Friday, April 17, 2026
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लखनलाल पाल की कलम से – रमकल्लो की पाती : मैं ऐसी ही हूँ (भाग – 11)

प्राननाथ
चरन स्पर्श।
तीन दिन से तबियत सही नहीं है। पेट में दर्द बना रहता है। गुनियों को दिखाया था। वह दुनिया भर का खटराग करता रहा। कभी मंत्र फूँकता, तो कभी तन्त्र की बात करता। दो दिन से यही कर रहा है पर आराम नहीं मिला। ये गुनिया ओझा भी… क्या कहूँ? गुनमंतर तो ठीक है पर इसकी आड़ में ये देह को बार-बार छूते हैं। फिर कहते हैं, बाहरी हवा का प्रकोप है। उसकी आँखों के लाल डोरे अव्यक्त को साफ-साफ परिभाषित कर रहे थे। साधु का भेस धरे हैं किन्तु उनमें साधु जैसे लक्षण कहीं से दृष्टिगोचर नहीं हो रहे थे। न जाने कितने जनी-मान्स उसके दरबार में हाजिरी बजाते हैं। वही लोग उनके चमत्कारों को ऐसे बखानते हैं कि आदमी को सहज में उनके प्रति श्रद्धा जाग जाती है। जैसे सारे रोग-सोग यहीं खतम हो जाएँगें। मैंने यहाँ आकर देखा तो हैरान रह गई कि किस तरह से लोग इनकी आध्यात्मिक नाट्यशैली से आकर्षित होकर भीड़ में तब्दील हो जाते हैं। भीड़ इन्हें मालामाल कर रही है।
पीड़ा थी, सो मैं भी लाइन में खड़ी हो गई। मेरा लंबर आने पर मैं उसके सामने बैठ गई। उसने मेरी समस्या पूछी। मैंने बता दी। वह मुझे बहुत देर तक घूरता रहा। मेरा हाथ पकड़कर उसने नब्ज देखी। उसका स्पर्श ऐसा था कि मैं असहज हो गई थी। वह हट्टा-कट्टा, तड़ंग जवान है। खूब खाया-अघाया है। मुझे वह बार-बार छू रहा था। मैंने धीरे से अपना हाथ खींच लिया था। मेरे बारे में हरबी जिज्जी से पूछ रहा था। वही बताती रही, मैंने कुछ नहीं बताया।
हरबी जिज्जी लिबा गई थी मुझे। कह रही थी कि रमकल्लो तू वहीं दिखा दे, बाहरी हवा होगी तो झाड़-फूंक से सही हो जाएगी। यह गुनिया रात को भी तन्त्र-मन्त्र करता है। मैंने जिज्जी से साफ कह दिया था कि मैं ठीक होऊँ या न होऊँ, रात को न आऊँगी।
सुना है इसने कई औरतों को भटका दिया है। उसकी पहुँच ऊपर तक है, इसलिए लोग सीधे कहने से डरते हैं। पता नहीं, वहाँ कैसा आकर्षण है कि लोग खिंचे चले 
आते हैं। एक औरत फुसफुसाकर कह रही थी कि एक महिला गोद भरने की आस में यहाँ आई थी। गुनिया ने उसकी इज्जत पर हाथ डाल दिया। सुबह औरत ने खूब बवंडर काटा था। इसके बाद पता नहीं चला, क्या हुआ?
दूसरी औरत ने उसकी बात काट दी। वह औरत को गलत ठहराते हुए बोली, “रुपये ऐंठने के चक्कर में वह महाराज (गुनिया) को फँसाना चाहती थी। झूठ के पैर थोड़े होते हैं। झूठा बदनाम करने से महाराज बदनाम थोड़े हो जाएँगे।”
चर्चा यही हो रही थी कि उस औरत के घरवाले महाराज से डर गए थे। गुनिया ने भी रुपये देकर मामला रफा-दफा कर दिया। बताव ले, रुपयों से इज्जत थोड़े लौटती है। औरत पर क्या गुजरी होगी, कौन समझता है। मैं तो कहती हूँ कि ऐसे चार सौ बीसों को जेल की हवा खिलानी चाहिए।
हरबी जिज्जी वहीं जाती है। दामाद ने सरोजी को छोड़ दिया है। उसी के लिए आती रहती है। प्राननाथ, लड़के की कमी नहीं है, सरोजी ने ही उसे छोड़ दिया है। हरबी जिज्जी भी कम नहीं है, आग में पानी नहीं, पेट्रोल डालती है और बुझाने के लिए इधर-उधर दौड़ती है। यह तो वही बात हो गई कि चूल्हे में हगे, सनीचर को खोरी दे।
मैंने तो जिज्जी को पहले ही समझाया था कि उनके बीच दीवाल न बन। उन्हें समझा-बुझाकर एक करा दे, तब अठत्तर पढ़ रही थी, अब देहुरा-देहुरा घूम रही है। मैंने उसकी छोटी बेटी मुनिया से भी कहा था कि अम्मा और बहन को समझा, वे सही नहीं कर रही हैं, पर मेरा सुझाव किसी ने न माना। पबरै, मुझे क्या लेना-देना है।
ये समस्याएँ तो हैं ही, रोग-दोख वाले भी यहीं आते हैं। आदमी करे भी तो क्या ? दुख-तकलीफ दूर करने के लिए जहाँ इनके सींग समाते हैं, वहीं घुस जाते हैं। गरीबी जो न कराए, कम है। डॉक्टर लूट मचाए है। उधर से बचने के लिए इधर आते हैं। अस्पतालों में पैसे लूटे जाते हैं और यहाँ देह का शोषण होता है। आम जनता को तो पिसना ही है। ये पीसें या वो। कोई किसी की सुनता ही नहीं। रसूखदार बाबाओं की ऊपर तक पहुँच होती है, इसी भय से लोग समझौता कर लेते हैं।
प्राननाथ, मैं वहाँ दोबारा नहीं गई। डॉक्टर को दिखाया था। अब दर्द ठीक है। हरबी जिज्जी चिरमिरा रही थी कि तुझे किसी का विश्वास नहीं है। विश्वास कर लेती, तो चुटकी भर भभूत में काम हो जाता। मैंने कह दिया कि जिज्जी रोग भभूत से नहीं दवा से ठीक होते हैं। हरबी जिज्जी ठ्वासरे मार रही थी कि पैसा बढ़ा है, सो डॉक्टरों को लुटा रही है। मैंने जिज्जी से ज्यादा बहस न की।
प्राननाथ, अब मैं ठीक हूँ, चिन्ता की बात नहीं है।
शेष फिर
आपकी ही 
रमकल्लो

लखनलाल पाल 
जन्मतिथि- 2 जुलाई सन 1968 
जन्म स्थान- ग्राम व पोस्ट इटैलिया बाजा जिला हमीरपुर उत्तर प्रदेश 
शिक्षा – b.sc गणित M.A हिंदी b.ed पीएच-डी हिंदी 
प्रकाशित रचनाएं- हंस, कथादेश, कथाक्रम ,लमही ,युद्धरत आम आदमी, सृजन समीक्षा, पुरवाई आदि में कहानियां प्रकाशित। 
सम्प्रति – रमकल्लो की पाती उपन्यास धारावाहिक रूप से पुरवाई पत्रिका में प्रकाशित 
प्रकाशित पुस्तकें – बाड़ा ऋतदान, रमकल्लो की पाती (उपन्यास) पंच बिरादरी , कोरोना लॉकडाउन और लड़की (कहानी संग्रह )
 वर्तमान पता- कृष्णाधाम के आगे नया रामनगर उरई जिला जालौन उत्तर प्रदेश 28 5 001 
ई-मेल – [email protected]


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12 टिप्पणी

  1. https://www.thepurvai.com/ramkallo-ki-pati-by-lakhanlal-pal-11/
    रमकल्लो धीरे-धीरे बहुत समझदार होती जा रही है। अब वह दुनिया देख रही है। कुछ भी उसकी आँखों से छुपा नहीं है।गाँव में रहते हुये भी किसी भी बीमारी को लेकर वह साधु संन्यासी और बाबाओं में विश्वास नहीं करती। आजकल के बाबाओं के किस्से सुनती रहती होगी कि किस तरह वह लोग मौका पाकर स्त्रियों की इज्जत लूट लिया करते हैं। सब ढोंगी है। मन में राम बगल में ईंटें लिए घूमते हैं यह लोग।

    हरबी जिज्जी के कहने पर वह किसी बाबा के पास गई तो लेकिन उस बाबा के रंग-ढंग देखकर उसने डॉक्टर के पास ही जाना ठीक समझा। और उसे उसकी दवा माफिक भी आ गई। रमकल्लो इतनी बेवकूफ नहीं है कि ऐसे उल्टे-सीधे बाबाओं की गिरफ्त में आ जाये। हर समय वह सतर्क रहती है। हर परिस्थिति में उसे अपनी इज्जत की रक्षा करना आता है।
    वह एक सुंदर व चंचल तितली की तरह है वह जो खतरे का आभास पते ही उस जगह से उड़ जाती है। उसकी समझदारी और साहस की कायल होती जा रही हूँ मैं।

    लखनलाल जी आपके लेखन पर आपको बधाई।

  2. शन्नो जी, आपने रमकल्लो की चतुराई का बहुत सटीक और प्यारा कमेंट दिया है। आपके द्वारा दिया गया तितली का प्रतीक रमकल्लो के चरित्र से मेल खा रहा है।
    आपकी टिप्पणी रचना की स्वीकार्यता पर मुहर लगा रही है। आपका बहुत-बहुत धन्यवाद

  3. लखनलाल पाल जी
    आप की रमकल्लो के चरित्र में जो परिवर्तन आ रहें हैं वे वाकई तारीफ के काबिल है जिसमें कोई आशंका नहीं है। अंधविश्वास का शिकार हिन्दुस्तान भविष्य में किस मोड़ पर पहुंचेगा इस खयाल से आत्मा कांप जाती है।
    गांव के प्रधान की हरकतों से रमकल्लो ने निश्चित ही बोध ग्रहण किया है इसलिए वह दिन ब दिन सयानी और कर्मशील बनने जा रही है।
    काश मेरे हिन्दुस्तान की हर व्यक्ति अंधविश्वास से आजाद हो जाएगी तो हिन्दुस्तान विश्वगुरु बनने में अधिक समय नहीं लगेगा।
    सुन्दर पाती की तरह रमकल्लो का वैचारिक सौन्दर्य भी बढ़ता रहे यही शुभकामना और बधाई!
    सादर

    • प्रोफेसर विजय महादेव गाडे जी की प्रतिक्रिया पात्र रमकल्लो का हौसला बढ़ाने वाली है। हिन्दुस्तान की हर नारी को अंधविश्वास से मुक्त, कर्मशील और सयानी हो जाने की इस कामना में रमकल्लो का उदाहरण गर्व की अनुभूति करा गया।
      आपका बहुत-बहुत आभार सर

  4. इसबार की रमकल्लो की पाती बहुत खास हैऋ खास इन अर्थों में कि ग्रामीण अंचल के अंधविश्वास, भूत-प्रेत और तंत्र क्रियाओं के गोरखधंधों आदि का विस्तार अब महानगरों में भी खूब फूल-फल रहा। गाँव का होने के कारण मेरा मानना है कि भूत-प्रेत, चुड़ैल,अनिष्टकारी बाहरी शैतानी हवा आदि ग्रामीण जीवन के अँधविश्वासी अभिन्न अंग रहे हैं।इक्कीसवीं सदी के द्वार पर दस्तक दे रहा आधुनिक डिजिटल गाँव अभी भी भूत- प्रेत जैसी मनगढ़ंत, काल्पनिक और सत्यानाशी आसुरी प्रवृत्तियों में भीतर तक धँसा हुआ है। जहाँ वह सात्विक लोक शक्तियों में आस्था रखता है, वहीं जादू-टोना, मूठ, डायन,भट्टी, जमीन के भीतर से गढ़ा धन निकालना, बलि तथा दिनारी (षड्यंत्र पूर्वक विष देना) जैसी अवैज्ञानिक व पाखण्डपूर्ण तंत्र क्रियाओं में भी विश्वास करता है। उनका ताबीज गले में लटकाए घूमता फिरता है। आज गाँव में जितना महत्व देवी-देवताओं कारसदेव, मैकासुर, देईबाबा, घटोई बाबा, बीजासेन व कालका मैया आदि का है, उतना ही महत्व भूत-प्रेतों का भी किसी न किसी रूप में बना हुआ है। इन भूत-प्रेतों और बाहरी हवा के अस्तित्व को गाँव का मन कभी नकार नहीं पाएगा।
    हालांकि घाट के घटोई पूजन में नदी के संरक्षण मूलभाव समाहित है। उसी तरह ब्रह्मदेव के थान के भीतर की जो वैज्ञानिकता है वह पीपल वृक्ष के माध्यम से वन संरक्षण को संदेश देती है।
    मगर दुःख इस बात का है कि देवी – देवताओं, भूत-प्रेतों, बाहरी हवा आदि का डर दिखाकर उसकी आड़ में तमाम फर्जी पीर, फकीर, बाबा, पाखण्डी, तांत्रिक, गुनिया,ओझा व भगत भोलेभाले लोगों का हर प्रकार से शोषण कर रहे हैं।आजकल यह धंधा जोरों पर है। अक्सर महिलाएँ इनके बहकावे में आकर अपना व अपने परिवार का अनिष्ट कर लेतीं हैं। रमकल्लो इन पाखंडी तांत्रिकों व उनके अड्डों की वास्तविकता जानती है। वह कम पढ़ी -लिखी जरूर है मगर प्रगतिशीलता से भरी है। इसलिए वह त्रांत्रिक बाबा की बुरी नजर से सचेष्ट व सावधान है। भले ही वह त्रांत्रिक के दरबार में लगी लंबी लाइन में अपने लंबर के लिए खड़ी
    रही। तांत्रिक बाबा का भूत भगाने के नाम पर महिलाओं के गोपन अंगों को घूरना तथा उनकी देह को बार-बार अश्लीलता से सयाश छूने की घिनौनी हरकतों को रमकल्लो नज़र अंदाज़ नहीं करती बल्कि पाखण्डियों व चरित्रहीनों को लगातार बेनकाब करते हुए अन्य महिलाओं को इन ढोंगियों की पोपलीला से अवगत कराती है। इससे पहले वह प्रधान जी की बुरी नीयत की भलीभाँति लानतमानत कर चुकी है। रमकल्लो की खुद्दारी काबिलेतारीफ है। इसके साथ ही वह नाइंसाफियो के खिलाफ भी मोर्चा खोलती है। एक अकेली स्त्री का यह संघर्षों की आग में तपकर कुंदन की तरह चमकदार है। वास्तव में रमकल्लो महिला सशक्तिकरण की संवाहिका बनकर हमारे सामने उपस्थित है…
    डॉ० रामशंकर भारती
    14/06/2025

  5. आदरणीय डॉ रामशंकर भारती जी, आपने गांव देखा है। देखा क्या आप तो उसी मिट्टी के है। गांव के तंत्र मंत्र से भलीभांति परिचित भी है। पाती में ये सब आना ग्रामीण जीवन का एक हिस्सा है। डॉक्टरों की लूट भी गरीबों को इस तरफ धकेलने पर मजबूर करती है।
    खैर ग्रामीण जीवन तो थोड़े बहुत उलट-फेर के साथ ऐसे ही चलता है।
    आपकी टिप्पणी ने उस स्थिति को बहुत अच्छे से व्यक्त कर दिया है। और बता दिया है कि ये सारी चीजें तर्कहीन और अवैज्ञानिक है।
    आपकी टिप्पणी मेरा उत्साहवर्धन करती है। आपका बहुत-बहुत आभार भारती जी

  6. काय री रम कल्लो तोये जो का ओरी,तें इतनी पढ़ी लिखी दुनिया डारी जानबे वारी ,तबहुं तेरो पेट पिरानो ,ओर ते डागधर
    की जंगा गुनिया नो पोची,
    अब जोई तो के हे कि बा हरबी
    जीजी लेवा गई ती
    अरे बो हरबिया पे ले अपनों घर तो समार ले ,
    अच्छी राई की तुम बा दुनिया की आंखे देखई के समज गई
    ओर फिर दुबारा बाके ईंते नई गई
    डांगधर को दिखादव सो नोनी हो गई
    अरे देखत तो रत टीवी में पेपर में जे बाबा साबा कैसी लूट मचाए, जे सांसी काय ,मो बजाबे की खात,मो बजाबो भी एक कला आय,
    पईसा से शरीर से सबसे मौका पर त ,लूट लेत ,जनता खो उल्लू बनाउत्त
    तुम तो दूसरन को समझावे वारी अब ऐसी बातन में न आईओ
    चलो अपओ ध्यान धरो
    प्राणनाथ की कछु खबर आई तो बताइयों ,वैसे तो तुमाय लखन लला से पतो करत रताई
    अच्छी राम राम

    • कुंती जी, आप तो रमकल्लो में पूरी तरह से घुल-मिल गई है। इस डांट-डपट में कितना अपनत्व है। इसे पढ़कर ही समझा जा सकता है।
      इतनी प्यारी टिप्पणी के लिए आपका बहुत-बहुत आभार कुंती जी

  7. आदरणीय सर जी!
    अबकी बार की पाती ने एक ऐसी समस्या का वर्णन किया है जो गाँवों में शायद आज भी प्रचलित हैं।
    गुनिया, ओझा ,बैगा! एक लंबे समय से इन नाम को नहीं सुना किंतु अंधविश्वास और अंध श्रद्धा की जड़ में आज भी यह काम हो रहे हैं। लोगों को जागरूक होने की जरूरत है।
    रमकल्लो ने पाती के माध्यम से एक जीवित चित्र खींच दिया। लोग समझते हुए भी समझना नहीं चाहते इससे बड़ी बेवकूफी और क्या हो सकती है?
    भलाई हुआ की राम कल समझ गई और उसने डॉक्टर की दवा ले ली।
    यह विषय गंभीर है।
    रमकल्लो की पाती के माध्यम से गाँव के माहौल ,सोच-विचार व गाँव की स्थिति, रहन-सहन,भाषा, तीज-त्योहारों से सभी परिचित हो रहे हैं, जिन्होंने गाँव नहीं देखा है वे गाँव से परिचित हो रहे हैं।
    रमकल्लो को हमारा बहुत सारा प्यार और आशीर्वाद। ईश्वर उसे सुखी रखे। पतिदेव तो ध्यान ही नहीं दे रहे हैं, ईश्वर के भरोसे ही
    अकेली रह रही है।
    इस के लिए आपका बहुत-बहुत बधाई!
    श्रृंखला को पढ़वाने के लिए तेजेन्द्र जी का शुक्रिया। पुरवाई का आभार।

    • नीलिमा करैया जी, आप द्वारा की गई समीक्षा पाती के मर्म को छू जाती है। समीक्षा की खासियत यह रहती है कि आप उसे आज के संदर्भ में और आज के गांवों को जानने से जोड़ देती है। इससे पाती का मजमून यथार्थ के नजदीक पहुंच जाता है।
      बढ़िया समीक्षा के लिए आपका बहुत-बहुत आभार

  8. बीच में बहुत सारी पत्तियाँ पढ़ने से रह गईं। विदेश में थी काम और घूमने के बीच पढ़ना नहीं हो सका । ख़ैर रमकल्लो बहुत सयानी है बाबाओं की पोल पट्टी समझ गई और चक्कर में पड़ी । हर रमकल्लो एक नईसमस्या उठाती है प्रकाश डालती है और समाधान भी सुझाव देती है । सुंदरलिखा।

  9. पत्र के बहाने से गांव में फैले अंधविश्वास पर प्रहार करती राम कल्लो की पाती अच्छी लगी।

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