Wednesday, February 11, 2026
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सूर्यकांत शर्मा की कलम से ‘हरी चींटियाँ सपने देखती हैं’ की समीक्षा

पुस्तक – हरी चींटियाँ सपने देखती हैं 
लेखिका – अजीत कौर,
प्रकाशक – मेधा बुक्स दिल्ली,
कुल पृष्ठ – 325 
मूल्य – ₹700 
समीक्षक
सूर्यकांत शर्मा
जीवन के नब्बे वसंत देख चुकी सुप्रसिद्ध पंजाबी की जानी-मानी लेखिका अजीत कौर जी की नई पुस्तक – “हरी चींटियाँ सपने देखती हैं”, इस वर्ष प्रकाशित हुई है और हाल ही में डायलॉग प्रोग्राम के अंतर्गत इस पुस्तक का लोकार्पण भी हुआ है। वस्तुतः यह संस्मरणों की एक अमूल्य थाती है जो आज़ाद  भारत से पहले अविभाजित भारत और उसके बाद से अद्यतन एक लंबे कालखंड की यात्रा प्रस्तुत करती है। यह पुस्तक गुरुमुखी भाषा से अनुवाद कर, हिंदी में लिखी गई है। इसका अनुवाद ‘भूपेंद्र कौर प्रीत’ ने किया तथा पुस्तक का आवरण चित्र, श्रीमती अजीत कौर की सुपुत्री ‘डॉ.अपर्णा कौर’ ने सृजित किया है।         
यह संस्मरणों की आकाशगंगा बहुत से सुने-अनसुने प्रसंगों के साथ-साथ कुछ लब्ध प्रतिष्ठित व्यक्तित्वों को अंदर तक झांक कर, उनके जीवन के अनछुए और ऐसे पहलुओं को सामने रखती है कि पाठक समीक्षक संपादक सब हैरान होने की स्थिति में आ सकते हैं।        
इस संस्मरण का आरंभ मशहूर ग़ज़ल गायक ‘जगजीत सिंह’ से, शीर्षक- ‘ ग़ज़ल का बादशाह’ से होता है। बकौल अजीत कौर, जगजीत सिंह और चित्रा सिंह को आधार देने हेतु अभिनय के  कालजयी शहंशाह स्वर्गीय दिलीप कुमार को फोन किया, “यूसुफ़ भाई आपके शहर का एक लड़का है जगजीत सिंह। बहुत अच्छा गाता है। अपनी बीवी चित्र के साथ। उसे कोई नहीं जानता। वह एक बड़ा सिंगर बन सकता है। यूसुफ़ भाई! एक आप ही हैं जो मुझे बचा सकते हैं और जगजीत सिंह को भी। अगर आप आ जाएं और हम बड़े-बड़े बैनर लगा दें कि फिल्मों की दुनिया के बादशाह दलीप कुमार आ रहे हैं तो हाॅल क्या सड़कें भी भर जाएंगी। एक काबिल लड़का संगीत की दुनिया में स्थापित हो जाएगा। मैं कसम खाती हूँ ।वो बहुत अच्छा गाता है।” “बहुत अच्छा अजीत बहन आ जाएंगे भाई।”
 लेकिन दुनिया की रीत से, ग़ज़ल गायक स्वर्गीय जगजीत सिंह भी, अलग नहीं चले और प्रसिद्धि के रास्ते पर उन्होंने अजीत कौर जी के अमूल्य सहयोग को कभी सार्वजनिक रूप से नहीं स्वीकारा। उसे भुला आगे और आगे चलते चले गए…                   
ऐसा ही एक और दिलचस्प किस्सा है। यह संस्मरण मशहूर उस्ताद अल्लारख्खा के दामाद से जुड़ा है।अजीत कौर जी ने उनसे, एक कैसेट के रिकॉर्डेड आवाज़, जिस गायिका की थी, उसे खोजने का निवेदन किया था। 
उस आवाज़ की खोज, नूरां पर जाकर समाप्त हुई। दरअसल यह किस्सा, नूरां और गुरदास मान का है; जिसमें गुरदास मान का अंश तो किसी हद तक स्वीकार्य है। लेकिन नूरां जी वस्तुतः सर्वहारा वर्ग की महिला थीं और अजीत कौर जी के सहयोग से वे एक चोटी की गायिका बनीं। दुनिया ने उन्हें सर आँखों पर बिठाया। लेकिन जब नूरां को पहली बार बुलाया गया तो कौरजी के शब्दों में, “काली-कलूटी, सूखी, छोटे कद की, झुरियां वाली चमड़ी, छोटी सी चोटी में से निकलते बाल, मैले-कीचड़ कपड़े। गोद में मैला सा हारमोनियम उठाये हुए। उसका बेटा कोई 16-17 वर्ष का होगा। मैले कपड़े, घबराया हुआ, गोद में ढोलकी उठाई हुई। या खुदा! इन दोनों को इसी तरह स्टेज पर कैसे बिठाया जा सकता है…? नूरां और उसके बेटे को नहलाने धुलाने, कंघी करने, कपड़े बदलने में, अपर्णा की सलवार कमीज़ उधेड़ कर छोटी करके, पहनने में, चाय और परांठे खिलाने में, काफी समय लग गया।” 
इतने कड़े परिश्रम के बाद उसे स्टेज पर प्रस्तुत किया गया और दर्शकों ने उसकी गायकी को सराहा। तत्पश्चात वह भी शोहरत और पैसे की सीढ़ियाँ चढ़ गई और कभी भी अजीत कौर की इस मदद का कोई खुलासा नहीं किया।      
सजीव संस्मरणों की यह पुस्तक पाठकों को एक से एक विख्यात विभूतियों के बारे में बताती है, उदाहरण के तौर पर शाहरुख ख़ान। स्वर्गीय धीरू भाई अंबानी, सरदार प्रीतम सिंह, अमृत कौर उर्फ़ अमृता प्रीतम, इमरोज़ और अंतिम मुगल बादशाह को शायरी सिखाने वाले स्वर्गीय शेख इब्राहिम ज़ौक। इन सभी की पड़ताल और चौंकाने वाले खुलासे इस पुस्तक की थाती हैं। पाठक इस किताब को पढ़ कर वास्तविकता से दो-चार होगा तो बहुत सी अज़ीम्मुश्शान हस्तियों के शीशमहल, न केवल टूट जाएंगे वरन् उनका आत्म केंद्रित व्यवहार और फितरतें सामने आएंगी और ‘चारण साहित्य’ या ऐसे ही सिने-लेखक और विशेष रूप से आम युवा-पाठक चौंक उठेंगे।               
पुस्तक के आरंभ के पृष्ठों में अजीत कौर जी, मिलवाती हैं ‘बादशाह ख़ान से।’ दूरदर्शन में उनकी लिखी कहानी ‘दूसरा केवल’ हेतु ऑडिशन चल रहे थे। सैकड़ों युवा लड़के-लड़कियों में शाहरुख ख़ान भी अपनी किस्मत आजमाने हेतु खड़े थे। यकायक अजीत जी की नज़र इन पर पड़ी और इन्हीं के शब्दों में “भीड़ में एक चेहरा बहुत अच्छा लगा। पर न उसका कद-काठ था ना बदन गदराया हुआ था, न ऊँचाई ठीक थी। शायद 3-3 इंच की हील वाले बूट पहने हुए था। परंतु उसकी गालों में डिम्पल पड़ते थे। मैंने टंडन साहब को बताया कि यहां एक लड़का खड़ा है। छोटा सा सूखा-सड़ा सा है; और कोई खासियत नहीं है उसमें, लेकिन उसके गालों बहुत सुंदर गड्ढे पड़ते हैं।”
 
टंडन साहब ने कहा कि “डिम्पल से नहीं बनती फिल्में। डूबना है मैंने?” मैंने कहा, “एक बार उसे बुलाकर बात करके तो देख लो। आगे आपकी मर्जी।” मैंने जाकर उसकी बाजू पकड़ी और उसे टंडन साहब के पास ले आई। उसने हाथ जोड़कर नमस्ते की, गड्ढे पड़े। “नाम क्या है तुम्हारा?” टंडन साहब ने पूछा, “जी शाहरुख़ खान। गड्ढे पड़े। “पहले किसी थिएटर में काम किया है?” “जी स्कूल कॉलेज में कभी-कभी” और गड्ढे पड़े। 
‘दूसरा केवल’ सीरियल में इनका छोटा सा रोल, इन्हें ‘फ़ौजी सीरियल’ कामयाबी के रोलर कोस्टर पर ले गया। तिस पर भी बीबी अजीत कौर की मुताबिक़, फिल्म इंडस्ट्री के बादशाह ने कभी इनका शुक्रिया या ज़िक्र तक नहीं किया। 
यह सिलसिला आगे विख्यात बिजनेस व्यक्तित्व धीरू भाई अंबानी पर केंद्रित हुआ और सोवियत संघ पर केंद्रित पत्रिका-रूपी अंक पर ‘विशेष कपड़े की कतरनें’, जो धीरू भाई अंबानी का उत्पाद और मैडम की पसंद थीं। उन्हें सजावटी अंदाज़ में टांक कर रूस भेजा गया और कतरनें पसंद आना, फिर थोक ऑर्डर-दर-ऑर्डर…, अंबानी साहब का व्यापारिक परिदृश्य पर छा जाना। यहाँ फिर वही, कोई ज़िक्र ना होना।     
पुस्तक का सबसे बड़ा और अहम खुलासा, ‘अमृत कौर’ यानी ‘अमृता प्रीतम’ पर है। इसमें किए गए खुलासे, पाठकों के लिए, इस महिमामंडित साहित्यकार को कम से कम यथार्थ के धरातल पर तो खड़ा ही कर देंगे। किस्से की शुरुआत लाहौर में अविभाजित भारत के समय से शुरू होती है। अमृत कौर के परिवार की बात से और उनके  पति सरदार प्रीतम सिंह तथा उनके पिता की दरियादिली से। अमृता प्रीतम का टीबी से ग्रस्त होना, उनके पति और ससुर का लाखों रुपए खर्च कर अमृता के जीवन को बचाना, विभाजन विभीषिका को झेल कर दिल्ली में पुनः व्यवसाय करना। पटेल नगर- दिल्ली के मकान में फिर से अमृत कौर का अपना आत्मकेंद्रित, लेखकीय जीवन शुरू करना। ‘डॉ देव’ उपन्यास के सिलसिलेवार प्रकाशन होने के दौरान इमरोज़ का घर में आना और सरदार प्रीतम सिंह का इसे खुले और स्वस्थ मानसिकता से स्वीकारना। बाद में इमरोज़ को बासु भट्टाचार्य से मुंबई में काम मिलना, अमृत कौर का ऐलान करना कि मुझे इमरोज़ से इश्क़ है और फिर उसके साथ चले जाना…,
 एक वर्ष बाद पुनः प्रसिद्ध लेखक बलवंत गार्गी के घर, दिल्ली आना और सरदार प्रीतम सिंह का पुनः चुपचाप घर वापिस ले जाना मय इमरोज़! 
प्रीतम सिंह के परिवार को आपत्ति थी, लेकिन उनके पति का सहृदय व्यवहार। यहीं पर अजीत कौर जी ने, प्रीतम सिंह जी पर एक अध्याय  लिखा है, ‘अलविदा फ़कीर दरवेश।’ अमृत कौर मिले साहित्य अकादम अवॉर्ड, के पांच हज़ार रुपए से, हौज़खास में प्लॉट खरीदना और मकान बनाने हेतु अपने पति से उनकी पारिवारिक संपत्ति में हिस्सा लेने को कहना और लड़-भिड़ कर मकान बनाना। इमरोज़ के साथ अलग कमरे में रहना और पति प्रीतम सिंह की तबियत ख़राब होने पर लॉन में बैठना। अजीत कौर जी का प्रीतम सिंह जी से बात करना और फिर अमृता प्रीतम से संवाद, पाठकों को पति के प्रति प्रेम और समर्पण साथ ही मशहूर साहित्यकार की पहचान बता देने में सक्षम है। साथ ही इमरोज़ पर ‘एक वह भी था दरवेश’ में सारी जानकारी दी गई है। यह लेखिका के ज़िम्मेदार रुख़ को रेखांकित करता है। 
लेखिका, सार्क देशों में लेखकीय और सांस्कृतिक आदान-प्रदान में जीवंत रूप से सक्रिय रही हैं। ‘बातें सती कुमार के साथ,’ संस्मरण जाने-माने साहित्यिक विभूति, सरदार खुशवंत सिंह को भी साथ रखती है। जगह-जगह पर सुप्रसिद्ध चित्रकार ‘डॉक्टर अपर्णा’ भी इस समूची पुस्तक यात्रा में साथ रही साँसों सी हैं। 
संस्मरण की स्वर लहरियों में अनेकानेक बीते जमाने के साहित्यकारों, आयोजकों, लेखकों के नाम सुगंधित  हवा के झोंके की मानिंद आते हैं, यथा- कुँवर नारायण, केदारनाथ सिंह, वीपी सिंह, कृष्णा सोबती, अमृता प्रीतम, कमलेश्वर, जोगिंदर पाल, राजेंद्र यादव, मुल्क राज आनंद, गुलाब वज़ीरानी, ज्ञान वाचानी। 
पुस्तक समीक्षा की बात अपूर्ण रह जाएगी यदि इसमें पुस्तक के शीर्षक- ‘हरी चींटियाँ सपने देखती हैं’ पर बात ना हो। सच्चाई तो यह है कि यह  फिल्म का वाकया है। यह शीर्षक जहां “हरी चींटियाँ सपने देखती हैं” एक फिल्म का शीर्षक है, जो ‘वर्नर हर्ज़ोग’ द्वारा निर्देशित है। 
यद्यपि लेखिका ने पुरातन संस्कृति और उनके प्राकृतिक परिवेश के बीच संतुलन को दर्शाने और रेखांकित करने का प्रयास किया है। हरी चींटियाँ  एक रूपक है, जो लोगों के जीवन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। वे उनके सपनों और उनकी संस्कृति से जुड़ी होती हैं। यूं भी चींटियाँ आमतौर पर मेहनत, परिश्रम और समर्पण का प्रतीक मानी जाती हैं। लेखिका ने भी अपने प्रयासों को इन्हीं चींटियों के सदृश माना है और इसीलिए अपने संस्मरणों को यह शीर्षक दिया है।
इसी वर्णित तथ्य की आत्मा या गूढ़ार्थ को आत्मसात कर पुस्तक की डिजाइनर डॉक्टर अपर्णा ने इसे पुस्तक के कवर में स्थित कर उस पुस्तक को अति विशिष्ट, कला पुस्तक की श्रेणी में ला खड़ा किया है। 
लेखिका अब नब्बे वर्षीय हैं सो उन्होंने एक बड़े कालखंड को सक्रिय रूप से जिया है। उसी कालखंड को उन्होंने अपने अन्य मेमोयर्स यानी संस्मरणों  में जीवंत किया है। उदाहरण के लिए, ‘ एक पत्र शेख फरीद के नाम’, ‘नया साल नई सदी मुबारक’, ‘सोवियत संघ की नई मीठी रेशमी धूप’, ‘हर्षिल :गढ़वाल का कश्मीर’, ‘बातें सती कुमार के साथ’, ‘मास्को में महिलाओं की अंतर्राष्ट्रीय कान्फ्रेंस’, ‘गांधी फिल्म: एक चमत्कार’, ‘पंजाब और पंजाबियत को बचाओ’, ‘क्रिसमस:खुशियों का त्योहार’,  ‘इधर ही होती थी ज़िंदगी’, ‘लेखकों  का मेला केरल में’, ‘केरल में कलाकारों का मेला’, ‘दास्तान डीडी’ए, ‘दिल्ली में ब्रेख़्त’, ‘सफेद रूई के पंख’, ‘चाय की खाली प्याली में ज़हर’, ‘ज़ौक साहब कहां सोए पड़े हैं’, ‘हिंदुस्तान को ढूंढने की कोशिश’, ‘पहाड़ संग दोस्ती’, और अंतिम दो संस्मरण जो की अमृता प्रीतम के साथ साक्षात्कार उनकी पत्रिका ‘नागमणि’ के लिए और सबसे अंत में सारगर्भित संस्मरण और अद्यतन वर्तमान परिदृश्य ‘मेरा कमरा’ पाठकों को एक अलग से एहसास से सराबोर करते हैं।         
अस्तु यह पुस्तक साहित्यप्रेमियों, शोधार्थियों विद्यार्थियों,साहित्यिक संस्थानों के अतिरिक्त आम पाठकों में भी अपना स्थान स्वयं रखती है बशर्ते कि इस पुस्तक का प्रचार-प्रसार यथेष्ठ हो।
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4 टिप्पणी

  1. पुरवाई पत्रिका के इस अंक में भाई सूर्यकांत शर्मा जी द्वारा ‘हरी चींटियां सपने देखती हैं’ पुस्तक की समीक्षा पढ़ी। यह संस्मरणों की पुस्तक है जिसे अजीत कौर ने लिखा है। यद्यपि यह पुस्तक मूलरूप से पंजाबी भाषा में है पर इसके हिन्दी अनुवाद की समीक्षा की है भाई सूर्यकांत शर्मा जी ने।
    पुस्तक में सारे संस्मरण अंधेरे में भटक रहे उन लोगों पर है जो बाद में प्रसिद्धि पा चुके हैं। अधिकतर लोग फिल्मी दुनिया से संबंधित है। जगजीत सिंह हों, अल्लारख्खा के दामाद हों, फिल्मी दुनिया के बादशाह शाहरुख खान हो आदि बहुत से नाम है जिनकी संस्मरण लेखक ने उन्हें ऊंचाई पर पहुंचाने की भरपूर सहायता की है। वे ऊंचाइयों पर पहुंचे भी है। पर इसका दुखद पहलू यह रहा है कि वे सब बहुत ही कृतघ्न निकले। इतनी सहायता के बावजूद ऊंचाई पर जाने के बाद उन्हें कभी धन्यवाद तक न कहा। धन्यवाद की तो छोड़िए, स्वीकार ही नहीं किया कि इन्होंने कभी उनकी हेल्प की थी।
    मुझे एक बात समझ में नहीं आई कि एक,दो..चार..छै लोग कृतघ्न हो सकते हैं पर सभी के सभी हों यह बात गले नहीं उतरती है। जबसे धरती का निर्माण हुआ है और मनुष्य जाति अस्तित्व में आई हैं तभी से इस धरती पर सौ प्रतिशत कुछ भी नहीं रहा है। हर चीज के लिए कुछ न कुछ छोड़ दिया है। बुद्धिमानी से न सही, कभी-कभी मूर्खता में भी कृतज्ञता बाहर निकल पड़ती है।
    ऐसा भी हो सकता है कि जिन्होंने एहसान माना हो उनके संस्मरण ही न लिखे गए हों, अथवा एहसान मानने वाले प्रसिद्ध न हो पाए हों अथवा साहित्यकार को इंटरनेशनल प्रसिद्धि प्राप्त कर चुके लोगों पर ही लिखना एकमात्र उद्देश्य हो।
    खैर जब उन्होंने संस्मरणों में ऐसा लिखा है तो मान लेते हैं।
    भाई सूर्यकांत शर्मा जी, आपने पुस्तक की समीक्षा बहुत बढ़िया की है। आपकी समीक्षा पुस्तक पढ़ने को प्रेरित करती है। इतने अच्छे लेखन के लिए आपको बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

  2. भाई लखन पाल जी,
    आपने बड़े मनोयोग और सूक्ष्मता से इसे पढ़ा और लिखा है।
    इस पुस्तक को पढ़ा यूं तो सभी पुस्तकों को पढ़ कर ही समीक्षा करता हूँ।पर इस पुस्तक को बहुत सावधानी से पढ़ा कि इसे गुनने में दुगना समय लगा और इसी भावावेश में कुछ वर्तनी और व्याकरणीय त्रुटियाँ भी हुई।इसे ठीक करने में आदरणीय संपादक और विदुषी शैली त्रिपाठी जी को खासी मेहनत करनी पड़ी,हृदय से आप दोनों का आभार।
    तिस पर भी पुस्तक के संस्मरणों में से कुछेक यथा अमृता प्रीतम,सरदार प्रीतम और इमरोज इत्यादि को जब पुराने लोगों से पूछा तो सत्य ही पाया।यूं भी यह पुस्तक एक पंजाबी की हस्ताक्षर और वयोवृद्ध आदरणीया अजीत कौर जी ने लिखा,अतः इसकी प्रमाणिकता तो स्वयंमेव ही सिद्ध है।
    आपका पुनः हृदय से आभार।
    सूर्यकांत शर्मा

  3. सूर्यकांत जी!
    अजीत कौर जी की पुस्तक “हरी चीटियाँ सपने देखती हैं।” पुस्तक पर लिखी गई आपकी समीक्षा पढ़ी ।संस्मरणों की यह किताब निश्चित रूप से बहुत महत्वपूर्ण है। आपके लिए भी समीक्षा लिखना इतना सरल नहीं रहा होगा।पढ़कर इस बात से दुख हुआ किचन को आगे बढ़ाने में सहयोग दिया गया उन्होंने उन्नति के श्रेष्ठतम हासिल पर भी उन्हें याद नहीं रखा। लोग कितने एहसान फरामोश होते हैं!यह बात तकलीफ दे गई।
    महत्वपूर्ण किताब की बेहतरीन समीक्षा के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई।
    पुरवाई का आभार।

  4. पहले क्षमा याचना के साथ चूंकि आपके इस कमेंट को काफ़ी देर से पढ़ा।
    मुझे भी यह पढ़ कर बहुत हैरानी हुई।फिर उन लोगों से बात की,जो वर्षों से मैडम अजीत कौर जी के सानिध्य में रहे हैं।प्रिय लेखन पाल जी को तरह मुझे भी हैरानी और वह भी अविश्वास की हद तक।
    किसी ने कहा कि अच्छा क़िताब पढ़ कर पूछा,अच्छा किया,,,लगा कि क़िताब से दोस्ती कर पूछते हो ,,,खैर जब एक नहीं औरों से भी पूछा तो सच सच सच सब सच।
    सबसे बड़ी हैरानी और वितृष्णा तो अमृत कौर यानी अमृता प्रीतम वाला और उस से संबद्ध जनों के संस्मरण पढ़ कर हुई थी।
    आपका हृदय से पुनः आत्मीय आभार।
    जब बात की तो सारी की सारी बातें सत्य पाईं।

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