Wednesday, February 11, 2026
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डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ की कलम से – पितृसत्ता, परंपरा और पलायन: ‘अलकनंदा सुत’ के आईने में बदलता समाज

पुस्तक का नाम : अलकनंदा सुत
लेखिका : अर्चना पेन्यूली
प्रकाशक : वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली
पेपरबैक प्रथम संस्करण : 2025
आईएसबीएन नं. : 978-93-6944-332-1
मूल्य : रु. 495/-
अर्चना पैन्यूली की कृतिअलकनंदा सुतसमकालीन हिंदी गद्य के उस रूखे और यांत्रिक दौर में एक ऐसी शीतल जलधारा की तरह फूटती है, जहाँ स्मृतियों के शैलशिखर केवल अकादमिक विमर्श का विषय बनकर रह गए हैं लेखिका ने डेनमार्क की सुदूर और बर्फीली वादियों में प्रवास करते हुए भी अपनी मिट्टी की उस सोंधी खुशबू को जिस तरह शब्दों में सहेजा है, वहचिराग तले अँधेरावाली कहावत को पूरी तरह झुठलाते हुए सात समंदर पार से भी अपनी संस्कृति का अलख जगाने जैसा एक महत्तर और युगांतकारी कार्य है यह कृति एक साथ स्मृतिआख्यान, जीवनी और सामाजिक इतिहास का ऐसा अनुपम त्रिवेणी संगम है, जिसमें पाठक केवल काले अक्षरों को पढ़ता नहीं है, बल्कि उस बीते हुए कालखंड की धड़कनों और पहाड़ी ढलानों की पुकार को साक्षात अपने भीतर अनुभव करता है अर्चना जी नेअलकनंदा सुतके माध्यम से साधारण के भीतर छिपी उस असाधारणता को उद्घाटित किया है, जो अक्सर इतिहास के भारीभरकम पन्नों के बीच कहीं दबकर रह जाती है यह समीक्षा उस मर्म को छूने का एक विनम्र प्रयास है, जो पहाड़ की चोटियों जैसी ऊँचाई और उसकी घाटियों जैसी गहराई को एक साथ समेटे हुए है
इस पुस्तक का शिल्प विधान अत्यंत सुगठित और कलात्मक है, जो पाठक को पहले ही पृष्ठ से अपनी ओर खींच लेता है अर्चना पैन्यूली ने एक मंझे हुए शिल्पकार की तरह कथा का ढांचा तैयार किया है, जहाँ कालक्रम की सीधी रेखा के बजाय स्मृतियों के बिखरे हुए सूत्रों को एक साथ पिरोया गया है पुस्तक का नाटकीय आरंभ ही उस विरोधाभासी मानवीय मनःस्थिति को नग्न कर देता है, जहाँ एक ओर जीवन कास्वर्ण जयंतीवर्ष मनाया जा रहा है और दूसरी ओर एक नवजात कन्या का अत्यंत संघर्षपूर्ण और अनिश्चित आगमन होता है वाराणसी के कबीरचौरा अस्पताल का वह दृश्य, जहाँ एक तरफ उत्सवधर्मी माहौल है और दूसरी तरफ एक नन्ही जान के अस्तित्व का संकट, लेखिका के कथाकौशल का प्रमाण है यहाँ लेखिका नेफ्लैशबैकऔरक्रॉसकटिंगजैसी सिनेमाई तकनीकों का जो भाषाई उपयोग किया है, वह हिंदी गद्य में एक नवीन प्रयोग की तरह दिखाई देता है यह शिल्प केवल कहानी कहने का माध्यम नहीं है, बल्कि वह उस कालखंड के सामाजिक और मनोवैज्ञानिक तनावों को व्यक्त करने का एक सशक्त औज़ार भी बन गया है इस नाटकीयता के पीछे छिपा यथार्थवाद पाठक को झकझोरता है और उसे सोचने पर विवश करता है कि जीवन की खुशियाँ और त्रासदियाँ कैसे एक ही छत के नीचे साथसाथ साँस लेती हैं
कृति की भाषा और बिम्बविधान पर दृष्टि डालें तो इसमें वहपहाड़ी खनकऔरमैदानी स्पष्टताका अद्भुत समन्वय मिलता है, जो समकालीन साहित्य में दुर्लभ है लेखिका ने उत्तराखंड केसेवलगाँव की उन ऊँची ढलानों, बाँजबुरांश के जंगलों और अलकनंदा के शोर को जिस सूक्ष्मता से चित्रित किया है, वह शब्दों के माध्यम से एक जीवंत दृश्यबिम्ब निर्मित करता है जब वह पहाड़ की कठोर जीवनचर्या का वर्णन करती हैं, तो पाठक के कानों में पत्थरों की रगड़ और घाटियों में गूँजती हवाओं का स्वर स्पष्ट सुनाई देने लगता है उनकी भाषा में लोकमुहावरों और आंचलिक शब्दावली का ऐसा सटीक प्रयोग हुआ है कि वह कृत्रिम लगकर मिट्टी की उपज लगती हैलड़की हुई हैकी खबर पर पिता का मुँह लटक जानायह केवल एक वाक्य नहीं है, बल्कि भारतीय समाज की उस पितृसत्तात्मक ग्रंथि का एक कड़वा बिम्ब है, जिसे लेखिका ने बिना किसी लागलपेट के प्रस्तुत किया है अर्चना जी की गद्य शैली में एक ऐसी अंतर्धारा बहती है जो केवल अपनी मिट्टी से अगाध प्रेम करने वाले रचनाकार के पास ही संभव हो सकती है उनकी भाषा कहीं ठिठकती नहीं, बल्कि अलकनंदा की तरह प्रवाहमान रहती है, जिसमें स्मृति की लहरें बारबार पाठक के हृदय को भिगोती रहती हैं
शिवानन्द का चरित्र अपनी जड़ों से अटूट जुड़ाव और भविष्य की असीम उड़ान के बीच के एक जीवंत और दुर्दम्य सेतु की तरह उभरता हैमैं अपने गाँव का पहला दसवीं पास और पहला बी.. हूँ“, यह आत्मविश्वास से भरा वाक्य मात्र एक व्यक्तिगत उपलब्धि का बखान नहीं है, बल्कि एक पूरे अंचल की शिक्षा के प्रति छटपटाहट और संघर्ष का ऐतिहासिक दस्तावेज़ है लेखिका ने शिवानन्द को किसीपूज्य देवतायाआदर्श नायककी तरह पेश करके एक हाड़मांस के मनुष्य के रूप में गढ़ा है, जिसकी अपनी सीमाएं हैं, अपना क्रोध है और अपना अहम् भी है देहरादून में अपनी कोठी बनाना और पहाड़ों की सीमाओं से बाहर निकलकर शहरी व्यवस्था में खुद को स्थापित करना एकअकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकतावाली चुनौती को स्वीकार करने जैसा साहसिक कृत्य था शिवानन्द का संघर्ष केवल आर्थिक नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक अस्मिता की लड़ाई भी है, जहाँ वह अपनी पहाड़ी पहचान को खोए बिना आधुनिक दुनिया में अपनी जगह बनाना चाहते हैं उनका यह व्यक्तित्व आज के उस युवा वर्ग के लिए एक प्रेरक मिसाल है, जो अपनी जड़ों को आधुनिकता की अंधी दौड़ में कहीं पीछे छोड़ आए हैं
विशिष्टता के साथसाथ यदि हम इस कृति के मनोवैज्ञानिक धरातल का विश्लेषण करें, तो यहाँ पिता और पुत्री के बीच का जो अनकहा संवाद है, वह इस पुस्तक की आत्मा है नायक शिवानंद के बच्चों ने अपने पिता को एक पात्र की तरह देखने का जोखिम उठाया है बेटा अभय लिखता है :पिता जी के मन की थाह कौन ले सकता है?”, और यही जिज्ञासा उन्हें उनके व्यक्तित्व की उन परतों तक ले जाती है जहाँ अक्सर पहुँचना कठिन होता है प्रसव के समय पिता का व्यवहार और परिवार में पुत्र की चाहत के प्रति उनका आग्रह, उनके चरित्र के उसग्रे शेडको उजागर करता है जिसे अक्सर जीवनी लेखक छिपा लेते हैं यहाँ लेखिकागाँठ का पूरा और आँख का अंधावाली स्थिति के बजाय एक यथार्थपरक चित्रण करती हैं यह मनोवैज्ञानिक गहराई ही इस पुस्तक को एक साधारण संस्मरण से ऊपर उठाकर एक गम्भीर साहित्यिक कृति का दर्जा देती है घर के माहौल में एक तरफगहरी नींदमें सोई बीमार बहन और दूसरी तरफ रसोई में काम करती बड़ी बहन गौरी का सूक्ष्म चित्रण, मध्यवर्गीय परिवार के उस कड़वे यथार्थ को दर्शाता है जहाँ पुरुष के अहम् और स्त्रियों के मौन संघर्ष के बीच एक पूरा जीवन बीत जाता है
परंतु, एक निर्भीक और निष्पक्ष समीक्षक के रूप में मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि इस विशाल कलेवर में कहींकहीं विवरणात्मकता का ज्वार इतना अधिक हो गया है कि वह मुख्य कथा के प्रवाह को बाधित करता है स्पष्टता के साथ कहा जाए तो, 280 पृष्ठों के इस विस्तार में कई जगह घटनाओं का दोहराव और एक ही तरह के भावबोध की पुनरावृत्ति पाठक के धैर्य की कठिन परीक्षा लेती है कहींकहीं लेखिका का अपनी स्मृतियों और अतीत के प्रति अतिशय मोह इतना प्रभावी हो गया है कि वह एक लेखक की वस्तुनिष्ठता पर हावी होने लगता है कुछ अध्यायों में सूक्ष्म विवरण इतने अधिक हैं कि वे कथा के मुख्य तंतु को कमजोर कर देते हैं यदि पुस्तक का संपादन थोड़ा औरनिर्ममऔरचुस्तहोता, तो इसकी मारक क्षमता और भी अधिक प्रभावशाली हो सकती थी एक गम्भीर आलोचक के नाते यह महसूस होता है कि विवरणात्मकता का यह अतिरेक कभीकभी मुख्य चरित्र के गहरे मनोवैज्ञानिक विश्लेषण को पृष्ठभूमि में धकेल देता है, जिससे पाठक पात्र की आंतरिक उथलपुथल से पूरी तरह तदात्म्य स्थापित करने में स्वयं को असमर्थ पाता है शिल्प में यहऊँचनीचकृति की समग्रता को थोड़ा प्रभावित करती है
इस कृति का एक और पक्ष जो ध्यातव्य है, वह है तत्कालीन सामाजिक और राजनीतिक परिवेश की सापेक्षता यद्यपि लेखिका ने शिवानन्द के माध्यम से एक पूरे युग को पकड़ने की कोशिश की है, लेकिन उस कालखंड की वृहत्तर ऐतिहासिक घटनाओं का समावेश उतना प्रखर होकर नहीं उभरा है जितना कि पारिवारिक परिवेशजंगल में मोर नाचा किसने देखावाली उक्ति यहाँ चरितार्थ होती हैइतने उत्कृष्ट चरित्र चित्रण के बावजूद भी कुछ महत्वपूर्ण ऐतिहासिक मोड़ों का ज़िक्र लेखिका ने बहुत ही सरसरी तौर पर किया है उदाहरण के तौर पर, 1940 के दशक का वह संक्रमण काल जब पूरा देश बदलाव की दहलीज पर था, शिवानन्द के मानसिक अंतर्द्वंद्व में उस बाहरी हलचल का प्रतिबिंब और अधिक सघन होना चाहिए था इसके अलावा, अन्य सहायक पात्र जैसे बड़ी बहन गौरी या छोटी बहनें मिहिका और दिव्या, केवल पार्श्व में ही बनी रहती हैंएक हाथ से ताली नहीं बजती‘, वैसे ही किसी महान चरित्र के निर्माण में उसके आसपास के लोगों की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है लेखिका ने अपना पूरा ध्यान शिवानन्द पर केंद्रित करके बाकी पात्रों के साथ वह न्याय नहीं किया जिसकी वे अपेक्षा रखते थे, जिससे कथा में कभीकभी एक प्रकार का एकांगीपन महसूस होता है
लेखिका की गद्य शैली में जोपहाड़ी लहजाहै, वह प्रशंसनीय तो है, लेकिन कहींकहीं वह तत्सम शब्दावली के साथ टकराता हुआ भी प्रतीत होता है जहाँ एक तरफ आंचलिकता का सौंदर्य है, वहीं दूसरी ओर कुछ आधुनिक शब्दों का प्रयोग उस ऐतिहासिक वातावरण के साथ पूर्णतःबेमेलऔर कृत्रिम लगता है 1940 के परिवेश का वर्णन करते समय आधुनिक विमर्श की शब्दावली का उपयोग करना पाठक को उस कालखंड से काटकर वर्तमान में खींच लाता है, जिससे ऐतिहासिक प्रमाणिकता पर सवाल उठ सकते हैं अर्चना जी ने अपनी भावनाओं को टाइपराइटर के माध्यम से व्यक्त करने की जो कोशिश की है, वह कभीकभी बहुत अधिक व्यक्तिगत हो जाती है लेखन जब केवल स्वयं को शांत करने कीअनिवार्य साधनाबन जाता है, तो वह पाठकों के लिए कभीकभी दुरूह हो सकता है समीक्षा की दृष्टि से यह कहा जा सकता है कि यदि लेखिका अपनी भावनाओं और वर्णनों के बीच थोड़ा और संतुलन बना पातीं, तो यह कृति विश्व साहित्य की जीवनी विधा के समकक्ष खड़ी हो सकती थी शिल्प की यह दरारें हालांकि विषय की सघनता के सामने गौण हैं, फिर भी एक सचेत पाठक को खटकती हैं
इन सीमाओं के बावजूद, ‘अलकनंदा सुतका ऐतिहासिक महत्व इस बात में है कि यह पहाड़ के उस समाज का दस्तावेज़ है जो आज तेज़ी से विलुप्त हो रहा है अर्चना पैन्यूली ने उस पीढ़ी को एक विनम्र और भावभीनी श्रद्धांजलि दी है, जिसने ऊँचाइयों को छूने से पहले घाटियों के अँधेरों से जूझना सीखा था शिवानन्द का गाँव से निकलना केवल एक भौतिक पलायन नहीं था, बल्कि एक वृहत्तर सांस्कृतिक अस्मिता का विस्तार था लेखिका ने जिस तरह से वाराणसी से लेकर देहरादून और फिर डेनमार्क तक के भूगोल को एक सूत्र में पिरोया है, वह उनकी वैश्विक दृष्टि को दर्शाता है उनकी भाषा में वह ताप है जो पाठक के हृदय को पिघला देता है और वह प्रकाश है जो उसे अतीत के गौरव से साक्षात्कार कराता है यह पुस्तक प्रवासी साहित्य के क्षेत्र में भी एक मील का पत्थर है, क्योंकि यह केवल विरह की गाथा नहीं है, बल्कि अपनी जड़ों से शक्ति प्राप्त कर एक नए संसार के सृजन की कहानी है वाणी प्रकाशन ने इस कृति को प्रकाशित कर हिंदी जगत पर एक बड़ा उपकार किया है, क्योंकि ऐसी कहानियाँ लिखी नहीं जातीं, बल्कि स्मृतियों की आँच पर तपाकर कुंदन की तरह निकाली जाती हैं
अलकनंदा सुतकी रचना प्रक्रिया स्वयं में एक महागाथा है, जहाँ लेखिका ने पुत्र अभय के माध्यम से  अपनेनर्वसपलों को रचनात्मक ऊर्जा में रूपांतरित किया है जब वह अपनेऑफ़िसनमा कमरेमें बैठकर टाइपराइटर की खटखट के साथ अपने अतीत से संवाद करता है, तो लेखिका एक ऐसा युगद्रष्टा बन जाती हैं जो समय के क्रूर प्रहारों को शब्दों की मरहम दे रही हैं यह कृति इस अर्थ में भी विशिष्ट है कि यह हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने का मार्ग दिखाती है शिवानन्द का व्यक्तित्व हमें यह सिखाता है कि प्रगति का अर्थ अपनी संस्कृति का त्याग करना नहीं, बल्कि उसे सहेजकर नई दुनिया की चुनौतियों का सामना करना है अर्चना जी ने जिस ईमानदारी से पिता शिवानन्द के दोषों और गुणों का वर्णन किया है, वह हर उस लेखक के लिए एक सबक है जो सत्य की कसौटी पर अपनी कलम को परखना चाहता है यह पुस्तक आने वाले समय में केवल उत्तराखंडियों के लिए, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए एक संबल बनेगी जो अपनी पहचान की तलाश में भटक रहा है अंततः, यह कहना न्यायोचित होगा किअलकनंदा सुतहिंदी साहित्य के विशाल सागर में एक ऐसी अनमोल मणि है, जिसकी चमक समय बीतने के साथ और भी प्रखर और दैदीप्यमान होती जाएगी
लेखिका ने इस कृति में जिस तरह सेकालक्रमानुसारविवरण देने के बजाय स्मृतियों के प्रवाह को चुना है, वह उनके साहस का परिचायक है 30 अध्यायों में बँटा यह कथानक एक लंबी और घुमावदार पहाड़ी पगडंडी की तरह है, जहाँ हर मोड़ पर एक नया अनुभव और एक नया संघर्ष पाठक की प्रतीक्षा कर रहा हैभाग्य अपना निर्णय सुनाएगा‘—यह वाक्य पूरी पुस्तक में एक रहस्यमय संगीत की तरह गूँजता रहता है अर्चना पेन्यूली ने जिस तरह से मौत और ज़िंदगी के बीच झूलती अपनी छोटी बहन के संघर्ष को पिता के जन्मदिन के साथ जोड़ा है, वह जीवन के परम सत्य और उसकी विडंबनाओं को पूरी नग्नता के साथ प्रस्तुत करता है लेखिका की यह परिपक्वता उन्हें समकालीन गद्य के शीर्ष रचनाकारों की श्रेणी में खड़ा करती है उनके शब्द केवल सूचना नहीं देते, बल्कि एक ऐसा अनुभव प्रदान करते हैं जो पाठक की अपनी स्मृति का हिस्सा बन जाता हैअलकनंदा सुतका यह सफर हमें उस शिखर तक ले जाता है जहाँ पहुँचकर मनुष्य स्वयं से और अपनी जड़ों से साक्षात्कार करता है यह एक ऐसी रचना है जो पढ़ी नहीं, बल्कि जी जाती है
हमें शिवानन्द के उस आंतरिक संघर्ष और बाह्य परिवेश के अंतर्संबंधों को समझना होगा, जो इस पुस्तक की रीढ़ है शिवानन्द का व्यक्तित्व केवल एक व्यक्ति का चित्रण नहीं, बल्कि उस पहाड़ी अस्मिता का बिम्ब है जो अपनी जड़ों की नमी को मैदानी शुष्कता में भी बचाए रखना चाहती है लेखिका ने यहाँ जिसबिम्बविधानका आश्रय लिया है, वह अत्यंत मारक है जब वे पहाड़ की ऊबड़खाबड़ पगडंडियों और पत्थरों के बीच से रास्ता बनाते हुए शिवानन्द को चित्रित करती हैं, तो वह केवल एक भौतिक यात्रा नहीं रह जाती, बल्कि वह एक पूरी सभ्यता का आधुनिकता की ओर प्रस्थान बन जाता है यहाँशिल्पकी सूक्ष्मता इस बात में है कि लेखिका ने पहाड़ को केवल एकबैकड्रॉपया पृष्ठभूमि की तरह इस्तेमाल नहीं किया है, बल्कि पहाड़ यहाँ एक जीवित पात्र की तरह उपस्थित हैएक ऐसा मौन साक्षी जो कठोर भी है और ममतामयी भी नामवर सिंह जी के शब्दों में कहें तो, यहाँ प्रकृति और मनुष्य के बीच का द्वंद्व किसी रूमानियत से पैदा नहीं हुआ है, बल्कि वह जीवन की उस कड़ी वास्तविकता से उपजा है जहाँरोटीऔररास्तेदोनों के लिए पहाड़ का सीना चीरना पड़ता है लेखिका की भाषा यहाँ अलकनंदा के वेग की तरह प्रखर हो जाती है, जो अपने साथ स्मृतियों का मलबा और वर्तमान की चुनौतियाँ दोनों बहा ले आती है
लेखिका के शिल्प का एक और महत्वपूर्ण आयामप्रतीकात्मकताहै, जहाँ वे छोटीछोटी वस्तुओं और घटनाओं के माध्यम से बड़े सामाजिक सत्यों को उद्घाटित करती हैं टाइपराइटर कीखटखटकेवल एक ध्वनि नहीं है, बल्कि वह बेटे अभय के मन की बेचैनी और अपने पिता के अनकहे इतिहास को शब्द देने की छटपटाहट का प्रतीक है 30 अध्यायों के इस विस्तार में जहाँ एक ओर देहरादून की कोठी का निर्माण एक उपलब्धि के बिम्ब के रूप में उभरता है, वहीं दूसरी ओर गाँव की उस धूल भरी गलियों का मोह एक ऐसी टीस की तरह बना रहता है जो कभी समाप्त नहीं होती यहाँभाषाका तेवर तब बदल जाता है जब लेखिका पितृसत्तात्मक समाज की उस विडंबना पर प्रहार करती हैं जहाँ पुत्र की प्राप्ति को हीकुल का दीपकमाना जाता हैलड़की हुई हैकी खबर पर पिता के चेहरे का उतर जाना एक ऐसा दृश्यबिम्ब है जो भारतीय समाज के उस छद्म को उघाड़कर रख देता है जिसे हम अक्सर अपनी शिक्षा के गर्व में छिपा लेते हैं अर्चना जी ने यहाँहाथ कंगन को आरसी क्यावाली बेबाकी दिखाते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि एक शिक्षित और संघर्षशील व्यक्ति के भीतर भी परंपराओं की जड़ें कितनी गहरी हो सकती हैं
समीक्षा की दृष्टि से इस कृति कामनोवैज्ञानिक विश्लेषणभी उतना ही अनिवार्य है जितना कि इसका सामाजिक संदर्भ शिवानन्द के चरित्र में जो अंतर्द्वंद्व हैएक ओर अपनीजातबिरादरीमें श्रेष्ठ होने का गर्व और दूसरी ओर अपनी संतान के जन्म के समय की वह संकुचित मानसिकतालेखिका ने इसे किसी मंझे हुए मनोवैज्ञानिक की तरह उकेरा है यहाँ शिल्प का कौशल इस बात में है कि शिवानन्द की संतानें अपने पिता कोजजके कटघरे में खड़ा नहीं करतीं, बल्कि वे उन्हें एक ऐसे इंसान के रूप में देखती हैं जो अपने समय की सीमाओं और संस्कारों का कैदी है यह तटस्थता हिंदी जीवनी साहित्य में कम ही देखने को मिलती है अक्सर हम अपनी स्मृतियों कोचीनी की चाशनीमें डुबोकर पेश करते हैं, लेकिन अर्चना पैन्यूली ने यहाँनीमकी कड़वाहट को भी उतनी ही ईमानदारी से जगह दी है यही वह बिंदु है जहाँ पाठक शिवानन्द के प्रति सहानुभूति और रोष के बीच एक अजीब से खिंचाव का अनुभव करता है साहित्यकारों ने जिसेआलोचनात्मक सहानुभूतिकहा था, वह इस कृति के पन्नेपन्ने पर बिखरी हुई है, जो पाठक को एक साथ जोड़ती भी है और झकझोरती भी है
यदि हम इस कृति के भाषाई सौंदर्य की पड़ताल करें, तो इसमेंपहाड़ी बोलियोंका रस औरपरिनिष्ठित हिंदीका गांभीर्य एक साथ प्रवाहित होता है लेखिका ने जहाँ एक ओर आंचलिक शब्दों का प्रयोग करके परिवेश को जीवंत बनाया है, वहीं दूसरी ओर दार्शनिक चिंतन के क्षणों में उनकी भाषा अत्यंत गंभीर और तत्सम प्रधान हो जाती है यह भाषाई संतुलन हालांकि सराहनीय है, लेकिन जैसा कि पहले भी संकेत किया गया, कहींकहींऊँचनीचका आभास होता है कुछ स्थलों पर लेखिका ने भावनाओं के आवेग में भाषा को इतना अलंकृत कर दिया है कि वह यथार्थ के खुरदरे धरातल से कटती हुई प्रतीत होती हैजंगल में मोर नाचा किसने देखावाली स्थिति तब पैदा होती है जब अत्यंत महत्वपूर्ण मोड़ों पर लेखिका वर्णनों में इतनी उलझ जाती हैं कि मुख्य पात्र का आंतरिक स्वर थोड़ा मंद पड़ जाता है एक समीक्षक के नाते यह कहना आवश्यक है कि यदि इन वर्णनों को थोड़ा और संक्षिप्त किया जाता, तो कृति की सघनता और अधिक प्रभावी होती फिर भी, उनकी गद्य शैली में एक ऐसीखिंचावहै जो पाठक को रुकने नहीं देती
कृति के शिल्प मेंसमय की बुनावटएक विशिष्ट भूमिका निभाती है लेखिका ने कालखंडों को जिस तरह से एकदूसरे में पिरोया है, वह किसी पुरानीपशमीना शॉलकी बुनावट जैसा हैमहीन, कलात्मक और गर्म सन् 1940 के दशक से लेकर समकालीन समय तक की यह यात्रा केवल शिवानन्द की आयु की गणना नहीं है, बल्कि यह बदलते हुए भारत के सामाजिक ढाँचे का इतिहास है गाँव से शहर, और फिर शहर से सुदूर विदेश तक का यह विस्थापनस्मृतिबिम्बोंके माध्यम से जिस तरह अभिव्यक्त हुआ है, वह प्रशंसनीय है अर्चना जी ने इसअसाधारण साधारणताको अपनी कलम से जो गरिमा दी है, वह प्रवासी साहित्य में एक नई चमक लेकर आई है यह कृति सिद्ध करती है कि भूगोल बदल जाने से संवेदना का धरातल नहीं बदलता, बल्कि वह और अधिक व्यापक और प्रखर हो जाता है
हमें इस पुस्तक की उनछायाओंकी बात भी करनी होगी जो प्रकाश के साथसाथ चलती रहती हैं जहाँ मुख्य पात्र शिवानन्द का चरित्र अपनी पूरी विराटता के साथ उभरता है, वहीं परिवार की अन्य स्त्रियाँचाहे वह बड़ी बहन गौरी हो या छोटी बहनेंवे केवल शिवानन्द के व्यक्तित्व के प्रकाश को परावर्तित करने वाले दर्पणों की तरह रह गई हैं लेखिका के पास एक सुनहरा अवसर था कि वे इन पार्श्व पात्रों के माध्यम से उस पहाड़ी परिवेश की स्त्रीदृष्टि को और अधिक विस्तार देतीं लेकिन यहाँशिल्पथोड़ा एकांगी हो गया हैएक ही साधे सब सधेवाली नीति अपनाते हुए लेखिका ने अपना पूरा ध्यान केवल ‘पिता’ पर ही केंद्रित रखा, जिससे अन्य पात्रों की पीड़ा और संघर्ष केवल हाशिए पर ही सिमट कर रह गए यदि इन पात्रों को थोड़ा और मांसरक्त दिया जाता, तो यह जीवनी एक बहुआयामी सामाजिक दस्तावेज़ बन सकती थी विवरणात्मकता का बोझ कहींकहीं इतना अधिक है कि वह पात्रों के बीच की सूक्ष्म अंतःक्रियाओं को ढक लेता है एक सजग समीक्षक के रूप में यह कमी सुधी पाठकों को खटक सकती है
इस कृति केसांस्कृतिक योगदानको रेखांकित करना अनिवार्य है अर्चना पैन्यूली ने डेनमार्क जैसी बर्फीली धरती पर बैठकर अपनी स्मृतियों की आँच से जो यह कथासंसार रचा है, वह भाषाई प्रतिबद्धता का अनुपम उदाहरण है उनकी भाषा में वहमिट्टी का सोंधापनआज भी सुरक्षित है, जो अक्सर विदेश प्रवास के दौरान धुंधला पड़ जाता है लेखिका ने अपने लेखन के माध्यम से यह संदेश दिया है किजहाँ चाह वहाँ राह‘। उन्होंने टाइपराइटर की प्रत्येक खटखट में अपने पूर्वजों की धड़कनों को सुनने का प्रयास किया है यह कृति उन तमाम प्रवासियों के लिए एक दर्पण है जो अपनी जड़ों से कटने के बहाने खोजते हैं अर्चना जी ने अपनीचिंताओंऔरघबराहटको रचनात्मक ऊर्जा में बदलकर यह सिद्ध कर दिया है कि साहित्य केवल विलास की वस्तु नहीं है, बल्कि वह स्वयं से साक्षात्कार करने और अपने इतिहास को सहेजने की एक अनिवार्य साधना है उनके बिम्बों में जो सच्चाई है, वह पाठक को एक गहरी आत्मीयता से जोड़ देती है
अलकनंदा सुतकेवल शिवानन्द गैरोला की जीवनी नहीं, बल्कि हर उस पहाड़ीसुतकी कहानी है जो अपनी आँखों में सपनों का आसमान और पाँवों में संघर्ष की बेड़ियाँ लेकर निकला है अर्चना पैन्यूली ने जिस निर्भीकता और तटस्थता के साथ ‘पिता’ के जीवन के अँधेरे और उजाले पक्षों को उकेरा है, वह नामवर सिंह के उसआलोचनात्मक विवेककी याद दिलाता है जहाँ रचनाकार अपने प्रिय को भी सत्य की कसौटी पर कसने से नहीं डरता पुस्तक के 280 पृष्ठों का यह सफर एक ऐसी दुनिया की सैर कराता है जहाँ भावनाएं कच्ची मिट्टी की तरह महकती हैं और संघर्ष पत्थर की तरह सख्त है यद्यपि कहींकहीं विवरणों की अधिकता और सहायक पात्रों की उपेक्षा अखरती है, परंतु लेखिका की ईमानदारी और शिल्पगत दृढ़ता इन कमियों को ढँक लेती है यह पुस्तक हिंदी साहित्य के भंडार में एक ऐसी अनमोल मणि की तरह है, जिसकी चमक आने वाले वर्षों में और अधिक प्रखर होगी
अलकनंदा सुतका मूल्यांकन करते हुए यह कहा जा सकता है कि यह कृति अपने समय के यथार्थ को पूरी निर्भयता से अभिव्यक्त करती है लेखिका ने जोप्रारंभिक बिंदुचुना और जिस तरह सेभाग्य का निर्णयसुनाने तक की यात्रा पूरी की, वह उनकी रचनात्मक प्रौढ़ता का परिचायक हैपिता जी के मन की थाह कौन ले सकता है?” – यह प्रश्न अंत तक पाठक के मन में गूँजता रहता है और यही इस जीवनी की सबसे बड़ी सफलता है अर्चना पैन्यूली को इस महत्तर कार्य के लिए साधुवाद दिया जाना चाहिए कि उन्होंने अपनी जड़ों का कर्ज शब्दों के माध्यम से चुकाया है वाणी प्रकाशन का यह प्रयास हिंदी साहित्य के लिए एक उत्सव की तरह है यह पुस्तक आने वाले समय में जीवनी विधा और प्रवासी लेखन के लिए एक मानक स्थापित करेगी अलकनंदा की ये लहरें हिंदी के पाठकों के हृदय को लंबे समय तक भिगोती रहेंगी और उन्हें अपने अस्तित्व की जड़ों की ओर मुड़ने के लिए प्रेरित करती रहेंगी, ऐसी पूर्ण आशा है
डॉ. सुरेश कुमार मिश्राउरतृप्त
https://hi.wikipedia.org/s/1ptf


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1 टिप्पणी

  1. डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी!

    आपकी कलम से –अर्चना पेन्यूली की पुस्तक ‘अलकनंदा सुत’
    *”पितृसत्ता, परंपरा और : ‘अलकनंदा सुत’ के आईने में बदलता समाज”*
    संदर्भित पुस्तक समीक्षा पढ़ी और पूरी गंभीरता से पूरी पढ़ी। जाहिर है कि पुस्तक पढ़ने का मन बना।

    हम जितना अधिक पुस्तक के बारे में पढ़कर प्रभावित हुए, उतना ही या शायद उससे अधिक आपकी समीक्षक दृष्टि ने चमत्कृत किया।

    आपने बहुत बारीक-बारीक चीजों पर अपनी दृष्टि डाली है। कभी-कभी रचना में भावनात्मक प्रवाह (अगर आप अपना सत्य लिख रहे हैं )इतना अधिक तीव्र होता है कि दृढ़ता से केंद्र में केवल एक ही पात्र रहे तो अन्य सब कथानक उसके सामने उपेक्षित या कहीं गौण रह जाते हैं। और इसी कारण नजरअंदाज भी कर दिए जाते हैं।

    भावनाओं का प्रभाव और उसकी समुचित प्रस्तुति ध्यान को अपनी ओर केंद्रित कर लेती है।

    समीक्षा कैसी होती है? समीक्षक को कैसा होना चाहिये? आपकी यह समीक्षा एक कार्यशाला की तरह लगी हमें। इसमें बहुत कुछ ऐसा है जिसे सीखना एक निष्पक्ष समीक्षा व समीक्षक के लिए बहुत आवश्यक है।

    आपके समीक्षक अंशों को यहाँ आपने समझाइश के साथ कारण भी बताया है।
    हम इसे नोट करके रखेंगे।
    और एक बात और कहने से स्वयं को रोक नहीं पा रहे हैं कि वास्तव में आपकी इस पुस्तक समीक्षा को पढ़कर ‘उर तृप्त’ हुआ।
    इस समीक्षा के लिये आपका तहेदिल से शुक्रिया।
    प्रस्तुति के लिए तेजेन्द्र जी का भी तहेदिल से शुक्रिया।
    पुरवाई संपादकीय समूह का भी चयन के लिये दिल से आभार है।

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