तुलसीदास डॉ. रामविलास शर्मा के प्रिय और आदर्श कवि रहे हैं। हालांकि तुलसी पर उन्होंने कोई स्वतंत्र पुस्तक की रचना नहीं की है। परन्तु कई महत्त्वपूर्ण लेख तुलसी पर उन्होंने लिखा है, जिनमें अपनी मान्यताओं को उन्होंने प्रस्तुत किया और तुलसी के काव्य सौन्दर्य पर अनेक अनछुए पहलुओं को भी सामने लाकर रखा, इसके साथ उन्होंने तुलसी विरोधी आलोचकों को अपने तर्कों एवं आलोचना सामर्थ्य के माध्यम से उनकी धारणाओं का खंडन भी किया है। अपने इस कार्य में डॉ. शर्मा दुराग्रही आलोचना के भी शिकार हुए हैं।
तुलसी का मूल्यांकन रामविलास शर्मा भक्ति आंदोलन के विस्तृत सांस्कृतिक संदर्भ में करते हैं। भक्ति काव्य को वे संत–साहित्य कहना अधिक उचित समझते हैं, तो संत साहित्य के अंतर्गत निर्गुण–सगुण एवं संत–भक्त जैसे किसी भी भेद को नहीं मानते। वे मानवतावाद और प्रेम–भावना को संपूर्ण भक्तिकाव्य का सारतत्व स्वीकार करते हुए कहते हैं, “संत–साहित्य में बहुत से भेद–उपभेद हैं। कोई सूफी है, कोई वैष्णव है– कोई निर्गुणवादी है,कोई षैव है, लेकिन सभी में एक तत्व समान है–प्रेम। जायसी, तुलसी, मीरा, कबीर इनमें प्रेम का तत्व निकाल दीजिए तो भेद–उपभेद बचे रहेंगे। लेकिन उनका मूल स्वर नष्ट हो जाएगा। इसलिए संत और भक्त का भेद करना भ्रम है।”1
रामविलास शर्मा इस बात से इंकार करते हैं कि भक्ति साहित्य निराशाजन्य साहित्य है, हांलाकि उसमें निराशा के तत्व भी है। उनकी दृष्टि में मुसलमानों के शासनकाल में पराधीनता की वजह से लोग भक्ति और निराशा के गीत गाने लग गये यह धारणा अवैज्ञानिक है। उनके शब्दों में, “भक्ति–आंदोलन तुर्क आक्रमणों से पहले का है। गुप्त सम्राटों के युग में ही वैष्णव मत का प्रसार होता है, तमिलनाडु भक्ति आन्दोलन का केन्द्र रहा, जहाँ मुसलमानों का शासन न था।”2 बहुत से मुसलमान सतों ने खुद भक्ति आंदोलन में योगदान दिया है। भक्ति–आंदोलन को डॉ. शर्मा विशुद्ध देशी आंदोलन पुकारते हैं जो सामंती समाज की परिस्थितियों से पैदा हुआ था, “वह मूलतः इस सामंती समाज–व्यवस्था से विद्रोह का साहित्य है।”3
भक्ति आंदोलन को रामविलास शर्मा अखिल भारतीय सांस्कृतिक आंदोलन की संज्ञा प्रदान करते हुए इस आंदोलन की महान देन तुलसीदास को स्वीकार किया है। वे मानते हैं कि देश और काल की दृष्टि से इतना व्यापक सांस्कृतिक आंदोलन संसार में और कोई नहीं हुआ। जो भावात्मक एकता भक्ति–आंदोलन से स्थापित हुई, जितना फैलाव उसमें था, गहराई भी उतनी ही थी। डॉ. शर्मा का मानना है कि जहाँ एक तरफ वह अखिल भारतीय आंदोलन था तो वहीं दूसरी तरफ वह प्रदेशगत, जातीय आंदोलन भी रहा है। देश एवं प्रदेश एक साथ राष्ट्र और जाति दोनों की सांस्कृतिक धाराएँ एक साथ उसमें मिल जाती है। शर्मा जी लिखते हैं, ‘जो लोग समझते हैं कि अंग्रेज के आने से पहले यहाँ राष्ट्रीय एकता का अभाव था, उन्हें भक्ति–आंदोलन के इस अखिल भारतीय रूप पर विचार करना चाहिए।”4
डॉ. शर्मा का मानना है कि तुलसी साहित्य का मूल्यांकन दो प्रकार के लेखकों ने काफी आसान बनाया है। पहले प्रकार के वे लेखक जिनकी समझ में रामचरितमानस की रचना कर तुलसी ने इस्लाम के आक्रमण से हिंदू धर्म की रक्षा कर ली। दूसरे प्रकार के वे लेखक जिनकी समझ से वर्णाश्रम धर्म के छिन्न–भिन्न होने के युग में तुलसीदास ने ब्रह्मणवाद का समर्थन किया, स्त्री पराधीनता आदर्श रूप में रखा तथा भक्ति रूपी अफीम पिलाकर जनता को सुला दिया। शर्मा जी बताते हैं कि पहले प्रकार के जो आलोचक हैं वे तुलसी को श्रद्धा की नजर से देखते हुए उनको हिंदू धर्म का उद्धारक स्वीकारते हैं। तो वहीं दूसरे प्रकार के आलोचक तुलसी को प्रतिक्रियावादी पुकारते हैं, उनकी कला के महत्व को मानते हुए भी वे उनकी वैचारिक धारा को प्रगति–विरोधी स्वीकार करते हैं। शर्मा जी कहते हैं कि इन दोनों तरह के आलोचक एक ही परिणाम पर जा पहुंचते हैं जो यह है कि, “तुलसीदास जर्जर होती हुई सामंती संस्कृति के पोषक थे, इसलिए आज की जातीय संस्कृति के निर्माण में– ‘ऊँची’ जाति और ‘नीची’ जाति के हिंदुओं, मुसलमानों आदि की मिली–जुली संस्कृति के निर्माण में–उनकी विचारधारा कोई मदद नहीं कर सकती।”5 शर्मा जी की दृष्टि में दोनों प्रकार के आलोचक भारतीय जनता और विशेषकर हिंदी भाषी जनता को तुलसीदास की सांस्कृतिक विरासत से विमुख कर दे रहे हैं।
शूद्रों पर ब्राह्मणों के प्रभुत्व का तुलासीदास समर्थन कर रहे थे, जिनकी यह धारणा है, रामविलास शर्मा कहते हैं कि वे लोग भूल जाते हैं कि तुलसीदास ने इस प्रभुत्य का स्वयं अनुभव किया था और जो लोग यह मानते हैं कि तुलसी ने हिंदू धर्म की रक्षा मुसलमानों से की है वे लोग उनकी उस पंक्ति पर ध्यान दें जिसमें वे मांगकर खाने और मस्जिद में सोने की बात की है। शर्मा जी का मानना है किंतु लसीदास की यह दशा वर्ण–व्यवस्था के रक्षकों ने ही की थी। “यदि तुलसीदास कुलीनता और जातिवाद के समर्थक होते तो उनकी आत्म–निवेदन वाली रचनाओं में बार–बार यह स्वर न सुनायी देता– ‘लोग कहैं पौचु, सोन संकोचु ब्याह न बरेखी जाति पांतिन चहत हौं।”6 शर्मा जी की नजर में तुलसी की रामभक्ति की एक मुख्य वजह यह थी कि उनके स्वामी ने जातिहीन लोगों को अपनाया था।
शर्मा जी ने जोर देकर इस धारणा को स्थापित किया कि तुलसीदास का साहित्य वैचारिक धरातल पर प्रगतिशील है। कहीं भी वे इस बात को स्वीकार नहीं कहते कि वर्णवाद, जाति–व्यवस्था और भाग्यवाद को तुलसीदास ने दृढ़ किया। उनका यह कहना है कि जब स्वयं ही तुलसी को अपने जीवन में जाति–प्रथा के ठेकेदारों के कोप भाजन का सामना करना पड़ा था, तो वे जाति–प्रथा के पक्ष में भला क्यों खड़े होते इसी कारण शर्मा जी लिखतेहैं, “तुलसी के राम, भक्तों को मुक्ति देते समय, जाति–पांति का विचार नहीं करते। जाति–पांति पर निर्भर धर्मशास्त्र एक ओर है, तुलसी की भक्ति, जो सभी के लिए मुक्ति का द्वार खोलती है दूसरी ओर है।”7 शर्मा जी कहते हैं कि वर्ण, जातिधर्म आदि की वजह से तुलसी की भक्ति किसी का बहिष्कार नहीं करती। जिन तमाम लोगों के लिए पुरोहित वर्ग ने मुक्ति एवं उपासना का द्वार बंद कर रखा था, तुलसी ने उन सबके लिए खोला। इसी कारण वे यह नहीं मानते कि तुलसीदास की विचारधारा प्रगति–विरोधी एवं जन–विरोधी है।
रामविलास जी का मानना है कि तुलसीदास के विचारों को प्रतिक्रियावादी बताने वाले लोग ही उनके विचारों को संदर्भ से निकालकर दिखाते हैं, उन्हें तुलसी की पंक्तियों में अलग से जोड़ने की भी शंका है। नारी पर बात करते हुए वे लिखते हैं, “तुलसीदास स्त्रियों को पराधीन जानते हुए भी उन्हें पशुओं की तरह ताड़न की अधिकारी कहें तो इससे अधिक निर्ममता और क्या हो सकती है?… निःसंदेह यह उन लोगों की करामात है जो यह मानने के लिए तैयार नहीं थे कि नारी पराधीन है और उसे स्वप्न में भी सुख नहीं है।”8
रामविलास शर्मा की नजर में तुलसी की भक्ति मानववाद में डूबी है। मनुष्य का सबसे बड़ा उपासक यही कवि है। प्राचीन महाकाव्यों की जो मानवतावादी परम्परा थी तुलसीदास ने उसे आगे बढ़ाया है। परन्तु ‘रामचरितमानस’ मानो सजीव भाष्य है। उनकी मानवीय सहानुभूति का आधार सामाजिक यथार्थ रहा है। जैसा भरा–पूरा चित्रण तत्कालीन समाज का उनकी रचनाओं में दिखता है वैसा उस दौर के किसी और कवि में नहीं मिलता, “जनता की दरिद्रता, उसके क्लेशों का वर्णन उन्होंने बड़े ही यथार्थवादी ढंस से किया है।”9 तुलसी राजा और प्रजा के संघर्ष में प्रजा का साथ देते हैं। इसी तरह अनेक स्थानों पर तुलसी ने भक्त को भगवानसेबड़ा बताया है। षर्मा जी कहते हैं इससे ज्यादा मानवीय–प्रेम का उदाहरण वे क्या देते।
तुलसीदास डॉ. शर्मा की दृष्टि में जातीय जारण के सर्वश्रेष्ठ कवि रहे हैं। जनता की एकता उनके काव्य की आधारशिला रही है। मिथिला से लेकर अवध एवं ब्रज तक तुलसी की वाणी 400 वर्षों से नगरों तथा गाँवों में गूँजती रही है। शर्मा जी मानते हैंकि हमारे जातीय एकता तथा उसके पुनर्जीवन का कार्य अभी पूरा नहीं हुआ है। साम्प्रदायिकता ऊँच–नीच के भेद–भाव, स्त्री के प्रति सामंती शासक का रुख आदि अनेक हमारे जातीय संगठन के रास्ते में आने वाली बाधाएँ हैं। वे लिखते हैं, “तुलसी का साहित्य हमें इनसे संधर्श करना सिखाता है। तुलसी का मूल संदेश है, मानव–प्रेम।”10 शर्मा जी कहते हैं कि मानव मूल को सक्रिय रूप प्रदान करना और व्यवहार में सहानुभूति को परिणत करके जनता के मुक्ति मार्ग में सहयोग करना हम सब का कर्तव्य है।
शर्मा जी का कहना है कि तुलसी के युग को कुछ विद्वानों ने भारतीय दर्शन का ह्रास युग बताया है। जबकि तुलसी की रचनाओं में प्रत्येकदार्शनिक धारा के तत्त्व जहाँ–तहाँ देखने को मिल जाते हैं, परन्तु वे किसी भी दर्शन–विशेष के बंधन में बंधते हुए नजर नहीं आते हैं। उनके दार्शनिक दृष्टिकोण की सबसे बड़ी विशिष्टता रामविलास जी यह मानते हैं कि वह जीवन से विमुख न होकर, लोकोन्मुख तथा जीवन को सुखी एवं सार्थक बनाने के लिए है। “अनेक वैरागियों की तरह तुलसीदास मृत्यु के गीत नहीं गाते। संसार क्षणभंगुर है, इसलिए परोक्ष सत्ता से लौ लगाओदृयह उनका उपदेश नहीं है।”11 तुलसी का जो दर्शन है वह इसी जीवन और जगत में रहते हुए जगत के बंधनों से मुक्त होने की बात कहता है।
तुलसीदास के दर्शन एवं भक्ति के संदर्भ में रामविलास जी ने उनके कुछ ऐसे विचारों को दर्शाया है जिससे उनकी प्रासंगिकता बढ़ी है। इस तरह के विचारों के संकेत हालांकि आचार्य शुक्ल की आलोचना में भी देखने को मिल जाते हैं, परन्तु उसे तर्कों के साथ प्रस्तुत और विस्तारित किया डॉ रामविलास शर्मा ने। इस सन्दर्भ में शिव कुमार मिश्र ने तुलसी संबंधी रामविलास जी के मूल्यांकन पर बात करते हुए लिखा है, “डॉ. रामविलास शर्मा ने तुलसी के जिन सकारात्मक पक्षों को उभरा है, वे तुलसीदास के कृतित्व के वास्तव में जीवंत अंश है। उन्होंने तुलसी साहित्य में सामंत विरोधी मूल्यों को उजागर किया, गोस्वामी जी की किसान संवेदना से हमें परिचित कराया, साधारण जन के साथ गोस्वामी के संवेदनात्मक एकात्म को उनकी सबसे बड़ी शक्ति के रूप में विज्ञापित किया।”12
लोक भाषाओं से पूर्ण रूप से भक्ति–आंदोलन का संबंध रहा है। शर्मा जी के अनुसार तुलसीदास काजो युगांतरकारी महत्त्व है वह इस बात से पता चलता है कि वे हिंदी भाषा के सर्वश्रेष्ठ कवि के रूप में प्रसिद्ध हैं। ‘रामचरितमानस’ लिखकर उन्होंने हिंदी भाषा को संस्कृत के समान महत्व प्रदान किया। “रामचरितमानस ने पिछले अनेक शताब्दियों में जिन करोड़ों हिंदी–अहिंदी भाषियों के हृदय को स्पर्श करके उन्हें मानसिक शांति प्रदान की है और उनके जीवन को उन्नत बनाया है, उसकी तुलना मेरी दृष्टि में संसार की किसी भी भाषा के किसी भी ग्रन्थ से नहीं की जा सकती।”13 इस तरह शर्मा जी की नजर में ‘रामचरितमानस’ विश्व का सबसे अनोखा और मूल्यवान ग्रन्थ है जिसकी बराबरी का किसी अन्य भाषा एवं साहित्य में कोई और ग्रन्थ उन्हें नहीं दिखाई देता है।
तुलसीदास के मूल्यांकन को लेकर रमेश रावत रामविलास शर्मा पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं कि यह काफी विचित्र बात है कि शर्मा जी भक्ति काव्य की सम्पूर्ण प्रगतिशीलता और उसकी अभिव्यक्ति केवल तुलसीदास में ही देखते हैं। जिस निष्ठा के साथ तत्कालीन समाज में होने वाले वैचारिक और सांस्कृतिक बदलावों के पक्ष में कबीर खड़े नजर आने के साथ उन्हें अपनी बौद्धिक स्वीकृति प्रदान करते हैं, डॉ. शर्मा उसका श्रेय भी तुलसीदास को ही देते प्रतीत होते हैं। वे लिखते हैं, “कहना न होगा कि जिस नई बौद्धिक संस्कृति को रचने और निर्मित करने का प्रयास कबीर जैसे विचारक कर रहे थे, तुलसी उसे अपने समस्त मानवतावाद के बावजूद अपनी स्वीकृति प्रदान नहीं करते। डॉ. शर्मा यह फर्क नहीं करते कि तुलसी का मानवतावाद उनके भाव बोध का अंग है, उनका बौद्धिक परिप्रेक्ष्य नहीं।”14 यह सत्य है कि तुलसीदास का भावबोध इतना प्रबल है कि उनके बौद्धिक परिप्रेक्ष्य का अतिक्रमण करता नजर आता है।
वस्तुतः रामविलास जी तुलसीदास के वैचारिक परिप्रेक्ष्य तथा भाववोध के मध्य किसी तरह का अंतर्विरोध नहीं देखते हैं। यहउनकी तुलसी सम्बन्धी विवेचना की सबसे बड़ी विडम्बना कही जा सकती है कि वे तुलसीदास के अन्तर्विरोध को नजरअंदाज करते हुए अतिशयोक्तिपूर्ण ढंग से उनकी प्रशंसा करते हैं। कमलानंद झा का मानना है कि डॉ शर्मा का तुलसीदासके अतिशय महिमामंडन का एजेंडा बिलकुल स्पष्ट है। भारतीय सौन्दर्य बोध जो रामविलास जी के लिए बौद्धिक सौन्दर्यबोध का प्रर्याय रहा है वे उसमें तलसी को फिट करना चाहते थे। झाजी लिखते हैं, “इसे सीधे–सीधे हिंदू पुनरुत्थानवाद का अकादेमिक संस्करण कहा जा सकता है।”15 झा जी का यह भी कहना है कि डॉ. शर्मा ऐसे ही ‘परम्परा का पुनर्मूल्यांकन’ नहीं करते हैं। उनके लेखन की विकास यात्रा पर अगर हम गंभीरतापूर्वक देखें तो स्पष्ट तौर पर पता चलेगा कि वे क्रमशः वेद, पुराण और स्मृति की तरफ बढ़ते हुए नजर आते हैं।
तुलसीदास के मूल्यांकन में रामविलास शर्मा श्रद्धावान दिखाई पड़ते हैं इसलिए वे निष्पक्ष विवेचन करते हुए नजर नहीं आते हैं। तुलसीदास के शूद्रों एवं नारी से संबंधित अनेकों नकारात्मक विचारों और तथ्यों को रामविलास जी छुपाने की कोशिश की है इसके अतिरिक्त तुलसी के सामंत विरोधी मूल्यों को अपने ढंग से थोड़ा बढ़ा कर भी प्रस्तुत किया जो उनकी दुराग्रही आलोचना को दर्शाता है। अतः उनके विवेचन को लेकर उन पर आरोप भी लगे, जो काफी हद तक सही भी है। लेकिन फिर भी तुलसी के संबंध में उन्होंने कई ऐसे बिन्दुओं को उद्घाटित किया है जो उनसे पहले किसी आलोचक ने नहीं किया था। साथ ही उनके इस मूल्यांकन को काफी महत्व भी मिला, हिंदी मार्क्सवादी आलोचना को जो गरिमा और प्रतिष्ठा उन्होंने प्रदान किया उसका ऐतिहासिक महत्व है।
संदर्भ–सूची
-
उद्धृत लेख, रमेश रावत, रामविलास शर्मा की आलोचना दृष्टि और तुलसीदास, हिंदी के प्रहरी: डॉ. रामविलास शर्मा, सं. विश्वनाथ त्रिपाठी–अरुण प्रकाश, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण, 2002, पृ. 187
-
रामविलास शर्मा, परम्परा का मूल्यांकन, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, संस्करण, 2018, पृृ. 93
-
वही, पृ. 93-94
-
वही, पृ. 91
-
रामविलास शर्मा, प्रगतिशील साहित्य की समस्याएँ, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, संस्करण, 2014, पृृ. 163
-
वही, पृ. 167
-
रामविलास शर्मा, परम्परा का मूल्यांकन, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, संस्करण, 2018, पृृ. 53
-
रामविलास शर्मा, प्रगतिशील साहित्य की समस्याएँ, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, संस्करण, 2014, पृृ. 170
-
वही, पृ. 177
-
वही, पृ. 179
-
रामविलास शर्मा, परम्परा का मूल्यांकन, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, संस्करण, 2018, पृृ. 59
-
उद्धृत लेख, कमलानंद झा, रामविलास शर्मा, मार्क्सवादी आलोचना दृष्टि और गोस्वामी तुलसीदास, अंक 104 उद्भावना, सं. प्रदीप सक्सेना, 2012, पृ. 372
-
वही, पृ. 69
-
लेख, रमेश रावत, रामविलास शर्मा की आलोचना दृष्टि और तुलसीदास, हिंदी के प्रहरी, डॉ. रामविलास शर्मा, सं. विश्वनाथ त्रिपाठी, अरुण प्रकाश, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण, 2002, पृृ. 193
-
लेख, कमलानंद झा, रामविलास शर्मा, मार्क्सवादी आलोचना दृष्टि और गोस्वामी तुलसीदास, अंक 104 उद्भावना, सं. प्रदीप सक्सेना, 2012, पृृ. 383
