दिसंबर का महीना, वह भी क्रिसमस के आस-पास ब्रिटेन में रह रहे लोगों के लिए भरपूर उत्सव के दिन होते हैं। लगभग सभी की दस दिनों की छुट्टियाँ मतलब भागमभाग भरी ज़िंदगी से जैसे आपने बहुत सारा समय चुरा लिया हो । ज़्यादातर समय तो परिवार के साथ ही बीतता है, या कुछ ऐसे दोस्तों के साथ, जहाँ आप परिवार का हिस्सा माने जाते हो।
लंदन में कल ऐसी ही एक बेहद पारिवारिक-सी महफ़िल सजी- मेजबान विनीत एवं सपना जौहरी जी के घर ‘शाम-ए-महफ़िल’ जिसे नाम दिया गया “ग़ज़ल और चाय”। ज्यों-ज्यों शाम और गहरी शाम बनती गई, महफ़िल में हँसी-ख़ुशी के लम्हें और गीत-ग़ज़ल की बहार में शराबोर होती गई। हाथ में चाय की प्याली हो, साथ में प्यारी-प्यारी बातें करने वाले लोग, जो रुक-रुक कर आपको ग़ज़लें सुनाएं, शायरियों में पिरोए सोचिए कितना ख़ुशनुमा वक़्त रहा होगा।
सबसे पहले पूजा भनोट जी ने शाम का आग़ाज़ अपनी सुरीली आवाज़ से किया। आपको बताता चलूँ पूजा जी के लंदन में कई ग़ज़लों के कॉन्सर्ट हो चुके हैं। उन्होंने मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़ल सुनाई और दूसरी ग़ज़ल जो उन्होंने ख़ुद लिखी – “फिर जा राहों पर मिल गया वो / भरीं आँखों में घुल गया वो”।
आशुतोष कुमार जी ने शानदार ग़ज़ल सुनाई – “जिसे हम सब कलंदर बोलते हैं / पुकारे वो तो पत्थर बोलते हैं।”
आशीष मिश्रा जी ने एक गीत सुनाया “ज़िंदगी में दोस्तों, कोई तो कुछ मिला रहा / संगीत कोई दे रहा, कोई तो गुनगुना रहा।”
मेज़बान विनीत जौहरी जी ने ‘माँ’ पर लिखी अपनी बहुत ही मार्मिक नज़्म सुनाई, उनके सुनाने का अंदाज़ ग़ज़ब का रहा।
सपना जौहरी जी – सचमुच हममें से कई इन्हें पहली बार सुन रहे थे, इतना प्यारा गाती हैं, एक अलग किस्म की सूफी-शायराना आवाज़। उन्होंने एक गीत सुनाया “काहे को ब्याही बिदेस अरे लखिया बाबुल मोरे”।
ज़किया जुबैरी जी महफ़िल में सबसे वरिष्ठ थीं और उनकी कलम उतनी ही दमदार – उन्होंने अपनी एक कविता सुनाई – “मैं तो अंगना बहुरिया / चूड़ियाँ बोलें मेरी छन छना छन”।
मीरा कौशिक जी ने अपनी कविता सुनाई – जिसमें डिमेंशिया से प्रभावित अपने एक मित्र की बात कही – अंदाज़ ऐसा कि लगा सामने कोई नाटक चल रहा हो – सभी ने सराहा “तुम अब हाइकु में बोलते हो / फटी मुस्कान लिए”।
अनुराधा पांडे जी – भारतीय उच्चायोग लंदन में हिन्दी एवं संस्कृति अधिकारी हैं – उन्होंने प्रभु राम पर स्त्री के परिप्रेक्ष्य से बहुत भाव पूर्ण रचना सुनाई। “इतिहास नारे से नहीं चरित्र से देखा जाता है”
अद्विता ओझा – मित्रो जब ऐसी कविताओं की महफ़िल में छोटी पीढ़ी भी जुड़े तो लगता है सचमुच अपनी भाषा के लिए कुछ सार्थक हुआ। अद्वैता ने माइक संभाला और पूरे आत्मविश्वास के साथ एक कविता सुनाई “ए माँ मुझे अब जाने दे”।
राहुल ओझा जी – मित्रो हर महफ़िल में कोई न कोई छुपा रुस्तम होता है – आज की शाम के छुपे रुस्तम रहे ओझा जी – उन्होंने कभी अपनी प्रेमिका को लिखी एक कविता सुनाई – ऐसी कविता, जिसके अंदाज़ ने हम सभी के चेहरे पर मुस्कुराहट बिखेर दी।
सपना जी ने पुनः माइक संभाला और अपनी प्यारी-सुरीली आवाज़ में एक ग़ज़ल सुनाई – “महफ़िल बर्खास्त हुई शामों से”।
इस कवितामयी शाम में बीबीसी के वरिष्ठ पत्रकार नरेश कौशिक जी और मानव भनोट और ‘पुरवाई’ के संपादक तेजेन्द्र शर्मा भी मौजूद थे। ‘ग़ज़ल और चाय’ एक ऐसी शाम रही, जो हम सभी को बहुत समय तक याद रहेगी। सभी ने दोबारा मिलने की बात के साथ एक-दूसरे को बिदाई दी।
आशीष मिश्रा (लंदन)
मोबाइल – +44 75982 71166
वाह वाह क्या बात है !
मीरा को देखकर बहुत खुश हूं।आप सबको क्रिसमस और नववर्ष की बधाई ।
धन्यवाद आदरणीय।