहल रहेगी। चाणक्य को हमने काफी पढ़ा है। चाणक्य सीरियल में जब तक्षशिला को देखा था। मन प्रसन्न हो गया था। आज आपके संवाद की ने भी उसी तरह के आनंद से अनुभूत करवाया यह एक अच्छी पहल है। खेल ग्राम की सोच के क्रियान्वयन के लिए जिसने स्वप्न देखा, उसे पूरा करने का संकल्प लिया, जिस-जिस ने भी सहयोग दिया; प्रारंभ से अंत तक सभी का शुक्रिया और भविष्य के लिए शुभकामनाएँ। इस विस्तृत जानकारी से रूबरू करवा कर सुखद आनंद देने के लिये आपका तहेदिल से शुक्रिया।

    • आदरणीय नीलिमा जी, आपने निशंक जी के इस अनूठे कदम की सराहना की है। आपने इस विषय में चाणक्य, नालंदा और तक्षशिला का ज़िक्र करते हुए लेखक ग्राम को अतिरिक्त ऊंचाई प्रदान की है। हार्दिक आभार।

  19. लोगों में पठन-पाठन में आती कमी का रोना तो सभी रोते हैं किन्तु कमी का कारण जानने का प्रयास कोई नहीं करता। फ्लैट संस्कृति के कारण आज इतने बड़े-बड़े अपार्टमेंट बन रहे हैं। इनमें जिम, स्विमिंग पुल, कैंटीन, शॉपिंग काम्प्लेक्स, ऑडिटोरियम, बैडमिंटन कोर्ट, लॉन्ग टेनिस, टेबल टेनिस इत्यादि की सुविधाएं तो दी जाती है लेकिन मानसिक खुराक के लिए लाइब्रेरी का कोई प्रोविजन नहीं रहता। ऐसे समय में डॉ रमेशचंद्र पोखरियाल, जो पूर्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री रहने साथ एक अच्छे लेखक भी रहे हैं, के द्वारा अपने आदर्श स्वर्गीय अटल बिहारी बाजपेयी के स्वप्न को साकार करने के लिए लेखक गाँव की परिकल्पना को साकार रूप प्रदान करने का प्रयास करना न केवल सराहनीय है वरन अनुकरणीय भी है। अगर यह प्रयास वास्तव में सफल रहा तो निश्चय ही हमारे साहित्य, संस्कृति व कला का संरक्षण एवं संवर्धन तो करेगा ही, भारत के अन्य प्रदेश भी इस ओर कदम बढ़ाने के लिए प्रेरित करेगा। सबसे बड़ी बात तो लेखक गांव का आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के साथ समझौता होना है।
    दुःख तो इस बात का है कि इतने बड़े और उपयोगी आयोजन का मिडिया कवरेज भी बहुत अधिक नहीं हुआ, किसी को पता चला तथा किसी को नहीं भी पता चला होगा।

    • सुधा जी, आपने सही मुद्दे की ओर ध्यान दिलाया है। Food for thought बहुत महत्वपूर्ण है। भाई निशंक जी ने बहुत अनूठा कदम उठाया है। पुरवाई पत्रिका के पूरे परिवार की ओर से उन्हें हर तरह का समर्थन मिलेगा।

  20. निशंक जी को जितना जानता समझता हूं उस आधार पर विश्वास के साथ कह सकता हूं कि बात उद्घाटन तक सीमित नहीं रहेगी बल्कि आगे बहुत दूर तक जाएगी. आपने जो संदेह लालफीताशाही को लेकर व्यक्त किया है उससे इंकार नहीं किया जा सकता है, यदि ऐसा हुआ तो निशंक जी के प्रयासों को धक्का लगा सकता है. फिलहाल हमें आशा करनी चाहिए कि सब ठीक रहेगा….

    • प्रदीप भाई, निशंक जी पूरी तरह से कटिबद्ध हैं लेखक ग्राम को सफल बनाने के लिए। उनका परिवार और हम सब उनके साथ हैं इस मुहिम में। मुझे पूरा विश्वास है कि सभी बाधाओं को लांघते हुए निशंक जी अपने ध्येय में कामयाब होंगे।

  21. लेखक ग्राम – ये शब्द ही इतना सुखद और आशा भरा है कि एक साँस में पढती चली गई l पठन-पाठन की परंपरा की कमी का रोना रोने के स्थान पर सकारात्मक पहल निसंदेह ही निशंक जी का एक सार्थक और मानीखेज प्रयास है l लालफ़ीताशाही के व्यवधान व्यवधान खड़े करणे की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता पर जोश और जुनून अंततः हजार बाधाएँ पार कर ही लेते हैं l इस महती कार्य के लिए सभी साहित्नुयारागियों को सहयोग की अपनी भूमिका भी निभानी होगी । इस योजना को प्रकाश में लाने के लिए आपका आभार और निशंक जी को मेरी अनंत शुभकामनाएँ

    • वंदना जी, आपको संपादकीय और आदरणीय निशंक जी का कार्य पसंद आया, इसके लिये आपको हार्दिक आभार। आपकी कामनाएं कुबूल हों।

  22. सचमुच एक भगीरथ कार्य। अपने ढंग का अनूठा और प्रेरक। इस परियोजना के लिये लख लख शुभकामनायें । आप द्वारा इसकी विस्तृत जानकारी देने के लिए साधुवाद।

  23. एक मशहूर कहावत है कि देर आए दुरस्त आए। काश इस लेखक ग्राम की संथापना १९४७ में हुई होती जब भारत को अंग्रेजी सरकार ने transfer of power concept के आधीन उस समय की निर्वाचित नेतागणों को देश की बागडोर संभाली थी। भारत का दुर्भाग्य देखिए कि स्वतन्त्र भारत के शिक्षा मन्त्री रमेश पोखरियाल निशंक जैसे न होकर मौलाना अबुल कलाम आज़ाद को बनाया गया और इन हज़रत ने अपना उल्लु सीधा करने के लिए नए भारत में हिन्दी को प्रोत्साहन देने के स्थान पर स्कूलों में अंग्रेज़ी भाषा और मुगल इतिहास को तरजीह दी। यदि १९४७ में यह लेखक ग्राम बना होता तो आज यह लेखक ग्राम नालन्दा से भी कहीं बढ़चढ़ कर होता। आदरणीय अटल बिहारी जी की नम आँखों ने और उनके श्याम नारायण पाँडे और निराला जी के अन्तिम दिनों के वर्णन के दर्द ने जो रमेश पोखरियाल निशंक जी को कुछ करने की प्रेरणा दी, लेखक ग्राम उसका जीता जागता सबूत है। अटल जी स्वयं एक महान कवि, लेखक और सच्चे देशभक्त थे। आपकी लिखी हुई कुछ कविताओं को स्वर्गीय जगजीत सिंह ने “संवेदना” नाम की सीडी में अपने स्वर में गाया है।
    निशांक जी से मेरी मुलाकात ZOOM मीटिंग पर हुई थी जब हिन्दी राइटर्स गिल्ड ने निशांक जी को “साहित्य गौरव सम्मान” से सम्मानित किया था। जितना भी उनको सुनने का मौका मिला है, उस में आपको बहुत ही विनम्र पाया है। भारत को निशांक जी से अच्छा शिक्षा मन्त्री और कहाँ मिल सकता है।
    तेजेन्द्र भाई, लेखक ग्राम के इस सम्पादकीय के लिये बहुत बहुत साधुवाद।

    • विजय भाई, आपकी भावपूर्ण टिप्पणी ने दिल को भीतर तक छू लिया। आपने इतिहास से जोड़ कर संपादकीय का महत्व बढ़ा दिया है। हार्दिक आभार।

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