Wednesday, February 11, 2026
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संपादकीय – हिंदी व्यंग्य में फैल चुका वायरस…!

जूनियर वायरस से ग्रस्त व्यंग्यकारों को भाषण देने से बचा लिया गया। उनको आदेश मिला कि आप रचना पाठ करेंगे। ये बेचारे दुधारी तलवार पर खड़े थे। सोच कर प्रसन्न हो रहे थे कि वे अभी तक युवा हैं, चाहे उम्र में राहुल गाँधी से एक साल बड़े ही होंगे। वहीं दिल में दर्द भङ़क रहा था कि हाय हम भाषण नहीं दे पा रहे!… भाषण देने वाले हम पर ही आऱोप लगाते रहेंगे कि हमारे कारण व्यंग्य में वायरस फैला हुआ है।

साहित्य अकादमी को अचानक कहीं से ख़बर मिली कि हिंदी व्यंग्य में संक्रमण फैल चुका है। यह लगभग काल बनने जा रहा है व्यंग्य विधा का। तुरत-फुरत मीटिंग बुलाई गई। सभी अधिकारियों ने चिंता जताई कि अगर यह संक्रमण फैलता चला गया, तो व्यंग्य विधा की तो असामयिक मौत होने का अंदेशा है। 
अधिकारियों के चेहरों पर हवाइयाँ उड़ रही थीं… तीन साल कोरोना वायरस के आतंक में बिताए थे। लोग अपने सग़े रिश्तेदारों तक के अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हो पा रहे थे। बेटा अपने पिता की चिता को भी लकड़ी तक से छूने को तैयार नहीं था। ऐसे में अगर व्यंग्य में संक्रमण फैल गया, तो विधा का क्या होगा और विधारी कहाँ जाएंगे।
एक अबोध पूछ ही बैठा, “सर यह विधारी क्या होता है?”
“अरे, इतना भी नहीं समझते! यदि खेल से खिलाड़ी हो सकता है, तो विधा से विधारी क्यों नहीं हो सकता?… साहित्य अकादमी का परम कर्तव्य है कि नए-नए शब्दों को ईजाद किया जाए।”… बेचारा सवाल पूछने वाला अपने आपको कोसने लगा कि इतनी साधारण-सी बात उसे आज तक समझ नहीं आयी, तो व्यंग्ययात्रा का हिस्सा कैसे बन पाएगा!
उसे नानी की जगह मामा याद आने लगे… गूगल मामा! जल्दी से गूगल में संक्रमण के अर्थ खोजने लगा।  
मामा ने गोद में बिठा कर प्यार से समझाना शुरू किया- संक्रमण का क्या मतलब है, तुम यही जानना चाहते हो ना?
संक्रमण का अर्थ है इंफेक्शन… और इंफेक्शन का मतलब है हमारे शरीर में हानिकारक जीवाणु, वायरस, फंगस या परजीवी का प्रवेश और उनकी वृद्धि। जब ये हमारे शरीर में पहुँचते हैं, तो वे हमारी कोशिकाओं को नुकसान पहुँचाते हैं और बीमारी का कारण बनते हैं।
“तो क्या व्यंग्य में भी वायरस, फ़ंगस या परजीवी प्रवेश कर चुके हैं?… ऐसे व्यंग्यकार ख़ुद व्यंग्य का संक्रमण हैं, या उनके कारण व्यंग्य का ‘संक्रमण काल’ शुरू हो गया है?”
“देखो बेटा! तुम आज जितने व्यंग्यकार देख रहे हो न, इनमें कुछ ज़बरदस्त व्यंग्यकार हैं, कुछ जबरदस्ती के व्यंग्यकार हैं – जो केवल समोसा और विज्ञापन ला-ला कर घोड़ों की कतार में खड़े गधे हैं, कुछ स्वयंभू आलोचक हैं – इसलिए यह ‘संक्रमण काल’ है। आई बात समझ में?”
अबोध की रूह काँप उठी… इतना कठोर वाला सच, कोई कैसे बोल सकता है? इसे अकादमी में बैठ कर सच बोलने का साहस कैसे हुआ?… इसे पता नहीं कि काल कोई भी हो, सच बोलने की सज़ा सभी कालों में एक-सी होती है!
क्योंकि व्यंग्य में वायरस फैला हुआ है, इसलिए कुछ दूसरी विधाओं के लेखकों को भी बुलाना ज़रूरी था। कविता जगत में तो संक्रामक रोग वर्षों से चल रहा है। उन्हें बुलाने से तो वायरस के अधिक फैल जाने का डर था… इसलिए तय हुआ कि नाटक वाले लोग यदि यहाँ आकर नाटक करें, तो शायद व्यंग्यकारों पर मरहम का काम हो सकता है। 
यह तो होना ही था कि जिसे निमंत्रित नहीं किया गया, उसने मुहिम चला दी कि- यह सब तो नाटक हो रहा है। नाटक वाले परेशान कि संक्रमण तो व्यंग्य में है, तो नाटक कैसे हो सकता है? ऐसे में शोर मच गया कि दो बड़े व्यंग्यकार को वायरस ने ऐसा घेरा कि उनके डॉक्टरों ने उन्हें रेल-यात्रा करने से रोक दिया। उन्होंने महाभारत के संजय की आत्मा का आह्वान किया है ताकि वे उन्हें आँखों देखा हाल सुनाएं। वायरस के कारण उन बुज़ुर्गों को यह भी याद नहीं रहा कि आजकल ‘चोचल मीडिया’ पर हर चीज़ मुफ़्त में देखी जा सकती है। ‘चोचलिस्ट मीडिया’ भी युवा लेखकों का वायरस है!
जूनियर वायरस से ग्रस्त व्यंग्यकारों को भाषण देने से बचा लिया गया। उनको आदेश मिला कि आप रचना पाठ करेंगे। ये बेचारे दुधारी तलवार पर खड़े थे। सोच कर प्रसन्न हो रहे थे कि वे अभी तक युवा हैं, चाहे उम्र में राहुल गाँधी से एक साल बड़े ही होंगे। वहीं दिल में दर्द भङ़क रहा था कि हाय हम भाषण नहीं दे पा रहे!… भाषण देने वाले हम पर ही आऱोप लगाते रहेंगे कि हमारे कारण व्यंग्य में वायरस फैला हुआ है। 
जब कभी हिंदी के साहित्यकार या विधारी कहीं इकट्ठे हों, तो आरोप-प्रत्यारोप लगाना एक ज़रूरी शर्त है। यदि आरोप न लगें और आयोजकों को कटघरे में न खड़ा किया जाए, तो परंपरा का निबाह नहीं हो पाता। आरोप यहाँ भी लगे, और जलसे में शामिल होने वालों पर दबाव इतना बढ़ा कि ब्लड-प्रेशर मापक यंत्र की सुई फ़ुल-स्पीड पर चक्कर काटने लगी। कौन किसके साथ बैठा, और किसने क्या कहा? उसी पर बहसें होनें लगीं। जिसने कल किसी के चरित्र पर आऱोप लगाया था, वह आज उसी के साथ मंच पर बड़ी आत्मीयता से गले मिल रहा था।
सेमिनार का पहला वाक्य बोलने वाले ने स्वयं तो कभी व्यंग्य लिखा नहीं, मगर उसके वाक्य में व्यंग्य और व्यंग्यकारों के प्रति इतनी अधिक चिंता थी कि सबके भीतर का वायरस पेंडुलम की तरह झूलने लगा। “आजकल व्यंग्यकार सबसे अधिक निशाने पर हैं!” बेचारा अबोध सोच में पड़ गया। आजकल निशाना तो केवल एक ही व्यक्ति साध रहा है… और वह है- राहुल गाँधी, फिर भला वह क्यों व्यंग्यकारों पर निशाने साध रहा है? उसके पास तो और कई निशाने हैं- साधने के लिए… साधने का प्रयास भी करता है… मगर लगता है कि उसके तीरों में भी वायरस फैल चुका है। निशाने पर कुछ लगता ही नहीं। 
कुछ लोग दानवीर कर्ण के भक्त थे वहाँ । उन्हें व्यंग्यकारों की इतनी फ़िक्र थी कि वे उनकी रक्षा के लिए कवच और कुंडलों की माँग करने लगे। सूर्य भगवान चिंता में पड़ गए कि अकेले कर्ण के लिए कवच और कुंडल बनवाने में उनके आधे खेत बिक गये थे, अब हिंदी के महान व्यंग्यकारों के लिए इतनी बड़ी संख्या में जब बनवाने पड़ेंगे, तो उन्हें तो अपनी अग्नि तक गिरवी रखनी पड़ जाएगी। 
कहानीकार और नाटककार आपस में भिड़ रहे थे कि यह काल व्यंग्य का ‘संक्रमण काल’ नहीं, बल्कि नाटक और कहानी का ‘संकटकाल’ है। दो तीन कवि भी वहाँ खड़े थे। वे भी आँखों में आँसू भर कर बोले… हम तो चिता पर से उठ कर कह रहे हैं कि कविता के बारे में कुछ सोचा जाए। अब तो प्रकाशक बिना पैसा लिए काव्य संग्रह छापता ही नहीं।
असली भिड़ंत तो दिखी आलोचना सेशन में! तथाकथित आलोचक याद नहीं रख पाए कि उन्हें बोलने का समय केवल पंद्रह मिनट दिया गया है। बेचारे पंद्रह मिनट में तो विषय पर ही नहीं आ पाए। कभी आएं तो कभी बाएं तो कभी टाएं… अध्यक्ष तो अपने सर्जन मित्र की कैंची साथ लाए थे। उन्होंने निकाली जेब से कैंची और आलोचक के भाषण की तार काट डाली। आलोचक को तो समझ ही नहीं आया कि एक अदना से लेखक में इतनी हिम्मत कि वह उसके भाषण में विघ्न डाले! उसने कैंची का मुकाबला अपनी ज़बान की तलवार से लेने की ठान ली। माइक पर ही अध्यक्ष की अध्यक्षता की ऐसी-तैसी कर डाली। सभी व्यंग्यकारों को अपनी-अपनी औक़ात समझ में आ गई। आलोचक मंच से भुनभुनाता हुआ उतर गया। वापिस अपनी सीट पर नहीं बैठा। 
अब बारी थी अध्यक्ष की। अतिरिक्त गंभीर मुद्रा बनाए वे अपनी बात रख रहे थे। उन्हें कुछ यह भी लग रहा था कि व्यंग्यकार छायावाद के चंगुल में फँस रहा है। उन्होंने चेतावनी दे डाली कि “अपनी छाया से बाहर निकलो।” अबोध बालक ने देखा कि उस वक्त तो उसकी छाया धरती पर पड़ ही नहीं रही थी, फिर वह इस छाया से बाहर निकले तो कैसे निकले। मगर याद आया कि वह तो व्यंग्यकार है ही नहीं। इसीलिए उसकी छाया धरती पर नहीं पड़ रही। धरती पर छाया केवल व्यंग्यकारों की ही पड़ती होगी। 
मगर आलोचक अभी तक अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहा था। नीचे से ही चिल्लाया। “अबे ओ शेरवानी पहने प्राणी… समय तो तुम्हारा भी समाप्त हो चुका है। अपनी बात ख़त्म करो और जा कर बैठो अपनी कुर्सी पर। देखने वालों का तो रंग ही उड़ गया… शेरवानी पर आलोचक के गुस्से का रंग जगह-जगह फैल गया। अध्यक्ष की आँखों पे लगे चश्मे का शीशा चटक गया। अब लेखक और आलोचक में एक गहरी दरार पैदा हो गई।
सबसे बढ़िया बात कही गई – राग भोपाली में। व्यंग्यकारों को भारत के संविधान में कोई भरोसा नहीं, क्योंकि इसमें तो 150 बार संशोधन किया जा चुका है। इस महान साहित्यकार का कहना था कि भारत के संविधान में हम ग़रीब व्यंग्यकारों के लिए कुछ भी नहीं सोचा गया है। बाबा साहब अंबेडकर एक गंभीर व्यक्ति थे। उन्हें व्यंग्य विधा से किसी प्रकार का प्रेम नहीं था। हम सबको मिल कर व्यंग्यकारों का एक नया संविधान लिखना होगा। 
अबोध बालक सब कुछ सच-सच लिखता जा रहा था। शायद उसे कहा गया था कि ‘मिनट्स ऑफ़ दि मीटिंग’ उसे ही लिखने हैं। उसे मालूम था कि भारत का कोई समाचार-पत्र तो उसकी बात छापने वाला है नहीं। फिर इतनी मेहनत क्यों की जाए। फिर उसके दिमाग़ में आया कि ‘पुरवाई’ जब पश्चिम की ओर बहे, उसमें तमाम शब्द उड़ने के लिए छोड़ दो… स्वयंमेव ही वे अपने ठिकाने पर पहुँच जाएंगे… जिसे इन शब्दों की ख़ुशबू महसूस होगी… वह छाप लेगा…
तभी एक व्यंग्यकार कह उठा – ‘तुम्हीं ने दर्द दिया है तुम्हीं दवा देना’ – यानि कि व्यंग्य विधा में ‘संक्रमणकाल’ लाने के ज़िम्मेदार व्यंग्यकार ही हैं, इसलिए इस चक्रव्यूह से बाहर निकलने का तरीका भी उन्हीं को ढूँढना होगा।
तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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55 टिप्पणी

  1. वायरस व्यंग्य में नहीं बल्कि व्यंग्य के कथित मठाधीशों और उनके अनुगामियों के मन-मस्तिष्क में पैठ बना चुका है। बाकी संपादकीय सार्थक व व्यंजना से भरपूर है। इसके लिए बधाई तो बनती ही है।

      • वाह जी वाह बहुत व्यंग्यपूर्ण सार्थक संपादकीय हेतु बधाई। वैसे मेरा बाहर निकलना बहुत कम हो पाता है लेकिन इस सारे प्रकरण की चश्मदीद गवाह मैं भी हूं,,,,,,,,जय श्रीराम

  2. व्यंग्य की दुनिया में डर का माहौल है । कुछ बड़े व्यंग्यकार अपने सिंहासन को बचाने के प्रयास में लग चुके हैं । एक प्रवासी कहानीकार कह कर जिसे साहित्य वाले घाघ लोग किनारे लगाने का प्रयास करके हार मान चुके थे ।वो अब व्यंग्य की धारदार पैनी कलम लेकर मैदान में उतर चुके हैं । आपको साधुवाद इसकी चुभन बहुत देर तक और दूर तक महसूस होगी

  3. व्यंग का संक्रमणकाल पर बढियां
    व्यंगात्मक विचार – इन दिनों यह प्रसंग चर्चा में है ।
    साधुवाद
    Dr Prabha mishra

  4. धारदार व्यंग्य, व्यंग्य के कथित संक्रमण काल पर। विधारी से याद आया एक वनस्पति का जिसका नाम विधारा है। विधारा इन दिनों फूल रहा है। इसके सेवन से पुरुषत्व की धार तेज होती है, व्यंग्य की भी होनी चाहिए।

  5. शानदार सर जी। लगता है 24 घंटे भिगोकर मारा। व्यंग्य के संक्रमण काल पर कमाल करता भाषण आपके मित्र डॉ.संजीव कुमार ने दिया,ऐसा सुना। उन्होंने इस विषय पर 8-10 पुस्तकें भी लिखी हैं। उनके सद्प्रयासों के बावजूद व्यंग्य में वायरस तेजी से फैल रहा है।.लेकिन एक वरिष्ठ व्यंग्यकार ने कहा कि इस वायरस के प्रभाव से लगभग 500 युवा व्यंग्य लेखन की बीमारी का शिकार हो चुके हैं। 500 पहले से ही थे। साहित्य अकादमी ने उनके इलाज के लिए ही वह कार्यक्रम किया था जिससे वे सही होकर व्यंग्ययात्रा में शामिल हो सकें। आपका संपादकीय उन्हें सही दिशा देगा ः

    • रूप भाई, इसीलिए पुरवाई पत्रिका को व्यंग्य का सहारा लेना पड़ा। आपका बहुत शुक्रिया।

  6. अद्भुत! व्यंग लेखन को व्यंग्यात्मक रूप से कटाक्ष करता हुआ संपादकीय! बधाई तेजेंद्र जी।

  7. अच्छा व्यंग्य रचा है किन्तु जब से आरोप का समाचार सामने आया है साहित्य अकादमी खुद व्यंग्य का पात्र बन चुकी है और जो शामिल हो रहे हैँ उनको कुछ कहने का अर्थ ही नहीं है।

  8. बढ़िया सा गुदगुदाता सा संपादकीय। व्यंग्य की कसौटियों के सभी मानकों के सिर पर हाथ फेर,व्यंग्य विधा और उसके संपर्क चाशनी के हलवाईनुमा व्यंग्यीयों को आईना दिखाया संपादकीय।
    कभी किशोरावस्था में लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यकारों की कृतियों से आनंदित होते थे उसी की प्रतिकृति यहां इस संपादकीय में नज़र आई।
    सही कहा है,व्यंग्यकार तो उंगलियों पर गिने जा सकते हैं पर आजकल तो युवाओं में इस विधा की एआई के माध्यम से बैंड बजाया जा रहा है।
    साहित्य अकादमी की भी खूब ख़बर की गई है और मीडिया को भी इस संस्था पर अपना स्कैनर लगना चाहिए ताकि इस की साहित्यकारों के आमंत्रण और पुरस्कार बंदर बाँट का पता चले।
    खैर जो भी हो इस उल्लेखनीय संपादकीय हेतु संपादक और पुरवाई पत्रिका समूह को हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई हो।

    • भाई सूर्यकान्त जी, आप आजकल इतने व्यस्त रहते हैं फिर भी संपादकीय को पढ़ कर प्रतिक्रिया भेजने के लिये समय निकाल ही लेते हैं। आपको संपादकीय पसंद आया, यह हमारे लिये विशेष उपलब्धि है।

  9. व्यंग की कसौटी के सभी मानकों को आपने विस्तार पूर्वक धो दिया है। साहित्य अकादमी को भी एक संदेश भेजा है अगर वह समझ जाएं तो।
    बहुत बढ़िया संपादकीय तेजेंद्र जी!
    व्यंग विद्या पर संक्रमण काल लाने की जिम्मेवारी भी आपने व्यंग्यकारों पर ही डाल दी। बहुत खूब!
    लगे रहो मुन्ना भाई!

  10. सादर नमस्कार सर …. वाह्ह्ह… सार्थक लेख.. व्यंग्य पर सार्थक व्यंग्य…
    हर पीढ़ी के रचनाकारों के लिए उत्कृष्ट मार्गदर्शन..
    साधुवाद ….

    • सुंदर। व्यंग्य पर आधारित व्यंग्यात्मक संपादकीय। साहित्य अकादमी के कार्यक्रम पर मीठी चुटकी। पिछला संपादकीय भी बहुत सुंदर था। उस पर टिप्पणी करते हुए मैंने लंबा उत्तर लिखा। मोबाइल फोन में अचानक टाइप किया हुआ सारा मैटर उड़ गया। अब अफसोस करें भी तो क्या करें।
      आपकी पुरवाई पुरवाई के साथ पछुआ हवा को भी लाती रहती है। प्रत्येक घटना पर आपका दृष्टिकोण और उसका सूक्ष्म विश्लेषण पाठकों को नई दृष्टि देता है। आप परिश्रमपूर्वक पत्रिका का अंक नियमित निकाल रहे हैं, इसके लिए जितनी भी प्रशंसा की जाए, कम है।
      भाई लखनलाल पाल की रमकल्लो की पाती की धारावाहिक शृंखला मजेदार होती है और लोगों को उसे पढ़कर बुंदेलखंड की सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना और बुंदेली बानी का मिठास मिल रहा है।
      राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर पर हुए कार्यक्रम की रिपोर्ट पढ़कर मन आनंद से भर गया। आपकी जय हो। आप निरंतर सृजनशील रहें, यही परमात्मा से प्रार्थना है।
      पुनश्च, एक बार मैंने आपके संपादकीय पर टिप्पणी करते हुए वर्तनी की त्रुटियों की तरफ आपका ध्यान इंगित किया था। दरअसल वह मेरी अपनी चूक थी। मेरे मोबाइल फोन में ट्रांसलेशन की कोई प्रविधि शुरू हो गई थी जिसके कारण आपका संपादकीय मुझे बदला-बदला नजर आ रहा था और मैंने आपके संपादकीय के वाक्य-विन्यास और वर्तनी पर कमी को इंगित किया था। इस हेतु मैं क्षमाप्रार्थी हूं। आप बहुत सूझ-बूझ के साथ भाषा का बर्ताव करते हैं।

  11. भाई जयशंकर तिवारी जी, आपकी विस्तृत टिप्पणी ने संपादकीय के बहुत से पहलुओं को खंगाला है। हम आभारी हैं।

    वाक्य विन्यास और वर्तनी पर आपकी चिंता जायज़ थी मगर हम समझ रहे थे कि समस्या मोबाइल की सेटिंग में है। चलिए अब सब ठीक है। स्नेह बनाए रखें।

  12. इस बार का संपादकीय-हिंदी व्यंग्य में फैल चुका वायरस…! अभी तक के पढ़े गए संपादकीयों से हटकर है। मैं स्तरीय व्यंग्य लिखना कठिन मानता हूं। आपने यह जोखिम उठा लिया है।
    इस संपादकीय में हिन्दी व्यंग्यकारों पर व्यंग्य किया गया है। हर मंचीय कवि मंच पर एक व्यंग्य तो जरूर सुनाता है। इसके बिना उनका निबाह ही नहीं हो सकता है। व्यंग्य की अनिवार्यता ने (जिसे संपादक महोदय जी ने संक्रमण कहा है) व्यंग्य को कुछ हद तक फ़ूहड़ तथा हल्का बना दिया है। कुछ व्यंग्यकार ही सुनने लायक बचे हैं।
    संपादक जी एक श्रेष्ठ कहानीकार हैं इसलिए इस संपादकीय में कथा का आभास मिल जाता है। हिन्दी साहित्य अकादमी की चिंता कि व्यंग्य में वायरस फैल चुका है। बस यहीं से पाठक अकादमी का सेमिनार, और उसमें अध्यक्ष और आलोचक की तीखी नोक झोंक का आनंद लेने लगता है। वर्तमान सेमिनारों की दिशा और दशा पर जो करारी चपेट लगाई है, वह तल्ख हकीकत को हमारे सामने रख देती है। जूनियरों की अभी खुद की छाया नहीं दिखती है इसकी व्यंजना बहुत मारक है।
    कोरोना वायरस की दहशत को ऐसे तीखे अंदाज में कह दिया है कि मानव की नौटंकीबाजी अपने आप ही सिद्ध हो जाती है। ज्यादा कहने की जरूरत ही नहीं पड़ती है। मां बाप की सारी दौलत के जन्मजात हकदार बेटा-बेटी वायरस से घबराकर उनका दाह-संस्कार करने से डर जाते हैं। यह आंखों देखी महामारी का कड़वा सच रहा है।
    कविता से लेकर कहानी, नाटक जैसी विधाएं भी संपादकीय की चपेट में आ गई हैं। इन पर चपत भी ढंग की लगाई है। इस सच्चाई से तिलमिलाहट तो होती है पर इसको नकारा भी तो नहीं जा सकता है।
    साहित्य और राजनीति में घनिष्ठ संबंध रहा है। राजनीति का मुंह लगा व्यंग्य ढीठपने के साथ उसी के इर्द-गिर्द चक्कर काटता देखा गया है। आपने राजनीति पर जो व्यंग्य किया है वह कहीं खत्म नहीं हो रहा है। वह यूं ही चलता रहता है। छोड़े जा रहे बाणों में जो वायरस पनप गया है वह लक्ष्य वेध नहीं कर पा रहा है। ये प्रतीक थोड़े में भी बहुत कह जाते हैं।
    नई तरह की यह संपादकीय प्रभावित करती है। मस्तिष्क में बहुत समय तक टिके रहने का वादा भी करती नजर आ रही है।
    व्यंग्यात्मक विधा में लिखी संपादकीय के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई सर

    • भाई लखनलाल पाल जी, आपको पुरवाई का नये ढंग का संपादकीय पसंद आया और आपने इसकी भी सही ढंग की सर्जरी की है… हमारा तो दिन बना दिया आपने।

  13. बेहद उम्दा संपादकीय, तीखा , मीठा, खट्टा, हर स्वाद से भरपूर मजेदार और स्वादिष्ट होने के साथ-साथ लेखन के स्वास्थ्य के लिए भी बेहद उपयोगी।
    पुरवाई की हवाएँ तो हर दिशा में चलती हैं और शब्दों को विश्व में पहुँचाने की ताकत रखती हैं।
    तेजेंद्र भाई आपकी कलम में वो जादू है जो पढ़ने वाले का मन तो मोह ही लेता पर ज्ञान चक्षु भी खोल देता है।
    साधुवाद आपको

  14. व्यंग्य बहुत ही सुंदर बन पड़ा है क्या बताएं! किसी ने ठीक कहा है : व्यंग्य सुन कर सभी मुस्काते हैं, हंसते है – साथ ही वे भी जिन पर व्यंग्य लिखा गया है अन्यथा लोगों को पता चल जाएगा, कि व्यंग्य इन पर लिखा गया है; बल्कि व्यक्तिगत तौर पर इन पर ही फिट होता है।

  15. व्यंग्यात्मक शैली में लिखा गया आपका संपादकीय बहुत ही रोचक है हार्दिक शुभकामनाएं

  16. ‘व्यंग्य में फ़ैल चुका है वाइरस’ संपादकीय ने आपके नये रचना कौशल व्यंग्य विधा से परिचय करवाया है। कुछ दृष्टांत तो व्यंग्य की खूबसूरत मिसाल हैं। आपके ही शब्दों में-
    साहित्य अकादमी को अचानक कहीं से ख़बर मिली कि हिंदी व्यंग्य में संक्रमण फैल चुका है। यह लगभग काल बनने जा रहा है व्यंग्य विधा का। तुरंत -फुरंत मीटिंग बुलाई गई। सभी अधिकारियों ने चिंता जताई कि अगर यह संक्रमण फैलता चला गया, तो व्यंग्य विधा की तो असामयिक मौत होने का अंदेशा है। व्यंग्य विधा के संक्रमण को कोरोना काल से जोड़ना -बहुत खूब।
    समय से ज्यादा भाषण देने वालों पर व्यंग्य के लिए सर्जन मित्र की कैंची का खूबसूरत उपयोग – उन्होंने निकाली जेब से कैंची और आलोचक के भाषण की तार काट डाली।

    -सेमिनार का पहला वाक्य बोलने वाले ने स्वयं तो कभी व्यंग्य लिखा नहीं, मगर उसके वाक्य में व्यंग्य और व्यंग्यकारों के प्रति इतनी अधिक चिंता थी कि सबके भीतर का वायरस पेंडुलम की तरह झूलने लगा।
    -बड़े व्यंग्यकार को वायरस ने ऐसा घेरा कि उनके डॉक्टरों ने उन्हें रेल-यात्रा करने से रोक दिया। उन्होंने महाभारत के संजय की आत्मा का आह्वान किया है ताकि वे उन्हें आँखों देखा हाल सुनाएं। वायरस के कारण उन बुज़ुर्गों को यह भी याद नहीं रहा कि आजकल ‘चोचल मीडिया’ पर हर चीज़ मुफ़्त में देखी जा सकती है। ‘चोचलिस्ट मीडिया’ भी युवा लेखकों का वायरस है!
    -कुछ लोग दानवीर कर्ण के भक्त थे वहाँ । उन्हें व्यंग्यकारों की इतनी फ़िक्र थी कि वे उनकी रक्षा के लिए कवच और कुंडलों की माँग करने लगे

    जूनियर वाइरस से ग्रस्त व्यंग्यकार, विधा, विधारी, नानी की जगह मामा याद आने लगे अर्थात गुगुल मामा साहित्य की हर विधा के साथ जूनियर व्यंग्यकारों के सन्दर्भ में राहुल गाँधी को लपेटना किसी मिर्च मसाले से कम नहीं है।

    शब्दों का खूबसूरत प्रयोग। उत्कृष्ट संपादकीय के लिए साधुवाद।

    • सुधा जी आपने तो संपादकीय में से इतने तमाम उदाहरण दे कर अपनी टिप्पणी लिखी है कि हमें सच में कुछ गर्व जैसीअनुभूति होने लगी है।

  17. हिंदी व्यंग्य का संक्रमण काल
    आदरणीय तेजेंद्र शर्मा जी का संपादकीय वाकई सराहनीय है। “देखने में छोटे लगते घाव, करेंगे गंभीर”— इसमें हिंदी व्यंग्यकारों की खोज और हालात को बखूबी उजागर किया गया है।
    व्यंग्यकार, आलोचक और अकादमी—सब मिलकर हास्य और गंभीरता का अद्भुत मिश्रण प्रस्तुत कर रहे हैं। व्यंग्यकारों की परिस्थितियाँ, उनके विरोध और संघर्ष की जीवंत झलक पाठक तक पहुँचती है। हास्य, रूपक और व्यंग्य के माध्यम से समाज और साहित्य की सच्चाई का चित्रण किया गया है।
    तेजेंद्र शर्मा जी ने यह स्पष्ट किया कि व्यंग्य केवल हँसी का माध्यम नहीं, बल्कि साहित्यिक चेतना और जिम्मेदारी का प्रतिबिंब भी है। इसलिए, व्यंग्यकारों को अपने कर्तव्य का निर्वहन पहले भली प्रकार करना चाहिए, क्योंकि इसकी अनदेखी से हिंदी व्यंग्यकारों के बीच संक्रमण काल सा फैल गया है जिसके जिम्मेदार वे स्वयं ही हैं.. I

  18. सर.
    हम तो कहानी वाले हैं, व्यंग्य हमारे लिए दिल्ली दूर है जैसी विधा है…

  19. सच है व्यंग्य के हाल नासाज़ हैं ।‌आजकल तो दिखाई भी नहीं देते _ दिख भी जायें तो बड़े मरियल से-सपाट .. साफ़ पता चल जाता है कि जबरन बाहर निकाले गये हैं। हाल तो नाटक के भी अच्छे नहीं हैं। काव्यविधा जी बहुत फलफूल रही हैं।‌ उनके अन्दर का खोखलापन “छिप जाने में ” सफल हो जाता है .. और क्यों ना हो हमारे देश का हर दूसरा व्यक्ति कवि जो है; उसने काव्यगोष्ठियों का अम्बार लगा रखा है जिसमें आएं,बाएं शाएं सब खप जाता है।
    ये गुदगुदाता संपादकीय पढ़कर मज़ा आ गया । व्यंग की शोचनीय स्थिति पर सोचने का मन तो हुआ फिर सोचा कि हमारे सोचने से स्थिति में सुधार हो सकता होता तो हम पेशेवर “सोचारी” ( जैसे खेल से खिलाड़ी) ही बन जाते। ख़ैर…
    साधुवाद तो बनता है सर !

  20. आदरणीय तेजेन्द्र जी!

    इस बार के संपादकीय- *व्यंग्य में फैल चुका वायरस* ने हास्य व्यंग्य और आश्चर्य तीनों का साक्षात् रूप धारण किया हुआ है।

    जो हास्य- व्यंग्य सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक, सांप्रदायिक व और भी अन्य विद्रूपताओं को इंगित करते हुए उस पर अपनी तलवार की पैनी धार चला कर उसकी सफाई का प्रयास करता था चहुँ ओर गंदगी दूर कर स्वच्छता व्याप्त हो वही व्यंग्य वायरस के कारण व्यंग्य के घेरे में है!!!!!
    समस्या यह है कि इस वायरस का उपचार क्या हो सकेगा? जो दूसरों का उपचार करने में लगा था उसका उपकारी कौन होने वाला है क्या पता?
    वह गाना अचानक याद आया –
    चिंगारी कोई भड़के तो सावन उसे बुझाए।
    सावन जो आग लगाए….
    भले यह गाना वियोग श्रृंगार से जुड़ा है लेकिन फिर हाल तो हास्य- व्यंग्य के लिये सटीक लग रहा है।

    पहली बार आपको फुल प्रूफ व्यंग्य में पढ़ने का मौका लगा।
    हम आश्चर्य से कभी इस व्यंग्यकार छवि को और कभी उस कहानीकार छवि को देखते हैं।
    संपादकीय का यह उच्च स्तर है महसूस हुआ।
    सच में धमाल कर दिया।

    इस बार का संपादकीय अणुबम के धमाके की तरह लगा।
    इस पर तो बधाई का पहाड़ न्यौछावर।

    • नीलिमा जी, इस सार्थक टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद। आपको संपादक का व्यंग्यकार रूप पसन्द आया, इसके लिये बहुत शुक्रिया।

  21. व्यंग्यात्मक शैली में लिखा गया आपका नवीनतम संपादकीय रोचक भी है और मारक भी। ‘कुछ जबरदस्त व्यंग्यकार हैं कुछ जबरदस्ती के व्यंग्यकार हैं’, ‘कुछ स्वयंभू आलोचक हैं’, ‘सच बोलने की सजा सभी कालों में एक जैसी होती है’ ये कुछ उदाहरण हैं जो सूत्र रूप में बड़े से बड़ा कथन समेट लेते हैं। जो बात साधारण तरीके से कहने से कटु लग सकती थी, उसे आपने व्यंग्य में लपेटकर, थोड़ा हास्य का पुट देकर बड़ी आसानी से कह दिया है। आपके भीतर का व्यंग्यकार इस संपादकीय में पूरी तरह उपस्थित है। भाषा की वक्रता अत्यंत आकृष्ट करती है। सभी विधाओं का आपने लेखा-जोखा प्रस्तुत किया है और अंत मे व्यंग्य विधा के माध्यम से निष्कर्ष भी दे दिया है कि जिस विधा
    का संकट होगा, उसी विधा के रचनाकार उसकी कमियों को दूर
    कर सकते हैं। हार्दिक बधाई एक उम्दा व यादगार संपादकीय के
    लिए।

    • विद्या जी, आपकी टिप्पणी ने संपादकीय को सही परिप्रेक्ष्य में समझा दिया है। हार्दिक धन्यवाद।

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