द्विवेदी युग के प्रख्यात साहित्यकार ज़हूर बख़्श ने लगभग 175 पुस्तकों का सृजन किया है। बाल साहित्यकारों में उनका नाम अग्रगण्य है। उनके बिना बाल साहित्य का परिदृश्य अधूरा है। समाज का अग्निकुंड, शबनम, देवी सीता, देवी सती, मुस्लिम महिला रत्न, आर्य महिला रत्न आदि पुस्तकें हिन्दी साहित्य में मील का पत्थर मानी जाती हैं। ज़हूर बख़्श जी के बारे में जानने के लिए उनके पुत्र श्री अहमद अली सिद्दीकी से बातचीत प्रस्तुत है-
प्रश्न – आप अपने परिवार के बारे में विस्तार से बतायें।
उत्तर- सिपाही करीम बख़्श के दो पुत्र और एक पुत्री थी। पहले ज़हूर बख़्श और दूसरे रमजान खाँ और पुत्री सुगराबी। ज़हूर बख्श का जन्म 12 मई 1897 कमरया की पायगा सागर में एक किराये के कमरे में जन्म हुआ, गरीबी के कारण ज़हूर बख़्श उच्च शिक्षा से वंचित रहे। छठवीं कक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात् नार्मल ट्रेनिंग स्कूल जबलपुर से शिक्षण प्रशिक्षण प्राप्त कर प्राथमिक विद्यालय गोपालगंज सागर में अध्यापक पद पर जुलाई 1913 में नियुक्त हुए। यहीं से उनकी साहित्यिक यात्रा आरम्भ हुई जो अबाध गति से अनवरत 8 नवम्बर 1964 तक उनकी मृत्युपर्यन्त तक चलती रही।
ज़हूर बख़्श की पाँच संतानें हुईं, उनमें तीन पुत्रियाँ और दो पुत्र हुए। प्रथम पुत्री मुबारक जहाँ, दूसरी फातमा बेग़म और तीसरी नूरजहाँ। वरिष्ठ पुत्र मुबारक अली ने अध्यापक रहते हुए बाल साहित्य के क्षेत्र में पर्याप्त कार्य किया और मैं (अहमद अली सिद्दीकी) सहायक प्राध्यापक पद से सेवानिवृत्त। मैंने व्यंग्य लेख, कहानियाँ और संस्मरण लिखे हैं, यत्र-तत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं। पार्किंसन की बीमारी के कारण पिछले एक दशक से लेखन कार्य से वंचित हूँ।
ज़हूर बख़्श के जीवन में एक बहुत दुःखद घटना हुई, उन्होंने मोहल्ला मछरियाही सागर में दो मंज़िला मकान बना लिया था। जिसमें उन्होंने लगभग 17 हजार पुस्तकें एकत्र कर रखी थीं। 9 फरवरी सन् 1961 को उषा भार्गव काण्ड जो जबलपुर से संबंधित है उसके लपेटे में सागर भी आ गया, उसमें मेरे पिता यानी ज़हूर बख़्श जी का मकान और पुस्तकालय भी आग के हवाले दंगाइयों ने कर दिया।
विपन्न अवस्था में हम लोग भोपाल आ गये और यहीं बस गये। सन् 8 नवम्बर 1964 को साहित्यकार ज़हूर बख़्श जी का निधन हुआ और कब्रिस्तान जहाँगीराबाद (भोपाल) में दफ़न किया गया। बाद में सन् 1966 में मैंने अपने पिता जी की कब्रिस्तान का एक मकबरे के रूप में निर्माण कराया।
प्रश्न – आपके पिता जी का किन-किन साहित्यकारों से परिचय अर्थात् किन लोगों के साथ उठना-बैठना था?
साहित्यकार ज़हूर बख़्श समन्वयवादी विचारक-लेखक थे। पंडित कामता प्रसाद गुरु एवं उनके पुत्रों से पिता जी का सम्बन्ध रहा। जबलपुर में शिक्षक प्रशिक्षण के दौरान पंडित मातादीन शुक्ल, रामानुजलाल श्रीवास्तव, पंडित मधुमंगल मिश्र, नर्मदा प्रसाद मिश्र, पंडित द्वारका प्रसाद मिश्र से पत्र-व्यवहार और कभी-कभी मिलना-जुलना रहा। सागर मध्य प्रदेश में सैयद अमीर अली मीर, मास्टर बलदेव प्रसाद, मास्टर अब्दुल गनी, लोकनाथ द्विवेदी सिलाकारी, सलाम सागरी, डॉ. कृष्णलाल हंस, हर प्रसाद द्विवेदी, श्री हरी, माधवराव सप्रे, हाफ़िज़ मोहम्मद अज़ीम इत्यादि।
महान साहित्यकारों से मिलना और पत्र-व्यवहार आदि होता रहा, जिनमें प्रमुख इस प्रकार हैं- वृंदावनलाल वर्मा, महावीर प्रसाद द्विवेदी, हरिवंशराय बच्चन, मैथिलीशरण गुप्त, शिवपूजन सहाय, प्रेमचन्द, दुलारे लाल भार्गव, महाकवि निराला, माखनलाल चतुर्वेदी, ख्वाजा अहमद अब्बास, धर्मवीर भारती इत्यादि से पत्र–व्यवहार था।
प्रश्न – क्या आपको लगता है कि आपके पिता जी को जितना सम्मान मिलना चाहिए था उतना मिला?
उत्तर – जितने सम्मान के वो हक़दार थे उतना उन्हें नहीं मिला।
प्रश्न – कुछ साहित्यकारों ने आपके पिता जी पर आरोप लगाया कि आप हिन्दू समाज के बारे में गलत लिखते हैं?
उत्तर – पिता जी का लेखन चिंतनपूर्ण एवं अनुभव पर आधारित है, वे हिन्दू और हिन्दी के प्रति असीम अपनापन रखते थे। जिस जमाने में उनका लेखन कार्य चल रहा था। उस समय हिन्दू समाज और हिन्दू स्त्रियों का भविष्य चिंताजनक था। वे पूर्ण रूप से महिला सुधार के लिए पक्षधर थे। उन्होंने हिन्दू नारी के उन्नयन के लिये बहुत कुछ लिखा। देवी सीता, देवी पार्वती, देवी सती, आर्य महिला रत्न इस बात के प्रमाण हैं। अन्य स्फुट लेख और कहानियाँ भी बड़ी संख्या में हैं। उन्हें कुछ साहित्यकारों ने अलग दृष्टिकोण से देखा है।
प्रश्न – आपके पिता जी की कहानियाँ किन-किन पत्र-पत्रिकाओं में छपी थीं?
उत्तर – उनकी कहानियाँ हिन्दी के समस्त प्रसिद्ध पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुआ करती थीं, जिनमें सरस्वती, चाँद, माधुरी, अवन्तिका, आजकल, धर्मयुग, कल्पना, सरिता, साप्ताहिक हिन्दुस्तान इत्यादि। बाल कहानियाँ चंपक, नन्दन, किशोर, पराग आदि प्रसिद्ध पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। इनसे पूर्व अनेकानेक पत्रिकाओं और कोर्स बुक्स में प्रकाशित होती रहीं।
प्रश्न – जब आपके घर की लाइब्रेरी में आग लगाई गयी थी उस समय की मनःस्थिति के बारे में बताएँ। आपकी और आपके परिवार की?
उत्तर – हम पाँच बहन-भाई, पिता जी कागज़ की नाव के सवार रहे हैं। उन्हें मकान जल जाने का उतना दुःख नहीं था जितना पुस्तकालय के जल जाने का था। उनके संग्रह में कुछ प्राचीन दुर्लभ पुस्तकें भी थीं। समस्त आर्य साहित्य, वेद, पुराण, महाभारत, गीता, रामायण, रामचरितमानस, साकेत आदि शोभायमान थे। इस्लाम धर्म और उर्दू साहित्य की प्रसिद्ध पुस्तकों के हिन्दी संस्करण विद्यमान थे। सन् 1913 के पश्चात् के अनेक प्रसिद्ध साहित्यकारों के पत्रों का विशाल संग्रह था। सागर नगर से उन्हें असीम प्रेम था। जिस स्थान पर उन्होंने प्रतिष्ठा अर्जित की थी, वहीं सर्वनाश होने का दुःख उन्हें अन्दर से कचोटता रहा जिससे वृद्धावस्था में वे रक्तचाप से पीड़ित हो गये। भोपाल आगमन मजबूरी थी। यही उनके असमय निधन का कारण बना। हम पाँचों बहन-भाइयों को सागर से बहुत प्रेम था। इस बारे में ही गृह-विहीन होने का दुःख अपार था। हम तीन बहन-भाई का भविष्य ही जल गया। हम सभी की मनःस्थिति बहुत दुःखद थी।
प्रश्न – आपके पिता जी का स्वभाव कैसा था?
उत्तर – पिता जी का स्वभाव मिलनसार, मधुर और विनोदी था। उन्हें क्रोध आता था लेकिन जल्दी शान्त हो जाता था और अपने कार्य में व्यस्त हो जाते थे। उनमें स्वाभिमान और स्वावलम्बन बहुत था।
प्रश्न – क्या आपके पिता जी ने पहले उर्दू में लिखना शुरू किया था? बाद में हिन्दी में किया?
उत्तर – नहीं! उन्होंने लेखन कार्य हिंदी में प्रारम्भ से ही किया। बाद में कुछ उर्दू की रचनाओं का रूपान्तरण हिन्दी में किया जिनमें प्रमुख रूप से- गुलिस्ताँ, बोस्ताँ, मौलाना रूमी की मसनवी और शौकत थानवी के हास्य-व्यंग्य लेखों का अनुवाद किया था।
प्रश्न – उनकी कुछ बातें बताएँ जिनसे हिंदी जगत अब तक अछूता रहा है?
उत्तर – ज़हूर बख़्श जी में निम्नलिखित खूबियाँ थीं–
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वे किसी भी प्रकार का नशा आदि नहीं करते थे।
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वे आतिथ्य प्रेमी थे।
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समाज के सभी वर्गों से उनका सम्पर्क था और उनकी पहुँच में जिसका जो कार्य होता था, उसको वे अवश्य करते थे।
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वे बहुत उदार और दानी थे।
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वे परम देशभक्त थे।
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छोटों से स्नेह और बड़ों के प्रति उनमें आदर भाव था।
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सभी वर्गों के लोग उनका सम्मान करते थे।
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समस्त वर्गों की पंचायतों में उन्हें आमंत्रित किया जाता था। लोगों का विश्वास था कि पिता जी का मुंशिफाना फैसला रहेगा।
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वे हिन्दू, मुस्लिम एकता के पक्षधर थे। उनकी ईद, दीवाली के आयोजन प्रसिद्ध थे।
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वे हल्के श्यामल शरीर और स्थूल देहयष्टि, बिखरे हुए सफेद बाल, बड़ी मूँछें, गहरे नेत्र और प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनी थे।



बहुत सुंदर सर…..
Bahut accha interview mubarakbad
Bahut Accha
Nice interview…….
V nice innovative and informative and inspirational interview keep it up
सफलतम साहित्यकार हिन्दू मुस्लिम और धर्मांधता का पक्षधर नहीं होता। वो जो सोचता और करता है पूर्णतः साहित्याभिमुख की भावना से करता है। यह साक्षात्कार साहित्य लेखन, पठन और मनन में आपकी रुचि और प्रेम का तत्वदर्शी है। आपको कोटिश : बधाई एवं अनन्य शुभकामनाएं।
सही कहा आपने।
बहुत ही ज्ञानवर्धक वार्ता…
आप दोनो को बहुत बहुत साधुवाद