Sunday, May 17, 2026
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वक्त से दिन और रात…

1980 के दशक में जब बी आर चोपड़ा निर्देशित महाभारत का मेगा सीरियल दूरदर्शन पर दिखाया जाता था, तो उसका पहला संवाद होता था- “मैं समय हूँ…” इंसान समय के चक्र में अपना पूरा जीवन बिता देता है। वक्त का ज्ञान हर इंसान के लिए इतना ज़रूरी होता है कि वह अपनी कलाई पर घड़ी बाँध कर रखता है। आजकल तो स्मार्ट वॉच और स्मार्ट फ़ोन भी इंसान को सही वक्त की सूचना दे देते हैं। और इंसान जब चाहे, इन यंत्रों पर अलार्म भी लगा लेता है, ताकि समय रहते सावधान रहे।

बीबीसी हिंदी की एक रिपोर्ट में ममता गुप्ता और महबूब ख़ान लिखते हैं कि, “घड़ी की मिनट वाली सुई का आविष्कार वर्ष 1577 में स्विट्ज़रलैंड के जॉस बर्गी ने अपने एक खगोलशास्त्री मित्र के लिए किया। उनसे पहले जर्मनी के न्यूरमबर्ग शहर में पीटर हेनलेन ने ऐसी घड़ी बना ली थी, जिसे एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सके, लेकिन जिस तरह हम आज हाथ में घड़ी पहनते हैं, वैसी पहली घड़ी पहनने वाले व्यक्ति थे जाने-माने फ़्राँसीसी गणितज्ञ और दार्शनिक ब्लेज़ पास्कल। ये वही ब्लेज़ पास्कल हैं, जिन्हें कैलकुलेटर का आविष्कारक भी माना जाता है। लगभग 1650 के आसपास लोग घड़ी जेब में रखकर घूमते थे। ब्लेज़ पास्कल ने एक रस्सी से इस घड़ी को कलाई में बाँध लिया, ताकि वे काम करते समय घड़ी देख सकें। उनके कई साथियों ने उनका मज़ाक भी उड़ाया, लेकिन आज हम सब हाथ में घड़ी पहनते हैं।

प्रथम विश्व युद्ध से पहले जेब घड़ी लोकप्रिय थी। कलाई पर बाँधने वाली घड़ी केवल अमीर लोगों का चोंचला थी। आम आदमी की पहुँच से कलाई घड़ी बहुत दूर की वस्तु थी। प्रथम विश्व युद्ध में ब्रिटेन ने अपने सैनिकों के लिए कलाई पर पहनने वाली घड़ियाँ बनवाईं, ताकि उन्हें युद्ध के दौरान जेब से घड़ी निकालने में समय व्यर्थ न करना पड़े।

हम सबको घड़ी देखने की इतनी आदत हो चुकी है कि हमें घड़ी के काँटे (सुइयाँ) एक ख़ास दिशा में चलते हुए देखकर कोई हैरानी नहीं होती। हम यह मानकर चलते हैं कि घड़ी की सुइयाँ  बाएँ से दाएँ  ही चलेंगी। हमने कभी यह सोचा ही नहीं कि घड़ी की सुइयाँ इस दिशा में क्यों चलती हैं। दरअसल इंसान का दिमाग़ ऐसी बातें सोचता ही नहीं… बस उसे कुछ काम करने की आदत-सी पड़ जाती है।

मगर जब भी कोई व्यक्ति या समूह तयशुदा प्रणाली के विरुद्ध कुछ करता है, तो हमें हैरानी भी होती है और हम उसे दिमाग़ी तौर पर खिसका हुआ भी मानने लगते हैं। वैसे ऐसे ही लोग जीनियस भी बन जाते हैं। अंग्रेज़ी के व्यंग्यकार जोनाथन स्विफ़्ट के अनुसार- “एक पागल और जीनियस में बहुत सूक्ष्म-सा अंतर होता है।” इसीलिए कहा जाता है कि हमें जजमेंटल नहीं होना चाहिए।

बात हो रही है समय की और घड़ी की… भारत के झारखंड राज्य में कोरबा के निकट कुछ गाँव हैं, जहाँ के निवासी परंपरागत घड़ी को सही नहीं मानते। उनके क्षेत्र में घड़ी के कांटे दाएँ से बाएँ न चलकर बाएँ से दाएँ की ओर चलते हैं। इस समाज को गोंड समाज के नाम से जाना जाता है। इन लोगों के लिए वे तमाम चीज़ें वर्जित हैं, जो दूसरे समुदायों में सामान्य समझी जाती हैं। आदिवासी शक्ति पीठ से जुड़े गोंड आदिवासी समुदाय के लोगों के जीवन जीने के अपने ही नियम हैं। उल्टी दिशा की घड़ी के इस्तेमाल को लेकर आदिवासियों ने बताया कि उनकी ही घड़ी सही दिशा में चलती है। समुदाय ने अपनी घड़ी का नाम “गोंडवाना टाइम” रखा है।

गोंड समाज इस मामले में वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक तर्क देते हैं कि उनकी घड़ी उल्टी नहीं है। उनके अनुसार उनकी घड़ी प्राकृतिक दिशा में चलती है। उनका दावा है कि यदि हम प्रकृति का नियम समझने का प्रयास करें तो ब्रह्मांड में अधिकांश चीज़ें एंटी-क्लॉकवाइज़ दिशा में घूमती हैं। पृथ्वी अपनी धुरी पर पश्चिम से पूर्व (एंटी-क्लॉकवाइज़) दिशा में घूमती है। चंद्रमा पृथ्वी के चारों ओर एवं पृथ्वी सूर्य के चारों ओर एंटी-क्लॉकवाइज़ दिशा में चक्कर लगाते हैं।

गोंड समुदाय के लोग जीवन-चक्र का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि खेत जोतते समय बैल का घूमना, कुएँ से पानी निकालते समय रहट का घूमना और सबसे महत्वपूर्ण, विवाह में फेरे भी इसी दिशा में लिए जाते हैं। पेड़ पर बेल के लिपटने की दिशा भी प्राकृतिक रूप से दाहिने से बाएँ, यानी कि एंटी-क्लॉकवाइज़ होती है। सोचने की बात तो यह है कि तालाब में पड़ने वाला भँवर भी दाएँ से बाएँ  ही घूमता है।

गोंड लोग अपने आप को गोंडवाना लैंड का मूल निवासी मानते हैं। लाखों वर्ष पहले पृथ्वी की इक्वेटर रेखा के ऊपर के हिस्से को अंगारा लैंड और नीचे के हिस्से को गोंडवाना लैंड कहा जाता था। अंगारा लैंड में सूर्य और धरती की स्थिति कुछ ऐसी होती थी कि सूर्य की यात्रा क्लॉकवाइज़ दिशा में होती थी, मगर गोंडवाना लैंड में यह एंटी-क्लॉकवाइज़ दिशा में होती थी। राजनीतिक तौर पर अपने आप को गोंडवाना लैंड का मूल निवासी बताने के कारण वे अपनी घड़ी की सुइयों को एंटी-क्लॉकवाइज़ दिशा में चलाते हैं।

इस क्षेत्र में गोंड समुदाय के लोगों के अलावा गोंडवाना घड़ी को अन्य 29 समुदायों के लोगों ने भी मान्यता दे रखी है। आदिवासियों का कहना है कि प्रकृति का चक्र जिस दिशा में चलता है, उसी दिशा में उनकी घड़ी चलती है। आदिवासी समुदाय के ये लोग महुआ, परसा और अन्य पेड़ों की पूजा करते हैं। छत्तीसगढ़ के इस इलाके में करीब दस हजार परिवार रहते हैं। ये सभी लोग उल्टी घड़ी का पालन करते हैं। मुख्य शहर से 60 किलोमीटर दूर मानिकपुर गाँव में लोग अलग तरह से सोचते हैं।

श्री मरपच्ची ने इस विषय पर गहरा शोध किया है। मरपच्ची स्वयं बताते हैं कि “इसके लिए उन्होंने गहरा शोध किया। प्रकृति के नियमों को सूक्ष्मता से जाँचने के बाद यह निष्कर्ष निकाला गया कि प्रकृति की दिशा वास्तव में ‘दाएँ से बाएँ’ है, न कि ‘अंग्रेज़ी घड़ी की दिशा’ के मुताबिक। इसलिए उन्होंने सन् 2000 में एक ऐसी घड़ी का आविष्कार किया, जिसकी सुइयाँ  दाएँ से बाएँ घूमती हैं, जो प्रकृति की सही दिशा मानी जाती है।”

अपनी बात जारी रखते हुए वे कहते हैं, “आज इस घड़ी की ख्याति पूरे देश में फैल चुकी है। देश के 18 राज्यों में इस घड़ी का इस्तेमाल हो रहा है… आदिवासी वर्ग के अधिकतर लोग अब इसी घड़ी का इस्तेमाल करते हैं। बाकी लोग भी लगातार इस घड़ी के बारे में पूछते हैं… मैं उन्हें यह घड़ी उपहार भी देता हूँ ।  जिस घड़ी का उपयोग दुनिया करती है… जो बाएँ से दाएँ चलती है, वह प्रकृति के दिशा से उल्टी है। इस हिसाब से हमारे लिए वह घड़ी उल्टी है, जबकि हमारे द्वारा बनाई यह घड़ी, जो दाएँ से बाएँ की ओर सफर करती है, सही मानी जाती है। वास्तव में यही सीधी और सही दिशा है, जो प्रकृति की दिशा भी है। ”

मरपच्ची का कहना है कि इस घड़ी का नामकरण वे “गोंडवाना बेरा” करवाना चाहते हैं, क्योंकि दुनिया के पाँचों महाद्वीपों में सबसे पहले गोंडवाना लैंड का ही जिक्र आता है | देश गोंडवाना धरती पर ही बसा हुआ माना जाता है, इसलिए इस घड़ी का नाम शाश्वत पुरातन परंपरा से जुड़ा होना चाहिए। इसी कारण इसका नामकरण “गोंडवाना बेरा” करने का प्रस्ताव रखा गया है। इसके पेटेंट करवाने की प्रक्रिया भी जारी है। वर्तमान में इस घड़ी को छत्तीसगढ़ बेरा, गोंडवाना टाइम, गोंडवाना समय आदि नामों से जाना जाता है। आदिवासी समाज से आने वाले लोगों में यह घड़ी काफ़ी लोकप्रिय है। ज़िले के आदिवासी इसका उपयोग कर रहे हैं।

यह भी सच है कि घड़ी समेत तमाम मॉडर्न आविष्कार यूरोप, अमरीका, ब्रिटेन और जापान में हुए हैं। ये तमाम देश उत्तरी गोलार्ध में स्थित हैं। यदि घड़ी का आविष्कार दक्षिणी गोलार्ध के किसी देश में हुआ होता तो घड़ी शुरू से ही बाएं से दाएं की ओर चलती दिखाई देती।

साहिर लुधियानवी ने लिखा है- “आदमी को चाहिए वक़्त से डर कर रहे / कौन जाने किस घड़ी वक़्त का बदले मिज़ाज।” घड़ी की सुइयाँ चाहे दाएँ से बाएँ चलें या फिर बाएँ से दाएँ, वक़्त अपनी चाल पर कायम रहता है। सच तो यह है कि पहले घड़ी में समय देखा जाता था और आज पढ़ा जाता है। किसी ने कहा है- “जैसे-जैसे मेरे ज्ञान में वृद्धि होती है, मुझे अपने ज्ञान की सीमा का आभास होता रहता है।”

तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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8 टिप्पणी

  1. मेरे लिए नई जानकारी -आत्मीय आभार आपका और साधुवाद
    हर बार अचंभित हो जाती हूँ

  2. गोंडवाना की इस उल्टी घड़ी से हम अनभिज्ञ थे। यह संपादकीय पढ़कर सच में ऐसी वास्तविकताओं पर ध्यान गया जिनके बारे में सोचना तो दूर हमने जिनको कभी नोटिस भी नहीं किया था। बेल के चढ़ने की दिशा, पानी में पड़ते भंवर की दिशा इत्यादि यह स्पष्ट करते हैं कि प्रकृति भी एक set pattern पर चलती है । किन्तु इस सम्पादकीय में यह बात स्पष्ट नहीं हुई कि घड़ी की दिशा में परिवर्तन से क्या समय में भी परिवर्तन आ जाता है अथवा यह महज़ दिशा परिवर्तन है !
    जानकारियों से भरपूर आज का सम्पादकीय रुचिकर लगा; साधुवाद!

  3. ये गोंडवाना टाइम्स तो वाकई ग़ज़ब की जानकारी है और तारीफ़ ये कि उनके तर्कों को भी आप ग़लत नहीं ठहरा सकते हैं और ऐसे में क्या ही किया जाए उस टाइम और घड़ी का जिससे हम चल रहे हैं? ये ऐसा यक्ष प्रश्न है जिसका जवाब दे तो मरे और न दे तो भी मरे.. लेकिन इसका कारण ये है कि हम लोग western world जो कहता है उसे ही मानते हैं, एक उदाहरण ले सकते हैं कि योग जब तक था तब तक बस था लेकिन जैसे ही वो योगा बन गया वो महान हो गया, बहरहाल इस नई जानकारी का शुक्रिया

  4. पाठक की उत्सुकता को आरंभ से ही आकर्षित करने वाला आपका ये संपादकीय वैचारिक व ऐतिहासिक दृष्टि से उल्लेखनीय है। संस्कृति और समय के संबंधों को नवीन दृष्टि प्रदान करने वाला यह ज्ञानवर्धक लेख,
    जिसमें आदिवासी समाज की सांस्कृतिक चेतना और प्रकृति पर आधारित दृष्टिकोण को प्रस्तुत किया गया है, इसके माध्यम से गोंड समुदाय द्वारा घड़ी की दिशा को प्राकृतिक दिशा मानकर उससे संदर्भित विभिन्न उदाहरण जैसे पृथ्वी की गति, रहट, विवाह के समय लिए जाने वाले फेरे,बेल और भंवर का उदाहरण अत्यंत प्रासंगिक और चिंतन की गहनता को उद्वेलित करने की प्रेरणा प्रदान करता है। इस लेख के माध्यम से यह स्पष्ट होता है की मुख्य धारा का समाज जिसे उल्टा मानता है वह गोंड समुदाय व किसी भी अन्य सांस्कृतिक समुदाय के लिए कितना तर्कसंगत, स्वाभाविक और वैज्ञानिक सिद्ध होता है। परंपरा, समय और आधुनिकता के अंतर्संबंध की प्रस्तुति रोचक है।
    इस प्रकार आपका यह संपादकीय महत्वपूर्ण और ज्ञानवर्धक होने के साथ ही साथ लीक से हटकर और स्थापित सत्य की सीमाओं को लांघकर नए दृष्टिकोण खोजने की चुनौती भी देता है।
    शुभकामनाएँ।

  5. पुरवाई के इस अंक में
    “वक्त से दिन और रात “
    शीर्षक सम्पादकीय के लिए प्रतिष्ठित कथाकार / सम्पादक श्री तेजेंद्र शर्मा जी को बहुत बधाई ।
    रोज़मर्रा के सामान्य लगने वाले विषयों को आप विचारों के टकसाल में डाल कर सोच का नया आकार प्रदान कर देते हैं । यह आपके व्यक्तित्व का कमाल है ।
    काल बोधक – चक्र में जीवन की गति – प्रगति को महाभारत सीरियल से संदर्भित कर प्राचीन और अर्वाचीन आविष्कारों की वैज्ञानिक शृंखला को क्रमशः विश्लेषित किया गया है । घड़ी की गति और दिशा सूचक विचार सराहनीय –
    “यदि घड़ी का आविष्कार दक्षिणी गोलार्ध के किसी देश में हुआ होता तो घड़ी शुरू से ही बाएं से दाएं की ओर चलती दिखाई देती।”
    अंक में कविताएँ, लेख आदि भी उत्कृष्ट और पठनीय हैं ।
    बहुत बधाई ।
    —-
    मीनकेतन प्रधान ,
    भारत

  6. आदरणीय तेजेन्द्र शर्मा जी ने घड़ी संबंधी बहुत गहरी और नवीन जानकारी दी। घड़ी के इन अनछुए पहलुओं से परिचित होने के साथ – साथ गोंडवाना घड़ी के माध्यम से मूल प्रकृति को भी समझा।
    हाथ पर घड़ी के प्रयोग को भी जाना।

    हमेशा की तरह तेजेन्द्र जी के संपादकीय में ज्ञानवर्धक जानकारी निहित है।
    बहुत धन्यवाद
    पद्मा शर्मा

  7. आदरणीय भाई,
    सादर प्रणाम।
    एक बार पुन: आपका संपादकीय चौंका गया।आपकी सूक्ष्म दृष्टि नवीनतम शोध के उन बिंदुओं तक जा पहुंचती है जहां हमारी सोच मौन हो जाती है।जीवन के आरंभ से लेकर अंत तक यह समय चक्र हमारे साथ साथ चलता रहता है। समय अर्थात आज की घड़ी की बात जो एक अनिवार्य आवश्यक आवश्यकता है।घड़ी की घूमती सुईयों के साथ घूमती है हमारी जिंदगी भी।पर प्राकृतिक सूर्यघडी से आज हाथों में बांधने वाली घड़ी की कहानी भी रोचक ज्ञानवर्धक और चमत्कृत करने वाली है।जैसा कि अपने संपादकीय में आपने ” गोंडवाना ” घड़ी के बारे में बताया कि उसकी सुईयां दांयें से बांये अर्थात वर्तमान घड़ी के विपरीत घूमती हैं।यह झारखंड के आदिवासियों की प्रचलित परंपरागत घड़ी है जो सर्वमान्य है यहां के गोंडवाना समुदाय में।मैने भी सुना था पर उस समय इस बात का विश्वास नहीं हुआ था।आज संपादकीय में चर्चा हुई तो सत्यता की जानकारी मिली।आप हमेशा एक सर्वथा नवीन संदर्भ ले आते हैं संपादकीय में,और हम.ज्ञान पिपासा बन एक श्रेष्ठ छात्र की तरह बहुत कुछ सीखते रहते हैं।
    आपने जैसा कि अपने संपादकीय में लिखा है –”
    गोंड समुदाय के लोग जीवन-चक्र का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि खेत जोतते समय बैल का घूमना, कुएँ से पानी निकालते समय रहट का घूमना और सबसे महत्वपूर्ण, विवाह में फेरे भी इसी दिशा में लिए जाते हैं। पेड़ पर बेल के लिपटने की दिशा भी प्राकृतिक रूप से दाहिने से बाएँ, यानी कि एंटी-क्लॉकवाइज़ होती है। सोचने की बात तो यह है कि तालाब में पड़ने वाला भँवर भी दाएँ से बाएँ ही घूमता है।”
    बहुत ही सुंदर सार्थक जानकारी प्रदान करता आपका संपादकीय मेरे लिए तो एक शिक्षक की तरह है।बहुत बहुत बधाई हो भाई आपको।अशेष आभार।
    पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर

  8. नए सुंदर संपादकीय के लिए बधाई।

    मैं तो ऑस्ट्रेलिया में रहता हूं। हमारे लिए धरती एंटीक्लॉक वाइज़ घूमती है। मैं गोंडवाना समय का समर्थन करता हूं।

    जानता हूं, सचमुच यह अनिवार्य हो गया तो ज्यादा तकलीफ मुझे ही होगी। दिल से ऐसा नहीं चाहूंगा , पर आप तो जानते हैं हर भारतीय आधा पॉलिटीशियन होता है।

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