भारत – जिसे कभी सोने की चिड़िया कहा जाता था आज एक बार फिर अपने गौरवशाली अतीत की ओर तेजी से लौट रहा है। देश आज शिक्षा के क्षेत्र में जिस तरह से नई ऊंचाइयों को छू रहा है वह तो अपने आप में देश की मजबूत शिक्षा नीति को दर्शा ही रहा है लेकिन जिस तरह से अन्य क्षेत्रों में भी आगे बढ़ रहा है वह भी काबिलेगौर है। यही नहीं शिक्षा के साथ ही देश की सीमाओं की रक्षा, स्वनिर्भरता, अर्थव्यवस्था में उत्तरोत्तर सुधार, विदेशों के साथ भारत के बढ़ते रिश्ते, देश की आंतरिक शांति और देश में पुराने हो चुके कानूनों में जिस तरह से बदलाव कर सुधार की पटरी को और चौड़ा करने का काम किया जा रहा है; इससे पहले कभी किसी सरकार ने इन चीजों को न तो महसूस किया और न ही इस दिशा में कदम उठाने की जहमत उठायी।
कहा जाता है कुशल और बेहतर दृष्टिकोण रखने वाला नेतृत्व ही देश को महान बनाता है। शायद यह देश के तेजी से आगे बढ़ने का समय है। क्योंकि जिस तरह से आज गूगल जैसी अमेरिकी टेक कंपनियां भारतीय प्रतिभाओं का लोहा मानते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आदेशों की अवहेलना कर भारत में डाटा सेंटर बनाने के लिए 8 हजार करोड़ से अधिक के निवेश को तैयार है उसे देखते हुए यह कहना अतिश्योक्ति नहीं कि यह सदी भारत के गौरवपूर्ण उत्थान का है।
वहीं दूसरी ओर भारत की नई शिक्षा नीति से जिस तरह से बंद दरवाजे एक एक कर खुलते जा रहे हैं और देश में चहुंओर शिक्षा का प्रसार हो रहा है वह भी अपने आप में अभूतपूर्व है। सही मायने में देखा जाए तो भारत के माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने शिक्षा में व्यापक परिवर्तन की परिकल्पना करते हुए एक नई प्रणाली विकसित करने का सपना देखा था। जिसे अमली जामा पहनाते हुए शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान जी इसे वास्तविकता के धरातल पर उतार रहे हैं।
नई प्रणाली पूरी तरह भारतीयता के रंग में सराबोर है और इसके माध्यम से देश में उच्च-गुणवत्ता वाली शिक्षा प्रदान करने का यज्ञ जारी है। इस नीति के तहत एक समतामूलक और जीवंत ज्ञान-आधारित समाज में स्थायी रूप से परिवर्तित करने में प्रत्यक्ष योगदान के मिशन को पूरा किया जा रहा है। इससे भारत एक वैश्विक ज्ञान महाशक्ति बनने की दिशा में अग्रसर है। इस नीति की खासियत है कि यह पहुंच, समता, गुणवत्ता, सामर्थ्य और जवाबदेही जैसे पांच मार्गदर्शक स्तंभों पर आधारित है। जिसके माध्यम से हमारे युवा वर्तमान और भविष्य की विविध राष्ट्रीय और वैश्विक चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार होंगे।
वहीं दूसरी ओर स्कूली शिक्षा में, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 मुख्य मूल्यों और सिद्धांत पर जोर देती है कि शिक्षा को न केवल संज्ञानात्मक कौशल विकसित करना चाहिए, अर्थात, साक्षरता और संख्यात्मकता के ‘आधारभूत कौशल’ और ‘उच्च-क्रम’ कौशल जैसे कि आलोचनात्मक सोच और समस्या को सुलझाना – बल्कि सामाजिक और भावनात्मक कौशल भी – जिन्हें ‘सॉफ्ट स्किल्स’ भी कहा जाता है – जिसमें सांस्कृतिक जागरूकता और सहानुभूति, दृढ़ता और धैर्य, टीम वर्क, नेतृत्व, संचार, आदि शामिल हैं। नीति का उद्देश्य और आकांक्षा पूर्व-प्राथमिक शिक्षा को सार्वभौमिक बनाना है और इस वर्ष के अंत तक प्राथमिक विद्यालय और उससे आगे सभी के लिए आधारभूत साक्षरता/संख्यात्मकता की प्राप्ति पर विशेष जोर देती है। सुधारों के पीछे की मानसिकता भी बेहद उम्दा है।
दरअसल देश के शिक्षाविदों के साथ विमर्श के दौरान माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी शिक्षा के आकांक्षात्मक लक्ष्यों के साथ-साथ भारत की परंपरा, संस्कृति और मूल्य प्रणाली के अनुरूप बनाने की बात पर जोर देते रहे हैं। आज की शिक्षा नीति में उनका प्रभाव साफ परिलक्षित है। कई मौजूदा और प्रस्तावित पहलों के माध्यम से शिक्षा के साथ प्रौद्योगिकी को एकीकृत किए गए हैं, जिनमें ऊर्जावान पाठ्य पुस्तकें, शिक्षकों और शिक्षार्थियों की क्षमता निर्माण के लिए उच्च-गुणवत्ता वाली ई-सामग्री, सीखने के परिणामों पर आधारित प्रश्न बैंक आदि शामिल हैं। नीति में यह भी उल्लेख किया गया है कि देश भर में हर बस्ती में प्राथमिक विद्यालय स्थापित करने से शिक्षा तक पहुँच बढ़ाने में मदद मिली है। हालांकि, इससे बहुत छोटे स्कूल (जिनमें छात्रों की संख्या कम है) विकसित हुए हैं, जिससे शिक्षकों और महत्वपूर्ण भौतिक संसाधनों को तैनात करना परिचालनात्मक रूप से जटिल हो जाता है। इसलिए, नीति में सिफारिश की गई है कि कुशल प्रशासन के लिए कई पब्लिक स्कूलों को एक साथ लाकर एक स्कूल परिसर या कोई नवीन समूहीकरण तंत्र बनाया जा सकता है।
नीति में स्कूली शिक्षा के सभी चरणों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पर ज़ोर दिया गया है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा न केवल जीवन बदलने वाली है, बल्कि एक मानसिक विकास और चरित्र निर्माण का अनुभव भी है, जिसका नागरिकता पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। सशक्त शिक्षार्थी न केवल देश की बढ़ती विकासात्मक आवश्यकताओं में योगदान देते हैं, बल्कि एक न्यायसंगत और समतामूलक समाज के निर्माण में भी भाग लेते हैं। इस नीति से शिक्षा प्रणाली पर दीर्घकालिक सकारात्मक प्रभाव पड़ने और अगले 25 वर्षों में 2047 में विकसित भारत के निर्माण तक भारत को ‘अमृत काल’ के दौरान कुशल जनशक्ति का वैश्विक केंद्र बनाने की उम्मीद है।
अब अगर देश की शांति की बात करें तो पिछले एक दशक में देश में संसद और मुंबई के ताज जैसे प्रतिष्ठित होटल पर हमले जैसी घटना नहीं घटी है। देश में नासूर बन चुके नक्सलवाद भी अब अंतिम सांसें गिन रहा है। माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के कुशल नेतृत्व और उनकी सलाह पर गृह मंत्री अमित शाह जिस तल्लीनता से नक्सलवाद को झारखंड, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, तेलंगाना और आंध्रप्रदेश जैसे क्षेत्रों से खत्म कर रहे हैं वह ऐतिहासिक है। नक्सल के जनक माने जाने वाले नेता आज या तो मिट्टी में मिलाए जा चुके हैं या वे अपने कुनबे के साथ आत्मसमर्पण करने को बाध्य हैं। पिछले कई माह से नक्सली किसी बड़े हमले में शामिल होने का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं। यह सब केन्द्र सरकार की सशक्त नीतियों से ही संभव हो सका है। इसमें कोई दो राय नहीं है। वहीं पिछली सरकारों के कार्यकाल पर गौर करें तो यही नक्सली केन्द्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल जैसे राजनीतिज्ञों की जीवनलीला समाप्त करने में शामिल रहे हैं। लेकिन आज के हालात को देखें तो वे अब सरेंडर कर देश और समाज की मुख्यधारा में शामिल होने को लालायित हैं। इसे केन्द्र सरकार का खौफ कहें या केन्द्र की सख्त नीतियों का परिणाम लेकिन नतीजा बेहद कारगर है। केन्द्र का यह कदम स्वागत योग्य है।
शुक्रवार को भी छत्तीसगढ़ में नक्सल के खिलाफ पुलिस को बड़ी सफलता मिली है। एक साथ 208 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण कर दिया। इनमें 110 महिलाएं और 98 पुरुष शामिल हैं, जो प्रतिबंधित भाकपा (माओवादी) संगठन के विभिन्न रैंकों का प्रतिनिधित्व करते रहे हैं। सभी नक्सलियों ने ने 153 हथियारों के साथ आत्मसमर्पण किया है। अब इसे क्या कहेंगे? यही तो देश में आंतरिक शांति लाने में केन्द्र की सफलता है। याद दिला दें कि नक्सलियों के सफाया के लिए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 31 मार्च 2026 की डेडलाइन तय की है। इस कड़ी में एक साथ इतनी बड़ी संख्या में नक्सिलियों का सरेंडर नक्सल विरोधी अभियान के लिए बड़ी सफलता है।
अब बाह्य सफलता की बात करें तो बीते दिनों रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के बयानों पर गौर करें। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान सर क्रीक क्षेत्र में निरंतर अपनी सैन्य उपस्थिति बढ़ा रहा है और उसके किसी भी दुस्साहस का उत्तर ऐसे दिया जाएगा कि इतिहास और भूगोल दोनों बदल जाएंगे। इसके कुछ ही दिनों के अंतराल पर सेनाध्यक्ष जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने कहा कि अगर पाकिस्तान ने आतंकवाद का समर्थन करना नहीं छोड़ा तो भारत अगली बार वैसा संयम नहीं दिखाएगा, जैसा उसने आपरेशन सिंदूर के समय दिखलाया था और पाकिस्तान को विश्व मानचित्र से मिटना भी पड़ सकता है। उन्होंने सैनिकों से अगले संघर्ष के लिए तैयार रहने को भी कहा।
अब जरा वर्तमान में पाकिस्तान के हालात पर गौर करें तो अफगानिस्तान की पैदल सेना ही पाकिस्तानी फौज पर भारी पड़ रही है। अफगानिस्तान के हमले से परेशान पाकिस्तान एक बार फिर अपने आका अमेरिका के शरणागत होकर वहां स्वयं को बचाने की मिन्नतें कर रहा है। वहीं भारत पर आरोप भी लगा रहा है कि बलूचिस्तान और अफगानिस्तान में भारत मदद पहुंचा रहा है जिसके कारण पाकिस्तान को भारी क्षति हो रही है! यानि कमर टूटने लगी है पाकिस्तान की। वहीं हर मोर्चे पर सफल भारत मदमस्त हाथी की चाल में विकास और सफलता की सीढि़यां चढ़ रहा है।
प्रो. अखिलेश मिश्र अध्यक्ष, राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान (एन.आई.ओ.एस.) ई-मेल – [email protected]
बहुत सुंदर सार्थक और सारगर्भित आलेख आदरणीय। भारत और वैश्विक परिस्थितियों को आपने नये संदर्भ में देखा है।सटीक विवेचना प्रस्तुत की है बहुत सुष्ठु लेखन।हार्दिक बधाई, अशेष शुभ कामनाए।
बहुत सुंदर सार्थक और सारगर्भित आलेख आदरणीय। भारत और वैश्विक परिस्थितियों को आपने नये संदर्भ में देखा है।सटीक विवेचना प्रस्तुत की है बहुत सुष्ठु लेखन।हार्दिक बधाई, अशेष शुभ कामनाए।