Sunday, May 10, 2026
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डॉ. सुनीता शर्मा की कहानी – चाँद का सच

इस शाम जब से साहित्य सम्मान की सूची वायरल हुई, मोबाइल लगातार बज रहा था।
समूह में संदेश चमक रहे थे—
“सबको आमंत्रण मिला?”
“हाँ-हाँ, बहुत बड़े आयोजन में बुलाया है!”
“दीदी, आप भी आएँगी न?”
हल्की मुस्कान के साथ नीरा ने लिखा—
“देखूँगी…”
संदेश, वॉइस मेल।
वह एक पल के लिए ठिठक गई।
सूची में वे नाम थे जिन्हें उसने अनेक बार मंचों पर केवल ‘हाज़िर’ कहते सुना था।
कुछ नामों ने तो आज तक एक भी कहानी का पूरा प्लॉट नहीं बताया था।
नीरा ने मोबाइल स्क्रीन पर उँगली फेरते हुए गहरी साँस ली। मोबाइल धीरे से टेबल पर रखा।
उसके मन में हल्की बेचैनी और भीतर की मुस्कान दोनों थीं। रोज़ की तरह वह कमरे के कोने में बैठी थी। चाय बगल में, और हाथ में निर्मल वर्मा की “चीड़ों पर चांदनी”। पर हर पन्ना उसे भीतर तक हिला रहा था, जैसे इस शाम मानों आइना पूछ बैठा हो—
“तुम सच में दिखाई देती हो, या बस लिखती भर हो?”
वह तो बस लिखती है—भीतर की धड़कनों को, रिश्तों की तपिश को, शब्दों की आग और पानी को महसूस करती है।
डायरी के पन्नों के बीच उँगलियाँ फेरते हुए, हर पन्ना उसकी नींदों, सत्यों, पीड़ाओं और रिश्तों के उन धागों से बुना था, जिन्हें उसने किसी पुरस्कार के लिए नहीं, अपने जीने के लिए लिखा था।
पर आज… एक पल को ही सही, भीतर कुछ चुभा।
जैसे बचपन में छूटी कोई तस्वीर अचानक आँखों के सामने आ गई हो।
वह स्वयं को फ़ाइल के कोने में दबे पन्नों की तरह महसूस कर रही थी—उस सूची में उसका नाम नहीं था।
पर लिखना उसके लिए पदक नहीं, मुक्ति थी। यही वह कहती है।
नीरा ने हल्की मुस्कान दी और स्क्रीन टेबल पर रख दी।
कमरे में शाम का कोमल अँधेरा उतर रहा था।
टेबल लैम्प की पीली रोशनी उसकी डायरी पर झुक रही थी।
जिज्ञासावश उसने मोबाइल ऑन किया—
समारोह का लाइव प्रसारण शुरू हो चुका था।
हॉल के बाहर झिलमिलाती झालरों की रोशनी दूर से ही हर उपलब्धि की आभा बिखेर रही थी।
मंच पर वही नाम पुकारे जा रहे थे जिन्हें उसने कई बार सिर्फ रस्मी लेख पाठ करते देखा था—
“हमारे क्षेत्र के उत्कृष्ट साहित्यकार…”
“हमारी पत्रिका के स्तंभ…”
“आज के उभरते हुए रचनाकार…”
भीड़ ताली बजा रही थी, फोटो खींच रही थी, लाइव कर रही थी।
फोन लगातार बज रहा था—
रश्मि का वॉइस मेल गूंजा—
“कभी-कभी दिखना ज़रूरी हो जाता है। आओगी तो…”
“दीदी, क्यों नहीं आएं?”
“आपका नाम क्यों नहीं?”
“इतना लिखने के बाद भी…?”
नीरा ने किसी भी संदेश का जवाब नहीं दिया।
रश्मि अपनी चमचमाती हुई ट्रॉफी लेकर घर आ ही गई—
“अरे, तू नहीं आई? सब कह रहे हैं कि तू तो सम्मान की दावेदार थी।”
नीरा ने हँसने की कोशिश की—
“दावेदार? मैं कब दौड़ी किसी दौड़ में, रश्मि?”
रश्मि ने उसके कंधे पर हाथ रखा—
“पर तेरी लिखाई… तेरे संघर्ष… तेरी आवाज़—ये सब कहाँ छूट जाते हैं?”
नीरा ने खिड़की पर नज़र डाली।
बाहर गली में बच्चे पटाखे की तरह हँसी के साथ खेल रहे थे।
“आवाज़ें तो नहीं छूटती, रश्मि… बस कभी-कभी बेआवाज़ कर दी जाती हैं। वैसे भी रेस तो मैंने कभी दौड़ी ही नहीं, तो पुरस्कार कैसे पाती?”
मन के भीतर कोई पुराना वाक्य गूँजा—
“सम्मान वह है जिसे दिल पहचान ले, मंच नहीं।”
उसी वक्त उसकी छोटी बेटी, आर्या, कमरे में किताब लेकर आई—
“माँ, आपकी यह कहानी फिर पढ़ी। बहुत अच्छी लगी। आप और क्यों नहीं लिखतीं? आपकी आवाज़ तो सबसे खास है।”
नीरा के होंठ काँपे।
उस मासूम ने वो कह दिया जिसे वह खुद नहीं कह पा रही थी।
“और लिखूँगी… वादा है।”
रात को नीरा ने अपनी डायरी के कुछ नोट्स पढ़े।
सिर्फ़ उसकी रात, उसकी लिखाई, उसकी लड़ाई तो हमेशा अपने आप से ही रही है।
पूर्णिमा का चाँद नग्न, साक्षी।
नीरा ने लैपटॉप खोला।
नया दस्तावेज़।
उँगलियाँ टाइप कर रही थीं—रुकती, काँपती, लौट आतीं।
“सम्मान छूट जाए, पर आवाज़ नहीं छूटनी चाहिए।”
और जैसे ही पहला वाक्य लिखा, उसे लगा—
सम्मान भले कागज़ पर छूट गया हो, पर वह कहीं नहीं छूटी थी।
वह वहीं थी—अपने शब्दों में, अपने पाठकों की आँखों में, और उन कहानियों में जिन्हें आज तक कोई रेस हरा नहीं सकी।
फिर वह लिखती चली गई…
उन स्त्रियों के बारे में जो पुरस्कारों से नहीं, अपने सच बोलने की हिम्मत से चमकती हैं।
उन रिश्तों के बारे में जो ताली नहीं, समझ की भाषा जानते हैं।
उन मनुष्यों के बारे में जो दौड़ में नहीं, ईमान में जीतते हैं।
उसकी उँगलियाँ रुक ही नहीं रही थीं।
शीर्षक—चाँद का सच
और उसने खुद से कहा—
“कुछ आवाज़ें इसलिए नहीं छूटती…
क्योंकि वे हर उजाले में सवाल बनकर खड़ी रहती हैं।”
पूर्णिमा चली गई।
कचोट वहीं थी।
नग्न, तीखी, पूरी।
सुबह तक कहानी पूरी थी—
लंबी, सधी हुई, रोशन।
वह मुस्कुराई।
बच्ची को बाँहों में लिया।
“और लिखूँगी… वादा है।”
बाहर सूरज उगा था।
डॉ सुनीता शर्मा 
ऑस्ट्रेलिया ( मेल्बोर्न )


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2 टिप्पणी

  1. सुनीता जी!

    आप की कहानी ‘चाँद का सच पढ़ी’

    चाँद का सच तो यही है कि उसमें दाग है। बाकी तो प्रतीकात्मकता में बहुत अर्थ निकलते हैं लेकिन आप की कहानी के संदर्भ में यही अर्थ हमें ज्यादा सटीक लगा।
    कथानक के संदर्भ में यह बहुत सामयिक कहानी लगती है।

    यह वर्तमान की बड़ी सच्चाई है। सम्मान को लेकर लेखकों में जो होड़ मची है वह देखकर वास्तव में आश्चर्य होता है।
    अच्छे लेखन की कद्र नहीं होती तो भी बुरा लगता है। वास्तव में यही चाँद का सच है
    वैसे यह अच्छा है कि हमें अपने संतोष के लिए लिखना चाहिये।
    छोटी सी बिटिया अगर अपनी माँ की लिखी हुई कहानी को समझ कर कहती कि आपकी कहानी अच्छी है। आप और लिखिये। तो इससे ज्यादा सुखद बात और क्या हो सकती है।
    जिस काम को करने से हमें अंदर से खुशी मिले वही काम श्रेष्ठ होता है।

    मानस जैसा अद्भुत महाकाव्य रचकर भी तुलसीदास जी ने उसमें लिखा है-

    नाना पुराण निगमागम सम्मतं यद्
    रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतोऽपि।
    स्वान्तः सुखाय तुलसी रघुनाथ गाथा भाषा निबन्धमति मञ्जुलमातनोति॥
    अर्थ:
    अनेकों पुराणों (18 पुराणों), वेद (निगम), शास्त्रों (आगम/षड्दर्शन), और अन्य ग्रंथों (जैसे वाल्मीकि रामायण, आदि) के सार-समूह से जो मान्य तथ्य हैं, उन्हीं के आधार पर श्री रघुनाथ जी की कथा का वर्णन किया मैं ने किया है। तुलसीदास जी कहते हैं कि उन्होंने यह अत्यंत मनोहर (सुंदर) रामकथा अपनी भाषा (अवधी/हिंदी) में, केवल अपने अंतःकरण की प्रसन्नता और आत्म-शांति (स्वान्तः सुखाय) के लिए रची है।

    लोगों ने तो उसे भी और उन्हें भी विवाद का विषय बना दिया।

    हमें जिसमें खुशी मिलती है वही हमारे लिए हितकारी है।

    अच्छी कहानी है। इस कहानी के बहाने मानस का स्मरण हुआ। प्रणाम आपको।
    कहानी एक सकारात्मक संदेश देती है।

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