- प्रश्न:- “मिश्र जी, आपके ‘फूल… इमारतें और बन्दर’ उपन्यास के शीर्षक में ‘इमारतें’ सत्ता और वैभव का प्रतीक लगती हैं, लेकिन इस राजनीतिक परिदृश्य में आपने ‘बंदरों’ को किस रूप में रखा है? क्या ये बंदर व्यवस्था में फैली अराजकता के प्रतीक हैं या राजनीति की अवसरवादिता के?”
देखिए… फूल वो हैं, जो आदमी को उसकी प्रसंशा के वक्त माला के रूप में पहनाए जाते हैं, चापलूसी, रिकगनीशन भी उसी में आ जाता है… इज्जत भी। इमारतें जो हैं, वे हैं दिल्ली का नॉर्थ-ब्लॉक, साउथ-ब्लॉक या भोपाल के विंध्यांचल भवन, सतपुड़ा भवन- जहां सचिवालय होता है… प्रशासन की केन्द्रीय कोठरी। बंदर, नॉर्थ ब्लॉक जहाँ हम काम करते थे वहाँ बहुत बंदर थे, उसका लंबा-चौड़ा विवरण ‘फूल…इमारतें और बंदर’ में है। वो प्रतीक बन गए अफसरों के, ब्यूरोक्रैसी के। बंदर… अफसर लोग, जो इधर से उधर उचकते फिरते हैं। उपन्यास में कहा गया है कि ये बंदर पुराने अफसरों की आत्माएं हैं जो फाइलों के इर्द-गिर्द भटक रही हैं। उछल कूद करने वाले अफसरान आए… गए। इमारतें अर्थात सत्ता हमेशा रहती हैं। अफसरों/नेताओं को फूल, मालाएं पहनाई जाती हैं। फूल सूख जाते है- इज्जत, प्रसंशा वगैरह ये सब क्षणिक प्राप्तियाँ हैं।
प्रश्न:- “आपने स्वयं प्रशासन को बहुत निकट से देखा है। ‘फूल…इमारतें और बंदर’ में जो राजनीति और नौकरशाही का अपवित्र गठबंधन दिखता है, क्या आपको लगता है कि पिछले दशकों में वह और भी अधिक गहरा और जटिल हो गया है?”
वो तो है ही… जो और होगा आगे… हर कोई सत्ता को अपने पास खींचना चाहता है…पॉवर। राजनेता अपनी तरफ खींचता है, अफसर अपनी तरफ खींचता है, संस्थाओं के जो रूल हैं वो लगाम रखने के लिए होते हैं… उन्हें नेता-अफसर तोड़ते-मरोड़ते चलते हैं, इसलिए वे और जटिल होते चले जाते हैं। देश-दुनिया में जो आदर्श होते थे, अच्छाई की तरफ जाने के लिए जो सामने रखे जाते थे, उनका क्षरण होता जा रहा है। जब क्षरण होगा और सब सत्ता को अपनी तरफ खींचेंगे तो राजनीति-नौकरशाही का गठबंधन जटिल होता ही जाएगा। अब जैसे एक उदाहरण लीजिए- पुतिन ने आक्रमण कर दिया यूक्रेन पर… ‘पीस’ का नाम लेकर अमेरिका के ट्रम्प महोदय बीच में आ गए, वे वेनजुआल के प्रेसीडेंट को ही उठा के ले गए। तो वो भी वही कर रहे हैं … जो पुतिन कर रहे हैं। स्वार्थों की टकराहट बढ़ती चली जाती है। निःस्वार्थ भाव से सेवा करने वाले जो पहले थे वो अब नहीं हैं और न आगे होंगे क्योंकि अब ऐसे संस्कार नहीं बचे… तो मामला तो जटिल होता ही जाएगा।
प्रश्न:- लाल पीली जमीन में “लाल और पीले रंगों के पीछे की मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि क्या थी जब आप यह कथा बुन रहे थे?”
देखिए ‘लाल पीली जमीन’ में लाल और पीले को अलग करके मत रखिए। एक मुहावरा है- ‘लाल पीला होना’ अर्थात गुस्सा, तो जो बुंदेलखंड की जमीन उपन्यास में चित्रित है उसमें बुनियादी स्वभाव मनुष्य का गुस्सैल है। बुन्देली होते भी हैं। ‘सौ दंडी एक बुन्देलखंडी’ कहावत ही है, तो वो जमीन ही ऐसी थी, जिसमें गुस्सा होना, मार पीट ये सब ज्यादा था, जो मैंने बचपन में देखा… मेरा बचपन चरखारी में बीता वहाँ आदमी सिर्फ लड़ता-झगड़ता ही रहता था, एक दूसरे को मारता रहता- गुंडई। वहाँ पर कोई प्रशासन या पुलिस हमने कभी देखे ही नहीं। चरखारी में तो लगता था कि जो ताकतवर है बस उसी का राज है, जिसकी लाठी उसकी भैंस। नौवीं दर्जे में बांदा आया, वहाँ का परिवेश थोड़ा अलग किस्म का था। वहाँ बुन्देली भाषा भी मिली-जुली हो जाती है, लेकिन चरखारी में ठेठ बुन्देली थी… आल्हा-उदल… वही पढ़ा जाता था। बांदा में आकर पहली बार रामचारितमानस के पाठ सुनाई दिए। वहाँ मेरी किशोरावस्था बीती, जीवन में प्रेम आया।
प्रश्न:- “बुंदेलखंड और विशेषकर चरखारी का परिवेश ‘लाल पीली जमीन’ उपन्यास में एक जीवित पात्र की तरह उभरता है। क्या आपको लगता है कि आंचलिकता केवल भाषा तक सीमित होती है, या वह मनुष्य के भाग्य का निर्धारण भी करती है?”
भाषा तक सीमित होने की बात नहीं है भाई… कुछ जगहें ऐसी होती हैं जिसकी मिट्टी में वहाँ के लोगों का स्वभाव जज़्ब हो जाता है, वही मिट्टी का स्वभाव बन जाता है। ऐसी ही एक किताब है ‘टॉमस हार्डी’ की ‘द रिटर्न ऑफ द नेटिव’ और आधुनिक साहित्य में ‘गब्रियल गार्सिया मार्खेज़’ (Gabriel García Márquez) द्वारा लिखी गई ‘वन हंड्रेड इयर्स ऑफ सॉलिट्यूड’ (One Hundred Years of Solitude)। ये किसी एक पात्र पर नहीं हैं। ‘लाल पीली जमीन’ में भी एक पात्र नहीं हैं, हालांकि ‘लाल पीली जमीन’ जब मैंने लिखा था तो न मैंने मार्खेज़ का नाम सुना था, न ही उसे पढ़ा था। तो ऐसे उपन्यास जो परिवेश-प्रधान होते हैं उनमें परिवेश ही नायक होता है। ‘लाल पीली जमीन’ में खंदिया मोहल्ला ही नायक है।

प्रश्न: “आपने ‘पाँच आंगनों वाला घर’ उपन्यास में एक सांस्कृतिक संक्रमण को पकड़ा है। क्या आपको लगता है कि पाँच आंगनों के सिमटकर एक फ्लैट या छोटे कमरे में तब्दील होने से हमारी संवेदनाएँ भी संकुचित हो गई हैं?”

