साहित्य के क्षेत्र में जहाँ पुरुष कथाकारों का वर्चस्व रहा और सृजन व रचनाधर्मिता में अपनी सशक्त उपस्थिति कायम रखपाने में सफल रहे हैं वहीं महिलाओं ने भी अपनी अमूल्य कृतियों से साहित्य के क्षेत्र में एक नया अध्याय जरुर जोडा है।, परन्तु वह भारत माँ का दुर्भाग्य था कि यहाँ पुरुषों की भाँति स्त्रियों की शिक्षा-दीक्षा का अभाव रहा अन्यथा यहाँ जितने पुरुष साहित्यकार हुए उनसे अधिक महिला साहित्यकार होतीं।जीवन के सभी क्षेत्रों में स्त्री ने पुरुष का साथ दिया है। वह उसकी सहधर्मिणी है, अर्धांगिनी है | वह उससे पीछे कैसे रह सकती है? उदीयमान सूर्य की प्रत्यूषा जैसी कोमल,अनुराग भरी लालिमा लिए संवेदनशील अनुभूतियों की रचयिता हैं लेखिका.कथाकार शिवरानी देवी । सहज,सरल,बेबाक हो अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने की कुशलता ही उनकी पहचान है।वह केवल कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद की धर्मपत्नी ही नहीं अपनी एक स्वतंत्र पहचान बनाने में भी सक्षम थीं पर उनके सृजन को.वह सम्मान नहीं मिल पाया जो उनका दाय था। पुरूष प्रधान समाज में जहां घर की देहरी आंगन से निकला प्रत्येक कदम एक नारी के लिए चुनौतीपूर्ण होता हैं.वहां सामाजिक वर्जनाओं को ललकारना..हर गलत कदम की ओर सृजन को प्रेरित करने की आकांक्षा नारी मन की सबलता होती है..उसकी ताकत है।स्वतंत्रता पूर्व प्रमुख कहानीकारों में उषा देवी मित्रा, कमला चौधरी, होमवती देवी, सुभद्रा कुमारी चौहान, तारा पाण्डेय, तेजरानी पाठक आदि ने अपने लेखन से स्त्री साहित्य को नई दिशा दी| इसी दौर में 1924 ई0 में शिवरानी देवी कहानी लेखन में प्रवेश करती है।अपने इस.साहित्यिक समाज में प्रथम पदार्पण के.संबध में स्वयं शिवरानी देवी कहती हैं-
वे जब दौरे पर रहते तो मेरे साथ ही सारा समय काटते और अपनी रचनाएँ सुनातेउनकी कहानियों को सुनते-सुनते मेरी भी रुचि साहित्य की ओर हुई। जब वे दौरे पर होते, तब मैं दिन भर किताबें पढ़ती रहती। इस तरह साहित्य में मेरा प्रवेश हुआ’’।
शिवरानी जी की कहानियां हमारे समाज एवं मन का आईना हैं। हमारे परिवेश में घटती हुई घटनाएं,जब ह्रदय को प्रभावित करती हैं और अपनी अभिव्यक्ति के लिए छटपटा उठती है तब होता है उनकी किसी कालजयी कहानी का जन्म,।जीवन के सुख दुख हर्ष विषाद की अनुभूतियों से भरी हुई उनकी कहानियां जब नारी विमर्श के मुद्दों को लेकर लिखी जाती है तो वह दर्द और पीड़ा के अनेक सोपानों से गुजर कर समाज के सम्मुख अनेक प्रश्न उठाती हैं पर उनका समाधान सरल नहीं होता।जब इन विमर्शों पर उनकी की सशक्त लेखनी आवाज उठाती हैं तो उनका जादू देखते ही बनता है।,उन्होने अपनी कलम से इसी दर्द को उकेरा है और सिद्ध किया कि कहानियां जीवन का ही प्रतिबिंब हैं। जिसमें झलकता है जीवन का हर.वह रुप हर्ष विषाद आशा निराशा प्रेम समर्पण सभी जो मन को प्रभावित करते हैं।शिवरानी देवी की कहानियों में जीवन बोलता है।जैसा कि उन्होने स्वयं लिखा है कहानी (गल्प)में जीवन का कोई न कोई सत्य, सौंदर्य का कोई न कोई अंग ,आत्मा की कोई न कोई झलक तो होनी ही चाहिए ।इसके बिना कोई गल्प रचा ही नहीं जा सकता।
शिवरानी जी एक.साहसिक अभिव्यक्ति और आदर्श जीवन को एक साथ समानांतर धरातल पर रख उन्होंने जीवन के दोनो रुपों को जिया है।उनके सृजन ने यह स्पष्ट किया है कि जीवन के संघर्षों में आज भी भारतीय नारी ने हार नहीं मानी है.। अपनी प्रगति के रास्ते खुद तलाशे हैं, ।भारतीय नारी ने सपने भी देखें हैं तो अपने परिवार की सुख छाँव में ,अपनों के बीच न कि उसे तोड़ कर, विच्छिन्न कर ,वही हमारी संस्कृति की पहचान है। और यही आदर्शवादिता उनकी लेखनी का उत्कर्ष है। यदि संवेदना,मानवता,कर्मठता -ममता जीवित है तो इन विजयिनी -सशक्त मनोबल वाली कर्मठ महिलाओं की ही बदौलत जो कलम भी चलाती हैं और उद्योग भी,सृजनकर्ता भी हैं और विघ्नहर्ता भी,। शिवरानी जी की कलम जूझना चाहती है अन्याय की हर चुनौती के खिलाफ.,उनकी आवाज उठी है हर अनय के.विरुद्ध।
शिवरानी देवी अपने बिंदास लेखन व सहज प्रतिकारात्मक नारी सुलभ अभिव्यक्ति के कारण ओज और विद्रोह की प्रतिमूर्ति कही जाती हैं।उनका मानना है कि ”स्त्री में स्त्रीत्व ही नहीं, बल्कि मातृत्व भी होना चाहिए” बनाम ”अगर आप मेरी बीवी होते तो मैं बताती कि स्त्रियों के साथ कैसे रहना चाहिए”। उनकी आत्मकथात्मक पुस्तक की भूमिका में प्रसिद्ध साहित्यकार बनारसीदास चतुर्वेदी जी लिखते हैं–
पतिपरायणा पत्नी की भूमिका में स्वयं शिवरानी देवी भी जहां-तहां दो फांकों में विभाजित अपने व्यक्तित्व की झलक देती चलती हैं, ऐसे भावुक समर्पणों को उल्लिखित करते हुए वे हतप्रभ हैं । जैसे शिवरानी देवी में ”विचार करने का और उन विचारों को प्रकट करने का साहस पहले से ही मौजूद रहा है। इस पुस्तक में उनके व पति प्रेमचंद जी के संस्मरण भी हैं जहां उनका पति से वैचारिक मतभेद रहा ,या कुछ मुद्दों पर वह सहमत नहीं थीं लेकिन अप’नी पतिपरायणा छवि से भी कभी बाहर नहीं निकल सकीं।’ यही उनके जीवन का आदर्श तथा नैतिक मूल्यों का मूलमंत्र भी रहा । बनारसीदास जी कहते हैं —इन वार्तालापों से जहां प्रेमचंद जी का सहृदयतापूर्ण रूप प्रकट होता है, वहां शिवरानी जी का अपना अक्खड़पन भी कम आकर्षक नहीं। शिवरानी जी प्रेमचंद जी की पूरक थीं, उनकी कोरमकोर छाया या प्रतिबिंब नहीं।’
शिवरानी देवी कथा सम्राट प्रेमचंद की पत्नी थीं अत: वे लेखिका के रूप में अपनी अलग पहचान नहीं बना पाईं। ईर्ष्यालु साहित्य समाज द्वारा प्रेमचंद को उनकी कहानियों के रचयिता के रूप में प्रचारित किया जाता रहा। यद्यपि प्रेमचंद ने हमेशा इस बात का खंडन किया है।
’प्रेमचंद : घर में’ तथा ‘नारी हृदय’ कहानी संग्रह की कुछ विशिष्ट कहानियों के आधार पर शिवरानी देवी के साहित्य का मूल्यांकन बहुत कम होगा ।बे तत्कालीन बीसवीं सदी की ऐसी लेखिका हैं जिन्हें अपनी बेबाक अभिव्यक्ति जिसे वह स्वयं उद्दंड कहती हैं,पर गर्व है।यही कारण.है कि उनके पति प्रेमचंद भी उन्हे योद्धा स्त्री कहते हैं जिसे किसी का भय नहीं।जो समाज की कटूक्तियों और वर्जनाओं से भी जूझना और प्रतिकार करना जानती है।
शिवरानी देवी ने भक्ति और वैराग्य के संबंध में भी अपने बेबाक विचार प्रस्तुत किए हैं । जिस.समय भक्ति काल का युग था,कबीर के वैराग्य व निराकार ईश्वर की परिकल्पना में जीवन केवल त्याग समर्पण और विभिन्न आध्यात्मिक गतिविघियों में बंधा हुआ था, और वही सच्चा सद्साहित्य माना जाता था।और एक लयबद्ध जीवन क्रम में जीना सिखा रहा था।धर्म के नाम पर तरह तरह की धार्मिक क्रियायें तथा समर्पण के नाम पर भोग लिप्सा की प्रवृत्ति भी पनप रही थी।शिवरानी देवी कहती हैं —
भक्ति और वैराग्य को हमने बहुत दिन गाया।वह भी हमारे.साहित्य का एक युग था।तब समाज पर इतनी जाता छायी थी कि उसे अपने घावों पर भी पीडा नहीं होती थी।ऐसे युग का.साहित्य या तो ऐयाशी की ओर जाता था या.वैराग्य की ओर।लेकिन अब जीवन में नयी नयी समस्याएं आ खडी हु ई हैं।एक क्रांति सी मंच गई है।किंतु अब हमें सजीव और तेजराज साहित्य चाहिए। मेरे विचार से साहित्य केवल समाज का आईना नहीं है वह उसका पथ प्रदर्शक प्रकाश भी है और निराकार भी।
तात्पर्य यह कि वे हितेंन सहितं इति साहित्यं की अवधारणा को मानती थीं।साथ ही यह भी कि साहित्य समाज का दर्पण तो बने पर ऐसा दर्पण जो स्वच्छ हो,जिसमें कोई दरार न हो।भले ही रास्ता भक्ति का हो परन्तु समर्पण के नाम पर कोई शोषण न हो।ऐसा कहने का साहस रखना भी एक बडी चुनौती थी उस समय।वह भी एक सामान्य घरेलू महिला जिसके लिए केवल घर गृहस्थी और परंपराओं में बंध कर जीना ही उसकी नियति थी।वैसे.समाज में उनका मुखर विरोध बहुत बडे साहस का काम था। उनकी कहानियों मैं यह बात स्पष्ट है कि जीवन उद्देश्य पूर्ण, प्रेममय हो,साथ ही कर्मनिष्ठ तथा जीवन की चुनौतियों का जीत पाने की एक जिद भी हो।उनका यह भी कहना था कि स्त्री मर्यादित हो,समर्पित हो लेकिन प्रेम कलुषित न हो । मैं यह नहीं कहती कि प्रेम का एक सिरे से बहिष्कार कर दिया जाये ।नहीं,मेरा आशय यह है कि प्रेम को उसकी मर्यादा के अंदर रखा जाय कि.वह कामुकता का रुप धारण न करने पाये।उनकी कहानियो ,भाषणों और संस्मरणों में झलकता है जीवन का हर.वह रुप हर्ष विषाद आशा निराशा प्रेम समर्पण सभी जो मन को प्रभावित करते हैं।शिवरानी देवी की कहानियों में जीवन बोलता है।जैसा कि उन्होने स्वयं लिखा हैकहानी (गल्प)में जीवन का कोई न कोई सत्य, सौंदर्य का कोई न कोई अंग ,आत्मा की कोई न कोई झलक तो होनी ही चाहिए ।इसके बिना कोई गल्प रचा ही नहीं जा सकता।
रचनावली शीर्षक सै वरिष्ठ लेखिका, संपादक शुभा श्रीवास्तव जी एवं राजीव गोंड जी ने शिवरानी देवी के समग्र सृजन को ढूढ निकालने और उन पर शोधात्मक दृष्टिकोण से बृहद अनुशीलन किया.है।उनका यह प्रयास स्तुत्य है। जैसा मैने पढा कि प्रेमचंद जी की मृत्यु के बाद शिवरानी जी ने स्मृति अंक निकाला था जिसका संपादन उन्होने स्वयं किया था।इसमें शुभा जी ने स्मृति शीर्षक से शिवरानी जी का संस्मरण भी प्रकाशित किया है। हंस के जनवरी-फरवरी 1932 ई० के आत्मकथा विशेषांक में शिवरानी देवी की आत्मकथा भी प्रकाशित हुई थी। उनकी कहानियों का यदि समुचित मूल्यांकन किया जाता तो भारतीय नारी समाज में घर बाहर दोनो परिस्थितियों में समुचित संतुलन बना पाने की सीख और एक नैतिक आदर्श को जीवन में ढाल.पाने का ज्ञान मिला होता। उनकी कहानियों की नायिकाए बिंदास मुखर और चुनौतीपूर्ण भूमिकाओं में विजेता की तरह नजर आती हैं।
शिवरानी जी की पहली कहानी *साहस *में ही नारी जीवन संघर्ष के सभी विमर्शों की बात उठाई गई है।जिसमें नायिका छोटी.सी बालिका की कहानी है जिसके पिता धना खे अभाव में बेटी की शादी चार बच्चों के पिता चालीस वर्षीय वृद्ध से करना चाहते हैं। बेटी राम प्यारी पहले तो विवाह को टालना चाहती है और विरोध करती है पर.जब उसका कोई प्रतिरोध काम नहीं आया तो उसने एक ऐसा साहसिक कदम उठाया जो सनाज
के नैतिक नियमों के प्रतिकूल था और स्त्री के लिए तो समाज की नजर में चारित्रिक दृष्टि से कदापि उचित नहीं था।
शिवरानी जी ने कहानी में लिखा, “रामप्यारी धीरे से अपने बगल में हाथ ले गई, फिर तन कर खड़ी होकर उसने घूँघट उलट दिया, सहसा तड़-तड़ की जवाज के साथ मंडप गूँज उठा। उपस्थित सज्जनों ने चकित होकर देखा-वर के सिर पर जूतें पड़ रहे हैं, किंतु सबसे आश्चर्य की बात तों यह थी कि यह काम किसी और का नहीं था, स्वयं वधू ही यह कार्य कर रही थी!!
चांद में प्रकाशित उनकी कहानी बलिदान की नायिका प्रभा देवी ने मुखर और सशक्त मनोबल के साथ नारी सशक्तिकरण और अधिकारों पर अपनी बात रखी है ,जो निर्भीक, बिंदास नारी के व्यक्तित्व की परिचायक है।मांगने से.नहीं मिलेगा । तब मरने से चलेगा।जब तक.हम.मरना नहीं जानती हैं तब तक हम मार महीं सकती हैं।और न.ही अपना उद्धार ही कर सकती हैं।क्योंकि अधिकार तो हमेशा बलिदान से मिलता रहा है।जब हम पुरुषों के बराबर अधिकार चाहती हैं ,तो.हम.क्यों आशा करें कि कोई हमारी मदद करे। इस कहानी का परिवेश उद्देश्य जो भी रहा हो परन्तु ये पंक्तियां गहन प्रभाव छोडती हैं। ऐसा नहीं कि शिवरानी देवी का लेखन केवल आत्मकथा वृत्त है बल्कि उन्होनें अपने संपादकीय, कहानियोः और भाषणों में तत्कालीन समाज की विसंगतियों और ज्वलंत समस्याओं दहेज प्रथा, अनमेल विवाह, सौतेली मां की प्रताड़ना, स्त्री की पारिवारिक सामाजिक विमर्शों और दर्द की व्यथा कथा को भी अपने.लेखन का विषय बनाया है।हां कभी कभी उनमे व्यक्तिगत पीडा या निजी जीवन की वेदना का भी प्रभाव मिलता है।
करुणा की मार्मिकता जब स्व पीर से अधिक जग की पीर बन जाती है,तब व अभिव्यक्ति और सृजन की भावनात्मक अनुभूतियों में रच बस कर काल,समय की सीमाओ से परे , पढ़ी जाती है,सुनी जाती है। जीवन के संघर्षों,सुख दुख की ये कहानियां जब शिवरानी जी के हृदय से सतत् प्रवाहिता गंगा की धारा बन निकलती हैं, तो उनमें विचारों की तीक्ष्णता, अनुभवों की लंबी विरासत, और वात्सल्य, प्रेम, स्नेह,का एक अजस्र स्रोत भी प्रवाहित होता चलता है जो उनकी पहचान भी है और अस्मिता का गौरव भी।
रोहिणी अग्रवाल जी के एक आलेख में मैने पढा-शिवरानी देवी – निर्भीकता और साफगोई की मिसाल! हिंदी आलोचना के हाशिए पर बैठ कर तंज कसती लेखिकाओं में एक! यकीनन वे हिंदी साहित्य की गार्गी हैं – प्रतिरोध की गूंजती टंकार! जैसी”।
शुभा श्रीवास्तव, राजीव गोंड जी की शोध दृष्टिः साधुवाद की पात्र है,उनकी साहित्यिक निष्ठा की प्रशंसा करना चाहूंगी कि उन्होने आदरणीया शिवरानी देवी के रचना संसार से साहित्य व समान को परिचित कराया। यदि यह प्रयास नहीं होता तो.हम.एक ऐसे समृद्ध साहित्यकार के सृजन संसार से अछूते रह जाते। जिन्होने अनीति, अन्याय और शोषण के विरुद्ध प्रतिकार तथा ममत्व पति प्रेम, पारिवारिक नैतिक जीवन मूल्यों को आत्मसात करना भी सिखापा। शत-शत नमन।
पद्मा मिश्रा
जमशेदपुर
प्रिय पद्मा!
*”शिवरानी देवी के रचना संसार में नैतिक जीवन मूल्यों व*
*आदर्शवादिता के स्वर”*
तुम्हारा लिखा यह लेख पढ़ा। ऐसे याद आ रहा है काफी समय पहले शिवरानी जी के बारे में कुछ पढ़ा था। तभी पता चला था कि वह भी कुछ लिखा करती थीं।
हालांकि हमने उनका लिखा कुछ भी नहीं पढ़ा।
उनके समय में जो सामाजिक और राजनीतिक स्थितियाँ रहीं हैं उसका तो काफी कुछ अंदाजा है हर रचनाकार अपने काल का दर्पण होता है। प्रेमचंद को पढ़ते हुए तत्कालीन सामाजिक स्थितियों को समझना कठिन नहीं।
वह समय ही नैतिक मूल्यों और आदर्शवादिता का था।
मर्यादाओं की जकड़न भी कम नहीं थी।
उस समय के बारे में सोचो तो कभी-कभी ऐसा लगता है कि मर्यादाओं की सीमा कभी-कभी मजबूरी का बंधन भी बन जाया करती थीं। विशेष रूप से महिलाओं के लिये।
इस लेख के लिये बहुत मेहनत की है पद्मा तुमने वह मेहनत महसूस हुई पढ़ते हुए।
शिवरानी देवी के कुछ कोटेशन जो तुमने उदाहरण में लिखे थे वह हमने भी नोट किये।
काबिले गौर लगे।
*”अपने लेखन में मैं यह नहीं कहती कि प्रेम का एक सिरे से बहिष्कार कर दिया जाये ।न ही,मेरा आशय यह है कि प्रेम को उसकी मर्यादा के अंदर रखा जाय कि.वह कामुकता का रुप धारण न करने पाये।”*
इन कथ्य में मर्यादा नैतिकता की ताकत बनती है।
शिवरानी ने तत्कालीन समाज की विसंगतियों और ज्वलंत समस्याओं में दहेज प्रथा, बेमेल विवाह, सौतेली माँ की प्रताड़ना, स्त्री की पारिवारिक व सामाजिक विमर्शों और दर्द की व्यथा कथा को अगर अपने लेखन का विषय बनाया तो वास्तव में उस समय यही समस्याएँ ज्वलंत थीं।
शिवरानी जी की पहली कहानी *साहस* का वर्णन तुमने किया। उसमें नारी जीवन संघर्ष के सभी विमर्शों की बात उठाई गई है। जिसमें नायिका छोटी सी बालिका की कहानी है, जिसके पिता धन के अभाव में बेटी की शादी चार बच्चों के पिता चालीस वर्षीय वृद्ध से करना चाहते हैं। बेटी राम प्यारी पहले तो विवाह को टालना चाहती है और विरोध करती है पर.जब उसका कोई प्रतिरोध काम नहीं आया तो उसने एक ऐसा साहसिक कदम उठाया जो तत्कालीन समाज के नैतिक नियमों के प्रतिकूल था और स्त्री के लिए तो समाज की नजर में चारित्रिक दृष्टि से कदापि उचित नहीं था।
जब किसी भी तरह से शादी नहीं रुकती है तो वह लड़की घूँघट उठा के दूल्हे को मारने लगती है।
वाकई एक साहसिक कदम था। इस एक कहानी में नारी की तत्कालीन स्थिति अपने पूर्ण विद्रुप स्वरूप में नजर आती है।
इन्होंने बहुत सही जज किया कि साहित्य क्या है?
*”हितेन् सहितं इति साहित्यम्!”*
जो हित के साथ है, वास्तव में साहित्य वही है।यह पूरी तरह सत्य है
यह बात भी सौ फीसदी सही कही कि *कहानी (गल्प)में जीवन का कोई न कोई सत्य, सौंदर्य का कोई न कोई अंग ,आत्मा की कोई न कोई झलक तो होनी ही चाहिए ।इसके बिना कोई गल्प रचा ही नहीं जा सकता।*
*मेरे विचार से साहित्य केवल समाज का आईना नहीं है, वह उसका पथ प्रदर्शक प्रकाश भी है और निराकार भी।*
यह 101% सही है।
तुम्हारे लिखे लेख के माध्यम से शिवरानी को जान पाए , उनके विचारों से परिचित हुए और उनके मंतव्य को समझ पाए।
इस कीमती लेख के लिए तुम्हारा बहुत-बहुत शुक्रिया पद्मा।
प्रस्तुति के लिए तेजेन्द्र जी का शुक्रिया।
पुरवाई का बहुत-बहुत आभार।
इस महत्वपूर्ण आलेख के लिए आपको हार्दिक बधाई।
कई अनजान पहलुओं की जानकारी मिली। आभार