इंदौर की सुश्री व्योमा मिश्रा एक मानी हुई साहित्यकार, अनुवादक और स्थापित सृजनात्मक (creative) एडिटर और प्रूफ़-रीडर हैं और लंबे समय से इस क्षेत्र में कुशलतापूर्वक कार्य कर रही हैं। आपका हिंदी के अतिरिक्त फ़्रेंच भाषा पर भी अधिकार है… बहुत-सी पुस्तकों, कहानियों और बालकथाओं का फ़्रेंच से हिंदी में अनुवाद किया है। बहुमुखी प्रतिभा से संपन्न व्योमा मिश्रा के साथ ‘पुरवाई’ की शैली त्रिपाठी को साक्षात्कार करने का अवसर मिला। उनका ज्ञानवर्धक साक्षात्कार सुधी पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है :-
शैली – व्योमा जी आप इतने चुपचाप अपना काम करती रहती हैं कि हिन्दी जगत के पाठकों को आपके बारे में कुछ अधिक जानकारी नहीं है। सबसे बढ़िया यही रहेगा कि आप अपने बारे में कुछ बताइये। आपने कहाँ से पढ़ाई की, आपकी रुचियाँ क्या-क्या हैं?
व्योमा – मेरा जन्म-स्थान धार (म.प्र.) है। लेकिन मेरी संपूर्ण शिक्षा-दीक्षा इंदौर (म.प्र.) से हुई। मैं एक ऐसे परिवार से ताल्लुक रखती हूँ, जो पिछले सौ सालों से भी अधिक समय से शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ा हुआ है। मेरे दादाजी श्री रामसुख जी मिश्र उस ज़माने के सर्वाधिक उच्च शिक्षित व्यक्तियों में से एक थे। उस ज़माने में जब लड़कियों को शिक्षित करने को गंभीरता से नहीं लिया जाता था, हमारे घर की सभी महिलाएँ, बेटियाँ तथा बहुएँ, उच्च शिक्षा प्राप्त थीं। मेरी सबसे बड़ी बुआ, शांता बुआ एम.ए.(संस्कृत), बी.एड. थीं; और वो भी आज से क़रीब 75 साल पहले।
इसी तरह परिवार के अन्य सदस्य भी शिक्षा से जुड़े थे। पिता- श्री नरेंद्र मिश्र, अहिल्याश्रम उ.मा. विद्यालय में हेड ऑफ़ फ़ोटोग्राफ़ी डिपार्टमेंट तथा लेक्चरर (फ़िज़िक्स) के पद से क़रीब 20 वर्ष पूर्व रिटायर हुए। माताजी- श्रीमती स्वर्णलता मिश्र ने भी संगीत और होमसाइंस में बी.ए. किया था।
मेरी पारिवारिक पृष्ठभूमि इतनी सशक्त रही कि शिक्षा के साथ ही फ़ोटोग्राफ़ी, लेखन और पठन-पाठन के संस्कार बचपन से मिले। नौवीं-दसवीं कक्षा से ही मैंने पापा से फ़ोटोग्राफ़ी सीखी और बतौर प्रोफ़ेशनल फ़ोटोग्राफ़र अपना कैरियर शुरू कर दिया था।
‘नई-दुनिया’ अख़बार के लिये फ़्रीलॉन्सर फ़ोटोग्राफ़र के रूप में मेरे कई क्लिक्स छपे। बराबर मेहनताना भी मिलता था। जानते हैं कितना? पूरे बीस रुपये! और वो बीस रुपये किसी ख़ज़ाने से कम नहीं लगते थे। वार्षिक-विशेषांक या कैलेंडर में फ़ोटो छपे तो और भी ज़्यादा। ख़ैर, हम बात करते हैं पठन-पाठन और लेखन की।

बचपन से ही मेरे पिताजी ने कई तरह की किताबों, बाल-पत्रिकाओं, कॉमिक्स आदि की बंदी लगवा दी थी जैसे ‘नंदन’, ‘चंदामामा’, ‘बालभारती’, ‘इंद्रजाल कॉमिक्स’ आदि। हमारे यहाँ ‘कादम्बिनी’ भी नियमित आती थी। इसके अलावा पिताजी, लाइब्रेरी से भी किताबें लाकर मुझे दिया करते थे। इस तरह स्वस्थ पठन के संस्कार मुझे अपने पिताजी की बदौलत मिले और मैंने पढ़ना काफ़ी जल्दी सीख लिया था। रही लिखने की बात, तो मैंने शुरुआत की थी कविता लिखने से, और मेरी पहली कविता ‘नई-दुनिया’ में तब छपी जब मैं महज़ छठी कक्षा में थी।
वक़्त गुज़रता रहा और मैंने कॉमर्स में ग्रेजुएशन किया। अपने परिवार में वाणिज्य संकाय में दाख़िला लेने वाली मैं पहली सदस्य थी। उसके बाद मैंने फ़ैशन डिज़ाइनिंग का कोर्स किया, फिर मास मिडिया और पत्रकारिता का। उसके कई बरस बाद मैंने फ़्रेंच सीखी और बस, फ़्रेंच की ही होकर रह गई। बरसों अपनी ख़ुद की फ़्रेंच क्लासेस चलाती रही और क्लास से बचे समय का उपयोग फ़्रेंच बाल-साहित्य के हिंदी अनुवाद में करती रही। लेकिन हाँ, हिंदी से नाता नहीं तोड़ा।
शैली – आपने कॉमर्स की पढ़ाई की, आप साहित्यसर्जक और अनुवादक भी हैं; फिर प्रूफ़-रीडिंग जैसे श्रमसाध्य और एक तरह से नीरस कार्य के प्रति आपका रुझान कैसे हुआ? आप कब से यह कार्य कर रही हैं?
व्योमा – पहली बात तो ये है शैली जी कि प्रूफ़-रीडिंग नीरस कार्य नहीं, एक अत्यंत रुचिकर कार्य है; और रुझान यूँ कि यह एक ‘मास्टरनी की निगाह’ विरासत में मिलने का परिणाम है। प्रूफ़-रीडिंग में बारीक़ और पैनी निगाह की आवश्यकता होती है; जो मुझमें जन्मजात थी। अपने स्कूल के दिनों में, मैं हमारे स्कूल की वार्षिक-पत्रिका ‘दीपशिखा’ की संपादक थी। तभी से संपादन और प्रूफ़-रीडिंग की बारीक़ियों को मैंने जाना-समझा और उन्हें अपने लेखन में स्थान दिया। फिर तो जो भी काम मिलता गया, करती चली गई।
शैली – आपके अनुसार साहित्य में प्रूफ़-रीडिंग का क्या महत्त्व है, लेखन या टाइपिंग की त्रुटियाँ सुधारना ही पर्याप्त है या प्रूफ़-रीडिंग इससे बढ़कर कुछ और भी है?
व्योमा- लेखन या टाइपिंग की त्रुटियाँ सुधारने के अलावा प्रूफ़-रीडिंग के अन्य कई पहलू हैं। इस पर विस्तार से बात करना आवश्यक है। देखिये, लेखन का संपूर्ण कार्य लेखक द्वारा संपन्न किया जाता है; जिसमें प्रूफ़-रीडर की भूमिका नगण्य होती है। पहले के ज़माने में हस्तलिखित पांडुलिपियाँ मुझे मिलती थीं और मैं भी एक अदद पेन से ही त्रुटियाँ सुधारा करती थी। अब ज़माना कंप्यूटर का है, तदनुसार हमें तकनीकी ज्ञान होना अति आवश्यक है।
आज कई लेखक कंप्यूटर में टाइप करके हमें पांडुलिपियाँ दे देते हैं और हम उनमें प्रूफ़ लगाते हैं। लेकिन आज भी कई लेखक, विशेषकर बुज़ुर्ग लेखक या वो लेखक जो टेक्नो-फ़्रेंडली नहीं हैं, हस्तलिखित पांडुलिपियाँ या बाहर किसी टाइपिस्ट से टाइप कराई गयी पांडुलिपियाँ देते हैं। ज़ाहिर है एक टाइपिस्ट, साहित्य या भाषा का जानकार भी हो ये आवश्यक नहीं। इस दशा में वर्तनीगत अशुद्धियाँ होना स्वाभाविक हैं; और यहीं से शुरू होता है एक प्रूफ़-रीडर का काम। वर्तनीगत अशुद्धियों में विराम-चिह्न, अनुस्वार, अनुनासिक आदि शामिल हैं। फिर कारक-चिह्नों में भी विकारों की भरमार पाई जाती है। अहिंदी-भाषी लेखकों के साथ-साथ हिंदी-भाषी लेखकों में भी वाक्य-विन्यास और संज्ञा के लिंग के ज्ञान का अभाव स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है।
शैली – साहित्य की प्रूफ़-रीडिंग का आपका अंदाज़ कुछ अलग-सा है। साहित्य संबंधी प्रूफ़-रीडिंग को देखने के अपने दृष्टिकोण के बारे में कुछ बताइये?
व्योमा – ‘दृष्टि’ गिद्ध की और ‘कोण’ न्यायपूर्ण रहता है। मैंने कभी भी अपना काम करते समय किसी अन्य के दृष्टिकोण को आधार नहीं बनाया। ‘अन्य’ की श्रेणी में मैं सरकारी महकमों, हिंदी के ठेकेदारों, सोशल मिडिया के धनी साहित्यकारों, हिंदी को ‘आधुनिकता की ऊँचाइयाँ’ प्रदान करने वाली बिरादरी को रखती हूँ। मैंने सदा ही आदर्श, मानक और परंपरागत हिंदी, जो अज्ञेय जी की, हजारीप्रसाद द्विवेदी जी की, भारती जी की रही है, की पैरवी की और उसे ही अपनाया है। जहाँ नुक़्ते की दरकार हो, लगाती हूँ। जहाँ चंद्रबिंदु लगता है, लगाती हूँ। पूर्णविराम को फ़ुलस्टॉप से रिप्लेस नहीं करती। योजक-चिह्नों का यथास्थान प्रयोग करती हूँ। आजकल सेमी-कॉलन का इस्तेमाल करना लोग भूल ही चुके हैं, लेकिन मैंने सेमी-कॉलन का अस्तित्व आज भी जीवित रखा है। वक़्ते-ज़रूरत वाक्य-विन्यास, संज्ञा के लिंगों को सुधारना, पैराग्राफ़ बदलना आदि कार्य भी कर डालती हूँ। बस शैली जी, यही कुछ ऐसी बातें हैं जिससे मेरे द्वारा किया गया कार्य लेखक, पाठक और प्रकाशक देखते ही पहचान जाते हैं।
शैली – प्रूफ़-रीडिंग के दौरान क्या प्रकाशक या लेखक के साथ कभी तनावपूर्ण पलों का सामना भी करना पड़ा?
व्योमा – जी बिलकुल, दोनों पक्षों के साथ ज़बरदस्त तनातनी के कई मौक़े आए। हमारे देश के हिंदी-साहित्यकारों के भाषा-ज्ञान के बारे में सधे शब्दों में कहूँ तो अस्सी प्रतिशत साहित्यकार ‘अपनी हिंदी’ अपनी जेब में रखकर चलते हैं। इस जुमले और इस विषय को रेशा-रेशा बिखेरकर देखना मौजू होगा। यहाँ अकसर विदेशों के देखा-देखी हिंदी की श्रेष्ठता को आँकने का चलन बढ़ रहा है और बढ़ता ही चला जा रहा है।
एक रोचक घटना का ज़िक्र करती हूँ। एक बार एक वरिष्ठ लेखक की पुस्तक मेरे पास एडिटिंग और प्रूफ़िंग के लिये आई। उन साहब ने ताउम्र मेरी भलाई के लिये बहुत-कुछ किया; जिसके लिये मैं उनकी तहे-दिल से शुक्रगुज़ार ज़रूर हूँ; लेकिन सिद्धांतों में मुआमले मैं कॉम्प्रोमाइज़ कर ही नहीं सकती। नहीं किया।
तो, जो किताब मेरे पास आई, वह एक जीवनी थी। एक लेखिका होने के नाते शैली जी, आप बेहतर जानती होंगी कि जीवनी में फ़ैक्ट्स एंड फ़िगर्स का क्या महत्त्व होता है। मैंने एडिटर और प्रूफ़-रीडर की अपनी हद से आगे बढ़कर रीसर्च कर उस किताब के आँकड़े दुरुस्त किये, लेकिन साहित्यकार महोदय उखड़ चुके थे। अलावा इसके, काम करते वक़्त मैं स्तरीय वर्तनी का प्रयोग कर उन्हें व्हाट्सएप पर हर पल, जी हाँ! हर पल मैसेज भी भेज रही थी। चाहे वो रात के नौ बजे हों, बारह या फिर दो ही क्यूँ न बजे हों… महोदय मैसेज-दर-मैसेज उखड़ते चले जा रहे थे।

फ़ाइल पूरी कर उन्हें भेजी। तोबा! उन महोदय ने सिर्फ़ एक मैसेज किया- ‘मैं हिंदी का ख्यातिप्राप्त लेखक हूँ, मेरा अपना पाठक-वर्ग है। मेरे पाठकों का ‘टेस्ट’ मैं जानता हूँ और वो भी जानते हैं कि मैं क्या और कैसा लिखता हूँ। तुम्हें बीच में आने की ज़रूरत नहीं। यदि मैं ‘हजार’ लिखूँ तो भी मेरे पाठक ‘हज़ार’ ही पढ़ेंगे, यदि मैं ‘जरूरत’ लिखूँ तो भी मेरे पाठक ‘ज़रूरत’ ही पढ़ेंगे, यदि मैं ‘कीमत’ लिखूँ तो भी मेरे पाठक ‘क़ीमत’ ही पढ़ेंगे, यदि मैं ‘खत’ लिखूँ तो भी मेरे पाठक ‘ख़त’ ही पढ़ेंगे, यदि मैं ‘फर्क’ लिखूँ तो भी मेरे पाठक ‘फ़र्क़’ ही पढ़ेंगे। यदि मैं ‘कहां’ (उच्चारण- कहान्) लिखूँ तो भी मेरे पाठक ‘कहाँ’ ही पढ़ेंगे, यदि मैं ‘चांद’ (उच्चारण – चान्द) लिखूँ तो भी मेरे पाठक ‘चाँद’ ही पढ़ेंगे। तुम क्यूँ बेकार समय जाया (‘ज़ाया’ नहीं) कर रही हो!’
मैं चुप, हैरान! यही नहीं, अगले दिन प्रकाशक साहब को भी कह डाला कि व्योमा ने मेरी किताब का सत्यानाश कर डाला है, आप उसे व्योमा के लगाए प्रूफ़ के बिना ही छापिये। और शैली जी, वो गाना है न- ‘अनाड़ी का खेलना, खेल का सतियानास…’ :- किताब बिना प्रूफ़ के छाप भी दी गई।
एक क़िस्सा और… एक मैडम का एक साझा उपन्यास मेरे पास आया। पाँच अनुभवहीन महिलाओं ने लिखा था। एक वाक्य में यदि दस शब्द हैं तो दस से भी अधिक ग़लतियाँ। मेरे द्वारा सुधार-कार्य करके फ़ाइल मुख्य-महिला, जो स्वयं को उस उपन्यास का ‘संपादक’ घोषित कर चुकी थीं, को भेजने पर उन्होंने मुझसे पहला वाक्य ये कहा, “व्योमा, शायद तुम्हें मुझसे कोई प्रॉब्लम थी… तभी तुमने मेरे उपन्यास का ये हाल किया…।”
तो… ऐसे भी मरहले आते हैं, और आते ही रहते हैं। शैली जी, आज लेखक/लेखिका हिंदी का सामान्य ज्ञान तक नहीं रखते और स्वयं को ‘स्थापित साहित्यकार’ घोषित करने में ज़र्रा-भर भी ग़ुरेज़ नहीं करते। लेखक हैं, जो लिखते चले जा रहे हैं, लिखते चले जा रहे हैं और लिखते ही चले जा रहे हैं, वहीं प्रकाशक हैं जो छापते चले जा रहे हैं… छापते चले जा रहे हैं…।
शैली – वर्तमान डिजिटल माहौल में प्रूफ़-रीडिंग की प्रथा समाप्त-सी हो रही है, प्रकाशकों को प्रूफ़-रीडिंग का अर्थ और महत्त्व कैसे समझाया जा सकता है?
व्योमा – हा.हा.हा! ज़ोरदार प्रश्न किया आपने शैली जी। ‘प्रूफ़-रीडिंग का अर्थ और महत्त्व’! एक ज़माना था जब हम अख़बार पढ़कर अपनी हिंदी सुधारा करते थे। वो उम्र, जब अख़बार हाथ में उठाया तक नहीं जाता था तब अख़बार ज़मीन पर बिछाकर, उसके ऊपर बैठकर पढ़ा करते थे; और अगर अपनी होमवर्क कॉपी में हिंदी-टीचर कोई ग़लती निकाल दे तो, हम यह कहते हुए अख़बार का पन्ना उनके सामने ले जाकर रख देते थे कि देखिये मैडम जी, हमने जो लिखा है वही अख़बार में लिखा है। और आज! आज मैं ख़ुद बच्चों पर दबाव डालकर कहती हूँ कि अख़बार मत पढ़िये, आपकी हिंदी बर्बाद हो जाएगी। – लेकिन एक दर्द भी उठता है कि इन बच्चों को किस दिशा में ले जाऊँ, कौन-सा प्रकाशन हाउस रेफ़र करूँ?-
एक बार एक प्रकाशक महोदय ने मुझसे कहा, “व्योमा जी, आप अपना महत्त्व समझो… हम अपने प्रकाशन हाउस में आपको ‘प्रूफ़-रीडर’ का पद दे रहे हैं… जो लोग यह कह रहे हैं कि आपको संपादक का दर्जा देना चाहिये, कुछ भी नहीं जानते। ये संपादक-वंपादक कुछ नहीं होता… प्रूफ़-रीडर का पद कितना महत्त्वपूर्ण होता है आपको पता नहीं…।”
शैली जी, ये एक ऐसे प्रकाशक थे जिन्हें ये तक नहीं मालूम कि फ़ोण्ट किसे कहते हैं, पेपर-साइज़ क्या होता है, ‘गटर’ किस चिड़िया का नाम है। अब क्या कहूँ… अपने पर्सनल लम्हों में ऐसे ‘महानुभवों’ पर हँसती रहती हूँ और प्रार्थना करती हूँ कि भगवान भाषा हिंदी को इनसे बचाए।
शैली – मगर व्योमा जी आप तो साहित्यकार भी हैं; आपकी साहित्यक यात्रा में प्रूफ़-रीडिंग की क्या भूमिका रही?
व्योमा – यही कि कम-अज़-कम वर्तनीगत अशुद्धियों से मेरा लेखन निजात पा गया।
शैली – लिटरेरी-एजेंट भारत के लिये एक नई अवधारणा (कॉन्सेप्ट) है। आप इस क्षेत्र से भी जुड़ी हैं; हमारे पाठकों को इस विषय कुछ में बताइये?
व्योमा – ये प्रश्न बहुत आवश्यक पूछा आपने शैली जी। विदेशों में लेखकों/साहित्यकारों द्वारा लिटरेरी-एजेंट नियुक्त करना सामान्य और आम बात है; लेकिन भारत में लिटरेरी-एजेंट वाक़ई एक नई अवधारणा (कॉन्सेप्ट) है। मेरा मानना है कि भारत में भी लेखकों/साहित्यकारों को लिटरेरी-एजेंट का महत्त्व समझना चाहिये। लिटरेरी-एजेंट का कार्य मूलतः लेखक को लेखन-क्षेत्र से संबंधित दुनियावी कार्यों से निजात दिलाना है। दुनियावी कार्यों से तात्पर्य है कि कौन-सी कृति किस प्रकाशक को देना, पेइंग/नॉन पेइंग पुस्तक का निर्णय लेना, रॉयल्टी तय करना, रॉयल्टी की प्राप्ति का रिकॉर्ड रखना, कितनी प्रतियाँ प्रकाशित हुईं, कितनी बिकीं, कितनी बचीं, आइंदा कितनी छपेंगी आदि।
लेखक के समग्र साहित्य का रिकॉर्ड रखना भी एक महत्त्वपूर्ण कार्य है, जो लिटरेरी-एजेंट के कार्यक्षेत्र में आता है। समग्र साहित्य का रिकॉर्ड रखनेका माने हैं कि कौन-सी पुस्तक कब प्रकाशित हुई, किस प्रकाशक द्वारा प्रकाशित हुई आदि। अलावा इसके, यदि कोई क़ानूनी विवाद हों तो लिटरेरी-एजेंट एक वकील की भूमिका का निर्वहन भी करता है। आज डिजिटल-युग है, यदि कोई लेखक ‘टेक्नो-फ़्रेंडली’ नहीं हैं तो उन्हें टेक्निकल सपोर्ट देना भी लिटरेरी-एजेंट के कार्यक्षेत्र के दायरे में आता है।
लेखक अगर इन समस्त दुनियावी कार्यों में उलझा रहे तो निःसंदेह उसकी लेखन-क्षमता प्रभावित होती है। एक लेखक यदि इसके लिये अपना एक निजी लिटरेरी-एजेंट नियुक्त कर ले तो वह इन समस्त झंझटों से मुक्त होकर अपने समय का उपयोग सिर्फ़ और सिर्फ़ लेखन में करने के लिये स्वतंत्र हो जाता है। हाँ, आर्थिक पक्ष ज़रूर मायने रखता है, लेखक को लिटरेरी-एजेंट नियुक्त करने के लिये आर्थिक रूप से सक्षम होना भी कम आवश्यक नहीं।
शैली – आप कितने समय से लिटरेरी-एजेंट के तौर पर काम कर रही हैं? इस क्षेत्र की चुनौतियों और अपने खट्टे-मीठे अनुभव पर कुछ प्रकाश डालिये।
व्योमा – ज़्यादा वक़्त नहीं हुआ शैली जी, लेकिन मेरा सौभाग्य रहा कि मुझे भारत के सर्वश्रेष्ठ लेखक बतौर क्लाइंट मिले। उदाहरण के लिये ‘ढब्बू जी फ़ेम’ ‘आबिद सुरती जी’ मेरे पहले क्लाइंट रहे।
जब मुझे उनके घर जाने का सौभाग्य मिला और मैंने उनका लेखन-कार्य देखा तो, मेरी हैरानी की सीमा न रही। मैंने उनकी कई ऐसी पुस्तकें देखीं जो उत्कृष्ट साहित्य की श्रेणी में आती हैं; लेकिन पाठकों तक पहुँच ही नहीं पा रही हैं। कारण भिन्न-भिन्न थे। कई पुस्तकें ऐसी भी थीं जिनकी मात्र एक ही प्रति मौजूद थी और वो भी सिर्फ़ उन्हीं के पास। वहीं कई पुस्तकें ऐसी भी थीं जिनकी एक भी प्रति मौजूद न थी। मैंने उनकी पांडुलिपियाँ देखीं, जिनमें से कई पचास से अधिक वर्ष की उम्र रखती थीं तो कई गर्भ में ही जन्म लेने के लिये छटपटा रही थीं। मैंने उन्हें अपने लिटरेरी-एजेंट का कार्य शुरू करने के बारे में विस्तार से बताया तो उन्होंने एक पल की देरी किये बिना मेरी सेवाएँ लेना स्वीकार कर लिया; और उसी दिन से मेरा काम शुरू हो गया।

सबसे पहले मैंने वो किताबें, जिनकी मात्र एक ही प्रति, हार्ड कॉपी में मौजूद थीं, उन्हें सहेजा, टाइप करवाया और उनकी वर्ड-फ़ाइल बनाईं। फिर वो किताबें, जो सिर्फ़ सॉफ़्ट कॉपी यानी पीडीएफ़ में थीं, उन पर काम किया। फिर पांडुलिपियाँ सहेजीं।
पुस्तकें एकत्रित करने के पश्चात उन्हें श्रेणीबद्ध किया। जैसे, उन्होंने रेड-लाइट एरिया पर बहुत लिखा है, तक़रीबन सात उपन्यास वेश्या-जीवन पर उनके प्रकाशित हो चुके हैं; उन सातों किताबों का एक सेट तैयार हुआ। इसी तरह सामाजिक, प्रेम, डाकू-जीवन, हास्य, नाटक आदि विषयों को आधार बनाकर समग्र साहित्य को श्रेणीबद्ध किया गया। अब बारी आई समस्त अस्सी किताबों को कंप्यूटरिकृत फ़ॉर्मेट में तब्दील करने की। चूँकि ये प्रोजेक्ट छोटा नहीं, अतः काम अभी अंडर पाइपलाइन है। -टाइपिंग, प्रूफ़िंग, एडिटिंग, कवर-पेज, भूमिका वगैरह-वगैरह का कार्य- पर्याप्त समय की माँग करता है। चंद किताबों के लिये लीगल कार्रवाई करने की भी आवश्यकता होगी। दो-चार सेट पूरे होते ही प्रकाशकों से डील करने का कार्य शुरू होगा।
तो शैली जी, इस तरह एक लिटरेरी-एजेंट अपना कार्य करता है और इन समस्त कार्यों के लिये एक तयशुदा शुल्क लेखक से लेता है। आबिद जी के बाद अन्य लेखकों से भी मैंने बात की, अपनी सेवाएँ देने का प्रस्ताव रखा और ज़्यादातर लेखक सहर्ष राज़ी भी हुए। पर हाँ, आबिद सुरती जी मेरे पहले क्लाइंट हैं।
प्रश्न- व्योमा जी हम सबने धर्मयुग में ढब्बू जी के कारनामों का आनंद उठाया है। आपने तो आबिद सुरती जी के साथ महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। उनके बारे में कुछ बताइये।
व्योमा– आबिद जी एक कार्टूनिस्ट हैं, पेंटर हैं, लेखक हैं, समाजसेवी हैं (पानी पर किया गया उनका कार्य आज संपूर्ण विश्व में सराहा और अपनाया जा रहा है) लेकिन इन सबसे ऊपर, वो एक बेहतरीन इंसान हैं। लेखक के रूप में उनकी तक़रीबन अस्सी से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।
उनके व्यक्तित्व के बारे में कहने के लिये इतना कुछ होता है कि समय-सीमा या शब्द-सीमा के बंधन तोड़ना मजबूरी बन जाता है। बहरहाल, इतना ज़रूर कहूँगी कि मानवता, सदाशयता, उदारता, सहयोग की भावना और हास्य-बोध उनमें कूट-कूटकर भरा है। ‘ओनली’ नब्बे वर्ष की आयु में भी रोज़ शाम सैर पर जाते हैं, सात्विक भोजन करते हैं, पिछले चालीस से भी अधिक समय से हर सुबह नियमित ध्यान-योग करते आ रहे हैं। आज भी अकेले यात्रा करते हैं और पानी, कार्टून और साहित्य से जुड़े विषयों पर आधारित टॉक-शोज़ अटैंड करते हैं। अपने फ़ाउंडेशन ‘ड्रॉप डेड’ के बैनर तले पानी बचाने के लिये पोस्टर अभियान भी चला रहे हैं।
वो अभी ‘मात्र’ नब्बे वर्ष के हैं और अभी तीन और किताबों का लेखन कर रहे हैं; जिनमें एक उपन्यास भी है। आप जब भी उनके सामने उनकी उम्र का ज़िक्र करें तो उम्र के आगे ‘ओनली’ शब्द न जोड़ने की गुस्ताख़ी भूलकर भी न कीजियेगा (हँसते हुए) वरना एक पल के सौवें हिस्से से भी पहले आपको करेक्ट कर दिया जाएगा। “रीयली, ही इज़ ‘ओनली’ नाइंटी इयर्स न्यू (ओल्ड नहीं) यंग बॉय।”
शैली – आपकी अभिरुचियाँ बहुआयामी हैं। रेडियो, टेलीविजन और ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म्स से संबंधित अपने कार्यों के बारे में भी जानकारी दीजिये तो प्रसन्नता होगी।
व्योमा – शैली जी, मैं विशुद्ध साहित्य-प्रेमी व्यक्तियों की श्रेणी में आती हूँ। लेकिन ये कटु-सत्य है कि हिंदी-साहित्य के भरोसे जीवन-यापन करना मुश्किल होता ही है। इसी वज़ह से मैं रेडियो, टेलीविज़न और ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म्स के लिये भी लिखने लगी; लेकिन अपनी शर्तों पर। मैंने चाहे डायलॉग्स लिखे हों, स्क्रिप्ट राइटिंग की हो, स्क्रीन-प्ले लिखा हो, ट्रांसक्रिप्शन किया हो या सब-टाइटल्स लिखे हों; जो भी अलग-अलग प्लेटफ़ॉर्म्स के लिये लिखा; पूर्णतः नैतिकता और भारतीयता को सर्वोपरी रखते हुए, अर्थात भाषा और भाव की मर्यादा का सख़्ती से पालन करते हुए।


बहुत ही उम्दा साक्षात्कार।जितने अच्छे प्रश्न उस से भी बेहतरीन उत्तर।प्रूफ रीडिंग लेखन और पठन में एक प्यूरीफायर की तरह है।भाषा की अशुद्धता और फूहड़पन उसी से परिमार्जित होता है।आम भाषा में गन्ने के रस को उबालते हुए मैल को निकाल कर ही स्वादिष्ट गुड का बनना या फिर बढ़िया महकते बासमती चावल या आत्मा का तृप्त करती दाल में कंकड़ को निकलना और फिर अन्नपूर्णा की मानिद खाने का परोसा जाना और खाया जाना ,जीवन का आनंद है,,,उसी प्रकार ही प्रूफ रीडिंग और संपादन है। हिंदी भाषा में भले ही आप प्रूफ रीडिंग को दोयम दर्जे पर मान लें जो सत्यता के काफी नजदीक है,ऐसा लेखक और प्रकाशक के मतिभ्रम के कारण है।सरकारी प्रकाशन संस्थानों में प्रूफ रीडिंग की अपनी मूल्यवर्धिता है,जो रचनाधर्मिता के साथ कदमताल करती है।अंग्रेजी भाषा में प्रूफ रीडिंग को उचित सम्मान मिलता है ऐसा मेरा व्यक्तिगत अनुभव है।
डिजिटल का असर इस प्रक्रिया पर आया है,इस से इन्कार नहीं ,परंतु निजी क्षेत्र के प्रकाशन जगत को अपनी जिम्मेदारी लेनी होगी जो अभी भी एक तिलस्म है जिसमें सृजन बंदी है।
भारत जैसे देश में लिटरेरी एजेंट ,मेरे अनुभव जनित विचार से दूर की कौड़ी है।
शैली त्रिपाठी जी,व्योमा मिश्रा जी और पुरवाई पत्रिका परिवार को बधाई।
सूर्य कांत शर्मा
बेहतरीन बात की आपने सूर्यकांत जी, ‘गन्ने के रस को उबालते हुए मैल को निकाल कर ही स्वादिष्ट गुड का बनना या फिर बढ़िया महकते बासमती चावल या आत्मा का तृप्त करती दाल में कंकड़ को निकलना और फिर अन्नपूर्णा की मानिद खाने का परोसा जाना और खाया जाना ,जीवन का आनंद है,,,उसी प्रकार ही प्रूफ रीडिंग और संपादन है।’
जी हाँ, ये भी आवश्यक है कि निजी क्षेत्र के प्रकाशन जगत को अपनी जिम्मेदारी लेनी होगी.
आभारी हूँ जो आपने इतनी गंभीरतापूर्वक ये साक्षात्कार पढ़ा. सादर धन्यवाद.
बहुत दिनों बाद इतना शानदार और ‘टू द पाइन्ट’ साक्षात्कार पढ़ा है। व्योमा जी परिचय रहा है, लेकिन उनकी प्रतिभा के इतने महत्वपूर्ण पक्षों से अपरिचित ही था। इसका एक कारण उनका अत्यधिक विनम्र होना और अपने बारे में अपनी ओर से न बताना है। मेरा संबंध उनके ‘प्रूफ रीडर’ वाले रूप से रहा है। बहुत ही निष्ठा और श्रम के साथ अपना काम करती हैं। एकरूपता की पक्षधर हैं। मैं उनका प्रशंसक हूँ। उनके लिए अनंत शुभकामनाएँ।
दिविक जी, आपकी किताबों पर कार्य करना मेरे लिये मायने रखता है. जब भी हम मिले तो काम से संबंधित बातों के अलावा किसी अन्य विषय पर बात करने का मौक़ा ही नहीं मिला, अतः दीगर पक्ष उजागर हो ही नहीं पाए. ख़ैर, आपने ये साक्षात्कार पढ़ा, मुझे बहुत अच्छा लगा. सादर धन्यवाद.
शैली तिवारी जी द्वारा व्योमा जी का साक्षात्कार लिया गया है। यह साक्षात्कार व्योमा जी के साहित्य लेखन, प्रूफ रीडिंग तथा लेखन से जुड़ा हुआ है। शैली जी ने जिस अंदाज से प्रश्न किए हैं व्योमा जी ने उसी अंदाज में जवाब दिए हैं। कई जगह लगता है कि हमें भी बहुत कुछ सीखने की जरूरत है। व्योमा जी का वह अंदाज मुझे फनी लगा जब उन्होंने एक बड़े साहित्यकार की रचना का शुद्धिकरण किया और वे प्रूफ रीडर पर भड़क गए थे। यद्यपि इसमें व्योमा जी ने बहुत परिश्रम किया था। उस परिश्रम का वहां कोई मूल्य नहीं होता है। इस ऐंगल से सोचता हूं तो दुख होता है। फिलहाल दोनों साहित्यकारों को बहुत बहुत बधाई
आपने व्योमा जी के योगदान का महत्व समझा। आप जैसे सुधीजन के लिखे शब्दों से आत्मबल मिलता है। आत्मीय आभार लखन जी।
लखनलाल पाल जी, साक्षात्कार पढ़ने के लिये धन्यवाद. यहाँ शैली जी के धैर्य की प्रशंसा आवश्यक है. साथ ही उन्होंने प्रश्न ही ऐसे किये कि मुझे सोचने-विचारने की आवश्यकता ही महसूस नहीं हुई, शैली जी बधाई की पात्र हैं.
पुनःश्च धन्यवाद.
भाषा और वर्तनी के प्रति आपकी सतर्कता लाजवाब है ।आपको नए वर्ष की शुभकामनाएं।
आपकी किताब पर काम करना भी एक अद्भुत अनुभव था कैलाश जी. आभारी हूँ जो आप भाषा और वर्तनी के प्रति सतर्कता के मुआमले में सजग ठहरे.
इस साक्षात्कार को महत्त्व देने के लिये आभारी हूँ.
पढ़ लिया और आपके बारे में कुछ और जानने को मिला ♥️मेरी लिटरेरी एजेंट बनने का क्या लेंगी
‘धन्यवाद’ तो क़तई नहीं कहूँगी विमल, पर हाँ, पानीपूरी खिलाने का वादा करो तो तुम्हारी भी लिटरेरी एजेंट बनने के बारे में सोच सकती हूँ.
पठनीय प्रस्तुति।
सादर धन्यवाद नागेश जी.
बहुत अच्छी और दिलचस्प बातचीत। बड़ी ताजगी से भरी। साथ ही देर तक याद रह जाने वाली। एक लंबे समय से व्योमा मिश्र को जानता हूं। उनके काम करने के ढंग और काम के प्रति जुनून को भी। पर उनके व्यक्तित्व के उन बहुमुखी आयामों से तो अपरिचित ही था, जो इस रोचक बातचीत से खुले हैं।
शैली त्रिपाठी ने बहुत अच्छे सवाल किए और व्योमा मिश्र ने उनके उतने ही अच्छे, सटीक और अर्थपूर्ण जवाब भी दिए। हिंदी में भाषा और वर्तनीगत अराजकता पर न सिर्फ उन्होंने खुलकर कहा, बल्कि तमाम रास्ते भी सुझाए, जो हिंदी और हिंदी साहित्यकार को नए जमाने के साथ कदमताल करने में वाकई मददगार हो सकते हैं।
अलबत्ता, इस रोचक और जीवंत साक्षात्कार के लिए व्योमा जी और शैली त्रिपाठी को बधाई। साथ ही इसे सुलभ करवाने के लिए ‘पुरवाई’ और भाई तेजेंद्र जी का साधुवाद!
स्नेह, प्रकाश मनु
आप सरीखे वरिष्ठ साहित्यकार की विस्तृत टिप्पणी सौभाग्य है। सादर प्रणाम, हार्दिक आभार।
मनु अंकल, आपने… आपने ये साक्षात्कार पढ़ा! मैं धन्य हुई. आपकी किताबों पर काम करना मुझे बहुत अच्छा लगता है. कारण ये नहीं कि लेखन उम्दा होता है (वो तो सारी दुनिया जानती ही है), बड़ा कारण ये है कि आपकी किसी भी किताब पर काम करके फ़ाइनल ड्राफ़्ट आपको भेजने के बाद जो चर्चा आपसे होती है उससे मुझे बहुत-कुछ सीखने को मिलता है. मुझे आप अपना एकलव्य कह सकते हैं… मैंने आपकी कई किताबों पर काम किया और हर एक किताब मुझे एक अलग ही अंदाज़ से शिक्षित कर बैठी. ‘पुरवाई’ को धन्यवाद जो इस माध्यम से आज सार्वजनिक रूप से मुझे आपको ये बताने का मौक़ा मिला. आपको सादर चरणस्पर्श, शैली त्रिपाठी को बधाई और तेजेंद्र जी को हार्दिक धन्यवाद.
व्योमा इस पीढ़ी की विरलतम, अनमोल और महत्वपूर्ण उपलब्धि है । उनकी विद्वत्ता के आगे बढ़कर कार्य के प्रति उनका समर्पण, सैद्धांतिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता और स्पष्टवादिता प्रेरक हैं ।
धन्यवाद आनंदकृष्ण जी, आपने तो मुझे चने के झाड़ पर चढ़ा दिया…
सारगर्भित साक्षात्कार!
आदरणीया शैली त्रिपाठी जी और आदरणीया व्योमा मिश्रा जी दोनों को हार्दिक शुभकामनाएंँ और बधाइयाँ!
हार्दिक धन्यवाद आभार सरिता जी। आपने समय निकाल कर पढ़ा और अपनी प्रतिक्रिया दी।
धन्यवाद सरिता जी
बहुत बहुत दिलचस्प साक्षात्कार
जितने उम्दा सवाल उतने ही बढ़िया जवाब
लेखन वर्तनी के संदर्भ में सौ फीसदी सही जानकारी
व्योमा जी को इससे पहले सुनने का मौका नहीं मिला था लेकिन आज उनकी अवधारणाओं को समझने का अवसर प्राप्त हुआ
शैली जी आप ने नीरस साक्षात्कार विधा को सजीव बनाया है
आप दोनों को बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं!!
विजय महादेव गाडे सांगली महाराष्ट्र
आपको भी ये साक्षात्कार पढ़ने के लिये बहुत बहुत धन्यवाद प्रोफ़ेसर विजय महादेव गाडे जी
ज्ञानवर्धक भी और रोचक भी
आदरणीया शैली जी
बहुआयामी व्यक्तित्व की स्वामिनी व्योमा मिश्रा का आपके द्वारा किया गया यह साक्षात्कार एक मुकम्मल साक्षात्कार है।आपने बड़े ही सधे हुए ढंग से तार्किक प्रश्नों के माध्यम से व्योमा जी के अनूठे व्यक्तित्व/कृत्तिव (प्रूफरीडिंग) से पाठकों को जोड़ते हुए उनकी वैचारिकी से भी अवगत कराया है।
डॉ० रामशंकर भारती
रामशंकर भारती जी, सहमत हूँ कि शैली जी ने बड़े ही सधे हुए ढंग से तार्किक प्रश्न सामने रखे. वो बधाई की पात्र हैं और निःसंदेह आप धन्यवाद के.
आबिद सुरती का इंटरव्यू रिकार्ड लिया था मै ने, कुछ साल पहले दिल्ली में पुस्तक मेले में.
तब पहली बार इनसे यानी व्योमा जी से मुलाकात हुई थी.
पूरी बातचीत रोचक और ज्ञानवर्धक है.
मेरे चैनल Ashok Dilliwala Show on YouTube पर आप वो बातचीत देख सकते हैं.
धन्यवाद अशोक जी
बहुत स्पष्ट, सार्थक और प्रभावी साक्षात्कार। प्रूफ रीडिंग और संपादन वाकई बड़े मुश्किल काम हैं,खासकर आज के समय में ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो गए हैं। लिटरेरी एजेंट के बारे में कुछ नई जानकारी भी मिली। बधाई आप दोनों को। पुरवाई का धन्यवाद।
ये विधा बहुत ही क्लिष्ट और जोखिम से परिपूर्ण है शैली बक्षी खड़कोतकर जी, और बिलाशक चुनौतीपूर्ण भी. धन्यवाद कि आपने संज्ञान लिया और पूरा साक्षात्कार पढ़ा. सादर.
अति ज्ञानवर्धक साक्षात्कार या यूँ कहूँ तो समाज का आइना दिखाता वार्तालाप । सच है कि कुछ लोग खुद को बदलना नहीं चाहते चाहे उनके कारण साहित्य का स्तर गिर ही क्यों न रहा हो। शैली जी आपने बहुत आकर्षक ढंग से प्रश्न पूछे और व्योमा जी ने बड़ी तन्मयता से हर प्रश्न का जवाब दिया। कुछ नई जानकारियाँ भी मिलीं जैसेकि लिटरेरी एजेंट के बारे में मैं कुछ ख़ास नहीं जानती थी । हाँ मैनें प्रूफ़ रीडिंग का कार्य २ साल किया है दीपक गाइडस और बुक्स प्रकाशन के साथ तो इस साक्षात्कार ने मुझे आज से २० साल पहले का समय याद करवा दिया। आप दोनों को मेरी ओर से हार्दिक शुभकामनाएँ । इसी तरह आप साहित्यिक यात्रा में आगे बढ़ती रहें।
धन्यवाद मंजूषा दुग्गल जी. सही कहा आपने कि शैली जी आपने बहुत आकर्षक ढंग से प्रश्न पूछे. सादर.
व्योमा मिश्रा जी से बतौर प्रूफ़रीडर और फ्रेंच अनुवादक तो परिचय था लेकिन उनके बारे में और अधिक विस्तार से जानकर बहुत अच्छा लगा। यूँ ही अपने क्षेत्र में सीढ़ी दर सीढ़ी उन्नति करती रहें।
धन्यवाद राजीव जी। अपने इंटरव्यू पढ़ा, मुझे बहुत अच्छा लगा। आपकी दुआओं के लिए शुक्रिया।
अरे वाह, शानदार सवाल-जवाब। आपने आबिद सुरती जी के बारे में आपने बताया था कि आप उनके साथ काम कर रही हैं। लिटरेरी ऐजेंट के बारे में विस्तृत चर्चा से संपूर्ण जानकारी आज मिली। पूफ्र रीडिंग में नुक्ते को लेकर मेरी कई बार बातचीत भी हुई थी। खैर हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं लो। अपनी अलग राह बना रही हो, अच्छा लगा।
अरे वाह, शानदार सवाल-जवाब। आपने आबिद सुरती जी के बारे में बताया था कि आप उनके साथ काम कर रही हैं। लिटरेरी ऐजेंट के बारे में विस्तृत चर्चा से संपूर्ण जानकारी आज मिली। पूफ्र रीडिंग में नुक्ते को लेकर मेरी कई बार आपसे बातचीत भी हुई थी। खैर हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं लो। अपनी अलग राह बना रही हो, अच्छा लगा।
धन्यवाद शील कौशिक जी, आपकी कई किताबों पर काम किया मैंने और प्रत्येक किताब से प्रभावित हुई। आपकी बधाई और शुभकामनाओं के लिये सादर धन्यवाद.
बहुत ही शानदार साक्षात्कार जितने अच्छे प्रश्न उतने ही अच्छे उत्तर। इस साक्षात्कार के माध्यम से व्योमा जी के बहुआजमी व्यक्तित्व को जानने का अवसर मिला। बहुत कुछ नया भी जानने को मिला। जैसे लिटरेरी एजेंट। कुछ तीखी परंतु महत्वपूर्ण बातें भी बेधड़क व्योमा जी ने कही हैं। प्रूफ्रेडिंग पुस्तक प्रकाशन का एक बहुत ही महत्वपूर्ण अंग है जो पूरी तरह से उपेक्षित हो गया है। व्योमा जी ने मेरी पुस्तक की प्रूफरीडिंग की है और मैं जानती हूँ वह कमाल की प्रूफरीडर हैं। मैं उनके उज्जवल भविष्य की कामना करती हूँ। यह साक्षात्कार उनकी उम्र का नहीं उनके अनुभव का परिचायक है। इस शानदार साक्षात्कार के लिए शैली त्रिपाठी, व्योमा मिश्रा और पुरवाई परिवार को हार्दिक बधाई।
सादर धन्यवाद नीलम जी।
एक बहुत ही बढ़िया और न ही नई जिनकारी से भरपूर साक्षात्कार है यह। मैं भी सम्पादक के बतौर इन सारी मुश्किलों से दो-चार होती ही हूँ, फिर भी मुझे किसी को जवाब नहीं देना होता इसलिए कोई ख़ास परेशानी नहीं होती। बहुत ही दिलचस्प और नपा-तुला साक्षात्कार है। मुझे इस तरह के एजेंट होने का पता बस अभी चला। जब व्योमा ने मुझे बताया कि मैं यह काम कर रही हूँ तो मेरी समझ में नहीं आया। इस साक्षात्कार से (इसे मैं क्या कहूँ, शायद साहित्यिक मध्यस्थ कहना सही रहेगा) तो यह एक दिलचस्प काम है। अच्छा लगा। इस साक्षात्कार के लिए पुरवाई को और और… शैली जी को ढेर सारी बधाई।
धन्यवाद आशा शैली जी, हिंदी साहित्य जगत में आपका योगदान बहुमूल्य है.
व्योमा जी के बारे में आज इतना कुछ जानने को मिला, अच्छा लगा। आम जीवन में वे कभी अपने बारे में इतना कुछ नहीं बताती।
व्योमा जी मैं कई बार व्यक्तिगत मिला हूं, एक अच्छी लेखिका के संग संग एक बहुत अच्छी और हंसमुख इंसान हैं वो, उनके बारे और जानकार मुझे बहुत अच्छा लगा, व्योमा जी को मेरी ओर से ढेर सारी शुभकामनाएं
अच्छा साक्षात्कार बन पड़ा।
बधाई।