Monday, March 9, 2026
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नैवेद्य पुरोहित की कलम से – शिवना साहित्य समागम 2026 सीहोर से लौटकर

बीते दो दिन 28 फरवरी और 1 मार्च को मैं सीहोर में शिवना प्रकाशन (Shivna Prakashan) द्वारा क्रिसेंट रिज़ॉर्ट एंड क्लब में आयोजित शिवना साहित्य समागम 2026 में सम्मिलित हुआ। यह महज़ एक साहित्यिक आयोजन नहीं था, यह एक ऐसा मेला था जहाँ अलग-अलग विचार शब्दों के साथ गले मिल रहे थे और अजनबी भी दोस्त बन गए।
मैं वहाँ “रेडियो कर्मवीर 90.0 FM – जो करता है जन गण मन की बात” की टीम के साथ गया था। मेरे साथ प्रशांत सिंह, भूमि सिंह, सुप्रजा पांडेय और देवमाल्य बनर्जी थे। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से जनसंचार विभाग की टीम भी साथ थी जिसमें मेरे मित्र हर्ष कर्णवाल, चैतन्य शाह, शांतनु भैया, महक पवानी, प्राक्षि शर्मा, निकिता धाकड़, ताविषी देवरानी और हम सभी के मार्गदर्शक डॉ. लाल बहादुर ओझा सर थे जिनकी मौजूदगी हर क़दम पर रोशनी की तरह हमारे साथ रही।

पहला दिन: जब साहित्य और सिनेमा एक-दूसरे में घुल गए
सिद्धपुर सभामंडप में हो रहे पहले दिन के दूसरे सत्र ने माहौल बना दिया। मंच पर थे फिल्म अभिनेता यशपाल शर्मा (Yashpal Sharma) फ़िल्म निर्देशक इरफ़ान ख़लील ख़ान (Irfan Khan) और प्रतिभा सुमन शर्मा (Pratibha Sumann) संचालन आकाश माथुर (Akash Mathur) और अंकुर परसाई ने किया। अंकुर परसाई की एक पंक्ति सत्र का सार बन गई, “Literature is the soul of society and Cinema is the reflection of society.” प्रतिभा सुमन शर्मा ने कहा, “सिनेमा और समाज को हम अलग-अलग नहीं कह सकते। यह कहकर कि ऐसी फ़िल्में बन रही हैं इसीलिए समाज बिगड़ रहा है तो हम पल्ला झाड़ रहे हैं। समाज भी कहीं न कहीं उस ओर बढ़ने लगा है।” इरफ़ान ख़लील ख़ान ने फ़िल्मकारों को सीधी नसीहत दी और कहा, “साहित्य से कहानी आएगी। फ़िल्म मेकर्स को कहानी तभी मिलेगी जब वे साहित्य से जुड़े रहेंगे।” उन्होंने ‘किसी का भाई किसी की जान’ और ‘सिकंदर’ जैसी फ़िल्मों का ज़िक्र करते हुए कहा कि कहानी के अभाव में फिर ऐसी ही फिल्में बनती है। यशपाल शर्मा जिनसे मिलना खुद एक अनुभव है उन्होंने रीजनल सिनेमा की ताकत पर जो कहा, वो बेजोड़ था। ओटीटी प्लेटफॉर्म ZEE5  पर उपलब्ध तमिल फ़िल्म ‘अयोधि’ का ज़िक्र उन्होंने बड़ी तन्मयता से किया। एक कट्टर हिंदू की कहानी, जो एक्सीडेंट के बाद तमिल लोगों की मदद से गुज़रता है, दीवाली के वक़्त एक तमिल शख्स सब छोड़कर उस व्यक्ति की डेडबॉडी के लिए पुलिस से एनओसी से लेकर शव को एयरपोर्ट से ले जाने तक की ज़िम्मेदारी उठाता है। ऐसी कई रीजनल फ़िल्मों में कंटेंट बहुत स्ट्रॉन्ग होता है। प्रतिभा जी, यशपाल शर्मा की पत्नी हैं। जब आकाश माथुर ने उनसे पूछा कि पर्दे पर आप कम दिखाई देती हैं, तो उनका जवाब था, “अब लेखन और निर्देशन में व्यस्त रहने लगी हूँ।”
क्या पत्रकारिता की विश्वसनीयता दाँव पर है?
‘सिपाही बहादुर सभागार’ में यह सत्र जितना गंभीर था, उतना ही ज़रूरी भी। संचालन पॉलिटिक्सवाला (Politicswala) के पंकज मुकाती (Pankaj Mukati Politicswala) ने किया। वक्ताओं में थे विस्तार न्यूज़ के एडिटर इन चीफ ब्रजेश राजपूत (Brajesh Rajput), पंकज शुक्ला (Pankaj Shukla), पुष्पेंद्र वैद्य (Pushpendra Vaidya) और पूर्व विधायक शैलेंद्र पटेल (Shailendra Patel)। पत्रकार अलग हैं, मीडिया हाउस अलग यह बात शैलेंद्र पटेल ने पहले ही साफ़ कर दी। सर्कस पत्रकारिता पर जो कहा गया वो कड़वा सच था, “हमने अपने पैरों पर ही कुल्हाड़ी मारी है। टीआरपी की दौड़ में पहले साँप-बिच्छू-भूत-प्रेत-बाबा-ओझा आए, फिर धीरे-धीरे प्राइम टाइम के शो में भी नाग-नागिन की कहानियाँ बढ़ने लगीं।” एक वक्ता ने वाकया साझा किया कि जब किसी पत्रकार ने अपने संपादक को बताया कि एक बाँध डूब रहा है उस पर स्टोरी करना है तो संपादक ने मना कर दिया और कहा, “शिवलिंग पर नाग उठाकर लाओ ऐसा कुछ लाओ जो लोगों को अट्रैक्ट करे।” ब्रजेश राजपूत ने देर से आकर भी ज़रूरी बात कही और कहा कि “हम कुछ लोग जो वस्तुनिष्ठ पत्रकारिता करना चाहते थे या कर रहे हैं अब लोगों को वो चाहिए भी नहीं।” पंकज शुक्ला ने एक संकट की बात उठाई और कहा कि “आजकल एक व्यक्ति की रातोंरात विचारधारा बदल जाती है जो पहले जनपक्ष की बात करते थे, वो अपने हित के लिए रातोंरात पाला बदल लेते हैं।” बीबीसी के संजीव श्रीवास्तव की कचौड़ी की दुकान पर भी चर्चा हुई। सत्र का निचोड़ यह भी था कि भविष्य में बने रहने के लिए विषय-आधारित काम करना होगा।

थर्ड जेंडर का जीवन संघर्ष
‘सिद्धपुर सभामंडप’ में यह सत्र उतना ही भावुक था जिसका संचालन पारुल सिंह और पंखुरी पुरोहित ने किया। वक्ता थीं महामंडलेश्वर संजना सखी अपने जीवन के कठिन पलों को साझा करते हुए संजना सखी ने बताया कि 1999 का वो दिन जब उन्हें घर से निकाला गया, भाई ने बाहर का रास्ता दिखाया, माँ ने भी हाथ जोड़ लिए इसे याद करते हुए वे कहती है, “वो मेरे जीवन का सबसे दुखद पल था। लेकिन आज वही मेरे लिए सुखद भी है, क्योंकि अगर वो पल न होता तो मैं आज यहाँ नहीं होती।” एक-एक दिन समोसे पर निकाला और उस गहराई से एक अनुभव जन्मा जिसने पूरी ज़िंदगी का चक्र बदल दिया। उनका कहना था कि थर्ड जेंडर के लोगों को हमारे उपनिषदों में, वेदों में इतना सम्मान मिला है पूजनीय माने गए है उसके बावजूद समाज में आज भी तिरस्कार सहना पड़ता है तो यह फिर समाज का ही दोष है।” एक सच जो तीर की तरह लगा वह यह था कि जब उन्होंने बोला, “हकीकत यह है कि अगर आपके परिवार में ऐसा बच्चा पैदा हो, तो आप भी उसे स्वीकार नहीं करेंगे। दिखावे की सहानुभूति होती है।” आजकल एलजीबीटीक्यू अधिकारों की बात होती है कई लोग प्रोटेस्ट करते हैं इस सवाल पर महामंडलेश्वर संजना सखी का कहना था कि अगर समाज हमें एक्सेप्ट कर लेगा तो प्रोटेस्ट की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी।
शाम के वक्त जब दिन ढल रहा था। क्रिसेंट रिसोर्ट के लीज़ो बैंक्विट हॉल में शिवना प्रकाशन के पुरस्कार वितरण समारोह की तैयारियां हो रही थी। यह वह पल था जिसका हम सभी को बेसब्री से इंतज़ार था एमसीयू भोपाल में एडजंक्ट प्रोफेसर स्मृति मैम (Smriti Aditya) का सम्मान हो रहा था। मैम को उनकी डायरी “अब मैं बोलूँगी” के लिए शिवना कृति सम्मान से नवाज़ा गया। सभागार में उस पल जो तालियाँ बजीं, वो बहुत देर तक गूँजती रहीं। वहां मौजूद लोगों ने सभी सम्मानित हो रहे रचनाकारों के प्रति खड़े होकर करतल ध्वनि के साथ उनके प्रति सम्मान व्यक्त किया। पुरस्कार वितरण समारोह के बाद भगोरिया नृत्य हुआ और पारंपरिक व्यंजन जैसे दाल बाटी चूरमा कढ़ी कुल्फी सहित लज़ीज़ व्यंजनों से लबरेज़ डिनर का लुत्फ़ उठाया गया। तत्पश्चात हम लोग वापस रात में कैंपस के लिए निकल पड़े अगले दिन फिर सुबह 8:30 बजे कैंपस से निकले और सीहोर स्थित क्रिसेंट रिसोर्ट पहुंचे।

दूसरा दिन: जब टीम थोड़ी बदली पर जोश दोगुना रहा
दूसरे दिन देवमाल्या, सुप्रजा और ताविषी नहीं आ पाए लेकिन मेरी ही क्लास के आर्या शर्मा और कमलेश कुलमी ने स्मृति मैम से आने की अनुमति ले ली। और फिर दिनभर काम के साथ खूब मज़े किए। नई जोड़ी, नई ऊर्जा, वही उत्साह।
डिबेट या न्यूज़ आखिर क्या चाहता है दर्शक?
‘सिद्धपुर सभामंडप’ में यह सत्र इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर एक ज़रूरी बहस थी। संचालन आदित्य श्रीवास्तव ने किया। वक्ता माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय भोपाल के कुलगुरु विजय मनोहर तिवारी (Vijay Manohar Tiwari), वरिष्ठ पत्रकार अजय बोकिल (Ajay Bokil) और IND24 चैनल के संस्थापक नवीन पुरोहित (Navin Purohit) थे। विजय सर ने डिबेट की जो परिभाषा की वह लाज़वाब थी। उनका कहना था, “दिनभर में से एक चिंदी पकड़ो और शाम में उसका चादर बना दो वो है – डिबेट। 8-10 अतिथियों को 2-3 घंटे बिठाकर एक लो बजट मूवी की तरह चला दो। यह इसीलिए चलती है ताकि 24 में से कुछ घंटे ऐसे पास हो जाएंगे जिसमें पैसा कम खर्च हो।” भारत में 25 साल से ज़्यादा हो गए 24 घंटे के न्यूज़ चैनलों को लेकिन हमारा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया आज भी चाइल्डिश ही है।” वरिष्ठ पत्रकार अजय बोकिल ने कहा कि, “जिसे प्राइम टाइम कहा जाता है, वो पत्रकारिता की दृष्टि से क्राइम टाइम हो चुका है। आज दर्शक ग्राहक भी है और उत्पाद भी। भारतीय परंपरा में शास्त्रार्थ का ज़िक्र करते हुए उन्होंने टीवी डिबेट्स को उसका “विकृत रूप” बताया। नवीन पुरोहित ने वो बात कही जो बहुत कम लोग कहते हैं उनका कहना था कि अगर कोई यह कहता है दावा करता हैं कि हम सबसे भरोसेमंद हैं तो वो आपके भरोसे पर ही सवाल है कि आपको कहना पड़ रहा है!!! आज भारतीय मीडिया संक्रमण की चरम सीमा पर है।” ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल- BARC की एकाधिकारी और TRP व्यवस्था पर भी सवाल उठे। कुलगुरु ने अंत में हम सभी विद्यार्थियों के लिए कहा, “जो भी विद्यार्थी इस अनिश्चितताओं से भरी दुनिया में आ रहे हैं वे अपना बुद्धि-विवेक जागृत रखें, हमेशा कुछ अलग करने की कोशिश करें।”
अधूरे पन्ने…पूरा साथ
सिद्धपुर सभामंडप में हो रहा यह सत्र प्यार, साहित्य और ज़िंदगी का एक अनोखा संगम था जिसका संचालन शहरयार (Shaharyar Khan) ने किया। वक्ता दिल्ली यूनिवर्सिटी में जर्नलिज़्म के प्रोफेसर राकेश कुमार  और पेशे से इंजीनियर शरद जैन (Sharad Kumar Jain) थे। दोनों ने अपनी-अपनी प्रेम विवाह की कहानी साझा की साथ ही एक साहित्यकार से शादी करना और पेशेगत व्यस्तताओं के बीच अपने व्यक्तिगत रिश्तों के साथ किस तरह तालमेल बैठाना है यह बताया। शरद जैन ने बताया कि उनकी पत्नी वामा साहित्य मंच इंदौर की अध्यक्ष ज्योति जैन (Jyoti Jain) और उन्होंने मिलकर तय किया था हम भागकर नहीं, माता-पिता की रज़ामंदी से शादी करेंगे। उनका कहना था कि माँ हमेशा मानी हुई रहती है, उसे सिर्फ बतलाना पड़ता है। यह एक जुमला नहीं बल्कि एक सच्चाई भी है। राकेश कुमार का मानना था कि अंतरजातीय विवाह समाज को हेल्थी बनाता है और वो ही सही मायने में इंसान को मनुष्यों का समाज बनाता है, न कोई वर्ण, न जाति। उनकी पत्नी प्रज्ञा के उपन्यास ‘काँधोधर’ की भी चर्चा हुई जिसमें एक दृश्य है जहाँ बच्चा पानी में डूब जाता है और एक व्यक्ति निराश खड़ा हो जाता है। महिला लेखक से शादी करने वाले को क्या टिप्स देंगे यह सवाल सत्र में ठहाकों का सबब बना। राकेश जी का जवाब था कि एक ही क्षेत्र में रहने पर अक्सर टकराहट होती है। सामने वाले को उनकी स्पेस दें, उनकी इंपॉर्टेंस समझें साथ ही रिश्तों में पेशेंस बहुत ज़रूरी है।” शरद जैन का अनुभव से यह बात निकली कि, “शादी के पहले सिर्फ प्यार ही प्यार दिखता है, शादी के बाद सबकुछ यथार्थ में बदल जाता है तब बहुत ज़रूरी है कि आपको यह आना चाहिए कब कहां चुप रहना है।”
राजनीति की डगर में कितने फूल, कितने काँटे
सिद्धपुर सभामंडप में हो रहे इस सत्र का संचालन शिवना प्रकाशन के संस्थापक पंकज सुबीर (Pankaj Subeer) और पारुल सिंह ने किया। वक्ता थे तीन बार के विधायक सुदेश राय Sudesh Rai Sudesh Rai और उनकी पत्नी अरुणा राय। “बहुत सारे फल जिस पेड़ पर होते हैं, वो झुक जाता है और अधिक विनम्र हो जाता है।” यह पंक्ति पंकज सुबीर ने विधायक सुदेश राय के परिवार और उनके पूरे व्यक्तित्व पर की थी। विधायक महोदय का कहना था कि पारिवारिक जीवन खुशहाल हो तो मनुष्य का जीवन बहुत आसान रहता है।” उनकी धर्मपत्नी अरुणा राय ने भी खुलकर विधायक जी की तारीफ की और कहा ये बहुत साफ सुथरे इंसान है जो करते है दिल से करते है। रात 3 बजे भी किसी की मदद के लिए उठ जाते हैं। एक दर्शक ने पूछा, इतने बड़े पद पर रहते हुए घमंड क्यों नहीं आया? तो सुदेश राय का जवाब था, “मैं जिन लोगों के सानिध्य में रहा हूं जब उनमें नहीं आया तो मुझमें कैसे आएगा और मैं जिस परिवार से आता हूँ वहाँ घमंड को किसी शब्दकोश में नहीं रखा जाता।”
रेडियो सखी ममता सिंह (Mamta Singh) से मुलाकात
समागम के दौरान विविध भारती की प्रसिद्ध उद्घोषक ममता सिंह से विशेष बातचीत का मौका मिला, जिन्हें श्रोता ‘रेडियो सखी’ के नाम से जानते हैं। असम के धुबरी से शुरू हुई उनकी यात्रा एक मर्फ़ी रेडियो, लकड़ी की मेज़ पर रखा सिला हुआ कवर और एक छोटी बच्ची जो रेडियो के पीछे झाँककर देखती थी कि आवाज़ें कहाँ छिपी हैं। ममता सिंह के लिए रेडियो हमेशा से परिवार के सदस्य की तरह अहम रहा है। क्या पॉडकास्ट से रेडियो को खतरा है? इस पर उनका कहना था कि “बिल्कुल नहीं पॉडकास्ट ने तो रेडियो का काम आसान कर दिया है। पहले रेडियो प्रोग्राम एक निश्चित समय पर ही सुने जा सकते थे अब पॉडकास्ट की वजह से श्रोता अपनी सुविधा के अनुसार उसे कभी भी सुन सकते हैं।
कुछ ख़ास मुलाकातें जो यादगार बन गईं
इस पूरे सफ़र में मेरा जिन शख्सियतों से मिलना हुआ, वो किसी नेमत से कम नहीं था फिल्म अभिनेता यशपाल शर्मा, भारत सरकार से 2015 में सम्मानित पद्मश्री ज्ञान चतुर्वेदी (Gyan Chaturvedi), प्रसिद्ध कवि यतींद्र मिश्र (Yatindra Mishra), फिल्म निर्देशक इरफ़ान ख़लील ख़ान, AISCET के संस्थापक व रवींद्रनाथ टैगोर यूनिवर्सिटी के कुलाधिपति संतोष चौबे (Santosh Choubey), वरिष्ठ पत्रकार अजय बोकिल, वरिष्ठ पुलिस अधिकारी वर्तमान में सीएम सिक्योरिटी हेड समीर यादव (Sameer Yadav), शशांक गर्ग (Shashank Garg), सीहोर से तीसरी बार के विधायक सुदेश राय, लीलाधर मंडलोई (Leeladhar Mandloi) शशिकांत यादव (Shashikant Yadav) पंकज सुबीर, शहरयार सहित कई गुणीजनों से व्यक्तिगत मुलाकात हुई।
भोजन जो दिल में बस गया
दोनों दिन हर समय खाना इतना शानदार रहा कि उसका ज़िक्र न करना नाइंसाफी होगी। मेरे जैसे खाद्यरसिक के लिए तो यह सोने पर सुहागा था। कहीं कोई कमी नहीं बस लज़ीज़ खाना और बेहतरीन मेज़बानी। शिवना प्रकाशन ने हर बात का ख्याल रखा।
विदाई का लम्हा
अंत में जाते वक्त जब पंकज सुबीर जी ने हम विद्यार्थियों से कहा कि वे चाहते है आने वाले 5-7 साल बाद हम लोग भी इस समारोह में पत्रकारिता के किसी सत्र में वक्ता के रूप में आए। उनका यह कहना हमारे अंदर जोश भर गया। दो दिन में कई लोगों से मिलना हुआ, विभिन्न विचारों से टकराना हुआ, बहुत सारे सवालों के जवाब मिले और इतने ही नए सवाल उठने लगे कि लगा यह सफ़र शायद अभी खत्म नहीं हुआ, बस एक पड़ाव आया है। प्रशांत, भूमि, हर्ष, चैतन्य, आर्या, कमलेश, शांतनु भैया, सुप्रजा, महक, प्राक्षि, निकिता, देवमाल्या, ताविषी इन सभी साथियों ने भी इस यात्रा को यादगार बनाया और डॉ. लाल बहादुर ओझा सर जिनका मार्गदर्शन हर क़दम पर मिला, जिनकी उपस्थिति ही एक आश्वासन थी कि वह हमारे साथ है।
शिवना साहित्य समागम 2026 यह एक आयोजन नहीं एक संपूर्ण अनुभव रहा। जहां साहित्य, सिनेमा, पत्रकारिता, राजनीति, तीसरे लिंग के संघर्ष, प्रेम और जीवन की डगर सब कुछ दो दिनों में समा गया। शिवना प्रकाशन को बहुत-बहुत धन्यवाद ऐसा कार्यक्रम आयोजित करने के लिए जहाँ हर इंसान कुछ लेकर लौटा।
~ नैवेद्य पुरोहित
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