Saturday, May 23, 2026
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सृजन के अंतःस्वर : वरिष्ठ साहित्यकार गोविंद मिश्र के साथ हरि ओम की बातचीत

  • प्रश्न:- “मिश्र जी, आपके ‘फूल… इमारतें और बन्दर’ उपन्यास के शीर्षक में ‘इमारतें’ सत्ता और वैभव का प्रतीक लगती हैं, लेकिन इस राजनीतिक परिदृश्य में आपने ‘बंदरों’ को किस रूप में रखा है? क्या ये बंदर व्यवस्था में फैली अराजकता के प्रतीक हैं या राजनीति की अवसरवादिता के?”
देखिए… फूल वो हैं, जो आदमी को उसकी प्रसंशा के वक्त माला के रूप में पहनाए जाते हैं, चापलूसी, रिकगनीशन भी उसी में आ जाता है… इज्जत भी। इमारतें जो हैं, वे हैं दिल्ली का नॉर्थ-ब्लॉक, साउथ-ब्लॉक या भोपाल के विंध्यांचल भवन, सतपुड़ा भवन- जहां सचिवालय होता है… प्रशासन की केन्द्रीय कोठरी। बंदर, नॉर्थ ब्लॉक जहाँ हम काम करते थे वहाँ बहुत बंदर थे, उसका लंबा-चौड़ा विवरण ‘फूल…इमारतें और बंदर’ में है। वो प्रतीक बन गए अफसरों के, ब्यूरोक्रैसी के। बंदर… अफसर लोग, जो इधर से उधर उचकते फिरते हैं। उपन्यास में कहा गया है कि ये बंदर पुराने अफसरों की आत्माएं हैं जो फाइलों के इर्द-गिर्द भटक रही हैं। उछल कूद करने वाले अफसरान आए… गए। इमारतें अर्थात सत्ता हमेशा रहती हैं। अफसरों/नेताओं को फूल, मालाएं पहनाई जाती हैं। फूल सूख जाते है- इज्जत, प्रसंशा वगैरह ये सब क्षणिक प्राप्तियाँ हैं।     
प्रश्न:- “आपने स्वयं प्रशासन को बहुत निकट से देखा है। ‘फूल…इमारतें और बंदर’ में जो राजनीति और नौकरशाही का अपवित्र गठबंधन दिखता है, क्या आपको लगता है कि पिछले दशकों में वह और भी अधिक गहरा और जटिल हो गया है?”
वो तो है ही… जो और होगा आगे… हर कोई सत्ता को अपने पास खींचना चाहता है…पॉवर। राजनेता अपनी तरफ खींचता है, अफसर अपनी तरफ खींचता है, संस्थाओं के जो रूल हैं वो लगाम रखने के लिए होते हैं… उन्हें नेता-अफसर तोड़ते-मरोड़ते चलते हैं, इसलिए वे और जटिल होते चले जाते हैं। देश-दुनिया में जो आदर्श होते थे, अच्छाई की तरफ जाने के लिए जो सामने रखे जाते थे, उनका क्षरण होता जा रहा है। जब क्षरण होगा और सब सत्ता को अपनी तरफ खींचेंगे तो राजनीति-नौकरशाही का गठबंधन जटिल होता ही जाएगा। अब जैसे एक उदाहरण लीजिए- पुतिन ने आक्रमण कर दिया यूक्रेन पर… ‘पीस’ का नाम लेकर अमेरिका के ट्रम्प महोदय बीच में आ गए, वे वेनजुआल के प्रेसीडेंट को ही उठा के ले गए। तो वो भी वही कर रहे हैं … जो पुतिन कर रहे हैं। स्वार्थों की टकराहट बढ़ती चली जाती है। निःस्वार्थ भाव से सेवा करने वाले जो पहले थे वो अब नहीं हैं और न आगे होंगे क्योंकि अब ऐसे संस्कार नहीं बचे… तो मामला तो जटिल होता ही जाएगा।   
प्रश्न:- लाल पीली जमीन में “लाल और पीले रंगों के पीछे की मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि क्या थी जब आप यह कथा बुन रहे थे?”
देखिए ‘लाल पीली जमीन’ में लाल और पीले को अलग करके मत रखिए। एक मुहावरा है- ‘लाल पीला होना’ अर्थात गुस्सा, तो जो बुंदेलखंड की जमीन उपन्यास में चित्रित है उसमें बुनियादी स्वभाव मनुष्य का गुस्सैल है। बुन्देली होते भी हैं।  ‘सौ दंडी एक बुन्देलखंडी’ कहावत ही है, तो वो जमीन ही ऐसी थी, जिसमें गुस्सा होना, मार पीट ये सब ज्यादा था, जो मैंने बचपन में देखा… मेरा बचपन चरखारी में बीता वहाँ आदमी सिर्फ लड़ता-झगड़ता ही रहता था, एक दूसरे को मारता रहता- गुंडई। वहाँ पर कोई प्रशासन या पुलिस हमने कभी देखे ही नहीं। चरखारी में तो लगता था कि जो ताकतवर है बस उसी का राज है, जिसकी लाठी उसकी भैंस। नौवीं दर्जे में बांदा आया, वहाँ का परिवेश थोड़ा अलग किस्म का था। वहाँ बुन्देली भाषा भी मिली-जुली हो जाती है, लेकिन चरखारी में ठेठ बुन्देली थी… आल्हा-उदल… वही पढ़ा जाता था। बांदा में आकर पहली बार रामचारितमानस के पाठ सुनाई दिए। वहाँ मेरी किशोरावस्था बीती, जीवन में प्रेम आया।
प्रश्न:- “बुंदेलखंड और विशेषकर चरखारी का परिवेश ‘लाल पीली जमीन’ उपन्यास में एक जीवित पात्र की तरह उभरता है। क्या आपको लगता है कि आंचलिकता केवल भाषा तक सीमित होती है, या वह मनुष्य के भाग्य का निर्धारण भी करती है?”
भाषा तक सीमित होने की बात नहीं है भाई… कुछ जगहें ऐसी होती हैं जिसकी मिट्टी में वहाँ के लोगों का स्वभाव जज़्ब हो जाता है, वही मिट्टी का स्वभाव बन जाता है। ऐसी ही एक किताब है ‘टॉमस हार्डी’ की ‘द रिटर्न ऑफ द नेटिव’ और आधुनिक साहित्य में ‘गब्रियल गार्सिया मार्खेज़’ (Gabriel García Márquez) द्वारा लिखी गई ‘वन हंड्रेड इयर्स ऑफ सॉलिट्यूड’ (One Hundred Years of Solitude)। ये किसी एक पात्र पर नहीं हैं। ‘लाल पीली जमीन’ में भी एक पात्र नहीं हैं, हालांकि ‘लाल पीली जमीन’ जब मैंने लिखा था तो न मैंने  मार्खेज़ का नाम सुना था, न ही उसे पढ़ा था। तो ऐसे उपन्यास जो परिवेश-प्रधान होते हैं उनमें परिवेश ही नायक होता है। ‘लाल पीली जमीन’ में खंदिया मोहल्ला ही नायक है। 

प्रश्न: “आपने ‘पाँच आंगनों वाला घर’ उपन्यास में एक सांस्कृतिक संक्रमण को पकड़ा है। क्या आपको लगता है कि पाँच आंगनों के सिमटकर एक फ्लैट या छोटे कमरे में तब्दील होने से हमारी संवेदनाएँ भी संकुचित हो गई हैं?”

 

बिल्कुल हो गई हैं… सम्मिलित परिवार के बच्चे में कितनी पीढ़ियों के संस्कार उतर आते थे, वे चीजों को फैलाकर देखने लगता था। आज ये जो मेरा घर है, जहां हम बैठे हैं, यहाँ मैं बाहर भी देख सकता हूँ। मान लो मेरा घर बंबई में हो, तो मैं कमरे में ही कैद रह जाऊंगा… मेरा चीजों को देखने का नजरिया ही सीमित हो जाएग। भविष्य में सम्मिलित परिवार रह पायेंगे या नहीं, वो एक अलग प्रश्न है, क्योंकि उसमें समाजशास्त्र आ जाता है, देश की आर्थिक स्थितियाँ भी आती हैं… सम्मिलित परिवार के बने रहने में तमाम कारक काम करते हैं, लेकिन सम्मिलित परिवार की जो अच्छी चीजें थीं, उनसे इनकार नहीं किया जा सकता। हर चीज में अच्छाई-बुराई होती है। ‘हुजूर दरबार’ में लोगों ने कहा कि प्रजातन्त्र की जगह गोविंद मिश्र राजतन्त्र लाना चाहते हैं, लेकिन राजतन्त्र में जो अच्छी चीजें थीं वो प्रजातन्त्र में कहाँ आ पाईं? उपन्यास में राजा कहता है कि मेरी कोशिश होती है कि हर घर में एक कमाऊ व्यक्ति होना चाहिए। उसमें (हुजूर दरबार) खरे से बातचीत में वह कहता है कि माना हम भ्रष्ट हैं, सब सत्ताधारी भ्रष्ट होते हैं, लेकिन हमने तो इतना जमा कर लिया है कि हमारी कई पीढ़ियों तक चल जाएगा। प्रजातन्त्र में हर बार एक नई पीढ़ी आएगी और नए ढंग से लूट-खसोट करेगी…। सम्मिलित परिवार को कह सकते हैं कि वह आधुनिक सभ्यता के विकासक्रम में एक पड़ाव था। उसे एकल परिवार (न्यूक्लियर फैमिली) में सिमटना ही था, जिसका राजन और उसकी बीवी प्रतिनिधित्व करते हैं, राजन अपने घर में अपने बड़े भाई जिसकी पत्नी ने माँ की तरह राजन को पाला था, उसको घर नहीं ला पाता। जब ‘पाँच आँगनों वाला घर’ को व्यास सम्मान मिला था तो इलाहाबाद के सत्य प्रकाश मिश्र ने संस्तुति पत्र में बड़ी अच्छी टिप्पणी की थी। उसमें उन्होंने कहा था कि “उपन्यास जो अहीर भैरव से शुरू होता है, कौवे की कांव-कांव में खत्म होता है।” मैंने यह नहीं सोचा था। कैसी सटीक टिप्पणी है। ‘पाँच आँगनों वाला घर’ में कम्मों रंडी जब उस परिवार के हाल खराब होते हैं, तब वह आकर रुपये दे जाती है। आज कोई अपने पैसे नहीं निकालेगा? मैंने वह उपन्यास इसलिए लिखा कि बहुत से लोगों ने इस तरह के सम्मिलित परिवार, ऐसे चरित्र नहीं देखे होंगे, न देख पायेंगे। जिसमें बड़ बाबा पेड़ जो है वो भी एक पात्र है। देश में जो राजनीतिक बवंडर चल रहे हैं वे भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जोगेश्वरी का इतना विशाल हृदय कि कोई आर्थिक आधार न होते हुए भी परिवार का जो मुख्य कमाऊ व्यक्ति था, उसे स्वतंत्रता संग्राम में कूद जाने की परमीशन दे देती है कि तुम्हारा मन करता है स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने का तो अवश्य जाओ… परिवार की जो तकलीफें उठानी पड़ेंगी… उठायेंगे।   
प्रश्न: “‘पाँच आंगनों वाला घर’ उपन्यास में मानवीय मूल्यों के हो रहे क्षरण का प्रमुख कारण आप किसे मानते हैं?
काल-क्रम है, समय आगे बढ़ता है। जैसे एक सभ्यता शुरू होती है, फिर धीरे-धीरे पनपती है, फिर अवसान वेला में चली जाती है। सिंधु नदी घाटी की सभ्यता, नील नदी घाटी की सभ्यता… कोई भी सभ्यता देख लीजिए। तो ये आधुनिक सभ्यता जिसमें हम जी रहे हैं, ये शुरू होती है पुनुरुत्थान के समय से… कि मनुष्य ही सबसे बड़ा है।      
आज हम आधुनिक सभ्यता के पतन के दौर में जी रहे हैं। उसका सबसे बड़ा सबूत यही है कि आदमी जिसने स्वयं को सबसे ऊपर लगाया, वह कहता है कि प्रकृति वगैरह कुछ नहीं, वही सुप्रीम है। वही मनुष्य आज अपनी सभ्यता को ही खत्म कर रहा है। 
प्रत्यक्षतः मानवीय मूल्यों के हो रहे क्षरण के अनेक कारण हो सकते हैं- जनसंख्या वृद्धि। जो प्रकृति के संसाधन हैं वो चुकने लगे, उन्हें चुकना ही है तो फिर उसमें छीना-झपटी शुरू हुई, खींचातानी, तो परिवार भी सिकुड़ने लगे। सबको अपना-अपना चाहिए तो परिवार और भी सिकुड़ते चले जाते हैं। फिर लोगों की हवस भी बढ़ती चलती जाती है, आज सबसे बड़ी हवस यही है कि आदमी सब कुछ अपनी तरफ खींचना चाहता है। 
प्रश्न: “‘पाँच आंगनों वाला घर’ उपन्यास के कुछ पात्र अब भी पुराने आदर्शों को जी रहे हैं, जबकि नई पीढ़ी पूरी तरह व्यावहारिक है। एक लेखक के तौर पर, इस वैचारिक संघर्ष को चित्रित करते समय क्या आप किसी एक पक्ष की ओर झुके हुए महसूस करते हैं, या आप केवल एक तटस्थ दृष्टा बने रहना पसंद करते हैं?”
देखिए इसमें कई चीजें हैं… एक तो जो जी रहे है वो कोई ये सोच के नहीं जीता कि वह क्या जी रहा है, वो तो स्वाभाविक रूप से उसकी जीवन शैली में आ गया, वो सिर्फ जीता है। क्या जी रहा है उसका विश्लेषण वह सायास नहीं करता। हाँ… बहुत बाद में कुछ खास लोगों में ये हो सकता है कि वे आदर्श समझें और उसे जियें। आदर्श बड़ी चीज है। आदर्श अगर नहीं होगा तो जीवन आगे अच्छाई की ओर कैसे चलेगा। अच्छाई हमेशा हर युग में रहती आई है, इसी से मनुष्यता बची हुई है…। भले ही अच्छाई कम मात्रा में रहे, लेकिन वह रहती है। उपन्यास के विविध पात्र अलग समयों के, अलग पीढ़ी के हैं… उनका चरित्र-व्यवहार उनकी पीढ़ी का है। 
सवाल लेखक के चुनाव का नहीं है वो सिर्फ जीवन प्रस्तुत कर रहा है अलग-अलग कालखंडों का। झुकाव उसका सम्मिलित परिवार के मूल्यों की तरफ है। 
प्रश्न: “‘कोहरे में कैद रंग’ उपन्यास के पात्र किसी निश्चित ‘ब्लैक एंड व्हाइट’ सांचे में नहीं बंधे हैं। क्या आपको लगता है कि आधुनिक मनुष्य की त्रासदी यही है कि वह अपनी इच्छाओं और नैतिकता के बीच हमेशा एक ‘ग्रे शेड’ (धूसर क्षेत्र) में फंसा रहता है?”
अच्छाई के रंग हमेशा रहते हैं। वे अक्सर कोहरे में दबे रहते हैं, उनको समाज भी नहीं पहचान पाता। उदाहरण के लिए नानी का चरित्र। एक अति-साधारण महिला… नाचीज़, जिसको कोई गंभीरता से लेना तो छोड़ दीजिए उसकी तरफ देखता भी नहीं, लेकिन अपने गुणों के कारण उपन्यास में उसकी महत्वपूर्ण उपस्थिति है। मेरी एक पाठिका थी… डॉक्टर। पति गुजर गए, तो पहले वह बेटे के यहाँ रहने गई। वहां उसे उपेक्षा भरा व्यवहार मिला, तो बेटी जो अमेरिका में थी उसने अपने यहाँ रख लिया। वह बेटी के पास उत्साह से पहुँच गई कि बुढ़ापे में वहाँ रह लेगी। बेटी का पति विदेशी था। वह उसकी बेटी से कह रहा था- यह कौन सा लगेज यहाँ बुला लिया, इसको कौन ढोएगा। उसने सुन लिया कि यहाँ तो वह मनुष्य ही नहीं है। कोई तीसरी जगह जाने की नहीं थी, तो उसने बाथरूम में स्लीपिंग पिल्स रख ली कि अब आत्महत्या कर लेगी। तभी नानी (उसने मेरी यह किताब पढ़ी हुई थी) उसके सामने प्रकट हुई। नानी ने उससे कहा कि मेरे पास तो कुछ नहीं था… और मैंने जीवन में कभी हार नहीं मानी, तेरे पास तो भारत में घर है। वह अपने घर वापस लौट आई। और अपने बल पर जीने का संकल्प लिया। मेरी पाठिका ने मुझे पत्र लिखा- “उपन्यास की नानी ने मुझे बचा लिया।”
इसी तरह दूसरे पात्र हैं ‘पिता’, ‘सरस्वती’… सबमें कुछ-न-कुछ खास चीज हैं- जो प्रकट नहीं हैं…। ‘लाल पीली जमीन’ उपन्यास में नकारात्मकता ज्यादा थी, ‘कोहरे में कैद रंग’ में मैं सकारात्मक की तरफ मुड़ा हूँ। अब जैसे ‘रेवा’- वह सरस्वती का आधुनिक विस्तार है, उसमें भी अच्छाई हैं… वैवाहिक जीवन की भयंकर त्रासदी से गुजरने के बाद वह अपने आत्मबल पर टिकती है। ये जो रंग हैं वो कोहरे में कैद हैं… अक्सर वो उजागर नहीं रहते, तो उन्हे ढूंढने की जरूरत होती है।
प्रश्न: “समकालीन हिंदी उपन्यासों में ‘कोहरे में कैद रंग’ अपनी ‘धीमी आंच’ वाले कथा-प्रवाह के लिए अलग पहचाना जाता है। आज के तेज़ रफ़्तार समय में क्या आपको लगता है कि पाठक इस तरह के धैर्यवान साहित्य के लिए तैयार है?”
मैं पाठक का सोचकर नहीं लिखता… इतना ध्यान जरूर रखता हूँ, कि जो कहना चाहता हूँ वह पाठक की समझ में आ जाये। हर लेखक जो कहना चाहता है… वही लिखता है, उसके इंटरप्रिटेशन अलग-अलग हो सकते हैं। वह कृति उतनी ही ताकतवर मानी जाती है जिसके कई तरह के इंटरप्रिटेशन होते हों। पाठक स्वतंत्र है अपने इंटरप्रिटेशन के लिए। कोई भी कृति पाठक में अपना विस्तार पाती है… अलग-अलग पाठकों में। सिर्फ लेखक ही सर्जक नहीं होता, हर कृति का हर पाठक उसका पुनःसृजन अपने हिसाब से करता है।
प्रश्न: “‘कोहरे में कैद रंग’ उपन्यास को ‘साहित्य अकादमी’ जैसा प्रतिष्ठित पुरस्कार मिला। एक लेखक के तौर पर जब आप इस कृति को दोबारा पढ़ते हैं, तो क्या आपको लगता है कि आपने जो कुछ कहना चाहा था, वह पूरी तरह अभिव्यक्त हो पाया? या कुछ रंग अभी भी उस कोहरे में कैद रह गए हैं?”
भई इस तरह मैं सोचता नहीं हूँ… कोई रचना मेरी तब तक है जब तक मैं उसे लिख रहा हूं। छपने के बाद वह समाज की हो गई, अब आप शोध-छात्र जैसे मुझे उस तरफ फिर घसीटते हो, तो थोड़े-बहुत जवाब दे लेता हूं, वह भी तकलीफ के साथ, वरना मुझे फुरसत अपने नए लिखने से ही नहीं है। मैं भाग्यवान हूँ कि जब खाली हो जाता हूं, उसके बाद ईश्वर लिखने को कुछ न कुछ भेज देता है। एक और बात है कि आदमियों से संपर्क मैंने हमेशा रखा। 
 इस प्रश्न का उत्तर मेरे पास नहीं है क्योंकि वह मेरी कृति अब कहाँ रहीं? लिखी जा चुकी कृतियाँ अब आप लोगों की हैं। जहां तक प्रतिष्ठित पुरस्कारों की बात है तो सभी पुरस्कार अपने-अपने ढंग से प्रतिष्ठित हैं। पुरस्कार एक हद तक उस रचना की गुणवत्ता पर कमेंट करते हैं… कि वह पहचानी जाने लगे। मेरा मानना है कि एक लेखक की रचनाओं की, किसी दूसरे लेखक की या अपनी ही पूर्ववर्ती रचनाओं से तुलना नहीं होना चाहिए… सिर्फ देखना चाहिए कि उस लेखक ने जो ‘स्ट्रक्चर्ड रियल्टी’… पूरा यथार्थ भी नहीं… जो उसने उस उपन्यास में पेश की है, उसमें वह कितना सफल हुआ है…। यह तय करते हैं पाठक। किसी किताब के बारे में हवा में जो राय ठहरी हुई है, वही असली राय है।
प्रश्न:- “‘वह अपना चेहरा’ उपन्यास में दफ्तरशाही व्यवस्था की जो भयावह तस्वीर आपने खींची है, क्या आपको लगता है कि इस ‘चेहरे’ को बदलने की कोई गुंजाइश आज के समय में बची है?
देखिए भाई मैं थोड़ा निराशावादी हूँ… कह लीजिए आप। हमारी आधुनिक सभ्यता पतन को उन्मुख है… तो चीजें खराब ही हुई हैं, आदमी की नस्ल ही खराब हो गई दिखती है… अच्छी शिक्षा ही बच्चों को नहीं मिली जो अफसर होकर आते हैं… उनमें जो संस्कार, आदर्श होना चाहिए वे नहीं हैं, तो कहां कोई गुंजाइश होगी। अब तो खराब ही खराब होना है और हो रहा है। 
आज के बड़े अफसरान नेताओं की जी हुजूरी करते रहते हैं कि उन्हें अवकाश प्राप्ति पर एक साल का एक्सटेंशन और मिल जाए। तो ये पतन ही हो रहा है और पतन ही होगा, जब तक ये पूरी पृथ्वी और मनुष्य को नहीं ले डूबेगा। 
प्रश्न:- “‘कोहरे में कैद रंग’ में मनुष्य अपने भीतर के कोहरे (द्वंद्व) से लड़ रहा है, जबकि ‘वह अपना चेहरा’ में वह व्यवस्था के बाहरी मकड़जाल से जूझ रहा है। एक लेखक के तौर पर आपको ‘मनुष्य के भीतर की धुंध’ को चित्रित करना अधिक कठिन लगा या ‘सत्ता की खुरदरी वास्तविकता’ को?”
सत्ता पर लेखन एक पक्षीय होता है… उसको ढूँढना और लिखना आसान होता है। मनुष्य को समझना पड़ता है। ‘मनुष्य वाला’ लेखन व्यक्ति केंद्रित होता है, एक व्यक्ति के अंदर जो द्वंद्व है, उसे जीवन में आपने कैसे देखा जैसे ‘वह/अपना चेहरा’ में वह (उपन्यास का मुख्य पात्र) जो देखता है, उसमें दोनों चीजें हैं, एक तो उसका अफ़सरी से मोह-भंग है। जो वह सोच कर आया था… यहाँ का जो सिस्टम है उसकी वजह से कर नहीं सकता। उसका दूसरा संघर्ष यह है कि वह अनचाहे केशवदास बनता चला जा रहा है, जिसके खिलाफ वह चला था वही बनता चला जा रहा है, आगे चलकर उसकी शक्ल केशवदास जैसी ही हो जाएगी। रचना(पात्र) के साथ उसके व्यवहार में उसका व्यक्ति पक्ष है और जो अपने दूसरे बैचमेट के साथ का उसका कार्यकलाप है उसमें उसका सत्ता के खिलाफ चलने वाला पक्ष है। 
प्रश्न:- ‘’कोहरे में कैद रंग’  की स्त्रियाँ बहुत भावुक और सूक्ष्म हैं, जबकि ‘वह अपना चेहरा’ में (जैसे रचना) वे दफ्तरी राजनीति और शोषण का सामना कर रही हैं। अलग-अलग परिवेश में आपकी स्त्री दृष्टि में क्या बदलाव आए?”
हमारे पितृसात्मक समाज में स्त्री पर ज्यादतियां बहुत होती थी लेकिन अब पैंडुलम घूमा है, तो अब स्त्रियाँ ज्यादती करती हैं। 
लेखक की दृष्टि को कृति के ही चौखटे में देखना चाहिए कि उसमें किस समाज की, किस वक्त की बात उसने आई है। ‘वह/अपना चेहरा’ में वह(रचना) शोषण झेल रही है, अपना उसका पक्ष दबा हुआ है जो उसकी अपनी पहचान है वह दबी हुई है। मेरा नया उपन्यास ‘राह दरबदर’ देखिए। उसमें 1940 से लगाकर आज तक भारतीय नारी की स्थिति अलग-अलग कहानियों के माध्यम से कही गयी है। अलग-अलग कहानियों से उपन्यास बनाने का प्रयोग है। अलग-अलग कहानियों में उस समय की स्त्री की स्थिति दर्शायी गई है। अगर स्त्री-पुरुष प्रेम की बात करें तो मेरी नजर में न तो पहले के समय में प्रेम था जब पति पीटता था और औरत पति को मालिक कहती थी और न आज के समय में जब स्त्री के मन का जरा भी नहीं हुआ तो वह पति को निकाल बाहर करती है। मुख्य चीज है कि संतुलन कैसे सधे। जो स्त्री-पुरुष के संबंध में ‘राह दरबदर’ के अंतिम शीर्षक से ध्वनित है- कि स्थैर्य या गति इन दो में चुनाव है। स्थैर्य यह कि जिससे प्रेम हो और उसी से विवाह हो और गति ये कि औरत अपनी अस्मिता को लिए हुए इतना आगे चली जा रही है कि प्रेम महसूस करना ही बंद हो गया है। आज यह समस्या है, प्रेम महसूस करना विरल है। पुरुष के लिए भी और स्त्री के लिए भी। अपवाद होते हैं जो प्रेम महसूस करते हैं, विवाह भी चलते हैं… पर उनसे कोई धारणा नहीं बनायी जा सकती।
प्रश्न:- “‘खिलाफत’ उपन्यास को लिखते समय क्या आपके मन में किसी विशेष घटना का प्रभाव था, जिसने आपको इस विषय पर लिखने के लिए मजबूर किया?”
‘खिलाफत’ की भूमिका है उसके पहले के उपन्यास में। आलिया से मेरा परिचय दिल्ली में हुआ। जो कश्मीर से दिल्ली सर्विस करने आई हुई थी। वह प्रोग्रेसिव शिया मुसलमान परिवार से थी। अशरफ का आना जाना उनके घर बहुत था वे बचपन से एक दूसरे से प्यार करते थे। दोनों परिवार आलिया-अशरफ की शादी भी मानकर चलते थे। आलिया अपने मन के साथ-साथ अपने पिता के मन का भी करना चाहती थी। लेकिन इस बीच अबु-बकर-बगदादी ने नमाज करते शियाओं की मस्जिद पर बम गिराए क्योंकि उनका मानना था कि सुन्नी ही असल इस्लाम हैं, और वही उनका प्रतिनिधित्व करता है। आलिया के पिता शिया थे, उनका कहना था कि हम अपनी बेटी को कातिलों के घर में नहीं देंगे। आलिया की पीड़ा ने वह उपन्यास लिखवाया। चूंकि शिया सुन्नी का मामला इस पर भी जाता था कि इस्लाम जंग का मजहब है या शांति का, उसमें भी उपन्यासकार गया है। तो आलिया की पीड़ा से खिलाफत उपन्यास निकला है।
प्रश्न:- “मिश्र जी, आपने उपन्यास का शीर्षक ‘शाम की झिलमिल’ चुना है। क्या यह ‘शाम’ केवल ढलती उम्र का प्रतीक है, या यह जीवन के अनुभवों के उस प्रकाश की ओर इशारा करता है जो केवल अंत में ही समझ आता है?”
दोनों ही चीजें हैं। शाम माने जिंदगी की शाम तो है ही लेकिन उसमें भी कई रोशनियाँ हैं, कुछ-कुछ वैसा ही जैसे दूर कहीं से आप गांव की तरफ जा रहे हैं, तो गांव की बस्ती में जैसे दिये टिमटिमाते दिखते हैं। जिंदगी की शाम… कुछ अच्छा, कुछ बुरा होता है, पर उसमें कुछ रोशन भी टिमटिमाता है।
प्रश्न:- “वृद्धावस्था को अक्सर साहित्य में केवल दुख या उपेक्षा के रूप में दिखाया जाता है, लेकिन आपके ‘शाम की झिलमिल’ उपन्यास में एक अलग तरह की गरिमा और ‘झिलमिल’ है। इस सकारात्मकता को बनाए रखने की प्रेरणा आपको कहाँ से मिली?”
अपने आप से। मेरा ज्यादातर लेखन आत्मापरक है। ‘शाम की झिलमिल’ में वृद्धवस्था में भी कुछ उत्साहवर्धक चीजों की तलाश है। ये मान लेना कि अब दुनिया में कुछ नहीं है… यह मान कर बैठ जाना… ये मुझे ठीक नहीं लगता। शंकराचार्य जी का यह कहना सही है कि भई बुढ़ापे में ये-ये होता है-
अङ्गं गलितं, पलितं मुण्डं।
दशनविहीनं जातं तुण्डम्।।
वृद्धो याति गृहीत्वा दण्डं।
तदपि न मुञ्चत्याशापिण्डम्॥”
लेकिन मैंने अपने जीवन में गर्माहट ढूंढने की कोशिश की है और मुझे मिलती है… विरल होती है। तो उपन्यास में वह आया है।
प्रश्न:- “उपन्यास का शीर्षक ‘तुम्हारी रोशनी में’ बहुत प्रतीकात्मक है। यह ‘रोशनी’ किसकी है? क्या यह किसी पुरुष का सानिध्य है, या सुवर्णा के भीतर का अपना विवेक है जो उसे अंधेरों से बाहर निकालता है?”
तुम्हारी से मतलब क्या है…? सुवर्णा के लिए अनंत है, अनंत के लिए सुवर्णा। दोनों के लिए एक दूसरे की रोशनी तुम्हारी रोशनी है। सुवर्णा महानगर की महिला है, वहां सूखापन ज्यादा है प्रेम नहीं है, अनंत कस्बे का है। सुवर्णा कई बार कहती है कि तुम जिस तरह चीजों में डूब लेते हो, मैं कोशिश करके भी नहीं कर पाती, तो उस तरह डूबने की ललक है उसकी। उसे सब आदमियों में कुछ न कुछ अच्छा दिखता है… उसे वह लेना चाहती है। इस किताब के बारे में ‘सुवास कुमार जी’ ने लिखा था कि “इतनी जिजीविषा भरी, अपने निर्णय खुद लेने वाली सशक्त महिला की तस्वीर पहली बार हिंदी उपन्यास साहित्य में गोविंद मिश्र के इस उपन्यास में आई है।” उपन्यास जब प्रकाशित हुआ था तब यह नारी विमर्श वगैरह नहीं था। इस उपन्यास में द्वंद्व आधुनिक भारतीय नारी का पारंपरिक परिवार वाली दृष्टि से है। एक चीज गौर करने लायक है। मेरे इन दोनों उपन्यास में ‘तुम्हारी रोशनी में’ और ‘धूल पौधों पर’ उन क्रिया-कलापों को लेकर चलते हैं जो निंदनीय है, जिनसे घृणा पैदा होती है… सुवर्णा का कई लोगों से संबंध बनाना, जबकि वह उथला-उथला ही संबंध है। लेकिन ऐसा लगेगा की यह खोखली महिला है। वह महिला ऐसी वजनी हो जाती है कि पाठक को उससे प्यार हो जाता है। ‘धूल पौधों पर’ में तो दोनों पात्र ऐसे हैं- बुड्ढा ‘प्रेमप्रकाश’ अपने से कम उम्र की उपन्यास की नायिका से प्रेम कर रहा है और यह नायिका अपने पति को छोड़कर प्रेमप्रकाश से रोशनी पा रही है। दोनों ही घृणा के पात्र हैं, लेकिन अंत तक आते आते दोनों इतने ऊपर उठ जाते हैं कि लोगों को अपील करते हैं। यह लियो टॉलस्टॉय द्वारा लिखित ‘अन्ना कैरेनिना’ में भी था कि ‘अन्ना कैरेनिना’ अपने बच्चों को छोड़ कर एक आर्मी के ऑफिसर के साथ चली जाती है। क्रिश्चयनिटी में उन दिनों मोरेलिटी इतनी ज्यादा थी कि ऐसे पात्र को घृणा से ही देखा जाएगा। टॉलस्टॉय ने इसके कई ड्राफ्ट बनाए और अंत में जो छवि अन्ना कैरेनिना की उभरती है तो उसे सब प्यार करना चाहते हैं, यह करिश्मा होता है लेखक का।
प्रश्न:- “मिश्र जी, ‘तुम्हारी रोशनी में’ युवावस्था की ऊर्जा, प्रेम और खोज का उपन्यास है, वहीं ‘शाम की झिलमिल’ जीवन के उतार और ठहराव की कथा है। एक रचनाकार के तौर पर, इन दोनों पड़ावों के बीच आपने मानवीय संवेदनाओं में क्या बड़ा बदलाव महसूस किया?”
‘तुम्हारी रोशनी में’ जिन मूल्यों की तरफ संकेत है- वह है प्रेम में डूबना… इतना अंतरंग हो जाना किसी संबंध में कि आप उसमें डूब जाएं… अनंत उसका प्रतीक है, अंत में सुवर्णा घर छोड़ करके मां के पास पहुंच जाती है…। उसने घर छोड़ भी दिया है और छोड़ा भी नहीं है। वह डूबने का मर्म तो समझ गई है पर अब भी डूब नहीं पाती, छटपटाती रह जाती है। ‘शाम की झिलमिल’ में उम्र के साथ तालमेल बैठाने की कोशिश है। उतार पर सन्यास ही असली चीज है, सब चीजों के लिए तटस्थ भाव। मैंने किसी भी उपन्यास में कोई लाउड मैसेज नहीं दिया… देना भी नहीं चाहिए क्योंकि फिर पाठक उसमें कैद हो जाता है…। ऐसी स्थिति पेश कर देना कि वह अपने आप खोजें। जैसे ‘तुम्हारी रोशनी में’ मैंने यह दिखाया है कि सुवर्णा माँ के पास जाती है लेकिन यह नहीं कि वह माँ के पास हमेशा के लिए आ गई है। यह पाठक सोचे कि उसे क्या करना चाहिए।
प्रश्न:- “‘उतरती हुई धूप’ में आपने इलाहाबाद के कॉलेज जीवन का बहुत सजीव चित्रण किया है। आज के डिजिटल युग के कैंपस और आपके उपन्यास के उस दौर के कैंपस की ‘रूमानी और बौद्धिक छटपटाहट’ में आप क्या मुख्य अंतर देखते हैं?”
बहुत अंतर है… उस समय ये डिजिटल युग नहीं था तो मनुष्य मनुष्य के बहुत करीब था। अब हर चीज का मशीनीकरण हो गया है, और होता जा रहा है। जितना ज्यादा मशीनीकरण होगा उतना ही ज्यादा मनुष्य एक दूसरे से दूर होते चले जाएंगे। 
प्रश्न:- “‘धूल पौधों पर’ आपको सरस्वती सम्मान मिला, हरिवंशराय बच्चन के बाद आप दूसरे हिन्दी के लेखक थे जिसे यह सम्मान मिला। इस उपन्यास की विशेष बात क्या थी?
उपन्यास में मुख्य पात्र दो हैं ‘प्रेमप्रकाश’ और वह। दोनों की आयु में फर्क होते हुए भी उनमें एक-दूसरे के लिए जो भावनात्मक लगाव पैदा हुआ है, वह नया है। वह पूछती है कि- ‘मैं आपकी कौन हूं?’ तो प्रेमप्रकाश कहते हैं कि- ‘जो-जो तुम्हारे जीवन से उठता चला गया मैं तुम्हारा वो-वो हूं… तुम्हारे माता-पिता नहीं है… तो मैं वो हूं, तुम्हारा भाई जो आंदोलन में जल गया… वो मैं हूं।’ इस उपन्यास की खासियत यह है कि दोनों पात्र विकसित हुए हैं, जिसको फ़ॉस्टर ‘राउंड कैरेक्टर्स’ कहता है। प्रेमप्रकाश जो शुरू में इज्जतदार, बूर्जुआ है, वह इस लड़की के संपर्क में आकर मनुष्य हो जाता है, प्रेम से चलता है, इज्जत भर लेकर नहीं चलता। लड़की का संघर्ष ये है कि शुरू में वह एकदम पराश्रित है। अंत में कहाँ पहुँचती है, आगे वह कहती है “मैं जहां भी जाऊँगी अपने बच्चे को साथ लेकर जाऊंगी, और यहाँ कभी नहीं लौटूँगी।” यह निर्णय लेने की क्षमता… स्त्री में अगर आ जाए तो वह उसका डेवलपमेंट है। प्रेमप्रकाश का संघर्ष अंदरूनी है, इस महिला का बाहरी है…। यहां तक कि प्रेमप्रकाश से भी वह बाहर-बाहर लड़ रही है। दोनों का जो विकास हुआ है वह महत्वपूर्ण है। ‘तुम्हारी रोशनी में’ और ‘धूल पौधों पर’ उपन्यास में फर्क यह है कि ‘तुम्हारी रोशनी में’ की सुवर्णा के पास सब कुछ था- ब्यूटी, क्लास वन अफसर, शादीशुदा, बच्चे, पैसा, कार और ‘धूल पौधों पर’ की महिला के पास नाम भी नहीं है, लेखक ने जानबूझ कर उसे कोई नाम नहीं दिया। उसके पास कुछ नहीं है, धीरे-धीरे चल कर प्रेमप्रकाश के संपर्क में आने से उसमें निर्णय लेने की क्षमता विकसित हो जाती है।
प्रश्न:- “‘धूल पौधों पर’ की नायिका एक पढ़ी-लिखी, जागरूक स्त्री है, फिर भी वह एक दकियानूस ससुराल में अपनी पहचान खोने लगती है। क्या आप यह कहना चाहते हैं कि शिक्षा के बावजूद भारतीय स्त्री के लिए ‘पारिवारिक गुलामी’ से निकलना आज भी उतना ही कठिन है?”
अगर आज के परिप्रेक्ष्य में बात करें तो आज भारतीय नारी ‘पारिवारिक गुलामी’ से निकल चुकी है, लेकिन इस उपन्यास में वह पारिवारिक गुलामी से लड़ रही है। निकलकर बाहर आती है। आज अधिकांशतः पति यह नहीं सोच सकता कि उसकी पत्नी उसके साथ रहने को मजबूर है। महिला के पास शिक्षा आ गई, नौकरियां या तो है या नौकरी पाने की संभावनाएं पुरुषों से ज्यादा हैं। वह कमा रही है, कमाने के लिए जागरूकता आई है। कानून उनके पक्ष में बन गए हैं। सब ने उसका कॉन्फिडेंस इतना बढ़ाया है कि उसको द्वंद नहीं रह गया है ससुराल से बाहर आने का। आज कोई भी स्त्री दब कर नहीं रहती… यहां तक कि बेपढ़ी-लिखी पत्नियाँ भी अपनी बात रखती हैं।
प्रश्न: “मिश्र जी, आपके पहले उपन्यास ‘उतरती हुई धूप’ में प्रेम एक कच्ची उम्र का ‘रोमांस’ और ‘मोहभंग’ है, लेकिन ‘धूल पौधों पर’ तक आते-आते यही प्रेम एक-दूसरे की ‘मुक्ति’ और ‘बौद्धिक विकास’ का माध्यम बन जाता है। क्या यह बदलाव आपके निजी जीवन के अनुभवों का परिपक्व होना है या आपने समाज में प्रेम के अर्थ को बदलते देखा है?”
समाज का प्रतिबिंब ज्यादा है। ‘उतरती हुई धूप’ और ‘धूल पौधों पर’ उपन्यास में तकरीबन पचास साल का फर्क है। पचास साल में समाज में जो बदलाव आए हैं- पहले प्रेम को लेकर पीड़ा होती थी, अन्तर्जातीय विवाह हो ही नहीं सकते थे। अब तो जाति सिर्फ वोटों के लिए रह गई है। तो यह बदलाव निजी नहीं है, यह समाज में आया बदलाव है।
प्रश्न:‘तुम्हारी रोशनी में’ की स्त्री जहाँ संबंधों की नई रोशनी तलाश रही थी, वहीं ‘कोहरे में कैद रंग’ की नायिका अपने ही एकांत और स्मृतियों के कोहरे में सिमटी हुई है। क्या आपको लगता है कि आधुनिकता के इस दौर में स्त्रियां पहले से ज्यादा अकेली हो गई हैं?”
सिमटना अपने आप में अकेला होना नहीं होता है जैसे एक शेर है- “किसी राहबर को खबर भी न होगी कि इंसान तन्हा भी एक काफिला है।” हर मनुष्य के भीतर एक ब्रम्हांड है। ‘कोहरे में कैद रंग’ में आकर वह ज्यादा अपने पास आ गई है अपने भीतर ही कुछ ढूँढना, अपने को संभाल ले जाना। आज भारतीय महिला अपने पास आ गई है, अपने एकांत को उसने साध लिया है तो उसे उसका सिमटना नहीं कहिए, यह उसकी ग्रोथ है, बड़ी हुई है वह।
हरि ओम  
स्नातक/परास्नातक : हंसराज कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय
पीएचडी : डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा (शोध केंद्र:- राजा बलवंत सिंह कॉलेज, आगरा) 
पता- vill. Jamuni Purwa, post-Tindwara, Dist.- Banda, pin-210001
मोब. न.- +91 7701931907
ईमेल- [email protected]
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