इस शाम जब से साहित्य सम्मान की सूची वायरल हुई, मोबाइल लगातार बज रहा था।
समूह में संदेश चमक रहे थे—
“सबको आमंत्रण मिला?”
“हाँ-हाँ, बहुत बड़े आयोजन में बुलाया है!”
“दीदी, आप भी आएँगी न?”
हल्की मुस्कान के साथ नीरा ने लिखा—
“देखूँगी…”
संदेश, वॉइस मेल।
वह एक पल के लिए ठिठक गई।
सूची में वे नाम थे जिन्हें उसने अनेक बार मंचों पर केवल ‘हाज़िर’ कहते सुना था।
कुछ नामों ने तो आज तक एक भी कहानी का पूरा प्लॉट नहीं बताया था।
नीरा ने मोबाइल स्क्रीन पर उँगली फेरते हुए गहरी साँस ली। मोबाइल धीरे से टेबल पर रखा।
उसके मन में हल्की बेचैनी और भीतर की मुस्कान दोनों थीं। रोज़ की तरह वह कमरे के कोने में बैठी थी। चाय बगल में, और हाथ में निर्मल वर्मा की “चीड़ों पर चांदनी”। पर हर पन्ना उसे भीतर तक हिला रहा था, जैसे इस शाम मानों आइना पूछ बैठा हो—
“तुम सच में दिखाई देती हो, या बस लिखती भर हो?”
वह तो बस लिखती है—भीतर की धड़कनों को, रिश्तों की तपिश को, शब्दों की आग और पानी को महसूस करती है।
डायरी के पन्नों के बीच उँगलियाँ फेरते हुए, हर पन्ना उसकी नींदों, सत्यों, पीड़ाओं और रिश्तों के उन धागों से बुना था, जिन्हें उसने किसी पुरस्कार के लिए नहीं, अपने जीने के लिए लिखा था।
पर आज… एक पल को ही सही, भीतर कुछ चुभा।
जैसे बचपन में छूटी कोई तस्वीर अचानक आँखों के सामने आ गई हो।
वह स्वयं को फ़ाइल के कोने में दबे पन्नों की तरह महसूस कर रही थी—उस सूची में उसका नाम नहीं था।
पर लिखना उसके लिए पदक नहीं, मुक्ति थी। यही वह कहती है।
नीरा ने हल्की मुस्कान दी और स्क्रीन टेबल पर रख दी।
कमरे में शाम का कोमल अँधेरा उतर रहा था।
टेबल लैम्प की पीली रोशनी उसकी डायरी पर झुक रही थी।
जिज्ञासावश उसने मोबाइल ऑन किया—
समारोह का लाइव प्रसारण शुरू हो चुका था।
हॉल के बाहर झिलमिलाती झालरों की रोशनी दूर से ही हर उपलब्धि की आभा बिखेर रही थी।
मंच पर वही नाम पुकारे जा रहे थे जिन्हें उसने कई बार सिर्फ रस्मी लेख पाठ करते देखा था—
“हमारे क्षेत्र के उत्कृष्ट साहित्यकार…”
“हमारी पत्रिका के स्तंभ…”
“आज के उभरते हुए रचनाकार…”
भीड़ ताली बजा रही थी, फोटो खींच रही थी, लाइव कर रही थी।
फोन लगातार बज रहा था—
रश्मि का वॉइस मेल गूंजा—
“कभी-कभी दिखना ज़रूरी हो जाता है। आओगी तो…”
“दीदी, क्यों नहीं आएं?”
“आपका नाम क्यों नहीं?”
“इतना लिखने के बाद भी…?”
नीरा ने किसी भी संदेश का जवाब नहीं दिया।
रश्मि अपनी चमचमाती हुई ट्रॉफी लेकर घर आ ही गई—
“अरे, तू नहीं आई? सब कह रहे हैं कि तू तो सम्मान की दावेदार थी।”
चाँद का सच तो यही है कि उसमें दाग है। बाकी तो प्रतीकात्मकता में बहुत अर्थ निकलते हैं लेकिन आप की कहानी के संदर्भ में यही अर्थ हमें ज्यादा सटीक लगा।
कथानक के संदर्भ में यह बहुत सामयिक कहानी लगती है।
यह वर्तमान की बड़ी सच्चाई है। सम्मान को लेकर लेखकों में जो होड़ मची है वह देखकर वास्तव में आश्चर्य होता है।
अच्छे लेखन की कद्र नहीं होती तो भी बुरा लगता है। वास्तव में यही चाँद का सच है
वैसे यह अच्छा है कि हमें अपने संतोष के लिए लिखना चाहिये।
छोटी सी बिटिया अगर अपनी माँ की लिखी हुई कहानी को समझ कर कहती कि आपकी कहानी अच्छी है। आप और लिखिये। तो इससे ज्यादा सुखद बात और क्या हो सकती है।
जिस काम को करने से हमें अंदर से खुशी मिले वही काम श्रेष्ठ होता है।
मानस जैसा अद्भुत महाकाव्य रचकर भी तुलसीदास जी ने उसमें लिखा है-
नाना पुराण निगमागम सम्मतं यद्
रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतोऽपि।
स्वान्तः सुखाय तुलसी रघुनाथ गाथा भाषा निबन्धमति मञ्जुलमातनोति॥
अर्थ:
अनेकों पुराणों (18 पुराणों), वेद (निगम), शास्त्रों (आगम/षड्दर्शन), और अन्य ग्रंथों (जैसे वाल्मीकि रामायण, आदि) के सार-समूह से जो मान्य तथ्य हैं, उन्हीं के आधार पर श्री रघुनाथ जी की कथा का वर्णन किया मैं ने किया है। तुलसीदास जी कहते हैं कि उन्होंने यह अत्यंत मनोहर (सुंदर) रामकथा अपनी भाषा (अवधी/हिंदी) में, केवल अपने अंतःकरण की प्रसन्नता और आत्म-शांति (स्वान्तः सुखाय) के लिए रची है।
लोगों ने तो उसे भी और उन्हें भी विवाद का विषय बना दिया।
हमें जिसमें खुशी मिलती है वही हमारे लिए हितकारी है।
अच्छी कहानी है। इस कहानी के बहाने मानस का स्मरण हुआ। प्रणाम आपको।
कहानी एक सकारात्मक संदेश देती है।
मेरी कहानी “चाँद का सच” को इतने मनोयोग से पढ़ने, समझने और उस पर अपने विचार साझा करने के लिए हृदय से आभार।
आपने चाँद के प्रतीक और उसके दाग दोनों को जिस दृष्टि से देखा, वह मुझे बहुत सार्थक लगी। सच तो यही है कि चाँद की चमक जितनी आकर्षित करती है, उसके दाग उतना ही उसका सत्य भी हैं। शायद जीवन, साहित्य और मनुष्य भी इससे भिन्न नहीं।
सम्मानों और उपलब्धियों की आपाधापी के बीच रचनाकार कई बार अपने मूल उद्देश्य से भटक जाता है। ऐसे में आपकी स्मरण कराई हुई तुलसीदास जी की पंक्तियाँ — “स्वान्तः सुखाय” — मन को भीतर तक छू गईं। वास्तव में लेखन का सबसे बड़ा पुरस्कार वही संतोष है जो सृजन के बाद मन में उतरता है।
कहानी की उस छोटी बच्ची का उल्लेख आपने विशेष रूप से किया, यह मेरे लिए बहुत सुखद रहा। कभी-कभी निष्कपट मन से निकला एक वाक्य बड़े-बड़े सम्मानों से अधिक मूल्यवान हो जाता है। शायद उसी सहज स्वीकृति में रचना का सबसे सच्चा सम्मान छिपा होता है।
आपकी टिप्पणी पढ़कर लगा कि कहानी अपने पाठक तक पहुँची और अपने भाव संप्रेषित कर सकी। किसी भी लेखक के लिए इससे बड़ी प्रसन्नता क्या हो सकती है।
एक बार पुनः आपके आत्मीय, विचारपूर्ण और प्रेरक शब्दों के लिए हार्दिक धन्यवाद।
कहानी को पढ़कर उसके सकारात्मक संदेश को आपने महसूस किया, यह मेरे लिए अत्यंत सुखद है। मेरा मानना है कि साहित्य केवल प्रश्न ही नहीं उठाता, वह पाठक के मन में आशा और आत्मचिंतन का एक दीप भी जलाता है।
आपके आत्मीय शब्द और प्रोत्साहन मेरे लिए किसी सम्मान से कम नहीं। हृदय से आभार एवं स्नेह।
सुनीता जी!
आप की कहानी ‘चाँद का सच पढ़ी’
चाँद का सच तो यही है कि उसमें दाग है। बाकी तो प्रतीकात्मकता में बहुत अर्थ निकलते हैं लेकिन आप की कहानी के संदर्भ में यही अर्थ हमें ज्यादा सटीक लगा।
कथानक के संदर्भ में यह बहुत सामयिक कहानी लगती है।
यह वर्तमान की बड़ी सच्चाई है। सम्मान को लेकर लेखकों में जो होड़ मची है वह देखकर वास्तव में आश्चर्य होता है।
अच्छे लेखन की कद्र नहीं होती तो भी बुरा लगता है। वास्तव में यही चाँद का सच है
वैसे यह अच्छा है कि हमें अपने संतोष के लिए लिखना चाहिये।
छोटी सी बिटिया अगर अपनी माँ की लिखी हुई कहानी को समझ कर कहती कि आपकी कहानी अच्छी है। आप और लिखिये। तो इससे ज्यादा सुखद बात और क्या हो सकती है।
जिस काम को करने से हमें अंदर से खुशी मिले वही काम श्रेष्ठ होता है।
मानस जैसा अद्भुत महाकाव्य रचकर भी तुलसीदास जी ने उसमें लिखा है-
नाना पुराण निगमागम सम्मतं यद्
रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतोऽपि।
स्वान्तः सुखाय तुलसी रघुनाथ गाथा भाषा निबन्धमति मञ्जुलमातनोति॥
अर्थ:
अनेकों पुराणों (18 पुराणों), वेद (निगम), शास्त्रों (आगम/षड्दर्शन), और अन्य ग्रंथों (जैसे वाल्मीकि रामायण, आदि) के सार-समूह से जो मान्य तथ्य हैं, उन्हीं के आधार पर श्री रघुनाथ जी की कथा का वर्णन किया मैं ने किया है। तुलसीदास जी कहते हैं कि उन्होंने यह अत्यंत मनोहर (सुंदर) रामकथा अपनी भाषा (अवधी/हिंदी) में, केवल अपने अंतःकरण की प्रसन्नता और आत्म-शांति (स्वान्तः सुखाय) के लिए रची है।
लोगों ने तो उसे भी और उन्हें भी विवाद का विषय बना दिया।
हमें जिसमें खुशी मिलती है वही हमारे लिए हितकारी है।
अच्छी कहानी है। इस कहानी के बहाने मानस का स्मरण हुआ। प्रणाम आपको।
कहानी एक सकारात्मक संदेश देती है।
आदरणीया नीलिमा जी,
सादर प्रणाम।
मेरी कहानी “चाँद का सच” को इतने मनोयोग से पढ़ने, समझने और उस पर अपने विचार साझा करने के लिए हृदय से आभार।
आपने चाँद के प्रतीक और उसके दाग दोनों को जिस दृष्टि से देखा, वह मुझे बहुत सार्थक लगी। सच तो यही है कि चाँद की चमक जितनी आकर्षित करती है, उसके दाग उतना ही उसका सत्य भी हैं। शायद जीवन, साहित्य और मनुष्य भी इससे भिन्न नहीं।
सम्मानों और उपलब्धियों की आपाधापी के बीच रचनाकार कई बार अपने मूल उद्देश्य से भटक जाता है। ऐसे में आपकी स्मरण कराई हुई तुलसीदास जी की पंक्तियाँ — “स्वान्तः सुखाय” — मन को भीतर तक छू गईं। वास्तव में लेखन का सबसे बड़ा पुरस्कार वही संतोष है जो सृजन के बाद मन में उतरता है।
कहानी की उस छोटी बच्ची का उल्लेख आपने विशेष रूप से किया, यह मेरे लिए बहुत सुखद रहा। कभी-कभी निष्कपट मन से निकला एक वाक्य बड़े-बड़े सम्मानों से अधिक मूल्यवान हो जाता है। शायद उसी सहज स्वीकृति में रचना का सबसे सच्चा सम्मान छिपा होता है।
आपकी टिप्पणी पढ़कर लगा कि कहानी अपने पाठक तक पहुँची और अपने भाव संप्रेषित कर सकी। किसी भी लेखक के लिए इससे बड़ी प्रसन्नता क्या हो सकती है।
एक बार पुनः आपके आत्मीय, विचारपूर्ण और प्रेरक शब्दों के लिए हार्दिक धन्यवाद।
सादर,
डॉ. सुनीता शर्मा
(सुनीता श्याम)
अच्छी कहानी॥ सकारात्मक संदेश देती है
आदरणीय सुदर्शन रत्नाकार जी
हार्दिक धन्यवाद।
कहानी को पढ़कर उसके सकारात्मक संदेश को आपने महसूस किया, यह मेरे लिए अत्यंत सुखद है। मेरा मानना है कि साहित्य केवल प्रश्न ही नहीं उठाता, वह पाठक के मन में आशा और आत्मचिंतन का एक दीप भी जलाता है।
आपके आत्मीय शब्द और प्रोत्साहन मेरे लिए किसी सम्मान से कम नहीं। हृदय से आभार एवं स्नेह।
सादर,
सुनीता शर्मा