काफी दिनों से घर में वातावरण थोड़ा खिंचा-खिंचा था । नलिनी जब भी मायके आती तो पहले भाई- भाभी उससे बहुत प्यार से मिलते थे, सब साथ बैठकर बातें करते थे, साथ में खाना खाते थे, सबमें हंसी मजाक चलता था, भाभियां भी बड़ा लाड करतीं थीं ।
मगर पिछली बार जब वह आई तब से उसने बदलाव महसूस किया था ।
इस बार जब वह मायके आने को निकल रही थी तो वह तय करके निकली थी कि वह इस बारे में मां से बात करेगी । जब उसने मां से बात छेड़ी तो मां मुस्कुराकर रह गईं । .उसी रात पिताजी ने सबको अपने कमरे में बुलाया और एक लिफाफे में से एक मियादी जमा रसीद निकालकर सबको बतलाई और बेटों और बहुओं की तरफ देखकर कहा, “भाई तुम लोग यही सोचकर नाराज़ थे ना कि मैने उसमें तीसरा हिस्सा नलिनी को क्यों दिया ? तुम लोग ये नहीं जानते कि नलिनी ने क्या किया ? उसने हम दोनों के नाम से, बुढ़ापे की जरूरतों के लिए एक एफ.डी. बनवाई और बाकी की रकम तुम दोनों के बेटों के नाम कर दी । मां के गहने दोनों भाभियों को देने के लिए वकील से कागजात बनवाकर हस्ताक्षर कर दिए” ।
फिर नलिनी के सर पर हाथ रखते हुए बोले “मुझे अपनी बिटिया की समझदारी पर नाज़ है”, नलिनी हंसते हुए बोली, “भैया इतनी आसानी से मैं अपना घर नहीं छोड़ने वाली, जब जी चाहेगा आ धमकूँगी, मां पापा और आप लोगों का दुलार ही मेरी सच्ची पूंजी है । इसे मैं नहीं गंवा सकती.”
अचानक वातावरण में मां-पापा की हंसी गूंज उठी । नलिनी ने भाभियों को गले लगा लिया, और भाइयों के चेहरे पर हंसी के साथ साथ शर्मिंदगी की लाली भी झलकने लगी ।
तभी पापा ने घोषणा की “आज तो इस खुशी के मौके को हम खुशियों के साथ मनाएंगे, हम सब बाहर खाना खाने जाएंगे.”…. वातावरण एकदम खुशगवार हो गया ।
बहुत सुन्दर लघुकथा शिल्पा जी। समझदारी परिवार को बांधकर रखती है। बधाई आपको।