प्राननाथ,
चरन स्पर्श।
बरसात का मौसम समाप्त हो चुका है। चौमासे भर बादलों ने खूब अत्त धरो। मड़इया की देखभाल न करती, तो वह टिकी रहती का? गिर जाती। बखरी की आड़-मर्यादा सब चली जाती। चोर-चपाटों की दर थोड़ी है, वे कब घर में घुस जाएँ और सारा सामान लेकर रफूचक्कर हो जाएँ। लुगाड़े बढ़े हैं, इज्जत-बिज्जत का भी डर था।
मौसम साफ हो जाने से मैंने राहत की साँस ली है। सुबह-शाम मौसम सुहावना हो जाता है। सैक्टर जो कीचड़ से भरे थे, अब सूख चुके हैं। गली, रास्ते साफ-सुथरे हो गए हैं। सुन्दर शरद का शिशुपन मोह रहा है। सुबह सड़क के किनारे खिली कुमुदिनी में वह खिलखिलाती सी प्रतीत होती है।
इस बरसात में ताल तलैया लबालब भर चुके हैं। उनसे उठती लहरें मन को आकर्षित करती हैं। ऐसा निर्मल पानी कि उसमें अपना अक्स देख लो। गाँव का तालाब अपने वैभव के साथ इतरा रहा है।
यह तालाब मुझे बहुत प्रिय है। बचपन में तुमने यहीं से तैरना सीखा था। तुम्हीं ने तो बताया था कि यह सिखाता था, तो गलती पर हैडमास्टर की तरह दंड भी देता था। सीखते समय कई बार डूबे तुम, नाक-लार एक हो जाती थी पर हार न मानी। उसी का परिणाम है कि तुम्हारी गिनती कुशल तैराकों में होती है। जो स्थान आपसे जुड़ा है। वही मेरे लिए तीर्थ से कम नहीं है।
लोग बताते हैं कि यह तालाब बावन बीघा में फैला था। इस पार से उस पार तक हर कोई तैरकर पार नहीं कर सकता था। आपने कई बार इसे फतह किया है। गाँव के लिए तालाब बहुत उपयोगी था।
जब तालाब में कमल खिलते, तो दृश्य बड़ा मोहक होता था। गर्मियों में सहलग शुरू होते ही लोग पुरैन तोड़कर ले जाते थे। लोगों ने कभी बाजार से पत्तल नहीं खरीदे। बड़ा होता है इसका पत्ता। हरे और गोल पत्ते पर जल के छींटे पड़ते ही गोल बूँदों में परिवर्तित हो जाते हैं। इस पत्ते की विशेषता है कि इसमें पानी नहीं ठहरता है। हरे पत्तल में जेवनार की बात ही अलग है।
प्राननाथ, अब तो तालाब की स्थिति वैसी नहीं रही है, जैसी पहले थी। अतिक्रमण से वह निरन्तर सिकुड़ता जा रहा है। अब तो बहुत कम क्षेत्रफल बचा है। लोग चारों ओर से उसे कब्जाते जा रहे हैं। कोई कुछ कहता भी नहीं है। दो-तीन साल पानी नहीं बरसा, जिससे वह सूखा पड़ा रहा। लोगों ने उसी की मिट्टी खोदकर अपने आँगन में भर ली।
मिट्टी खोदे जाने से अब पुरैन भी पैदा नहीं होती है और न कमल खिलते हैं। जिस साल मैं ब्याहकर आई थी, उस साल कमलों से सुशोभित तालाब इतरा रहा था। ऐसा लगता था कि देखते ही रहें। उसमें नहाने में बड़ा आनन्द आता था। कुछ साल ही ठीक रहा, अब इसके बुरे दिन शुरू हो गये। आजकल जमीन-जायदाद की हाय-हाय पड़ी है। ये हाय-हाय सुन्दरता की कदर नहीं जानती है।
अभी इसका पानी खूब साफ है। कुछ समय बाद पानी गंदा हो जाएगा। देखना लोग अपनी भैंसें इसी में लुराएँगे, जिससे बदबू उठने लगेगी। बदबू के मारे यहां से निकलने की हिम्मत न पड़ेगी। कूड़ा-कचरा भी इसी में फैकेंगे।
कल से नौदुर्गा शुरू हो रही है। गाँव में तीन जगह पंडाल सज गया है। लोगों ने गाँव भर से चन्दा इकट्ठा कर लिया है। मैंने भी दे दिया। इसी चन्दे से देवी माँ की भव्य मूर्तियाँ सजाई जाएँगी। इन दिनों गाँव में खूब रौनक रहेगी। प्राननाथ, पहले अपने यहाँ मूर्तियों का चलन नहीं था पर अब हर गाँव में मूर्तियाँ सज रही हैं। देश की सम्पूर्ण संस्कृतियाँ एक हो रही हैं। हर प्रदेश की संस्कृति को लोग आत्मसात कर रहे हैं। भूमण्डलीकरण के युग में यह संभव भी है।
नौ दिनों तक उनकी पूजा होती रहेगी, इसके बाद मूर्तियों को तालाब में विसर्जित कर दिया जाएगा। मूर्तियों की सजावट कैमिकल रंगों से होती है। वही कैमिकल तालाब के पानी में घुलकर उसे विषाक्त कर देता है। हर साल इस कैमिकल के प्रभाव से तालाब की मछलियाँ मर जाती हैं। गंध के मारे निकलना मुश्किल हो जाता है। मुझे तो इस आदमजात पर तरस आता है कि इन्हें सद्बुद्धि कब आएगी। वैसे छाती ठोंककर बुद्धिजीवी होने का दावा करते है।
इस वर्ष खरीफ की फसल खूब लहलहा रही है। ज्वार, बाजरा, अरहर आदि फसलें मस्ती में झूम रही हैं। नौने-नीके फसल आ गई, तो किसान को कुछ राहत मिल जाएगी लेकिन वनरोज (नील गाय) से बच जाए तब न। कुछ लोग पालतू गायों को भी छुट्टा कर देते हैं। सब दारोमदार खेती पर ही तो है। किसान करे तो करे क्या? दूसरे तो फन्दा लिए बैठे ही हैं। वह कभी-कभी अपने ही फन्दे में फँस जाता है।
टैम मिले, तो दशहरा को हो जाना। एक-दो दिन रुक लेना, फिर खूब चले जइयो। मैं रोकूँगी थोड़ी। तुम्हारे आ जाने से मुझे भी दरस-परस का सुख मिल जाएगा।
आ रहे हो न ?
आपकी ही
रमकल्लो
*बातूनी रमकल्लो*
एक साँस में न जाने कितनी बातें कह जाती है रमकल्लो!
बरसात के बाद जब वह शरद के मौसम के शिशुपन से मिलती है तो भीतर तक काँस के फूल की तरह खिल जाती है। इसके साथ ही उसे गाँव व टोला के लुच्चों-टुच्चों चोर-उचक्कों का डर भी
सता रहा है। बटन वह बातों बातों में पर्यावरण संरक्षण का भी संदेश देती है। सामाजिक विद्रूपताओं को भी उकेरते चलती है. सांस्कृतिक उत्सव शारदीय नवरात्र में आस्थावान स्त्री बनकर चंदा देती है और हाथ जोड़कर मैया से विनती में अपनी विवशताओं को दूर करने की अरज लगाती है-
कैसे के दरसन पाऊंरी
मैया तोरी ऊंची दहरियाँ…
रमकल्लो अपनी इस पाती में प्रकृति के बहुत निकट पहुंच गई है। वह अपनी साँसों के आसपास प्रकृति की हरीतिमा महसूस करती है। चाहे खुला मैदान हो, तालाब का किनारा हो, गली-गैल म़ें प्रकृति का आलंवन करते हरे पत्ते, धुली-धुली दूर्वा, कुमुदिनी के फूलों का लावण्य, शरद के आकाश पर हल्केहल्के बादलों के मृगछौनों की कुलाँचें, नए पत्तों की सुकोमलता आदि के अनूठे सौंदर्य को आत्मसात् करते हुए रमकल्लो अपने भीतर की तपन को रसगंधी बनाने के प्रयास कर रही है।
प्रख्यात कथाकार इलाचंद्र जोशी ने कहानी को लेकर एक बार कहा था- “मनुष्य के हृदय पट में अनेकानेक सुख-दु:खों का चक्र प्रतिक्षण धूपछाँह का-सा खेल खेलता रहता है। इस धूप छाँह का चित्र यथार्थ रूप से अंकित करके उसे अपने हृदय के सुंदर रंगों से रंजित करना ही सच्चे कलाविद् का उद्देश्य रहता है. … “.
मैं रमकल्लो की पाती को लेकर सोचता हूँ, तो मुझे इलाचंद्र जोशी को ही दोहराने का मन करता है। उनका कहना है, “कहानी का उद्देश्य न तो मनोरंजन ही है और न शिक्षा ही। इसका उद्देश्य है स्वाभाविक रीति से सौंदर्य और आनंद को प्रतिफलित करना। हृदय के भाव नाना अवस्थाओं में बदलते रहते हैं। जीवन का चक्र नाना परिस्थितियों के संघर्षण से उल्टा सीधा चलता रहता है। इसुवृहत् चक्र की किसी विशेष परिस्थिति की क्षणिक गति को प्रदर्शित करने, हृदय के भावों को किसी विशेष अवस्था के रंगों को रंजित करने में ही कहानी की विशेषता है….”
रमकल्लो पाती कहानी की उपर्युक्त अभिधारणा को बखूबी उद्घाटित कर रही है।
वरिष्ठ कथाकार डॉक्टर लखनलाल पाल ने रमकल्लो की पाती के बहाने आँचलिक सामा जीवन की विसंगतियों के दस्तावेज के रूप में पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया है। इस कहानी की यही खास विशेषता है कि अब आगे और क्या और क्या …की लोकेष्णाएँ बढ़ाती है।
कुल मिलाकर रमकल्लो की पाती अपनी कहन, रहन और गहन में संपूर्ण रूप से सफल हुई है…
डॉ० रामशंकर भारती
20 अप्रैल 2025
भारती जी आपने समीक्षा का शीर्षक *बातूनी रमकल्लो* दिया है, यह बहुत महत्व का है। महत्व शब्द को मैं इसलिए ले रहा हूं कि रमकल्लो महज इक्कीस साल की है और बातें बड़ी-बड़ी और सार्थक करती है। आपको उसकी चंचलता भाती है। किसी पात्र को ऐसा स्नेह मिलना लेखक के लिए गर्व की बात है। आपकी समीक्षा मुझे गर्व का अनुभव करा देती है।
रमकल्लो इतनी प्रसिद्धि दिला जाएगी मैंने ऐसा सोचा नहीं था। आप जैसे विद्वान समीक्षकों की प्रतिक्रियाएं मुझे लगातार ऐसा अनुभव करवा रही हैं। आपकी टिप्पणी दिन बना देती है। आपका बहुत-बहुत धन्यवाद भारती जी
आदरणीय तेजेन्द्र शर्मा जी का मैं बहुत आभारी हूं कि उन्होंने मेरी रचना को अंतरराष्ट्रीय पत्रिका *पुरवाई* में धारावाहिक रूप में प्रकाशित कर रहे हैं। सर आपका बहुत-बहुत धन्यवाद
लखनलाल जी,
रमकल्लो की पाँचवीं पाती अभी पढ़ी। यह भी उसके जीवन की समस्याओं से बरसात के पानी से भरे तालाब की तरह लबालब भरी है। किंतु पता चलता है कि आज इस तालाब की दशा ठीक नहीं है। अब इसकी छवि बदल गयी है। और आज इस तालाब से जुड़ी प्राननाथ के संग बिताये दिनों की पुरानी यादें भी ताजा हो आई हैं। वह मीठी यादें जब प्राननाथ ने रमकल्लो को इसी तालाब में तैरना सिखाया था। पढ़कर लग रहा है कि शायद यह दोनों childhood sweetheart थे।
इस पाती में भी हर बार की तरह गाँव से संबंधित सभी बातों के हाल पढ़ने को मिले। खेतों की फसलें और नौ दुर्गा की तैयारी के बारे में भी।
आज रमकल्लो के वर्तमान के साथ उसके अतीत की भी कुछ परछाईं तालाब के पानी में तैरती दिखाई दी।
प्राननाथ में रमकल्लो के प्राण अटके हुये हैं। वह अपने मन की सारी बातें अपने पति को न बताये तो फिर किससे कहे। लेकिन फिर भी उसकी तरफ से
वह एक पाती के लिये तरस रही है। पर प्राननाथ की तरफ से कोई प्रतिक्रिया होती नहीं दिखती। बेचारी रमकल्लो!
उसके जीवन की नई पुरानी बातों और उलझनों से भरी पाती पढ़वाने के लिये आपका धन्यवाद।
-शन्नो अग्रवाल
शन्नो जी, आप भी न, रमकल्लो के अतीत और भविष्य के लिए चिंतित हैं। चिंतित होना लाजिमी है। क्या करे रमकल्लो, उसकी समझ में तो जो आ रहा है वह लिख रही है। यह आपकी सहृदयता है कि आप उससे जुड़ती चली जा रही है। यही कारण है कि आप उसके पक्ष में खड़ी हो जाती हैं। यही तो मानवता है और यही मानव के जीवन मूल्य भी है।
आप इतनी बढ़िया प्रतिक्रिया देती हैं कि मन प्रसन्न हो जाता है। आपका बहुत-बहुत आभार
लखनलाल पाल
प्रिय लखनलाल पाल जी , रमकल्लो की पाती पढ़ी दूसरपेरग्राफ पढ़ते ही लगा कि प्रिय रमकल्लो ने खाली समय में B.A. में एडमिशन ले लिया है ,प्राइवेट ही सही ,
सुघड़ता पूर्वक लिखी गई पाती में पहले और अंतिम दो पैराग्राफ को छोड़ दें तो हर पैराग्राफ में उसका हिंदी का ज्ञान ,सामाजिक सरोकारों से जुड़ी बातें, पर्यावरण,संस्कृति ,प्राकृतिक सुंदरता की विवेचना सबमें उसका दिनों दिन बढ़ता ज्ञान ध्यान हम सबको आकर्षित कर रहा हे,
उसकी पाती से हमे ग्रामीण जीवन की दशा दिशा ओर वहां का वातावरण ,रहनसहन , बदलते परिवेश की जानकारी मिल रही हे
जो शहरों में रहते हैं वे ग्रामीण जीवन की चर्या से परिचित हो सकेंगे
एक उत्तम प्रयास आपका , रम कल्लो की पाती के माध्यम से भारत में बसे ग्रामीण जीवन से परिचय करवाना
निरंतर पाती का इंतजार करते पुरवाई के पाठक
आदरणीय तेजेंद्र सर का शुक्रिया।
कुंती जी, आपकी टिप्पणी पढ़कर अच्छा लगा कि आप रमकल्लो के बारे में बहुत कुछ जान गई हैं और बहुत कुछ जानने की आपमें जिज्ञासा है। पात्र के साथ आपका ऐसा जुड़ाव देखकर खुश हूं कि मेरा लिखना सफल हो गया।
कुंती जी आपका बहुत-बहुत आभार
Ramkallo की सभी पाती पढ़ी, आपने गांव घर की यादें ताजा कर दीं,बस एक बात कहूंगा, आ अब लौट चलें,