Tuesday, June 16, 2026
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डॉ चैताली सलूजा का शोध आलेख – प्रवास में प्रवासी मन : सुषम बेदी के कथा साहित्य के विशेष संदर्भ में

  • शोध सार – प्रवासी साहित्य प्रवासी मन की पीड़ा एवं अंतर्विरोधों को समझने का प्रयास है। विश्व के कोने-कोने में बसने वाले प्रवासी भारतीय दिलों की कुछ कहने की छटपटाहट, उनकी अव्यक्त समस्याओं की जीवन-गाथा प्रवासी साहित्य में अभिव्यक्ति पाती है। यह गाथा हैं अपनों की अपनों से बिछड़ने की, बिखरते सपनों की, मरीचिका के पीछे भागते लोगों की एवं प्रत्येक उस व्यक्ति की जो अपने सपनों को साकार करने के लिए देश छोड़कर विदेश चला जाता है। प्रवासी साहित्यकारों में सुषम बेदी का नाम अग्रणी रहा है जिनके साहित्य के माध्यम से हम प्रवासी मन की मनोदशाओं से परिचित होकर, उनकी विविध संवेदनाओं को समझकर, उनसे जुड़ाव महसूस करने लगते हैं।
बीज शब्द – प्रवास, प्रवासी मन, द्वंद्व, पीड़ा, संस्कृति, सरोकार, अस्तित्व, अस्मिता, असमंजस, संपन्नता, अकेलापन, भारतीय, परदेस, मनोदशा, पारंपरिक मूल्य।
मूल आलेख – काल-प्रवाह के साथ ही साहित्य में नए-नए विमर्शाें का उदय हो रहा हैं जिनमें से एक है प्रवासी विमर्श। प्रवासी साहित्यकार अपने साहित्य में प्रवासी मनःस्थितियों का विश्लेषण कर प्रवासी मन के विविध भावों एवं संवेदनाओं को चित्रित करता है। जो व्यक्ति अपने जन्म स्थान से दूर किसी और देश में निवास करता है उसे प्रवासी कहा जाता है। अपने जन्म स्थान से दूर जाने की यह पीड़ा सभी के मन को भाव विह्वल कर देती है। यही पीड़ा कभी आँसुओं में बह निकलती है तो कभी शब्दों में अभिव्यक्त होती है। भावबोध की इसी घनीभूत पीड़ा को जब साहित्य में अभिव्यक्त किया गया तो इसे प्रवासी साहित्य के नाम से अभीहित किया गया। प्रवास के नए परिवेश में प्रवासी मन भिन्न-भिन्न मनोभावों से गुजरता है। कभी सुख तो कभी दुःख, कभी सफलता की खुशी तो कभी असफल होने का दर्द, कभी संघर्ष तो कभी सूकून, कभी उल्लास तो कभी हताशा से होते हुए आशा-निराशा, भय-संशय, कल्पना-परिकल्पना, संकल्प तक मन का अनवरत सफर चलता रहता है। प्रवासी मन का यह सफर प्रवासी साहित्यकारों के साहित्य का मुख्य स्वर बनकर उभरा हैं। 
प्रवासी हिन्दी साहित्य के प्रमुख कथाकारों में सुषम बेदी एक जाना-माना नाम है जिनके साहित्य में प्रवासी मन की विविध संवेदनाएँ रेखांकित हुई हैं। सुषम जी ने प्रवास के नए क्षितिज में प्रवासी मनोदशाओं को एक नए दृष्टिकोण से देखने का प्रयास किया है।
सुषम जी के उपन्यास ‘लौटना’ में नायिका मीरा विवाह के पूर्व भारत में एक नृत्यांगना थी जो अपने नृत्य कला में पारंगत थी। नृत्य ही उसके जीवन का एकमात्र लक्ष्य था। विजय से विवाह के समय भी मीरा के मन में कई प्रश्न उठे थे कि वह नृत्य से दूर होकर या नृत्य को दर-किनार कर अपने वैवाहिक जीवन में सुखी हो पाएगी की नहीं? विवाह के पश्चात् मीरा विजय के साथ अमेरिका आ जाती है जहाँ धन, दौलत, भौतिक सुख-सुविधाएँ, पति का प्यार सभी कुछ है परंतु अपने नृत्य के लिए समुचित अवसर प्राप्त न होने के कारण मीरा दुःखी है। सब कुछ होकर भी उसके जीवन में एक खालीपन है। एक नृत्य कार्यक्रम में मीरा का परिचय कृष्णन से होता है। धीरे-धीरे कृष्णन और मीरा एक दूसरे के करीब आते जाते हैं। विजय के साथ मीरा का वैवाहिक संबंध बहुत मजबूत होने के बाद भी मीरा कृष्णन के प्रति आकर्षित हो जाती है परंतु भारतीय मूल्यों के कारण उसके मन में सदैव एक द्वंद्व चलता रहता है। मीरा के पारंपरिक मूल्य उसे विवाहेत्तर संबंध स्थापित करने से रोकती हैं तो पाश्चात्य सभ्यता के फलस्वरूप वह अपनी अस्मिता की रक्षा करने में असफल हो जाती है। उसका भारतीय मन बारंबार उसे यही अहसास कराता है कि विवाहेत्तर संबंध स्थापित करना गलत  हैं – कभी वह अपने पति विजय तक लौटना चाहती है तो कभी कृष्णन तक तो कभी केवल अपने नृत्य तक या फिर से अपने देश में लौटना चाहती है। इस प्रकार प्रवासी मन में एक द्वंद्व चलता ही रहता है।
सुषम जी के इसी उपन्यास में हम देखते हैं कि नायिका मीरा अमेरिका के एक दफ्तर में नौकरी करती है जहाँ उसकी मित्रता एड से होती है जो अमेरिकी है। कोई भी निर्णय लेने से पहले मीरा एड से पुछती है क्योंकि विदेशी धरती पर हैं उसमें आत्मविश्वास का अभाव होने लगता है और वह सोचती है – ‘‘जिस ज़मीन पर पैर नहीं जमें, वहाँ आत्मविश्वास क्या ख़ाक रहेगा! एड जानता है और वह खुद भी कि दफ़्तर के हर मामले में वह एड पर ही निर्भर थी। ………… हर नया कदम उठाने से पहले मन में अविश्वास जगता ही था …….. एक अनाम डर ………. गलत होने का डर …….. असफलता का डर! अपना कोई भी निर्णय उसे भरोसे वाला नहीं लगता था। क्या औरों के साथ भी ऐसा होता है? …….. क्या इसीलिए इस देश में हिन्दुस्तानी किसी भी महकमे में सुयोग्य होते हुए भी सर्वाेच्च पद पर नहीं पहुँचते? आत्मविश्वास से भरे हुए यहाँ पहुँचते हैं और आत्म संदेह के गर्त में गिर जाते हैं!’’1 इस प्रकार प्रवासी मन प्रवास में आकर आत्मविश्वास के अभाव में आत्म संदेह से घिरने लगते हैं। 
प्रवास में प्रवासी मन अपनी उपलब्धियों को देखकर आनंदित होता है परंतु वैभव व संपन्नता के नशे में सराबोर होकर जब अंतर्मन की तरफ झाँकता है तो वह सिहर उठता है। निर्जीव वस्तुएँ जीवन में सुख तो देती हैं परंतु दुःख नहीं बाँट सकती। मन का दुःख बाहर आने के लिए छटपटाता है परंतु बाहर निर्जीव भौतिक संसाधनों की दुनिया में दुःख बाँटने वाला कोई नहीं होता है और मन अकेलेपन के अंधेरे में खोने लगता है जैसा कि सुषम जी के उपन्यास ‘पानी केरा बुदबुदा’ में हमें दिखाई देता हैं। इस उपन्यास की नायिका पिया अमेरिका में डॉक्टर है। अपने जीवन में उसने अपना मनचाहा मुकाम हासिल किया परंतु परिवार के नाम पर पिया के पास कुछ नहीं है। पति के अत्याचार से परेशान होकर पिया तलाक लेकर अलग रहती है। पारिवारिक अशांति के कारण उसका बेटा भी उससे अलग रहता है। ऐसे में पिया कई बार अकेलेपन का अनुभव करती है – ‘‘जब भीतर झाँकती है तो तड़फड़ा उठती है पिया। एकदम शून्य है वहाँ। निपट अकेलापन। रेगिस्तान की दूर तक फैली हुई रेत ही रेत। रेतीली आंधी उसकी अपनी ही आँखों में किरकिच झाँकती हुई। पिया बाहर भागने लगती है। वही यात्राओं के दौर! मरीजों के मसले! अपनी ही आँख की किरकिराहट से कहा भागेगी।’’2 इस प्रकार प्रवास में कई प्रवासी सारी सफलताएँ अर्जित करने के बाद भी मानसिक रूप से अकेलेपन की अनुभूति करते हैं एवं आंतरिक रूप से खोखले होते जाते हैं।
पश्चिम की उपभोक्तावादी संस्कृति ने व्यक्ति को सुख सुविधाओं का गुलाम बना दिया हैं। भारतीय जब प्रवास में आते हैं तो वे भी भोग-विलास की आदि होने लगते हैं परंतु कई बार यह संपन्नता भी उन्हें खलती है। सब कुछ होते हुए भी उन्हें कुछ न कुछ अधूरा लगता हैं। उन्हें लगता हैं कि कुछ तो है जो यहाँ नहीं है। ‘आसमान पर पाँव’ कहानी की नायिका हेमा फॉरेनर जेसन से विवाह कर अमेरिका आती है। उसके घर में किसी चीज़ की कमी नहीं है परंतु वह सोचती है – ‘‘देर-सबेर हर किसी की ज़िदगी सँवर तो जाती ही है, पर फिर भी कुछ तो है, जो यहाँ नहीं। यहाँ संपन्नता है, बहुत संपन्नता। फिर ऐसा क्यों लगता है कि जीवन वहाँ ज्यादा संपन्न था। वह कौन सी संपन्नता है, जो उससे छूटे जा रही है?’’3 आर्थिक संपन्नता प्राप्त करने के बाद भी प्रवासी मन आत्मिक संपन्नता के लिए तड़पता रहता है।
भारतीय समाज जहाँ पारस्परिक जुड़ाव पर बल देता है वहीं पश्चिमी समाज स्व केंद्रित है। भारत में कोई भी व्यक्ति परिवार के बिना अपने जीवन की कल्पना नहीं कर सकता जबकि परदेस में व्यक्ति परिवार के साथ रहकर भी स्वयं को अकेला पाता है क्योंकि यहाँ जिंदगी की आपाधापी इतनी अधिक है कि पारस्परिक संवाद न के बराबर होता है और व्यक्ति अकेलेपन के अंधेरे में खोने लगता है। ‘गाथा अमरबेल की’ उपन्यास में नायिका शन्नों अपने पति के देहांत के बाद अमेरिका में बेटे के पास रहने आती है। परंतु यहाँ शन्नों का मन नहीं लगता है – ‘‘हाय मुझे तो यहाँ हौल पड़ता है। कैसा अकेला-अकेला है। मेरा तो यहाँ बिल्कुल मन नहीं लगता। पता नहीं, कैसे रहते हो तुम लोग। न कोई बंदा, न बंदे की आवाज़। कोई नौकर-चाकर भी आवाज़ नहीं देता। कैसे जी सकता आदमी यहाँ।’’4 किसी भी भारतीय के लिए उम्र के अंतिम पड़ाव में परदेस में आकर नए परिवेश में स्वयं को समायोजित कर पाना बहुत कठिन होता है।
सुषम जी के उपन्यास ‘हवन’ में नायिका गुड्डों अपनी बहन पिंकी के कहने पर अमेरिका आती है परंतु यहाँ आकर आर्य-समाज के रीति-रिवाजों में पली-बढ़ी गुड्डों को प्रत्येक स्तर पर द्वंद्व का सामना करना पड़ता है। पश्चिमी संस्कृति की चकाचौंध में अपनी भारतीय संस्कृति को बचाए रखना गुड्डों के समक्ष एक बड़ी चुनौती है जिसमें वह कभी सफल तो कभी असफल दिखाई देती है।
विभक्त’ कहानी में अनन्या के माता-पिता भारतीय मूल के हैं परंतु पश्चिमी देशों में रहते-रहते वे पश्चिमी संस्कृति में पूरी तरह ढल चुके हैं। भारत के प्रति अज्ञात प्रेम की भावना अनन्या को भारत खींच लाती हैं। उसे भारत की धरती बहुत अच्छी लगती है क्योंकि यहाँ उससे कोई नहीं पूछता कि वह कौन से देश की है जबकि अमेरिका में जब भी उससे कोई पहली बार मिलता है तो यही पूछता है कि वह कौन से देश से आई है? अर्थात् उसका रंग उसे कभी पूर्णरूप से अमेरिकी बनने नहीं देता है। अनन्या भारतीय संस्कृति को जानना, समझना चाहती है। उसकी यह तड़प उन हजारों भारतीय मूल के अमेरिकीयों की तड़प हैं जो न तो पूर्ण रूप से पश्चिमी संस्कृति से जुड़ पाते हैं और न ही भारतीय संस्कृति को पूरी तरह बनाए रख पाते हैं। इस प्रकार प्रवासी मन सदैव एक असमंजस की स्थिति से गुजरता है कि किस संस्कृति को कितना छोड़े और किस संस्कृति को कितना अपनाए।
दो देशों की संस्कृतियों के टकराहट से प्रवासी मन छटपटा उठता है। अपनी संस्कृति से विमुख होकर जाने-अनजाने वह पश्चिमी संस्कृति को अपनाने लगता है। अपनी उन्नति की होड़ में न केवल संस्कृति बल्कि उसके अपने संबंध एवं सामाजिक सरोकार भी छूटते जाते हैं जिसके कारण वह अंत में स्वयं को भीड़ में भी अकेला पाता है। ‘हवन’ उपन्यास में गीता की बेटी राधिका अमेरिकी चकाचौंध से प्रभावित होकर स्वयं को भी अमेरिकी जैसा ही बनाना चाहती है एवं इस चाह में वह अपनी भाषा, संस्कृति, पारिवारिक संबंधों से दूर होती जाती है। कुछ ही दिनों में राधिका को यह अनुभव हो जाता है कि यह दुनिया उसकी अपनी दुनिया नहीं है और वह एक बार फिर से अपनोें के बीच लौटना चाहती है – ‘‘विद्रोह और स्वतंत्रता के नाम पर वह बड़े अजीबो गरीब दलदल में फंसा हुआ महसूस करने लगी है। फिर से लौट जाना चाहती है उन सबके पास जो अपने हैं जिनका प्यार न तो हिसाब-किताब मांगता है, न ज़िस्मों का सौदा, तरसने लगी थी वह माँ के अपनेपन भाई-बहन की चुहल को, बीमार पिता के पैताने बैठ माँ का दुःख दर्द बाँटने को।’’5 इस प्रकार प्रवासी मन मूल्यों की संक्रमणशीलता का दंश झेलने के लिए बाध्य हो जाता हैं।
चिड़िया और चील’ कहानी में पीढ़ीगत अंतर के कारण जहाँ प्रवासी मन वैचारिक मतभेदों का सामना करता है वहीं ‘सड़क की लय’ कहानी में प्रवासी मन परंपरा और परिवर्तन के मध्य डोलता दिखायी देता है। ‘अवशेष’ कहानी में जहाँ प्रवासी मन अपनी अदम्य जिजीविषा के साथ ही अकेलेपन के गर्त में खोकर भी जीने के लिए बाध्य है वहीं ‘बेपंख चिड़िया की एक उड़ान’ कहानी में प्रवासी मन चाहकर भी कुछ न कर पाने की हताशा के साथ समझौता करता दिखायी देता है। प्रवास में प्रवासी मन भाषा की समस्या से भी जूझता है। अपनी मातृभाषा, राष्ट्रभाषा से परे एक प्रवासी को उसके अपनाए देश की भाषा बोलनी पड़ती है परंतु भारत से बाहर अपनी पहचान बनाए रखने के लिए प्रत्येक प्रवासी अपनी भाषा व संस्कृति से जुड़ा रहना चाहता है। सुषम जी अपनी एक लेख में कहती हैं – ‘‘पहचान का सवाल हर देश के प्रवासी साहित्य में अहम है। खासकर यूरोप-अमरीका में जहाँ ब्राउन रंग का होने की वजह से आप दोयम दरजे के तो हो ही जाते हैं, बाहर आकर सबसे पहले आप खोते हैं तो अपनी पहचान।’’6
निष्कर्षतः हम यह कह सकते हैं कि प्रवास में प्रवासी मन जिन संवेदनाओं से होकर गुजरता है, उनका सूक्ष्म विश्लेषण कर सुषम जी ने प्रवासी मन को परत-दर-परत खोलने का प्रयास किया है एवं उनके कथा साहित्य के माध्यम से हम ग्लोबल भारतीयों से दूर रहकर भी उनके मन की विभिन्न संवेदनाओें को समझकर उनसे जुड़ाव महसूस करने लगते हैं।
संदर्भ
  1. सुषम बेदी, लौटना, इण्डियन बुक बैंक, 2017, पृ. 32
  2. सुषम बेदी, पानी केरा बुदबुदा, किताब घर प्रकाशन, 2017, पृ. 146
  3. सुषम बेदी, सड़क की लय, ज्ञान विज्ञान एजूकेयर, 2016, पृ. 167
  4. सुषम बेदी, गाथा अमरबेल की, हिन्दी बुक सेंटर, 2017, पृ. 250
  5. सुषम बेदी, हवन, इण्डियन बुक बैंक, 2017, पृ. 120
  6. आत्माराम शर्मा, (संपा.), प्रवासी हिन्दी, आइसेक्ट पब्लिकेशंस, 2019, पृ. 89-90
नाम – चैताली सलूजा,
पद – सहायक प्राध्यापक (हिन्दी),
संस्था – शासकीय जे.पी. वर्मा स्नातकोत्तर कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय
शहर – बिलासपुर (छ.ग.)
ई-मेल – [email protected]
मोबाईल नंबर – 9039771619


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1 टिप्पणी

  1. डॉ चैताली सलूजा जी!
    आपका शोध आलेख – प्रवास में प्रवासी मन
    बीज शब्द – प्रवास, प्रवासी मन, द्वंद्व, पीड़ा, संस्कृति, सरोकार, अस्तित्व, अस्मिता, असमंजस, संपन्नता, अकेलापन, भारतीय, परदेस, मनोदशा, पारंपरिक मूल्य
    केलेख
    सुषम बेदी के कथा साहित्य के विशेष संदर्भ में पढ़ा।
    बी विषय जो दिए गए थे उसे देखते हुए संवेदनाएं महसूस हुईं।
    तेजेन्द्र जी की कहानियों को पढ़ते हुए प्रवासी विषय पर जो अनुभव हुए थे वह और गहरे हुए।
    सब कुछ होते हुए भी सुकून और शांति नहीं है।
    प्रवासी समस्याओं को उजागर करते हुए बढ़िया लेख है आपका।
    बहुत-बहुत बधाई आपको।

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