बीते दो दिन 28 फरवरी और 1 मार्च को मैं सीहोर में शिवना प्रकाशन (Shivna Prakashan) द्वारा क्रिसेंट रिज़ॉर्ट एंड क्लब में आयोजित शिवना साहित्य समागम 2026 में सम्मिलित हुआ। यह महज़ एक साहित्यिक आयोजन नहीं था, यह एक ऐसा मेला था जहाँ अलग-अलग विचार शब्दों के साथ गले मिल रहे थे और अजनबी भी दोस्त बन गए।
मैं वहाँ “रेडियो कर्मवीर 90.0 FM – जो करता है जन गण मन की बात” की टीम के साथ गया था। मेरे साथ प्रशांत सिंह, भूमि सिंह, सुप्रजा पांडेय और देवमाल्य बनर्जी थे। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से जनसंचार विभाग की टीम भी साथ थी जिसमें मेरे मित्र हर्ष कर्णवाल, चैतन्य शाह, शांतनु भैया, महक पवानी, प्राक्षि शर्मा, निकिता धाकड़, ताविषी देवरानी और हम सभी के मार्गदर्शक डॉ. लाल बहादुर ओझा सर थे जिनकी मौजूदगी हर क़दम पर रोशनी की तरह हमारे साथ रही।

पहला दिन: जब साहित्य और सिनेमा एक-दूसरे में घुल गए
सिद्धपुर सभामंडप में हो रहे पहले दिन के दूसरे सत्र ने माहौल बना दिया। मंच पर थे फिल्म अभिनेता यशपाल शर्मा (Yashpal Sharma) फ़िल्म निर्देशक इरफ़ान ख़लील ख़ान (Irfan Khan) और प्रतिभा सुमन शर्मा (Pratibha Sumann) संचालन आकाश माथुर (Akash Mathur) और अंकुर परसाई ने किया। अंकुर परसाई की एक पंक्ति सत्र का सार बन गई, “Literature is the soul of society and Cinema is the reflection of society.” प्रतिभा सुमन शर्मा ने कहा, “सिनेमा और समाज को हम अलग-अलग नहीं कह सकते। यह कहकर कि ऐसी फ़िल्में बन रही हैं इसीलिए समाज बिगड़ रहा है तो हम पल्ला झाड़ रहे हैं। समाज भी कहीं न कहीं उस ओर बढ़ने लगा है।” इरफ़ान ख़लील ख़ान ने फ़िल्मकारों को सीधी नसीहत दी और कहा, “साहित्य से कहानी आएगी। फ़िल्म मेकर्स को कहानी तभी मिलेगी जब वे साहित्य से जुड़े रहेंगे।” उन्होंने ‘किसी का भाई किसी की जान’ और ‘सिकंदर’ जैसी फ़िल्मों का ज़िक्र करते हुए कहा कि कहानी के अभाव में फिर ऐसी ही फिल्में बनती है। यशपाल शर्मा जिनसे मिलना खुद एक अनुभव है उन्होंने रीजनल सिनेमा की ताकत पर जो कहा, वो बेजोड़ था। ओटीटी प्लेटफॉर्म ZEE5 पर उपलब्ध तमिल फ़िल्म ‘अयोधि’ का ज़िक्र उन्होंने बड़ी तन्मयता से किया। एक कट्टर हिंदू की कहानी, जो एक्सीडेंट के बाद तमिल लोगों की मदद से गुज़रता है, दीवाली के वक़्त एक तमिल शख्स सब छोड़कर उस व्यक्ति की डेडबॉडी के लिए पुलिस से एनओसी से लेकर शव को एयरपोर्ट से ले जाने तक की ज़िम्मेदारी उठाता है। ऐसी कई रीजनल फ़िल्मों में कंटेंट बहुत स्ट्रॉन्ग होता है। प्रतिभा जी, यशपाल शर्मा की पत्नी हैं। जब आकाश माथुर ने उनसे पूछा कि पर्दे पर आप कम दिखाई देती हैं, तो उनका जवाब था, “अब लेखन और निर्देशन में व्यस्त रहने लगी हूँ।”
क्या पत्रकारिता की विश्वसनीयता दाँव पर है?
‘सिपाही बहादुर सभागार’ में यह सत्र जितना गंभीर था, उतना ही ज़रूरी भी। संचालन पॉलिटिक्सवाला (Politicswala) के पंकज मुकाती (Pankaj Mukati Politicswala) ने किया। वक्ताओं में थे विस्तार न्यूज़ के एडिटर इन चीफ ब्रजेश राजपूत (Brajesh Rajput), पंकज शुक्ला (Pankaj Shukla), पुष्पेंद्र वैद्य (Pushpendra Vaidya) और पूर्व विधायक शैलेंद्र पटेल (Shailendra Patel)। पत्रकार अलग हैं, मीडिया हाउस अलग यह बात शैलेंद्र पटेल ने पहले ही साफ़ कर दी। सर्कस पत्रकारिता पर जो कहा गया वो कड़वा सच था, “हमने अपने पैरों पर ही कुल्हाड़ी मारी है। टीआरपी की दौड़ में पहले साँप-बिच्छू-भूत-प्रेत-बाबा-ओझा आए, फिर धीरे-धीरे प्राइम टाइम के शो में भी नाग-नागिन की कहानियाँ बढ़ने लगीं।” एक वक्ता ने वाकया साझा किया कि जब किसी पत्रकार ने अपने संपादक को बताया कि एक बाँध डूब रहा है उस पर स्टोरी करना है तो संपादक ने मना कर दिया और कहा, “शिवलिंग पर नाग उठाकर लाओ ऐसा कुछ लाओ जो लोगों को अट्रैक्ट करे।” ब्रजेश राजपूत ने देर से आकर भी ज़रूरी बात कही और कहा कि “हम कुछ लोग जो वस्तुनिष्ठ पत्रकारिता करना चाहते थे या कर रहे हैं अब लोगों को वो चाहिए भी नहीं।” पंकज शुक्ला ने एक संकट की बात उठाई और कहा कि “आजकल एक व्यक्ति की रातोंरात विचारधारा बदल जाती है जो पहले जनपक्ष की बात करते थे, वो अपने हित के लिए रातोंरात पाला बदल लेते हैं।” बीबीसी के संजीव श्रीवास्तव की कचौड़ी की दुकान पर भी चर्चा हुई। सत्र का निचोड़ यह भी था कि भविष्य में बने रहने के लिए विषय-आधारित काम करना होगा।

थर्ड जेंडर का जीवन संघर्ष
‘सिद्धपुर सभामंडप’ में यह सत्र उतना ही भावुक था जिसका संचालन पारुल सिंह और पंखुरी पुरोहित ने किया। वक्ता थीं महामंडलेश्वर संजना सखी अपने जीवन के कठिन पलों को साझा करते हुए संजना सखी ने बताया कि 1999 का वो दिन जब उन्हें घर से निकाला गया, भाई ने बाहर का रास्ता दिखाया, माँ ने भी हाथ जोड़ लिए इसे याद करते हुए वे कहती है, “वो मेरे जीवन का सबसे दुखद पल था। लेकिन आज वही मेरे लिए सुखद भी है, क्योंकि अगर वो पल न होता तो मैं आज यहाँ नहीं होती।” एक-एक दिन समोसे पर निकाला और उस गहराई से एक अनुभव जन्मा जिसने पूरी ज़िंदगी का चक्र बदल दिया। उनका कहना था कि थर्ड जेंडर के लोगों को हमारे उपनिषदों में, वेदों में इतना सम्मान मिला है पूजनीय माने गए है उसके बावजूद समाज में आज भी तिरस्कार सहना पड़ता है तो यह फिर समाज का ही दोष है।” एक सच जो तीर की तरह लगा वह यह था कि जब उन्होंने बोला, “हकीकत यह है कि अगर आपके परिवार में ऐसा बच्चा पैदा हो, तो आप भी उसे स्वीकार नहीं करेंगे। दिखावे की सहानुभूति होती है।” आजकल एलजीबीटीक्यू अधिकारों की बात होती है कई लोग प्रोटेस्ट करते हैं इस सवाल पर महामंडलेश्वर संजना सखी का कहना था कि अगर समाज हमें एक्सेप्ट कर लेगा तो प्रोटेस्ट की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी।
शाम के वक्त जब दिन ढल रहा था। क्रिसेंट रिसोर्ट के लीज़ो बैंक्विट हॉल में शिवना प्रकाशन के पुरस्कार वितरण समारोह की तैयारियां हो रही थी। यह वह पल था जिसका हम सभी को बेसब्री से इंतज़ार था एमसीयू भोपाल में एडजंक्ट प्रोफेसर स्मृति मैम (Smriti Aditya) का सम्मान हो रहा था। मैम को उनकी डायरी “अब मैं बोलूँगी” के लिए शिवना कृति सम्मान से नवाज़ा गया। सभागार में उस पल जो तालियाँ बजीं, वो बहुत देर तक गूँजती रहीं। वहां मौजूद लोगों ने सभी सम्मानित हो रहे रचनाकारों के प्रति खड़े होकर करतल ध्वनि के साथ उनके प्रति सम्मान व्यक्त किया। पुरस्कार वितरण समारोह के बाद भगोरिया नृत्य हुआ और पारंपरिक व्यंजन जैसे दाल बाटी चूरमा कढ़ी कुल्फी सहित लज़ीज़ व्यंजनों से लबरेज़ डिनर का लुत्फ़ उठाया गया। तत्पश्चात हम लोग वापस रात में कैंपस के लिए निकल पड़े अगले दिन फिर सुबह 8:30 बजे कैंपस से निकले और सीहोर स्थित क्रिसेंट रिसोर्ट पहुंचे।

