गाँव में फागुन उतर आया था। खेतों में गेहूँ की बालियाँ सुनहरी होने लगी थीं और पलाश की डालियाँ अंगारों-सी दहक उठी थीं। हवा में महुए की महक घुली थी, मानो हर साँस में कोई मधुर गुप्त बात छिपी हो।
गौरी की यह पहली होली थी ससुराल में। अँखियों में नए सपनों की लाली थी और गालों पर हल्दी-सी चमक। आँगन में कुमकुम का थाल सजा था। ढोलक की थाप और फाग के गीतों के बीच उसका नाम पुकारा गया। वह घूँघट की ओट से बाहर आई ही थी कि पति ने चुपके से उसकी ओर गुलाल उड़ा दिया।
गौरी मुस्कुराई, पर अगले ही पल उसे चक्कर आया और वह गिर पड़ी।
“अरे, क्या हुआ?” कहते हुए लोग दौड़ पड़े। खुशियों के बीच अचानक सन्नाटा उतर आया। डॉक्टर बुलाने की तैयारी होने लगी।
तभी उसके देवर ने धीरे से कहा—
“भौजी के किछु नै भेलै। पान में भांग खुआ देलियै हम।”
क्षण भर को सब एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे। घबराहट हँसी में बदल गई। गौरी को ठंडाई की जगह इमली का शर्बत पिलाया जाने लगा।
सबने राहत की साँस ली।
2 – टेसू का रंग
फागुन की सुगबुगाहट पर जहाँ खुशियाँ उमगनी चाहिए थीं, वहाँ इन दिनों नंदिता के मन में उस झुग्गी-बस्ती की छवि बार-बार उभर आती, जहाँ वह स्कूल की ओर से, बच्चों को जमीनी हकीकत दिखाने ले गई थी।
स्कूल जाते समय उसने निश्चय कर किया। और कक्षा में पहुँचकर बोली—“हम एक चिन्मय भोर उगाना चाहते हैं।”
बच्चे हँस पड़े—“मैडम, भोर भी उगाई जाती है?”
नंदिता मुस्कुराई—“हाँ, जब मन जाग जाए, तभी संभव है।”
“तो क्या करेंगे?” कक्षा में स्वर गूँजा।
“जो रविवार को सुबह आठ बजे मेरी सोसायटी के गेट पर पहुँचेगा, वही इस परियोजना का हिस्सा बनेगा।”
रविवार की सुबह बच्चे समय पर पहुँच गए। नंदिता उन्हें लेकर बस्ती पहुँची। खुले घर, बिखरा सामान, बुझे चूल्हे और ठहरी हुई आँखें—बच्चे चुपचाप सब देख रहे थे। नंदिता ने धीमे स्वर में कहा—“बच्चो, केवल ज्ञान की अँगीठी जलाने से रोटी नहीं सिकती, साधन भी चाहिए।”
अगले दिन बच्चे अपने-अपने घरों से कपड़े, किताबें, भोजन और कुछ पैसे लेकर आए। वे फिर बस्ती पहुँचे। किसी ने दीवारों पर सूरज और पेड़ों के चित्र चिपकाए, किसी ने बच्चों को पढ़ना सिखाया, किसी ने सामान बाँटा। धीरे-धीरे वहाँ के चेहरों पर संकोच की जगह मुस्कानें उग आईं।
नंदिता ने इस प्रयास को नियमित करने के लिए स्कूल से अनुमति ली और हर महीने वहाँ जाने का क्रम बन गया।
यूँ तो आसमान धुँधला ही था, पर नंदिता को लगा—क्षितिज पर एक ही सही, सुनहरी रेखा उभर रही है।
एक दिन स्कूल में बच्चे ने पूछा—“मैडम, चिन्मय भोर उगी क्या?”
नंदिता की आँखें चमक उठीं—“जब तक हर घर में उजाला न फैल जाए, परियोजना अधूरी है।”
“तो अब क्या करेंगे अब?”
“कल चलकर देखते हैं।”
सब मिलकर फिर से बस्ती पहुँचे। वहाँ के बच्चे नमस्ते करना सीख गये थे। बस्ती के बच्चे घिर आये। सबको सामान देकर लौटते समय नंदिता ने कहा—“तुम लोग टेसू के फूलों का रंग बनाना, हम होली पर खरीदने आएँगे।”
यह सुनकर झुग्गी की सबसे चुप रहने वाली लड़की, फगुनिया, खिलखिला पड़ी।
3 – सूर्य का संदेश
सुबह की पहली किरण जैसे ही खेतों पर उतरी, रामस्वरूप ने आसमान की ओर देखा। रात की हल्की ठंड अभी बाकी थी, पर धूप में एक अलग ही अपनापन था। उसे लगा जैसे सूर्य ने सचमुच फागुन का छुपा संदेश भेजा है—प्यार का, भरोसे का। गुनगुनाहट का संदेश।
कई महीनों से वह चिंता में था। गेहूँ की फसल खड़ी तो थी, पर मन में आशंका भी थी। आज जब सुनहरी रोशनी बालियों पर बिखरी, तो वे सचमुच हेम की गठरी-सी दमक उठीं। उसका मन कचनार-सा खिल गया।
पास ही बाग में बौर की महक फैल रही थी। आर्क की श्याम कलियों पर भँवरे मंडरा रहे थे। हवा में सुरभि थी, पवन पागल-सा झूम रहा था। रामस्वरूप ने गहरी साँस ली। उसे लगा—मौसम खुद प्रेम पत्र बाँच रहा है, जिसमें लिखा है कि अब समय मनुहार करने वाला है। श्रम का फल मिलने वाला है। बरगद के नीचे बैठा उसका छोटा बेटा मिट्टी से खेल रहा था। पत्नी ने दूर से आवाज दी—“देखो जी, फसल इस बार अच्छी दिख रही है।” उसकी आँखों में उम्मीद की चमक उतर आई। रामस्वरूप ने मुस्कुराकर सिर हिलाया। वर्षों बाद उसके चेहरे पर निश्चिंत मुस्कान आई थी।
उसे याद आया, पिता कहा करते थे—“सूरज जब मुस्कुराए, तो किसान का दिल भी खिल उठता है।” आज वह बात सच लग रही थी। धूप सिर्फ रोशनी नहीं थी, वह आश्वासन थी कि परिश्रम व्यर्थ नहीं जाता।
रामस्वरूप ने खेत की ओर कदम बढ़ाकर बालियों को हाथ से सहलाया। उसे लगा जैसे पूरा वातावरण कह रहा हो—अब मेहनत का रंग भरने का समय आ गया है।
4 – ससुराल की पहली होली
फागुन हर वर्ष आता था। लोग कहते—यह रंगों, मिलन और प्रेम का महीना है। पर सीमा के लिए इस बार का फागुन अलग था। घर नया, लोग नए थे, और रिश्तों के संबोधन भी जैसे नए रंगों में भीगे हुए थे।
दूसरे दिन से नई बहू के स्वागत की रस्में शुरू होनी थीं। सुबह उसे जल्दी जगा दिया गया। सजी-धजी वह जब आँगन में आई तो पीतल के थाल में हल्दी और कुमकुम सजा था। रंग भरी पिचकारी दिखाकर देवर मुस्कराया। ननद ने आँखों से संकेत किया—जैसे किसी गुप्त खेल की तैयारी चल रही हो।
पलाश की गंध हवा में तैर रही थी। सब कुछ वैसा ही था जैसा वह बचपन से देखती आई थी—बस एक अंतर था। विजय अब उसके जीवन में केवल एक नाम नहीं, एक स्पर्श, एक उपस्थिति बन गया था। सीमा की आँखें उसे खोजने लगीं। बड़े से आँगन के एक कोने में स्त्रियाँ घेरा बनाए खड़ी थीं। विजय की हँसी वह पहचान सकती थी।
बूढ़ी स्त्रियों की दृष्टि बिना बोले पूछ रही थी—“अब तुम यहाँ की हो गई, सीमा रानी?” सीमा ने हथेली पर मेहंदी से लिखा ‘विजय’ नाम उँगली से छुआ ही था कि पहली रंग-बूँद उसी पर आ गिरी। वह चौंकी। पलटकर देखा—विजय पीछे खड़ा मुस्करा रहा था। उसके भीतर एक सिहरन-सी दौड़ गई।
तभी आवाज़ गूँजी—“विजय, मोटा डंडा ठा, और घाल दे अपनी बींदड़ी पे!”
सीमा सहम गई। भीतर भाग जाना चाहती थी, पर ननद ने हाथ थाम लिया—“अब तो मार खानी पड़ेगी, भाभी!”
दूर बच्चे खिलखिला रहे थे। चौक पर हल्दी की पीली रेखा धूप में चमक रही थी।
“अरे मार छोरा, इब का सोचे है?” किसी काकी की पोपली आवाज़ गूँजी। विजय ने हँसकर कहा, “ला डंडा, देर काहे की?”
सीमा ने आँखें मूँद लीं। स्त्रियों के हो-हल्ले के बीच उसकी पीठ पर हल्की-सी धप हुई। उसने धीरे से आँखें खोलीं। विजय के हाथ में फूलों से सजी पतली छड़ी थी। उसकी हँसी में शरारत से अधिक प्रेम का आश्वासन था—एक मौन भरोसा था। सीमा से कहा गया—वह भी रंग लगाए। काँपते हाथों से उसने थोड़ा-सा रंग विजय के गाल पर मल दिया। ऊपर छज्जे से देवरों ने फूल और रंग बरसा दिए।
हँसी, धूप, हल्दी और फूलों के बीच सीमा जैसे भीतर से खिल रही थी।
“सीमा, पाँव तो छू ले खसम के,” जेठानी ने कहा।
वह झुकी—संकोच से, संस्कार से। पर विजय ने उसे झुकने नहीं दिया। बाँहों से थामकर सीने से लगा लिया।
5 – तो कुछ अच्छा होता
शहर के बीचों-बीच एक पुराना पार्क था। कभी वहाँ टेसू दहकते थे। भौरों की गुनगुनाहट गूँजती थी। बच्चे बरगद की जड़ों में लुका-छिपी खेलते थे। अब ऊँची इमारतों ने उसे चारों ओर से घेर लिया था। धूप छनकर आती, हवा भी इजाज़त लेकर चलती।
उसी पार्क के कोने में बूढ़े माली रामू काका रोज़ सूखी क्यारियों में पानी देते। लोग हँसते—“काका, अब यहाँ कुछ नहीं उगेगा।”
काका मुस्कुरा देते—“वसंत को आने दो, फिर देखना।”
एक दिन पास की इमारत में रहने वाली छोटी अनाया बोली।
“काका, आप इन सूखी टहनियों से रोज़ बात क्यों करते हो?”
काका ने मिट्टी को सहलाते हुए कहा—“बिटिया, माटी सोई है, मरी नहीं। प्यार मिलेगा तो कलियाँ ज़रूर खिलेंगी।”
उस दिन से अनाया भी पार्क आने लगी। उसे देखना था कि वसंत में क्या होगा? फिर दो-तीन बच्चे और जुड़ गए। उन्होंने मिट्टी में बीज बोए, पानी डाला। कुछ हफ्तों बाद क्यारियों से नन्हें अंकुर झाँकने लगे। रामू काका ने आसमान की ओर देखा—“लो, वसंत आ गया।”
अनाया ने विस्मय से पूछा—“काका, ये पौधे पेड़ बनेंगे न?”
काका की आँखें भीग-सी गईं—“पेड़ तो बनेंगे ही…अगर ये पार्क बचा रहा तो।”
उसी क्षण उनकी नजर सामने वाले पेड़ पर गई। उसके तने पर एक पोस्टर चिपका था—‘यहाँ शीघ्र ही बहुमंज़िला अपार्टमेंट बनेगा।’
नन्हे पौधे हवा में काँप रहे थे।
कल्पना मनोरमा (जन्म : 4 जून 1972, इटावा, उत्तर प्रदेश) समकालीन हिंदी साहित्य की सशक्त रचनाकार हैं। उन्होंने संस्कृत एवं हिंदी में स्नातकोत्तर तथा हिंदी में बी.एड. किया है। कविता, नवगीत, कहानी, बाल-साहित्य, निबंध, साक्षात्कार, संपादन और पत्रकारिता उनके लेखन के प्रमुख क्षेत्र हैं। दो दशकों तक अध्यापन के बाद वे शैक्षिक प्रकाशन संस्थानों में वरिष्ठ संपादक व हिंदी काउंसलर रहीं। उनकी प्रकाशित कृतियों में कब तक सूरजमुखी बनें हम, मौन के विरुद्ध, एक दिन का सफ़र आदि उल्लेखनीय हैं। उनके लेखन का केंद्र स्त्री-विमर्श, सामाजिक यथार्थ और मानवीय पीड़ा है।
यथार्थ की पृष्टभूमि पर लिखीं तथा फागुनों के विभिन्न रंगों का चित्रण करतीं बहुत सुन्दर लघुकथाएँ। हार्दिक बधाई कल्पना मनोरमा जी।