Wednesday, February 11, 2026
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रामदरश मिश्र के साहित्य को नए संदर्भों में पढ़ने की दृष्टि देती है प्रेम जनमेजय की नई किताब

प्रस्तुति
वेद मित्र एवं देवमणि पांडेय
पिछले दिनों, दिल्ली में विश्व पुस्तक मेले और मुंबई में ‘ चित्र नगरी संवाद के मंच पर में रामदरश मिश्र की व्यंग्य चेतना पर केंद्रित प्रेम जनमेजय की पुस्तक के लोकार्पण व परिचर्चा का आयोजन हुआ।
विश्व पुस्तक मेले में आयोजित समारोह में अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. ओम निश्चल ने कहा कि रामदरश मिश्र की रचनाओं में व्यंग्य केवल हास्य नहीं, बल्कि जीवन-बोध और सामाजिक संवेदना का सशक्त माध्यम है। उन्होंने स्पष्ट किया कि मिश्र जी की व्यंग्य चेतना समय की विसंगतियों को उजागर करते हुए मानवीय मूल्यों की रक्षा करती है। डॉ. निश्चल ने पुस्तक की प्रशंसा करते हुए कहा कि रामदरश मिश्र के साहित्य का ऐसा सम्यक और सारगर्भित पाठ समकालीन व्यंग्यकार प्रेम जनमेजय ही कर सकते थे। इस अवसर पर उन्होंने पुस्तक से रामदरश मिश्र जी के एक गीत का सस्वर पाठ भी किया, जिसे श्रोताओं ने भावविभोर होकर सुना।
 मुख्य अतिथि प्रो. स्मिता मिश्र ने रामदरश मिश्र जी की प्रसिद्ध कविताओं का पाठ करते हुए कहा कि प्रेम जनमेजय की यह कृति उनके पिता के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है। उन्होंने कहा कि पुस्तक में चयनित रचनाओं के माध्यम से रामदरश मिश्र की व्यंग्य-दृष्टि का जो सूक्ष्म और संवेदनशील विवेचन हुआ है, वह शोधार्थियों और पाठकों दोनों के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगा। प्रो. मिश्र ने यह भी कहा कि यह पुस्तक रामदरश मिश्र की रचनात्मक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का सशक्त माध्यम बनेगी।
विशिष्ट अतिथि डॉ. वेद मित्र शुक्ल ने रामदरश मिश्र की ग़ज़लों और कविताओं का पाठ करते हुए उनके विपुल साहित्य में व्याप्त व्यंग्य चेतना पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि प्रेम जनमेजय की यह पुस्तक शोधार्थियों को प्रेरित करेगी कि वे रामदरश मिश्र के साहित्य में निहित व्यंग्य-बोध को और गहराई से समझें और आगे बढ़ाएँ। डॉ. शुक्ल ने इसे हिंदी आलोचना में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप बताया।
वरिष्ठ साहित्यकार हरिशंकर राढ़ी जो स्वयं भी व्यंग्यकार है उन्होंने रामदरश मिश्र के कथा साहित्य सहित उनकी प्रमुख पुस्तकों में निहित व्यंग्य चेतना की विशद व्याख्या की। उन्होंने अपने व्यक्तिगत संस्मरण साझा करते हुए बताया कि रामदरश मिश्र का व्यक्तित्व जितना सरल और मानवीय था, उनकी लेखनी उतनी ही पैनी और सजग थी। श्री राढ़ी ने कहा कि यह पुस्तक रामदरश मिश्र के साहित्य को नए संदर्भों में पढ़ने की दृष्टि देती है।

कार्यक्रम का संचालन करते हुए डॉ. अमरेंद्र पाण्डेय ने कहा कि रामदरश मिश्र का साहित्य हमारे समय का अत्यंत महत्वपूर्ण साहित्य है। उन्होंने प्रेम जनमेजय के कार्य की सराहना करते हुए कहा कि इस तरह के समर्पित और आलोचनात्मक अध्ययन से ही किसी रचनाकार की सृजन-यात्रा का सम्यक मूल्यांकन संभव हो पाता है। डॉ. पाण्डेय ने यह भी कहा कि भविष्य में भी इस प्रकार के और कार्य होते रहने चाहिए, जिससे हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक आधार और सुदृढ़ हो।
उल्लेखनीय है कि इस अवसर पर उपस्थित साहित्यिक मनीषियों के वक्तव्यों ने यह स्पष्ट कर दिया कि रामदरश मिश्र की व्यंग्य चेतना आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी उनके समय में थी। प्रेम जनमेजय की यह कृति न केवल उनके साहित्य का आलोचनात्मक पाठ है, बल्कि हिंदी व्यंग्य परंपरा को समझने की एक महत्वपूर्ण कुंजी भी है।
अद्विक प्रकाशन के निदेशक ने सभी अतिथियों और सहभागियों का आभार ज्ञापन करते हुए कहा कि उनका उद्देश्य गुणवत्ता-पूर्ण साहित्य को पाठकों तक पहुँचाना है और यह पुस्तक उसी दिशा में एक सार्थक प्रयास है। उन्होंने विश्वास जताया कि ‘रामदरश मिश्र की व्यंग्य चेतना एवं चयनित व्यंग्य रचनाएँ’ हिंदी साहित्य के अध्येताओं, शोधार्थियों और सामान्य पाठकों के लिए एक संदर्भ-ग्रंथ सिद्ध होगी।
समारोह  में सुभाष चंदर, आचार्य राजेश कुमार, रणविजय राव, सुधा कुमारी, डिम्पल गोयल आदि समेत साहित्य प्रेमी, लेखक, शोधार्थी और पाठक उपस्थित थे। पुस्तक मेले के इस व्यस्त वातावरण में भी कार्यक्रम की गंभीरता और साहित्यिक ऊँचाई ने सबका ध्यान आकर्षित किया। 
मुंबई के ‘ चित्र नगरी संवाद के मंच’ पर भी  विभूति नारायण राय और सूरज प्रकाश के सान्निध्य में, हरि मृदुल, देवमणि पांडेय,और सुभाष काबरा ने अद्विक प्रकाशन द्वारा प्रकाशित प्रेम जनमेजय की ‘रामदरश मिश्र की व्यंग्य चेतना’ का लोकार्पण हुआ। प्रेम जनमेजय को बधाई देते हुए सूरज प्रकाश ने कहा कि एक अच्छे लेखक में नज़र, नज़रिया, स्मृति और अनुभव—ये चार चीज़ें होनी चाहिए और प्रेम जनमेजय में ये चारों मौजूद हैं।
दोनों लोकार्पण समारोह में विद्वानों का मानना था कि प्रेम जनमेजय ने शताब्दी साहित्यकार रामदरश मिश्र की व्यंग्य-दृष्टि को केंद्र में रखते हुए उनकी चयनित व्यंग्य रचनाओं का सुसंगठित और आलोचनात्मक पाठ प्रस्तुत किया है।उपस्थित जनों ने पुस्तक की विषय-वस्तु, प्रस्तुति और संपादन की प्रशंसा की।


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1 टिप्पणी

  1. वेद मित्र एवं देवमणि सर!

    सर्वप्रथम आप दोनों को ही आपके अद्वितीय नामों के लिये बधाई।
    दोनों ही नाम बहुत अच्छे लगे। एकदम वैदिक काल के नामों जैसे।
    अद्विक प्रकाशन द्वारा प्रकाशित प्रेम जनमेजय जी की ‘रामदरश मिश्र की व्यंग्य चेतना’ के लोकार्पण के लिये प्रेम जनमेजय सर को बहुत बहुत बधाई।

    निश्चित ही रामदरश मिश्र के साहित्य को नए संदर्भों में पढ़ने की दृष्टि देने वाली होगी प्रेम जनमेजय जी की यह नई किताब।

    सूरज प्रकाश जी का कहा कि,” एक अच्छे लेखक में नज़र, नज़रिया, स्मृति और अनुभव—ये चार चीज़ें होनी चाहिए और प्रेम जनमेजय में ये चारों मौजूद हैं।” यह बात काबिले गौर है।

    हमने पुरवाई पत्रिका में ही प्रकाश मनु जी का एक लेख पढ़ा था जो उन्होंने अपने गुरु रामदरश मिश्र जी के उम्र के शतकीय जन्मदिवस पर लिखा था।
    एक बार उनसे फोन पर बात भी हुई थी। वे जो बोल रहे थे वह हम नहीं समझ पा रहे थे और जो हम बोल रहे थे वे सुन और समझ नहीं पा रहे थे। फिर किसी माध्यम से बात हुई। इतनी बड़ी शख्सियत से बात करके हम भी गौरवान्वित हुए।
    वास्तव में जब इंसान चला जाता है,तब उसका मूल्यांकन सही मायने में होता है।
    आप दोनों को ही इसके लिये शुक्रिया।

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