लान के चार में से दो चेयर पर दो लोग बतकही में व्यस्त। किनारे से झाॅंकते उलटे अशोकों, बाउंड्री वॉल पर चढ़े बाहर झाँकते गाढ़े बैंगनी–गुलाबी रंगतवाले मधु मालती के बीच उनके कहकहे और बातों की गूंज।
बातें कभी ऑफिस की, कभी टूरिज्म की। राजनीति से सरकी तो समाज पर जा टिकी। वहाॅं से समाजसेवा की ओर बढ़ चली।
फिर क्लब के वार्षिक समारोह की ओर मुड़ गई। यानी हर तरह की बतकही। कभी गंभीर, तो कभी मजाकिया। अपनी रौ में बातें करते दोनों बेवजह हॅंस रहे थे।
दूसरी बार चाय की तलब। पूरी हुई जब, सिप लेते हुए खन्ना साहब की नजर अचानक लॉन की ओर खुलनेवाली खिड़की पर चली गई।
फ्लोरल पर्दे के पार गोरा, कमसिन चेहरा एकटक उन्हें ताक रहा था। उनका मग हवा में ठहर गया। वह चेहरा कुछ कह रहा था। ऑंखें बोल रही थीं, एकदम स्पष्ट।
वे पुकार उठे,
“तुम भी यहीं आ जाओ अमृता!”
“नहींऽ…क्यों?”
“हमें ज्वाइन करोगी तो मुझे अच्छा लगेगा।“
“आपके पास? बिलकुल नहीं।“
और वह कमसिन किशोर चेहरा हट गया, पर्दे को जोर से खींचकर यथास्थान करता हुआ।
मिसेज जोशी ने उधर देखा। अपमान से काला पड़ता उनका चेहरा तमतमा गया।
“अमृता!…इधर आओ।“
उन्होंने जोर से बेटी को आवाज दी। आवाज अनसुनी हुई तो और ऊॅंची,
“कम सून।”
मम्मी की अंग्रेजी सुनी अमृता ने। वह उनकी अंग्रेजी सुनते ही समझ जाती है़ं, मम्मी बहुत गुस्से में हैं।
धीरे–धीरे चलते हुए लॉन चेयर के निकट जा पहुॅंची। चुपचाप खड़ी अमृता की तनी ग्रीवा देखकर उन्हें लगा, बदतमीजी की लहर बहुत बढ़ गई है।
“माफी माॅंगो।“
“इनसे? व्हाई? मैंने किया क्या?”
“मैं कहती हूँ, माॅंगो माफी।“
जिद एक तनी रस्सी। कोई भी उतरना नहीं चाहता। भले लुढ़क जाए।
“माॅंगोगी या…?”
“क्यों माँगे?”
मम्मी को लगा, उसके लाल गालों को पाॅंचों ऊँगलियों की छाप से और लाल कर दे। पर गुस्से को पीती रहीं। स्वर को यथासम्भव सहज बनाकर बोलीं,
“अपनी बदतमीजी के लिए।“
“बदतमीजी किसकी? मेरी या…?”
झट से कहकर अमृता झटके से चुप हो गई। अगर वह वाक्य पूरा हो जाता?
नहीं भी हुआ तो क्या? सब कुछ स्पष्ट हो ही गया। खन्ना परेशान हो उठे।
‘बिना कहे ही अमृता ने बहुत कुछ कह दिया है।‘
“अरे! बच्चों की छोटी गलतियों पर… छोड़िए भी। बड़ी होगी तो सब सीख जाएगी।”
मिसेज जोशी ने सुने बिना कहा,
“माॅंगो माफी अमृता!”
चबाकर कही गयी बात की अवहेलना एवं अपनी बेइज्जती होते देखकर खन्ना उठ गए।
“छोड़िए आप भी। मैं अब चलूॅंगा।“
“कैसे जाऍंगे आप? बैठिए, खन्ना साहब! अमृता माफी माॅंगेगी।“
इस पर अमृता बिना कुछ कहे तेजी से लौट गई। मम्मी को यह बात बर्दाश्त के बाहर लगी। यकीन नहीं हुआ कि उनकी बेटी और…।
सैंडिल से लॉन के कोमल घासों को रौंदती वे भी अंदर गईं। बेटी कमरे में बंद थी।
तेरह वर्षीया बेटी का यह दुस्साहस वे कैसे सह लेतीं। उन्होंने दरवाजे को जोर का धक्का दिया।
दरवाजा खुला। असावधान खड़ी होने के कारण गिरते–गिरते बचीं। तलवे की लहर और चढ़ी। उन्होंने देखा, अमृता खिड़की से लगकर खड़ी है। मिसेज जोशी उसे खींचकर बाहर लाने के लिए उस तक गई।
परन्तु अमृता ने बहुत ही शांति से ॳॅंगूठे से अपने वातायन के बाहर इशारा किया। उन्होंने झाॅंककर देखा। खन्ना सर झुकाए बाहर की ओर जा रहे थे।
वे अचंभित हुईं। आवाज देकर रोकना चाहा।
पर वे लाॅन पारकर गेट के बाहर निकल रहे थे।
मिसेज जोशी का क्रोध काफूर हो गया। बेटी की ओर एक नजर डाल, वे बाहर निकल गईं। मम्मी को गेट के बाहर जाते देखकर अमृता को धक्का लगा।
‘मम्मी…मम्मी! तुम उसे मनाने जा रही हो?’
और एक अनाम कुढ़न उसके अंदर घर कर गई।
‘मम्मी मैं अकेली बच गई। तब भी आप नहीं समझेंगी?…आप अकेली हो जाऍं तो जाने।‘
उसने भाई अखिल को याद किया। बुखार में तपते अखिल को पुराने नौकर भोला ने गलत दवा दे दी थी और वह चार दिन अस्पताल में रहकर…’ओह!’
अमृता उस समय को याद नहीं करना चाहती है। तब–तब सामने अड़ ही जाते हैं वे लम्हें।
परन्तु उसे पता है, मम्मी कभी अकेली नहीं होतीं।
डैडी व्यापार के काम से बाहर रहें तो भी नहीं। पार्टियों में बहुत भीड़ होती है, कोई अकेलापन कैसे अनुभव करे। क्लब में डांस, गाने, नशा… हा!…!हा!… ही!… ही!…न जाने कितनी दवाइयाँ ऊबन से बचने कीं।
‘और उसके पास?’
‘मम्मी, डैडी के रहते भी क्या है? नितांत अकेला घर। सजा–धजा पर अकेला। छुट्टियों में कितनी कोफ्त होती है।‘
सच है, शाम को सिर्फ लाॅन में खेलकर अमृता का मन कितना बहले?
मम्मी कभी छुट्टी पर लेकर रहीं तो भी मीन प्यासी।
दोपहर को घर पर रहतीं भी हैं तो उसे क्या फायदा? वे दोपहर में सोती हैं। और अमृता विज्ञापन की लड़कियों, स्त्रियों की कतरनें इकट्ठा करती उनमें मम्मी ढूॅंढा करती है।
‘क्या ये सब भी अपनी–अपनी अमृता को छोड़कर डैडी की बराबरी करने निकल पड़ी हैं?’
वह उदास होकर रंगीन पेंटवाली दीवारों को ताकती। दीवारें उसे रंगहीन नजर आतीं।
‘क्या ये सब भी क्लबों को रंगीन बनाकर घर को उदास रखती होंगी…? रंगहीन!’
वह बुदबुदाती,
‘पाॅंच तरह के पेंट से सजे घर में भी इतनी रंगहीनता क्यों है? इतनी उदासी क्यों है?’
यहाॅं के शीशे चमकते है, मुँह देख लो। पर ऐसा कभी नहीं हुआ कि वह अपना मुॅंह देखने के लिए शीशे के सामने खड़ी हुई और मम्मी को शीशे में अपने समकक्ष पाया हो।
‘पता नहीं, बचपन में मम्मी ने गोद में पाला है या पालने में?…अपना स्नेह दिया है या नौकरों का दिलवाया?’
पता नहीं क्या, उसे तो सब पता ही है। तभी तो शामू ही उसके शाम के नाश्ते से रात के खाने तक की फिक्र करता है।
मम्मी भी कभी नहीं पूछतीं,
‘क्या खिलाया?’
इन्हें शामू पर भरोसा जो है। वो जानती हैं, शामू उसे दूध, फल, स्वादिष्ट पौष्टिक भोजन, नाश्ता, लंच, डिनर सब कुछ समय पर देता है।
अमृता ने ऑंखें बंद कर लीं पर सब प्रत्यक्ष,
मिसेज जोशी सवेरे अपने सजने में, शाम क्लब जाने की तैयारी में और दोपहर को गाइड बन विभिन्न प्रदेश के विभिन्न यात्रियों को टूरिस्ट बस से हर जगह घुमाने में अपना वक्त व्यतीत करती है।
‘ऐसे में हम क्या करें?’
‘गर्मी की छुट्टियों में इस तपती जगह पर कौन यात्री आएगा भला? इसलिए तो मम्मी को इन दिनों छुट्टी मिल पाती है।‘
वह अंदर ही अंदर कहती रहती,
‘पर ये छुट्टियाॅं क्या सिर्फ सोने के लिए हैं? घूमने, क्लब जाने के लिए हैं?’
‘डैडी को व्यापार से फुर्सत नहीं। मम्मी को डैडी बनने से।‘
एकाएक चिंतनशील मन मचला,
‘पुरुष और स्त्री में अंतर क्या है?…क्यों है?…वे बराबर क्यों नहीं? और नहीं तो बराबरी की जरूरत कैसी?’
प्रश्नों के बियाबान में भटकती रहती है अमृता।
‘यह बराबरी क्या घर त्यागकर बाहर जाने में ही है?’
एक और स्थिति उसके मन की कोमलता कुचल डालती है और वह अक्सर नए प्रश्नों की घाटी में गिरकर उलझ जाती। घायल भी होती।
नि:संतान निखिल शर्मा और उनकी पत्नी पास ही रहती है। हर रात उनके घर से शोर का तूफान उठता है। शर्मा जी को अपने हाथों–पैरों पर वश नहीं।मिसेज शर्मा को मार खाते देखकर उसके मन में उठता है,
‘अंतर यहीं तो नहीं? आँटी कभी अंकल को नहीं मारती हैं। सारा काम भी खुद करती है। फिर मार क्यों?’
उलझन कम नहीं होती, पूछे किससे। कोई मित्र बनाना मम्मी–डैड को पसंद ही नहीं।
‘वे बराबरी की बात क्यों नहीं करती हैं? बाहर सर्विस क्यों नहीं करती हैं?’
दोनों तरह की अति उसे अखर जाती पर अमृता के बढ़ते मस्तिष्क में छटपटाते इन प्रश्नों का जवाब उसे नहीं मिल पाता।
**
अभी अमृता ने वीरान ऑंखों से शामू को नाश्ता परोसते देखा। शामू उसे गुमसुम पाकर गौर से देखने लगा। कुछ कहना चाहा। फिर बिना कुछ कहे कमरे से बाहर चला गया।
गेट पर बाहर से ताला लगाकर सामान लाने निकल गया। अमृता अनपने भाव से नाश्ता करने लगी। सदा की तरह एकदम अकेले टुँगती रही।
शाम का धुँधलका छा रहा था। साढ़े सात बजे मिसेज जोशी लौटीं। देखा, अब तक अमृता वहीं जमीन पर बैठी है। बल्कि और भी बदतर हालात में।
पल भर में उनका गुस्सा नाक पर। गोरा, पहाड़ी खूबसूरत चेहरा लाल हो गया। अमृता का काला पड़ता हुआ, कमरे का नीलापन गुम सा।
“लड़की! तू जिद्दी होती जा रही है। तुझे ठीक करना ही होगा।“
अमृता कुनमुनाई पर उठी नहीं।
“अमृता! उठो।…उठो बदतमीज!”
वह चौंककर मम्मी की ओर देखने लगी। अमृता की नजरों में तीखापन न था। एक बेचारगी तैर रही थी। जिद व गुस्से के लक्षण न थे।
मिसेज जोशी को लगा,
‘जिद्दी है। मनाने से ही मानेगी। गुस्सा समाधान नहीं।‘
अतः अपनी साड़ी को सँभालकर उसके नजदीक बैठती हुई पुचकारा,
“अमृता! मुझे इतना क्यो सताती है बेटा?”
उन्होंने उसकी चिबुक पकड़ी। उसके घुँघराले बालों पर हाथ फेरा। अमृता फूट पड़ी।
“अरे! किस बात फूट–फूटकर रो रही हो? ऐसा क्या हो गया?”
उनसे चिपट कर रोती रही।
‘इतनी छोटी बात पर…?’
उन्होंने सोचा न था। अपने बच्चों का अनावश्यक कमजोर होना उन्हें पसंद न था। अतः बहुत रुखाई से कहा,
“किस बात पर रो रही हो? इतनी छोटी और तीखापन देखो।“
अन्य समय रहता, अमृता झटके से उनसे अलग हो जाती। अभी और चिपट गई। चिपटकर और भी रोने लगी।
‘मम्मी कितनी नजदीक? इतनी तो कभी न थी।‘
उस दिन उसे कमरा बड़ा और डरावना नहीं लगा। बिस्तर भी भरा–भरा।
न जाने कब से उसके कमरे में मम्मी की ऊष्मा न थी। वे मिलती भी तो टीवी के सामने, बस।
जोशी जी दस–पंद्रह दिनों में आते तब भी तीनों टीवी साथ देखते। पर उस समय आवाजें अपनी और अपनों की कहां। तब हाॅल में तो टीवी बोला करता।
अमृता अपनी सी आवाजों के लिए तरस जाती।
आज मन की तरस थोड़ा कम। मम्मी लगातार बातें किए जा रही हैं।
उन्होंने उसके माथे और हाथ को चूमा।
***
दूसरे दिन मम्मी को निकट पाकर, दोपहर को उनकी गोद में लेटकर अमृता मानो स्वर्ग पा गई। सारे मानसिक, शारीरिक कष्टों के बावजूद। गिले–शिकवे बहने लगे। आधे से ज्यादा बह गए।
“मुझे पहलेवाले भोला से भी डर लगता था, आज के शामू की ऑंखों से भी।”
अंदर से काॅंपती अमृता ने आखिर कह ही दिया।
मम्मी क्षणाश ठिठकीं। उसे छाती से चिपका लिया। थपकती रहीं उसकी पीठ।
लेकिन सुबह–सुबह मम्मी को तैयार होते देखकर अमृता मचल गई।
“रुक जाओ न मम्मी! मत जाओ न।”
मम्मी से आग्रह से रोकने का हक जैसे उसे स्वयं मिल गया था।
“नहीं अमृता! एक अर्जेन्ट काम है।“
“प्लीज मम्मी! तुम्हारे पास रहने का बहुत मन है।”
फिर कहा,
“गोद में सो लूॅं?”
“नहीं! मेरा जाना जरूरी है।“
वे झट एक सक्सेसफुल कैरियरिस्ट में बदल गईं। अनुशासन की चाबुक पकड़कर खड़ी माॅं में भी।
“सिंह जी की बाई को बुला भेजा है। श्यामू की छुट्टी कर दी है।“
उन्होंने माँग में सिंदूर की पतली रेख लगाकर केशों को उलट दिया।लिपस्टिक लगाते हुए उसकी ओर देखा। फिर आईने में देखकर खुला पल्ला सँभालने लगीं।
“कल से कोई दूसरी बाई खोज दूॅंगी।”
“वे मम्मी कैसे बनेंगी मम्मी?”
मम्मी हॅंस दी, बेटी के मजाक पर। अमृता कैसे कहे,
“यह मजाक नहीं है मम्मी!
…
“मम्मी चली गईं? ओह!”
उसे याद आया, उन्होंने कभी कहा था,
“तुम मम्मी को शक की नजरों से देखती हो न? पर क्यों अमृता?”
और वह सोचने लगी,
‘नही मम्मी! उस नजर से तो नहीं।’
फिर भी उसे लगा,
‘तुम और आँटी की तरह क्यों नहीं हो? क्यों पार्टी की जरूरत?… महफिल की शान हो?’
‘तुम मम्मी क्यों हो?…ममी की तरह?’
‘सिर्फ माॅं क्यों नही मम्मी?’
वह और भी बदतर हालत में बैठी की बैठी रह गई।
ऑंसू ऑंखों से दोनों गालों पे लुढ़ककर लकीरों की चित्रकारी में लगे थे।
दो घंटे यूँ ही कैसे बीत गए, उसे एहसास नहीं हुआ। एकाएक बाहर गेट खुलने की आवाज आई। तब भी वह चैतन्य नहीं हुई।
कमरे में नारंगी–काले फ्लोरल प्रिंटवाली पसंदीदा साड़ी की झलक ने चैतन्य कर डाला।
अमृता की ऑंखें पूरी खुल गईं।
अपलक देखती रह गई वह। मम्मी सामने खड़ी थीं। उन्होंने बैग जमीन पर ही पटक दिया और अमृता के पास बैठकर उसे अंक में भर लिया।
अंक की गर्म छाया ने अमृता के रिसते घावों की जैसे सिंकाई की।
मिसेज जोशी के कानों में गूंज रहा था,
“मिसेज जोशी! आपको अपनी टीन एजर डॉउटर का ध्यान रखना चाहिए।”
वह चौंकी पर कुछ पूछ न सकी।
“बेटी को आपकी जरूरत है। वरुण के जाने के बाद शायद वह…।“
उन्होंने बात अधूरी छोड़ी। आगे जोड़ी,
“उस पर ध्यान दें। जाॅब तो फिर मिल जाएगी, बेटी नहीं पा सकेंगी।“
“बट, सर्विस मेरे बचपन का शौक है। मनाली से आते वक्त ही मैंने खुद से प्राॅमिस किया था।“
“शौक बाद में पूरे कर लीजिएगा।“
“ओह! नन्हें–नन्हें बच्चों को छोड़कर इतनी मदर जाॅब कर रही हैं। अमृता तो बड़ी है।“
उसने दृढ़ता से कहा,
“मैं किसी पर डिपेंड नहीं रहना चाहती।”
“आज कोई नहीं रहना चाहतींं।”
खन्ना ने हामी भरी।
“यह जरूरी भी है। लेडीज को आर्थिक रूप से इंडिपेंडेंट होना चाहिए। बट….”
“खन्ना साहब! ये आप कह रहे हैं, आप तो सबको इंस्पायर करते रहे हैं।“
“समय–समय की बात है मिसेज जोशी!”
“आपको याद है?”
“हाँ, याद है। पूरी तरह डिपेंडेंट थीं आप। मैं ही आपको मनाकर यहाँ इस फिल्ड में लाया था।“
“फिर… फिर क्यों?”
“तब अकेलेपन की शिकार आप थीं, अभी अमृता…।“
“समझ रही हैं न मेरी बात? बहुत नाजुक उम्र है उसकी।“
खन्ना ने समझाने की गरज से कहा,
“इतने सुसाइडल केस देख…।“
“…ऑंऽ! नहीं।“
“छोटे–छोटे बच्चे तक…।“
जो वे कहना नहीं चाहते थे, कहना पड़ रहा था। तीन महीने पूर्व ही उनका भतीजा भी ट्रेन के नीचे आकर प्राण त्याग चुका था।
“अभी घर जाइए। आपकी जरूरत आपकी बेटी को ज्यादा है मिसेज जोशी! प्लीज अंडरस्टैंइंड!”
रिवाल्विंग चेयर पर बैठे खन्ना आगे झुक आए थे।
“कल इस्तीफा लिखकर भेज दीजिएगा।”
सुसाइडल शब्द ने घन की तरह वार किया था।
मिसेज जोशी की सोचने–समझने की शक्ति गुम गई थी। उनकी नाक और पेशानी पसीने से भीग गई थी। याद आया था,
‘अभी पिछले हफ्ते ही तो कुलीग रौशन सिंह की बेटी…।‘
उसके मन में हलचल बढ़ गई थी। भय का नश्तर भीतर तक चुभने लगा था।
हर तरफ से किशोरों, युवाओं की आत्महत्या की खबरें आ रही थीं, पर इस नजर से उसने सोचा ही नहीं था।
वह बैग उठाकर ऑफिस से बाहर आ गई थीं।
बेतरतीब ढंग से बैग को ड्राइविंग सीट के बगल में फेंककर स्टीयरिंग थाम लिया था।
“मम्मी!…मम्मी!!”
“हाॅं बेटा! मैं आ गई। आ गई तेरे पास। हमेशा के लिए।“
“सच?…ओ मम्मी!”
वह मिसेज जोशी के गले से लगी रही। इस हग की उम्र लंबी हुई और निश्चिंतता, सुकून की दस्तक पड़ने लगी।
एक लंबी प्यास के होंठों को पानी मिला जैसे।
‘मैंने माॅं को पा लिया है शायद।‘
अमृता अनिश्चिंत। अमृता निश्चिंत।
अनिता रश्मि
संपर्क – [email protected]


अनिता रश्मि की कहानी ‘बस, गर्म अंक की तलाश’ पढ़ते हुए ऐसा लगता है, जैसे हम किसी आलीशान बंगले के बंद दरवाजों के पीछे सिसकती एक मासूमियत को साक्षात देख रहे हों। कहानी का कैनवास भले ही फूलों, लताओं और संभ्रांत जीवनशैली से सजा हो, पर इसकी असली रूह उस ‘रंगहीनता’ में बसी है जिसे केवल अमृता जैसी किशोरी ही महसूस कर सकती है। लेखिका ने यहाँ शब्दों से अधिक खामोशियों और संकेतों का सहारा लिया है। अमृता की वह तनी हुई ग्रीवा या खिड़की के पर्दे के पीछे से ताकती उसकी बोलती आँखें—ये वे लम्हें हैं जहाँ यांत्रिकता टूटती है और मनुष्यता अपने सबसे नबे और सच्चे रूप में सामने आती है।
अमृता का अंतर्मन किसी शांत समुद्र के भीतर उठने वाले भीषण ज्वार की तरह है। वह महज़ एक उपेक्षित बच्ची नहीं है, बल्कि एक ऐसी गहन चिंतक है जो अपने आसपास के सामाजिक ढाँचे को अपनी छोटी उम्र के बावजूद बहुत बारीकी से देख और तौल रही है। उसका सबसे बड़ा द्वंद्व ‘अधिकार और उपेक्षा’ के बीच का है। वह उस घर की मालकिन की बेटी है, पर उसे महसूस होता है कि उस घर की दीवारों और चमकते शीशों का भी वहाँ अपना एक स्थान है, सिवाय उसके। वह अपनी माँ के वजूद को अपनी आँखों के सामने दो हिस्सों में बँटा हुआ देखती है—एक वह जो टूरिस्टों के लिए हँसती-मुस्कुराती गाइड है, और दूसरी वह जो घर आकर थकान के नाम पर सो जाती है। लेखिका ने ‘मम्मी’ और ‘ममी’ के बीच जो महीन लकीर खींची है, वह आज के आधुनिक समाज की सबसे बड़ी त्रासदी है। अमृता का अपनी माँ को ‘ममी’ कहना यह दर्शाता है कि माँ ने अपनी जीवंतता और ममता को करियर की पट्टियों में लपेटकर कहीं दफ़न कर दिया है।
मिसेज जोशी का चरित्र आधुनिक स्त्री के उस अंतहीन संघर्ष को दर्शाता है जहाँ वह खुद को साबित करने की होड़ में अपनी सबसे कोमल जड़—अपनी ममता—को ही अनजाने में काट देती है। उनका चरित्र बुरा नहीं है, बल्कि वह ‘भ्रमित’ है। उन्हें लगता है कि अमृता को श्रेष्ठ फल, मेवे और आलीशान घर देकर वे अपनी माँ होने की जिम्मेदारी पूरी कर रही हैं। उनके लिए आर्थिक स्वतंत्रता केवल पैसा नहीं, बल्कि एक पहचान का सवाल है। वे अनुशासन की ऐसी चाबुक थामे हुए हैं जिससे वे अपनी बेटी को तो सुधारना चाहती हैं, पर खुद के भीतर झाँकना भूल गई हैं। लेखिका ने प्रतीकों का बहुत ही कलात्मक उपयोग किया है—अमृता का दीवारों को ‘रंगहीन’ कहना यह दर्शाता है कि रिश्तों की गर्माहट के बिना आलीशान घर भी केवल पत्थरों का ढांचा है।
कहानी में खन्ना साहब का पात्र एक ‘कैटालिस्ट’ और समाज के आईने की तरह आता है। उनका वह एक शब्द—’सुसाइडल’—मिसेज जोशी के भीतर के सारे अहंकार और करियर के प्रति मोह को एक ही झटके में ढहा देता है। यहीं से कहानी उस ‘गर्म अंक’ की ओर बढ़ती है। जब मिसेज जोशी सब कुछ छोड़कर अमृता को गले लगाती हैं, तो वह केवल एक मिलन नहीं होता, बल्कि वह दो बिछड़ी हुई रूहों का एक-दूसरे को फिर से पा लेना है। वह ‘हग’ (आलिंगन) इतना गहरा और ऊष्म है कि अमृता के मन के सारे पुराने रिसते घाव उसी पल सूख जाते हैं। अनिता रश्मि जी ने मिसेज जोशी के चरित्र के माध्यम से यह दिखाया है कि एक स्त्री के लिए करियर का गौरव तभी सार्थक है जब उसके आंगन का पौधा (संतान) उपेक्षा की धूप में मुरझा न रहा हो।
उपसंहार के रूप में, अनिता रश्मि जी ने “अमृता अनिश्चिंत, अमृता निश्चिंत” लिखकर कहानी को जहाँ समाप्त किया है, वह पाठक के मन में एक ठंडी फुहार जैसा सुकून छोड़ जाता है। यह अहसास कराता है कि रिश्तों की असली कीमत उनकी मौजूदगी में है, उनकी सुविधाओं में नहीं। यह कहानी कामकाजी माता-पिताओं को यह याद दिलाने का एक सशक्त प्रयास है कि बच्चों के बचपन की ‘एक्सपायरी डेट’ होती है; यदि उन्हें उस समय माँ-बाप का ‘अंक’ नहीं मिला, तो बाद की सारी सफलताएं निरर्थक साबित होंगी। संसार की सारी भाग-दौड़ और उपलब्धियों का अंतिम पड़ाव वही ‘गर्म अंक’ है जहाँ मनुष्य को बिना किसी शर्त के स्वीकार्यता और सुकून मिलता है।
ऎसी समीक्षात्मक टिप्पणी से कहानी और खुलती है।
ऊर्जादायक पाठकीयता के लिए बहुत धन्यवाद चन्द्रशेखर जी
ऎसी समीक्षात्मक टिप्पणी से कहानी और खुलती है।
ऊर्जादायक पाठकीयता के लिए बहुत धन्यवाद चन्द्रशेखर जी हार्दिक धन्यवाद,
समयानुकूल बहुत सुंदर संदेश देती कहानी। सुदर्शन रत्नाकर
मेरी कहानी को पुरवाई में स्थान देने के लिए शुक्रिया।
इसका बहुत सुंदर वाचन दो दिन पूर्व डॉ. कविता प्रभा जी ने किया
आज की वास्तविकता से रूबरू करवाती संवेदनशील कहानी! साधुवाद
उत्साहवर्धन के लिए धन्यवाद
प्रिय अनिता!
कहानी पर टिप्पणी लिख तो पहले ही ली थी लेकिन लापरवाही में डिलीट हो गई। यह दुबारा की मेहनत है।
कहानी एक गंभीर समस्या से जुड़ी है जो आजकल वर्ग विशेष में अमरबेल की तरह फैल रही है।
पारिवारिक जरूरत के तहत अगर पति-पत्नी दोनों को नौकरी करना पड़े तो वह एक अलग बात है।
पर सिर्फ अपना समय काटने के लिये किसी ऐसे अनावश्यक दलदल में उलझ जाएँ कि जिसके कारण अपने बच्चे, अपना परिवार ही नजर अंदाज होने लगे। यह चिंता का विषय है।
बीमार बेटे को नौकर के भरोसे छोड़ देना। और उसे नौकर द्वारा गलत दवाई देने की वजह से बेटे की मौत हो जाना। यह संभलने के लिये एक चेतावनी की तरह रहा। पर फिर भी समझ नहीं आया
अमृता के माफ़ी न माँगने के पीछे के कारण को जानने की कोशिश माँ ने नहीं की।
बेटी अमृता की मानसिक उलझन, उसका मानसिक द्वंद्व यहाँ पर उभर कर आया है।
“मम्मी मैं अकेली बच गई तब भी आप नहीं समझेंगी ।आप अकेली हो तो जाने……….।
“डैडी को व्यापार से फुर्सत नहीं और मम्मी को डैडी बनने से।”
“वह जानती है मम्मी कभी अकेले नहीं होतीं”
“न जाने कब से उसके कमरे में मम्मी की ऊष्मा नहीं थी।”
जहाँ-जहाँ बेटी ने अपना मुँह खोला है। वहाँ-वहाँ एक टीस सी मन में उठी।
ऐसा लगा कि जाकर बच्ची को गोद में उठाकर गले से लगा लिया जाए।
पर देर से ही सही, बेटी को माँ के जिस गरम अंक की तलाश थी वह उसे मिल गई।यहाँ कहानी का शीर्षक सार्थक हुआ।
अपनी महत्वकाँक्षा के चलते अपने अकेलेपन को दूर करने के रोग के ग्रसित चाह के प्रति यह कहानी अंकुश लगाने का आग्रह करती है।
एक गंभीर समस्या से जुड़ी है जो आजकल वर्ग विशेष में अमरबेल की तरह फैल रही है।
पारिवारिक जरूरत के तहत अगर पति-पत्नी दोनों को नौकरी करना पड़े तो वह एक अलग बात है।
पर सिर्फ अपना समय काटने के लिये किसी ऐसे अनावश्यक दलदल में उलझ जाएँ कि जिसके कारण अपने बच्चे, अपना परिवार ही नजर अंदाज होने लगे। यह चिंता का विषय है।
बीमार बेटे को नौकर के भरोसे छोड़ देना। और उसे नौकर द्वारा गलत दवाई देने की वजह से बेटे की मौत हो जाना। यह संभलने के लिये एक चेतावनी की तरह रहा। पर फिर भी समझ नहीं आया
अमृता के माफ़ी न माँगने के पीछे के कारण को जानने की कोशिश माँ ने नहीं की।
बेटी अमृता की मानसिक उसका मानसिक द्वंद्व यहाँ पर उभर कर आया है।
“मम्मी मैं अकेली बच गई तब भी आप नहीं समझेंगी ।आप अकेली हो तो जाने……….।
“डैडी को व्यापार से फुर्सत नहीं और मम्मी को डैडी बनने से।”
“वह जानती है मम्मी कभी अकेले नहीं होतीं”
“न जाने कब से उसके कमरे में मम्मी की ऊष्मा नहीं थी।”
देर से ही सही, पर बेटी को माँ के जिस गरम अंक की तलाश थी वह उसे मिल गई। यह कहानी का शीर्षकसार्थक हुआ।
अपनी महत्वकाँक्षा के चलते अपने अकेलेपन को दूर करने के लिये अपने बच्चों को नजरअंदाज कर अकेला छोड़ने से होने वाले नुकसान की ओर इशारा करती संवेदनशील कहानी है।
बधाई आपको इस कहानी के लिये अनिता।
प्रस्तुति के लिए तेजेन्द्र जी का शुक्रिया। पुरवाई का आभार।
अनीता जी हमारे झारखंड की लोकप्रिय कथाकार, कवयित्री हैं।उनकी कहानियों में जीवन के यथार्थ अनुभव और सामाजिक विषमताओं के विरुद्ध एक आवाज हमेशा मुखर्जी है।प्रस्तुत कहानी *बस,गर्म अंक की तलाश* अत्यंत मार्मिक,अनुभूति.जन्य और मनोवैज्ञानिक ढंग से नयी पीढी में पनपते अकेलेपन, बेटे और बेटी के बीच के फर्क तथा माता पिता की व्यस्तता, बच्चों की आया या नौकरों पर निर्भरता भी कई सवाल उठाती.है।जीवन की चकाचौंध में खोये माता पिता सिर्फ धन कमाकर अपना जीवन स्तर सुधारने की चाहत में बच्चों को.सुविधाभोगी तो बनाते ही हैं ,उन्हे अकेला भी कर देते हैं।हमारी कहानी की मासूम अमृता भाई को खोकर नितांत अकेली है.मां भी उस दुख को भूल अपनी दुनिया में.व्यस्त और पिता बिजनेस मैन ,व्यस्त हैं।अब अमृता मां बाप की स्नेहिल गोद को तरसती क्या करे? उसे भी मां की गर्म सुखद गोद चाहिए, जो उसे प्यार से गले लगा सके।उसकी जरुरतों का ख्याल रख सके।अंत में जब मां उसे मिलती है तो वह न जाने कब अपने अकेलेपन की दुनिया से बाहर निकल मां की गोद की शीतल छाँव में खो जाती है।बहुत सुंदर भावप्रवण सार्थक कहानी प्रिय अनीता जी बहुत बहुत बधाई आपको।शुभ कामनाए।
सुखदायी टिप्पणी के लिए आत्मीय धन्यवाद पद्मा जी।
ऊर्जा मिली
पुरुषों के साथ प्रतिस्पर्धा में स्त्री ने कब मातृत्व की अवहेलना कर दी आज की आधुनिक स्त्रियां काश समझ लें।समाज की नब्ज पकड़ कर आईना दिखाना हर किसी के बस की बात नहीं।आपने यह दायित्व निभाया।मार्गदर्शक कहानी हेतु अशेष शुभकामनाएं।
शाबाश कहने को दिल करता।
निवेदिता जी, सस्नेह धन्यवाद,
कह ही दें, जो मन कहे
रश्मि जी हमारे झारखंड की शान, आप की कहानी संवेदनाओं के कई स्तर को छूती है।
बहुत बधाई हो