Monday, March 9, 2026
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डॉ. रमेश यादव की लघुकथाएँ

लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ

संस्था के वार्षिक सांस्कृतिक महोत्सव की खबर तथाकथित बड़े अखबारों में न छपने से निराश होते हुए गाँधीवादी विचारों से प्रेरित ट्रस्टी मनमोहनजी ने रिमाइंडर के तौर पर एक बड़े समूह के सहायक सम्पादक (समाचार) को फोन किया। सामने से जवाब आया, मान्यवर हमने तो वो न्यूज दो दिन पहले ही प्रधान सम्पादक जी को फॉरवर्ड कर दी थी। उन्हें बता भी दिया था कि शहर की प्रतिष्ठित संस्था के वार्षिक समारोह की न्यूज है, मगर उनका अभी तक कोई रेस्पॉंन्स नहीं आया। आप फिर से मेल कर दें और प्रधान सम्पादक जी से बात भी कर लें।” 
      “सूचना क्रांति और सोशल मीडिया के इस दौर में भी अखबार वालों का ये रवैया है? अरे, एक वो दौर था जब इनके रिपोर्टर समारोह में आकर पूरी खबर कवर करते थे और आज समाचार बनाकर भेजने के बावजूद भी हम जैसी सेवाभावी, सामाजिक और समर्पित संस्थाओं की दखल नहीं ली जा रही है। पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ माना गया है, क्या अब वे लोग अपनी जिम्मेदारियों को भूल गए हैं?” मनमोहनजी कार्यालय में उपस्थित अन्य कार्यकर्ताओं के सामने खेद व्यक्त करते हुए बोले।   
      “सर आजकल मीडिया को पेड न्यूज का चस्का लग गया है। ख़बर के साथ जो लोग दान-दक्षिणा का कवर भेजते हैं, उन्हीं की खबर प्राथमिकता से छापी जाती है। कुछ जुगाडू और व्यापारी सोच की संस्थाओं और अधकचरे नेताओं ने पूरा माहौल खराब कर रखा है। इस गणित में हम कहाँ बैठते हैं सर? वैसे भी साहित्यक खबरों से उन्हें क्या लाभ है?” नए तेवर के कार्यकर्ता, सचिव ने अपनी बात रखी।  
      “सर अब हमें भी पैसे लेकर पुरस्कार बांटना चाहिए ताकि हम भी इस गणित में फिट बैठ सकें! समारोह में फिल्मी सेलिब्रेटी बुलाएंगे तो हमें बड़े-बड़े स्पॉन्सर भी मिलेंगे, साथ ही श्रोताओं के लिए भी डोनेशन कार्ड रखेंगे। इससे संस्था का प्रचार-प्रसार होगा और कुछ धन भी प्राप्त होगा।” कोषाध्यक्ष ने अपनी बात रखी।  
       “अरे भाई, सौ साल से सामाजिक उत्थान के लिए सेवारत हमारी संस्था की गरिमा और प्रतिष्ठा का क्या होगा?” इस बात पर नई पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी के कार्यकर्ताओं में बहस छिड़ गई। क्षुब्द होकर बुजुर्ग ट्रस्टी मनमोहन जी बोले, “भाइयों सामाजिक कार्य के नाम पर व्यापार करने से तो अच्छा है कि यदि हमारी क्षमता और नेकी जवाब दे चुकी हो तो हमें अपनी संस्था बंद कर देनी चाहिए। पैसे लेकर पुरस्कार बांटना, न्यूज छपवाना मेरे उसूल के खिलाफ है।” 
और बुजुर्ग मनमोहन जी अपनी कुर्सी से उठकर बाहर निकल गए…।
बिन डोर की पतंग
सर, आनंद बाबू के चिता की ज्वाला अभी शांत भी नहीं हुई है कि उनकी पत्नी और बच्चे मुझे बंगले से बेदखल करने की धमकी दे रहे हैं। ये लोग मुखाग्नि देने के लिए भी नहीं आए। अंतिम संस्कार भी मुझे करना पड़ा। पिछले दस वर्षों से इस बंगले में साहब के साथ रहकर उनकी सेवा करती रही। प्रॉपर्टी के कागजात बनवाने के लिए साहब कई बार बोलते रहे पर मैं मूर्ख थी, सिर्फ सेवाधर्म निभाती रही। लालची और स्वार्थी होती तो…!” रीता रानी तस्वीर के सामने रोने लगी। 
        देखिए मॅडम, प्रॉपर्टी और धन पर अंतिम अधिकार मृतक के कानूनी वारिस का ही होता है। माना कि आप कई जगह नॉमिनी हैं मगर नॉमिनी का अधिकार ट्रस्टी की तरह होता है। आपके पास और क्या-क्या डॉक्यूमेंट्स हैं दिखाओ। आपके साथ न्याय हो, इसकी कोशिश हम जरूर करेंगे।ढाँढ़स बँधाते हुए वकील साहब बोले।    
        वकील साहब को पेपर्स देते हुए वह बोली, “साहब का जब ओपन हार्ट सर्जरी हुआ था तब अस्पताल में बतौर नर्स मैंने दिन-रात उनकी सेवा सुश्रुषा की थी इसलिए उन्हें मुझ पर भरोसा था। पैंसठ साल की उम्र में पूरी तरह से टूट चुके, उनके लिए इस बड़े से बंगले में अकेले रहना मुश्किल हो रहा था। एक दिन फोन करके मुझे बुलाया और बंगले पर ही रहने का प्रस्ताव रखा। मैं तलाकशुदा नि:संतान अकेली थी, मुझे भी सहारे की जरूरत थी। अतः नर्स की नौकरी छोड़कर मैं उनके साथ रहने लगी। गुजरते समय के साथ, कब हम एक दूसरे का सहारा बन गए पता ही नहीं चला।” अपने आपको को ठगी-सी महसूस करते हुए वह पुनः रोने लगी। वकील साहब ने उनकी पत्नी के बारे में जब पूछा तब वह बोली – 
         उनकी पत्नी निशाजी दो छोटे बच्चों को लेकर 25 साल पहले तलाक लिए बिना उन्हें छोड़कर चली गई थीं। सैकड़ों बार साहब ने मुझे कहा था कि मैं अपने परिवार को एक छदाम भी नहीं देना चाहता। मुझे उनका हक नहीं चाहिए पर आज मैं अनाथ हो गई हूँ, मेरे साथ भी न्याय होना चाहिए। आगे की जिंदगी मैं कैसे काटूँ?” 
        सब ठीक हो जाएगा कहते हुए वकील साहब ने तसल्ली दी और कुछ काग़ज़ात पर उसके दस्तख़त लेकर चले गए। रीता रानी निराश होकर आनंद बाबू की तस्वीर के सामने अफसोस जताने  लगी- साहब, आपने तो हर अधिकार मुझे दिया मगर वसीयतनामा को लेकर आप कहते रह गए और मैं उस बात को समझ नहीं पाई। आज जब मुझे यहां से बेदखल किया जा रहा है तब नॉमिनी और कानूनी वारिस का अर्थ समझ में आ रहा है और वह विलाप करने लगी..। 
 
कर्तव्य और मां की ममता 
हॅलो मम्मी, भारती…,सब ठीक तो है ना? लगभग तीन महीने हो गए कनु को देखा नहीं, मिलना चाहती हूँ। सत्यानाश हो इस कोरोना काल का। एक तो अत्यावश्यक सेवा की नौकरी…ऊपर से तीन साल की बच्ची से जुदाई…कितना अन्याय हो रहा है ना छोटी–सी के साथ…! और सिसकियां भरने लगी। 
       तू मेरी बहादुर फ्रंटलाइन वारियार बेटी है ना ! इस तरह दिल छोटा करेगी तो कैसे काम चलेगा! तू बिलकुल चिंता मत कर, मैं हूँ ना यहां। कनु अभी सो रही है, तेरी आवाज सुन लेगी तो रोने लगेगी। परसों वीडियो कॉल पर उसने तुझे देख लिया था, अचानक मम्मा, मम्मा करके तुझे ढूँढने लगी। बड़ी मुश्किल से बहलाया था उसे! इसलिए तुझे मेसेज किया था कि बार-बार फोन मत किया कर। तुझे क्या लगता है, हमें तेरी चिंता नहीं…मजबूरी है ना बेटा..।
      सॉरी मम्मी, मगर जब छाती भर जाती है तो मैं बेचैन हो उठती हूँ, क्या करूँ मन नहीं मानता। डॉक्टर होने के साथ-साथ मैं एक मां भी तो हूँ, कलेजा फटने लगता है मेरा। आज मेरा विकली ऑफ है, तो आ जाती हूँ ना उसे देखने ! दूर से ही आप सभी को देख लूँगी।
        ठीक है तू चिंता मत कर, दामाद जी को फोन कर ले और आ जा, बाकी मैं सम्भाल लूँगी। कोविड के आतंक की ख़बरें सुनकर-सुनकर दिल दहल जाता है। और सुन…सावधानी तथा सतर्कता से ड्यूटी निभाना, अपना ख्याल रखना, अब फोन रखती हूँ।”    
        कपड़े चेंज करके डॉ. भारती बड़ी बेताबी से अपने घर की ओर निकल पड़ी। कॉलनी के बगीचे में दूर से ही वह अपनी बिटिया की बाललीला आँखों में भरती रही। मन तो बेटी को गोद में भरकर चूमने-चाटने के लिए तरस रहा था मगर…। 
        उसके पति ने इशारे से कुछ बताया। बगीचे के कोने में रखे कपड़े एवं अन्य जरूरत की चीजों से भरे बैग को डॉ. गौतमी ने लिया और मुँह पर मास्क लगाए मन ही मन हुलसती रही। उसके सब्र का बांध फूटता, इसके पहले ही तेज कदमों से वह स्टेशन की ओर बढ़ गई। होटल पहुंचते ही उसके भीतर की ममता फूट पड़ी और फूट-फूटकर रोने लगी। नर्स सहेलियों ने उसे धीरज दिया – अपने आपको संभालो मैडम, मुसीबत के ये दिन भी जल्द कट जाएंगे। हम सभी नौकरी और समाज के प्रति अपना फर्ज निभा रहे हैं। 
        डॉ. भारती ने कर्तव्य पर हावी होती ममता को पीछे ढकेला और तुरंत एपरन, पीपीई सूट पहना और स्टेस्थोस्कोप को सीने से लगाकर अपना फर्ज निभाने वार्ड की ओर निकल पड़ी…। 
डॉ. रमेश यादव 
हिंदी एवं मराठी के बीच सेतु का काम कर रहे, डॉ. रमेश यादव वरिष्ठ साहित्यकार, स्वतंत्र पत्रकार एवं बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी हैं मुंबई विश्वविद्यालय से एम.ए, पीएच.डी. की उपाधि तथा बैंकिंग, अनुवाद एवं पत्रकारिता में डिप्लोमा प्राप्त करते हुए, विविध विधाओं में मौलिक लेखन, अनुवाद, बाल साहित्य के साथ-साथ मराठी लोक साहित्य को हिंदी में ले आने का प्रशंसनीय कार्य उन्होंने किया है विविध विधाओं में उनकी अब तक 18 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। महाराष्ट्र राज्य के पाठ्यक्रमों में उनकी रचनाओं का समावेश किया गया है। देश-विदेश के विविध मान्यवर संस्थाओं द्वारा उन्हें कई मान-सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त हैं, जिनमें प्रमुख हैं – उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा राष्ट्रीय स्तर का सौहार्द सम्मान, महाराष्ट्र राज्य साहित्य अकादमी पुरस्कार, गुणवंत कामगार सम्मान (महाराष्ट्र राज्य), विश्व हिंदी सचिवालय (मॉरीशस) द्वारा काव्य का प्रथम पुरस्कार, कमलेश्वर स्मृति कहानी पुरस्कार, दया पवार स्मृति सम्मान, डॉ. राष्ट्रबंधु स्मृति राष्ट्रीय बाल साहित्य सम्मान, समाज भूषण, समाज गौरव आदि।   
         संस्कृति मंत्रालय, संगीत नाटक अकादमी तथा केंद्रीय हिंदी निदेशालय (भारत सरकार) द्वारा उन्हें शोध एवं प्रकाशन अनुदान प्राप्त है। उनकी एक पुस्तक का प्रकाशन भारत सरकार के प्रकाशन विभाग द्वारा किया गया है। देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं, आकाशवाणी तथा दूरदर्शन से उनकी विविध विधाओं की रचनाओं का प्रकाशन एवं प्रसारण होता रहता है। कई राष्ट्रीय संगोष्टियों में सहभागिता के साथ उनके अब तक 400 से अधिक फीचर, लेख एवं रिपोर्ट्स प्रकाशित हो चुके हैं। सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से शैक्षिक, कला, साहित्य, संस्कृति, विवेकानंद व्याख्यानमाला जैसे कार्यक्रमों के आयोजन–नियोजन में सक्रिय सहभागिता के साथ उन्हें अभिनय में भी विशेष रुचि है। हाल ही में महाराष्ट्र सरकार द्वारा उन्हें विशेष कार्यकारी अधिकारी (S.E.O.) का पद दूसरी बार बहाल किया गया है।                   
संपर्क – 
      481/161– विनायक वासुदेव बिल्डिंग, एन.एम. जोशी मार्ग, चिंचपोकली (पश्चिम) 
      मुंबई – 400011. फोन – 9820759088 


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