प्राननाथ
चरन स्पर्श।
तुम्हें गए छैः महीना से ज्यादा हो गए। ऐसा लगता है, कब तुम्हारे दर्शन कर लूँ। तुम्हारी याद में जी तलफत है। फुरसत मिले, तो एकाध दिन के लिए घर चले आना, फिर चाहे तुरन्त लौट जइयो।
दो महीना बड़ी आफत में जान रही, काए से कि सरकार ने पाँच सौ और हजार के लोट चलन से बाहर कर दिए थे। यहाँ की बैंकों में तो बड़ी भीड़ रही, वहाँ का हाल कैसा रहा? मैं तीन-चार दिन कतार में खड़ी रही। लैन में लगे लगे पाँवन की दशा हो गई। तुम हजार रुपये के दो लोट धर गए थे, वे मैंने बदलवा लिए। बदलवाती न, तो तुम्हीं बताव, बेकार न हो जाते।
मैं तो रोटी बाँधकर ले जाती थी और कतार में खड़े-खड़े खा लेती थी। कौन भूखों मरता? मां बताती थी कि ऐसे ही एक बार सरकार ने नसबन्दी शुरू कर दी थी। काफी पुरानी बात है। मोटर की भर्र सुना गई कि आदमी मूँड़ औंधाकर ज्वार-बाजरा के खेतों में घुस जाते थे। उस समय नसबन्दी प्रानन पड़ी थी, अब इस नोटबन्दी ने प्रान खा लिए। पहलूँ आदमी खेतों में घुसता था, अब बैंकों में मूड़ औंधाए रहा। एक बात बताऊँ प्राननाथ-“कतार में लगे लगे कई आदमी मर गए। बेचारे रुपइया न बदलवा पाए। बताव, उनके लरका-बच्चा कौन पालेगा?”
काम-धाम न लग रहा हो, तो यहाँ चले आओ। चुनाव आ गए हैं, जो कुछ मिल जाए वही बहुत है। आँधी के आम हैं, जितने बटोर पाओ सो बटोर लो, नहीं तो पाँच साल के लिए गए। पिछले चुनाव में कम पइसा मिले थे, इस बार मूर्ख नहीं बनना है। तुम आ जाओ, बइयर जनी को लोग बुद्धू बना देते हैं। पइसा सबके लेने हैं, चाहे जिस पाल्टी के हों। पैसा न लेकर काहे किसी को बुरे हों। पैसे नहीं लेते हैं, तो वे सोचते हैं कि हम उनके वोट न देंगे। ऐसा कैसा है कि सबके ले लो, हमारे लिए सब बरोबर हैं। जो हमारे दरवाजे आ गए, सिर माथे पर। हम दबाव काऊ कौ नई मानत, चाहे जितना बड़ा लकचन्द्र हो। वोट हम अपनी मर्जी से देंगे।
तुम्हारी एक बहुत बड़ी कमी है, तुम भावनाओं में जल्दी बह जाते हो। उन्होंने हजार का लोट हाथ पर धरो, सो तुम उनके एहसान तले दब जाते हो। वे अपने पुरखा का थोड़े दे रहे हैं, करोड़ों के बारे-न्यारे करके आए हैं। देखना जीतने के बाद उनके दर्शन दुर्लभ हो जाएँगे। जो गठिया-बछिया मिले उसे चाँप लो, फिर न जाने कब राम जनकपुर आएँगें। उनकी महानता के नीचे ज्यादा न दबा करो। सामने भइया दद्दा खूब कहो पर पीठ पर न चिपकाओ। न उनके सामने अकड़ो। पिछले चुनाव में हरबी के कक्का थोड़े गरम भए थे, आज तक खटिया में धरे सड़ रहे हैं।
भैंस खरीदने के लिए फार्म भर दिया है। परधान जी बता गए थे कि सरकार किसानों को ऋण दे रही है। बैंक मैनेजर ने मेरी चार फोटो ले ली है और फार्म में पाँच-छैः जगह दस्तखत करा लिए। सुना है संग वाले दो-चार लोगों को ऋण मिल गया है, मुझे नहीं मिला। मैनेजर दस हजार माँग रहा था, मैं कहाँ से देती? न पैसे दिए और न ऋण मिला। बीच में यह नोटबन्दी पबर आई। अब तो दो-चार महीना बाद की आशा करो। तुम आ जाव सो मैनेजर को निपटा सुरझा देव। बिना लेंय-देय काम न होगा। बताव, मिलना होता तो मिल न जाता। छैः महीने से बैंक में फार्म पड़ा है। मैनेजर के पाँव छू लइयो, शायद हजार दो हजार कम कर दे। इतने बच गए तो कौन कम हैं, सात-आठ दिन की मजदूरी है। सब कहूँ भ्रष्टाचार है, समासइ के मरे पर कहाँ तक रोओगे। सरकार कहत भ्रष्टाचार खतम कर देंगे।
कैसे हो जाएगा खतम? अभी कल हरबी की बड़ी मौड़ी सरोजी और मखना के लड़का कलुआ के बीच कुछ उल्टी-सीधी बातें हो गई थीं। औरतें तो खुसखुसा रही थी कि कलुआ सरोजी को पकड़ने आया था, हरबी जाग गई सो उसने शोर मचा दिया। सुबह हरबी और मखना उलझ गए थे। मखना ने हरबी को तीन-चार तमाचा मार दिए। उसने रिपोर्ट कर दी। पुलिस दोनों पक्षों को थाने घसीट ले गई। लड़की (सरोजी) ने थानेदार से स्पष्ट बता दिया था कि कलुआ ने मेरे साथ बदतमीजी की है, लेकिन पुलिस मानी का। जब थाने आ गए, तो सूखे कैसे बच जाएँगे। थानेदार ने दस-दस हजार दोनों पक्षों से ऐंठ लिए। नहीं दे रहे थे, तो न जाने कौन सा केस लगा देते। राँड़-रड़ी हरबी तो बेचारी वैसे ही दुखयारी है। उसका कक्का चारपाई पर पड़ा है, पुलिस ने उसे भी न छोड़ा। हरबी ने ठीक किया, जो दस हजार देकर छूट आई। मुकदमा लिख जाता, तो न जाने कब तक चलता। अपने आपको निर्दोष सिद्ध करने के लिए न जाने कितने पापड़ बेलने पड़ते। कानून ने पुलिस को बहुत बड़ी ताकत दे दी है। उसके दुरुपयोग को कौन रोक सकता है?
प्राननाथ, चिट्ठी पाते ही घर चले आना। हाँ ट्रेन में हिसाब से आइयो, काए सें जहरखुरानी गिरोह वहाँ ज्यादा सक्रिय रहत। वे यात्रियों को कुछ सुंघा देते हैं और उनकी गाढ़ी कमाई पर हाथ चट कर जाते हैं।
आपके इन्तजार में
रमकल्लो


लखनलाल पाल जी,
आप के द्वारा लिखित रमकल्लो की पाती का सप्तम हिस्सा मनोयोग से पढ़ते समय बार बार अतीत के, इतिहास के वह मंज़र सामने आ रहें थे.
आपातकालीन समय, नसबंदी नोट बंदी, कानून प्रशासन स्थिति इन सभी बातों पर आपने खुलकर लिखा है वह नितांत सराहनीय ही नहीं अपितु चिन्तनीय और प्रशंसनीय भी है.
आपातकाल आज़ाद हिन्दुस्तान की इतिहास का एक ऐसा दिगर दाग है जिसे धोने में सदियों का समय बीत जाएगा.
आपातकाल के अंजाम को भी हमनें देखा है.नसबंदी के भय से साधारण आदमी आक्रांत था और उसका आक्रोश सत्ता परिवर्तन में बदल गया.
नोट बंदी की त्रासदी को रमकल्लो ने महसूस किया है इसलिए उसे नसबंदी की याद आती है. लोगों को नोट बंदी से तकलीफ़ हुई इस बात को हम स्वीकार करते हैं किंतु यह दोनों अलग चीजें हैं यह हमारी अवधारणा है. एक बात सही है की इसके कारण रमकल्लो जैसी लाखों महिलाएं प्रभावित हुई यह भी सच है और अपने प्राणनाथ को लिखे खत में उसने इसका इजहार भी किया है जिसे पढ़कर दिल पसीज जाता है.
रमकल्लो किसान ऋण के लिए बैंक चली जाती है तो वहां उसे जो महसूस होता है उससे हम लोग परिचित हैं, वहीं बात प्रशासन की भी है, उसपर लिखना पिष्टपेषण और व्यर्थ है.
इतनी त्रासदियों का सामना करते हुए भी रमकल्लो नीडर और निर्भीक है और एक सशक्त नारी के रूप में वह उभरतीं है यह सबसे बड़ी बात है.
यह सब पढ़ने के बाद फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का शे’र याद आता है –
‘हम तो ठहरे अजनबी इतनी मदारियों के बाद
ख़ून के यह धब्बे धुलेंगे कितनी बरसातों के बाद!!’
आप को बहुत बहुत बधाई! आप की रमकल्लो की पाती साहित्य में अपना अलग स्थान निर्धारित करें इसी शुभकामना के साथ विराम लेते हैं.
विजय महादेव गाडे
प्रोफेसर विजय महादेव गाडे जी, आपकी समीक्षा ने रचना को ऊंचाइयां दे दी है। जब आप रचना पर समीक्षा लिखते हैं तो उसके मायने होते हैं। क्योंकि रचना एक तरह से एक्स रे हो जाती है जिसमें अंदर का सब कुछ देख लिया जाता है।
नोट बंदी के साथ नसबंदी का इस रचना में आना स्वाभाविक था। आपने इन दोनों को जिसमें खासकर नसबंदी के साथ आपातकाल के दाग-धब्बों की ओर इंगित किया है। यह सच है। इसे देश स्वीकार करता है।
बढ़िया समीक्षा के लिए हृदय से आभार सर
आदरणीय लखनलाल पाल की रमकल्लो की पाती पढ़कर मन खुश हो गया। आपने गांव की पूरी की पूरी कथा लिख डाली। पढ़ी लिखी रमकल्लो सब कुछ लिख देती है। गांव साकार हो गया है। लेखक जी को बधाई
पाती पढ़कर उस पर प्रतिक्रिया देने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद अंकित
आज रमकल्लो की सातवीं पाती भी पढ़ ली। उसका इंतजार खत्म होने का नाम ही नहीं लेता। सही ही तो कह रही है वह। छै महीने कोई कम होते हैं। प्राणनाथ की याद में रमकल्लो के प्राण सूखे जा रहे हैं किंतु उनका निष्ठुर हृदय नहीं पसीजता। आज तक हम रमकल्लो के प्राणनाथ का नाम तक न जान सके। शायद अगली किसी पाती में वह उनका नाम लिख कर बता दे।
घर के काम-काज के बाद वह अपने आंख-कान खुले रखती है। सनसनाती हवा की तरह गांव के घर-घर की खबरें बटोर कर अपनी चिट्ठियों में प्राननाथ को परोसती रहती है। पर दुनिया भर की चिंताओं से लदी रमकल्लो बड़े ठसके से रहती है। पति की याद तो उसे बराबर कचोटती रहती है। “तुम्हारी याद में जी तलफत है। फुरसत मिले, तो एकाध दिन के लिए घर चले आना, फिर चाहे तुरन्त लौट जइयो।”
दुनिया जहान की हर बात की उसे चिंता है। लेकिन प्राणनाथ के दूर होने से हर बात का निर्णय उसे अकेले ही लेना पड़ता है। पुराने नोटों को अकेले ही बैंक में बदलवाने जाना पड़ा वरना घर में पड़े सड़ते रहते। उस समय उसे नसबंदी के समय के किस्से भी याद आने लगते हैं। परधान जी से सभी सरकारी समाचार उसे प्राप्त होते रहते हैं। इधर सरकार की तरफ से भैंस खरीदने के लिये ऋण लेने की बात भी उन्हीं से पता लगाने पर उसने जो फॉर्म भर रखा है उस पर मैनेजर चुप्पी साधे है। दस हजार की घूंस मांग रहा है। उसे उम्मीद है कि प्राननाथ उसकी खुशामद करें तो वह घूंस के कुछ पैसे कम सकता है।
हर जगह भ्रष्टाचार का बोलबाला। अब हरबी की ही देखो। उसकी बेटी सरोजी और मखना के बेटा कलुआ के बीच कुछ कहासुनी हो गई तो मामला पुलिस तक पहुंचा। पर दोनों पार्टियों ने दस-दस हजार रुपए देकर चैन की सांस खींची। वरना न जाने कितने दिनों जेल में रहना पड़ता। पुलिस हो या कोई और हर जगह भ्रष्टाचार।
दूसरी तरफ चुनाव के प्रत्याशियों की बात करती है तो अपने पति को उनकी चापलूसी करने का पाठ पढ़ती है। ताकि प्रत्याशियों की चापलूसी करने से जितना माल उनसे मिले वह खींच ले। बाद में जो भी जीतेगा वह फिर पलट कर नहीं देखने वाला। वह इंसान अपने वादों से मुकर जायेगा। उसे पता है कि सब अपने मतलब के साथी होते हैं। तो उसे भी तो मौका मिलने पर अपना उल्लू सीधा करना चाहिये। चुनाव के समय वोट देने के वादे करके हर कोई गंगा में हाथ धो रहा है। तो वह क्यों पीछे रहें। “सामने भइया दद्दा खूब कहो पर पीठ पर न चिपकाओ। न उनके सामने अकड़ो। पिछले चुनाव में हरबी के कक्का थोड़े गरम भए थे, आज तक खटिया में धरे सड़ रहे हैं।” हरबी के कक्का की सब अकड़ निकल गई। मार खाकर अब खटिया तोड़ रहे हैं।
रमकल्लो की बातों से हमेशा लगता रहता है कि वह अपनी जिंदगी के फैसले लेने में बहुत समझदार व जिम्मेदार है। पुलिस या बड़े अधिकारी को अकड़ न दिखाना, ट्रेन में आते समय किसी का दिया न खाना, लोगों से सतर्क रहना आदि सभी बातें पति को पाती में समझाती है। जैसे एक मां अपने बच्चे को समझाती है।
पाती लिख वह न हारी
अब भी लिखना जारी है
रातें सूनी दिन हैं बैरिन
हाय यह कैसी लाचारी है।
उसके प्राण तो प्राननाथ में बसे हैं। लेकिन जैसे-तैसे उसकी उनके बिना जिंदगी चले जा रही है। उलझन की बात तो यह है कि कब तक ऐसे चलता रहेगा। रमकल्लो की पाती पढ़ते समय कुछ देर के लिये पाठक अपनी चिंताओं को भूल जाता है। लेखक लखनलाल जी को रमकल्लो की इन चिट्ठियों के लिये बहुत बधाई।
-शन्नो अग्रवाल
शन्नो जी आपकी इस विस्तृत टिप्पणी ने रमकल्लो के मन की दबी पीड़ा को उघाड़ दिया है। बाह्य रूप से सब कुछ ठीक-ठाक होते हुए भी उसके मन की टीस को आपने अपनी टिप्पणी से बाहर नहीं होने दिया है। रमकल्लो मूल रूप से विरहिणी है पर विरह को हावी होने से वह बचती दिख रही है। लेकिन हृदय के उद्गार शुरुआत में या अंत मे निकल ही आते हैं। इसे उसकी खासियत कह सकते हैं।आपने इस खासियत को अपनी टिप्पणी में ओझल नहीं होने दिया है। आपकी टिप्पणी में यह दिख रहा है।
बढ़िया टिप्पणी के लिए शन्नो जी आपका बहुत-बहुत आभार
बिटिया रमकल्लो,
खुस रहो,
हफ्ता भर में तुम्हारी एक पाती जौन मिल जात है, वहि से तोहरे हियरा का हाल मालूम पड़ जात है। यह खेलै खाए की उमिर मां अपने दूल्हा से एतना दूरी और उप्पर से घर केर जिम्मेदारी !तोहरे खातिर मोर मन दुखाए लागत है।
लेकिन क्या करिहौ बिटिया,धीरज धरौ। वइसै तुमका भगवान बहुत हिम्मती बनाए हैं।
वही भगवान ई कष्ट के दिन भी पूरे करि दैहैं।
तनी एक बात बताओ बिटिया, तोहरे गांव में बैंक केतना दूरि है? काहे से कि तोहै कई दिन लाइन में लगि के आपन 2000 रुपिया कै नोट बदलै का पड़ा!, हमें तो लागत है कि तोहरे गांव में लोगन के कमाई खूब तगड़ी है,यही से सब लोग नोट बचाय बचाय के धरे रहे और तोका कई कई दिन कई कई घंटा लाइन में लगै का पड़ा।
रमकल्लो, तू तो पढ़ी-लिखी बिटिया है रे! काहे नहीं अपने गांव के बीस-पच्चीस लुगाई लोगन के अपने साथ लेके घूसखोरी करन वारे दरोगा ,मैनीजर के दफ्तर के आगे धरना देती, नारे लगाती?
का जाने कभी सुनवाई हुई जाए।
अब बिटिया, तुम चाहे हमें मउसी मान लेव ,चाहे काकी , हम तोहरे बड़े हैं तो उपदेश तो देवै करेंगे।
बस चतुराई से अपना ख्याल राखौ औ धीरज न छोड़ौ।
तोहरी भला चाहै वाली।
सरोजिनी पाण्डेय जी, आप क्या हैं? मैं नहीं जानता हूं कि आप किस पद पर हैं? आपकी डिग्रियां क्या है? पर इतना जान गया हूं कि आप रमकल्लो के लिए एक आदर्श मां, आदर्श मौसी, आदर्श काकी, ताई जरूर हैं। इन सभी में आपकी पूर्णता दिखती है। इन संबंधों में डिग्री की नहीं सहृदयता की जरूरत होती है। वह सहृदयता मुझे रमकल्लो के प्रति दिखाई दे रही है। इस अदने से पात्र रमकल्लो के लिए आपने जो प्यार उड़ेल दिया है वह बहुत गहरे तक भिगो गया है।
हंसना, रोना या अपने बंधु-बांधवों से बात अपनी बोली बानी में ही होती है। आपने अपनी बोली में रमकल्लो को जो चिठिया लिखी है वह हृदय को तरल कर देती है। कितनी मिठास है इस बोली में, कहीं कोई व्यवधान नहीं है। निर्झर सी बहती चली जाती है। ऐसा चमत्कार कि पाठक बस पढ़ता चला जाए, पढ़ता ही चला जाए। और इसे पढ़कर उदास मन भी आनंद से हिलोरें मारने लगता है।
इस प्यारी चिठिया पर बहुत कुछ लिखना चाहता हूं पर व्यक्त नहीं कर पा रहा हूं। बस महसूस कर रहा हूं। मैं इस चिठिया को निजी तौर पर संग्रहीत कर रहा हूं।
और क्या कहूं, बस इतना ही कि आपका बहुत-बहुत आभार
सर जी!
रमकल्लो की पाती की तड़प सबकी पीड़ा बन गई।छै माह वियोग के कुछ ज्यादा खिंच गए। बेचारी 1 दिन के लिए ही सही, बुला रही है।
इस बार ऐसा दर्द उभर कर आया है नोट बंदी का, जो दुखती रग पर हाथ धरे सा रहा।राजनीतिक परेशानियाँ अलग। बेचारी सीधी साधी! इंसान जब अकेले जीता है तो होशियारी अपने आप आ जाती है।पर नोटबंदी के समय लाइन में खड़े-खड़े पाँव की जो दशा हुई ,वह दर्द महसूस हुआ।जिनकी जान गई उनके लिए क्या ही कहा जाए !नोटबंदी के साथ नसबंदी वाले दिन भी याद आ गए। सुनने में आया था कि जिनकी शादी नहीं हुई और जिनके बच्चे नहीं है उनकी भी नसबंदी कर दी गई थी।
भ्रष्टाचार का खुल्ला चिठ्ठा लिख दिया। बेचारी सरोजी! और गाँव की गिरती स्थिति के बारे में भी बता दिया। चुनाव का लाभ अच्छा बताया। चुनाव के पहले की स्थिति ऐसी है
*कोउ नृप होय
हमें का हानी* अभी जिनसे मिल रहा है उन सब से ले लो, बाद में तो मालूम है नेता लोग दिखने वाले नहीं।और अंत में पतिदेव को भी सावधान कर दिया, सफर में जहर खुरानी की बात करके।
भैंस के लोन के लिए बैंक के चक्कर लगे वहां भी भ्रष्टाचार।
इस बार की पाती में रमकल्लो ने बहुत कुछ कह दिया ।स्थानीय भाषा ने कहानी को प्रभावी बना दिया।
इस बार पाती पढ़ कर तो ऐसा लगा कि रमकल्लो के प्राननाथ का पता मिल जाता तो एक बार उससे मुलाकात कर लेते और समझाते कि दादा घर चले जाओ वर्ना रामकल्लो की माँ ले जाएगी किक्षशादी करके लेकर गए थे साथ रहने के लिए और अकेला छोड़ दिए। खबर नहीं ले रहे।
बहुत-बहुत बधाई आपको इस पाती के लिए सर जी! रमकल्लो तो अब हम सबकी सहेली बन गई।
इस सुंदर सी पाती के लिये बधाई आपको और प्रस्तुति के लिए तेजेन्द्र जी का शुक्रिया।पुरवाई का आभार।
नीलिमा करैया जी, आपका टिप्पणीकार वाला रूप निखरकर सामने आ गया है। अब तो जब तक आपकी टिप्पणी नहीं आ जाती है तब तक ये लगा रहता है कि अभी एक प्रतिक्रिया और आएगी। और जब आपकी प्रतिक्रिया आ जाती है तो रचना खिल उठती है। मेरा ही नहीं ऐसा विश्वास इस परिवार के बहुत से सदस्यों का होगा।
सुंदर प्रतिक्रिया के लिए बहुत-बहुत आभार नीलिमा करैया जी
अरे लखन भज्जा जो का हो रओ, बिचाई रम कल्लो की पाती पढ़के ,हमे बापे भोताई दया आ रई,
बताओ तो केसो हेगो जो प्राणनाथ, नासमिटो सांसी के रय गारी निकर रई हमाय मो से ,का रमकल्लो के पिरान, काड़ के मान हे,एक बेरा आ जातो, फ़िर चलो जातो,
बो तो जो कओ तनक पढ़ी लिखी है ,तेज तराट है ,बाकी जांगा ओर कोऊ जनी होती तो गांव वारे बाय जिऊं नई देते,
पाती में पुरा की परोस की सरकार की पुलिस वालन के भ्रष्टाचार की,जाने का का नई लिखत रहत ,सबके दुख को अपनों दुख मानत हेगी,
अरे तुमई शहर जा रय हों? प्रिय लखन जी, तो तुमई खबर कर दियो, बाके प्राणनाथ को ,
आ जाय तनक खबर अतर ले जाबे ,फिर चलों जाय
बाने भैंस के लाने फारम डार दओ है, लोट सुनदा बदलवा ल्याई बैंक से,अब बोट डरने हैं , बेसे तो बो काऊ से डरात नईया , बाय जोन खो बोट देने हुवे,बो बई खो दे हे ,
तनक के दियो गांव हो
जाबे, इतेक बात तो मान ले हो प्रिय लखन जी ,काय से की तुम हमाय मित्र हो ,
राम राम हमाई ,पुरवाई वारन खो ,काय से के,
पुरवाई से हमे रम कल्लो को पतो चलत रहत हे
आदरणीया कुंती जी, बुंदेली बोली में अपनों को दी गई गारी में भी प्रेम छलकता है। रमकल्लो से अति प्रेम के कारण, उसके दुख दूर करने के लिए ऐसा होना अस्वाभाविक नहीं है। रमकल्लो से ऐसा दुलार उसके प्रति जुड़ाव को दिखाता है। आप इस पात्र से पूरी तरह से जुड़ चुकी हैं।
बुंदेली बोली में आपका उलाहना बहुत कुछ कह जाता है। उसमें अपनत्व है, टीस है, और सबसे बड़ी बात इसमें जो न्याय की प्रवृत्ति दिख रही है वह बेजोड़ है।
बढ़िया टिप्पणी के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद कुंती जी