Saturday, July 4, 2026
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वक्त से दिन और रात…

1980 के दशक में जब बी आर चोपड़ा निर्देशित महाभारत का मेगा सीरियल दूरदर्शन पर दिखाया जाता था, तो उसका पहला संवाद होता था- “मैं समय हूँ…” इंसान समय के चक्र में अपना पूरा जीवन बिता देता है। वक्त का ज्ञान हर इंसान के लिए इतना ज़रूरी होता है कि वह अपनी कलाई पर घड़ी बाँध कर रखता है। आजकल तो स्मार्ट वॉच और स्मार्ट फ़ोन भी इंसान को सही वक्त की सूचना दे देते हैं। और इंसान जब चाहे, इन यंत्रों पर अलार्म भी लगा लेता है, ताकि समय रहते सावधान रहे।

बीबीसी हिंदी की एक रिपोर्ट में ममता गुप्ता और महबूब ख़ान लिखते हैं कि, “घड़ी की मिनट वाली सुई का आविष्कार वर्ष 1577 में स्विट्ज़रलैंड के जॉस बर्गी ने अपने एक खगोलशास्त्री मित्र के लिए किया। उनसे पहले जर्मनी के न्यूरमबर्ग शहर में पीटर हेनलेन ने ऐसी घड़ी बना ली थी, जिसे एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सके, लेकिन जिस तरह हम आज हाथ में घड़ी पहनते हैं, वैसी पहली घड़ी पहनने वाले व्यक्ति थे जाने-माने फ़्राँसीसी गणितज्ञ और दार्शनिक ब्लेज़ पास्कल। ये वही ब्लेज़ पास्कल हैं, जिन्हें कैलकुलेटर का आविष्कारक भी माना जाता है। लगभग 1650 के आसपास लोग घड़ी जेब में रखकर घूमते थे। ब्लेज़ पास्कल ने एक रस्सी से इस घड़ी को कलाई में बाँध लिया, ताकि वे काम करते समय घड़ी देख सकें। उनके कई साथियों ने उनका मज़ाक भी उड़ाया, लेकिन आज हम सब हाथ में घड़ी पहनते हैं।

प्रथम विश्व युद्ध से पहले जेब घड़ी लोकप्रिय थी। कलाई पर बाँधने वाली घड़ी केवल अमीर लोगों का चोंचला थी। आम आदमी की पहुँच से कलाई घड़ी बहुत दूर की वस्तु थी। प्रथम विश्व युद्ध में ब्रिटेन ने अपने सैनिकों के लिए कलाई पर पहनने वाली घड़ियाँ बनवाईं, ताकि उन्हें युद्ध के दौरान जेब से घड़ी निकालने में समय व्यर्थ न करना पड़े।

हम सबको घड़ी देखने की इतनी आदत हो चुकी है कि हमें घड़ी के काँटे (सुइयाँ) एक ख़ास दिशा में चलते हुए देखकर कोई हैरानी नहीं होती। हम यह मानकर चलते हैं कि घड़ी की सुइयाँ  बाएँ से दाएँ  ही चलेंगी। हमने कभी यह सोचा ही नहीं कि घड़ी की सुइयाँ इस दिशा में क्यों चलती हैं। दरअसल इंसान का दिमाग़ ऐसी बातें सोचता ही नहीं… बस उसे कुछ काम करने की आदत-सी पड़ जाती है।

मगर जब भी कोई व्यक्ति या समूह तयशुदा प्रणाली के विरुद्ध कुछ करता है, तो हमें हैरानी भी होती है और हम उसे दिमाग़ी तौर पर खिसका हुआ भी मानने लगते हैं। वैसे ऐसे ही लोग जीनियस भी बन जाते हैं। अंग्रेज़ी के व्यंग्यकार जोनाथन स्विफ़्ट के अनुसार- “एक पागल और जीनियस में बहुत सूक्ष्म-सा अंतर होता है।” इसीलिए कहा जाता है कि हमें जजमेंटल नहीं होना चाहिए।

बात हो रही है समय की और घड़ी की… भारत के झारखंड राज्य में कोरबा के निकट कुछ गाँव हैं, जहाँ के निवासी परंपरागत घड़ी को सही नहीं मानते। उनके क्षेत्र में घड़ी के कांटे दाएँ से बाएँ न चलकर बाएँ से दाएँ की ओर चलते हैं। इस समाज को गोंड समाज के नाम से जाना जाता है। इन लोगों के लिए वे तमाम चीज़ें वर्जित हैं, जो दूसरे समुदायों में सामान्य समझी जाती हैं। आदिवासी शक्ति पीठ से जुड़े गोंड आदिवासी समुदाय के लोगों के जीवन जीने के अपने ही नियम हैं। उल्टी दिशा की घड़ी के इस्तेमाल को लेकर आदिवासियों ने बताया कि उनकी ही घड़ी सही दिशा में चलती है। समुदाय ने अपनी घड़ी का नाम “गोंडवाना टाइम” रखा है।

गोंड समाज इस मामले में वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक तर्क देते हैं कि उनकी घड़ी उल्टी नहीं है। उनके अनुसार उनकी घड़ी प्राकृतिक दिशा में चलती है। उनका दावा है कि यदि हम प्रकृति का नियम समझने का प्रयास करें तो ब्रह्मांड में अधिकांश चीज़ें एंटी-क्लॉकवाइज़ दिशा में घूमती हैं। पृथ्वी अपनी धुरी पर पश्चिम से पूर्व (एंटी-क्लॉकवाइज़) दिशा में घूमती है। चंद्रमा पृथ्वी के चारों ओर एवं पृथ्वी सूर्य के चारों ओर एंटी-क्लॉकवाइज़ दिशा में चक्कर लगाते हैं।

गोंड समुदाय के लोग जीवन-चक्र का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि खेत जोतते समय बैल का घूमना, कुएँ से पानी निकालते समय रहट का घूमना और सबसे महत्वपूर्ण, विवाह में फेरे भी इसी दिशा में लिए जाते हैं। पेड़ पर बेल के लिपटने की दिशा भी प्राकृतिक रूप से दाहिने से बाएँ, यानी कि एंटी-क्लॉकवाइज़ होती है। सोचने की बात तो यह है कि तालाब में पड़ने वाला भँवर भी दाएँ से बाएँ  ही घूमता है।

गोंड लोग अपने आप को गोंडवाना लैंड का मूल निवासी मानते हैं। लाखों वर्ष पहले पृथ्वी की इक्वेटर रेखा के ऊपर के हिस्से को अंगारा लैंड और नीचे के हिस्से को गोंडवाना लैंड कहा जाता था। अंगारा लैंड में सूर्य और धरती की स्थिति कुछ ऐसी होती थी कि सूर्य की यात्रा क्लॉकवाइज़ दिशा में होती थी, मगर गोंडवाना लैंड में यह एंटी-क्लॉकवाइज़ दिशा में होती थी। राजनीतिक तौर पर अपने आप को गोंडवाना लैंड का मूल निवासी बताने के कारण वे अपनी घड़ी की सुइयों को एंटी-क्लॉकवाइज़ दिशा में चलाते हैं।

इस क्षेत्र में गोंड समुदाय के लोगों के अलावा गोंडवाना घड़ी को अन्य 29 समुदायों के लोगों ने भी मान्यता दे रखी है। आदिवासियों का कहना है कि प्रकृति का चक्र जिस दिशा में चलता है, उसी दिशा में उनकी घड़ी चलती है। आदिवासी समुदाय के ये लोग महुआ, परसा और अन्य पेड़ों की पूजा करते हैं। छत्तीसगढ़ के इस इलाके में करीब दस हजार परिवार रहते हैं। ये सभी लोग उल्टी घड़ी का पालन करते हैं। मुख्य शहर से 60 किलोमीटर दूर मानिकपुर गाँव में लोग अलग तरह से सोचते हैं।

श्री मरपच्ची ने इस विषय पर गहरा शोध किया है। मरपच्ची स्वयं बताते हैं कि “इसके लिए उन्होंने गहरा शोध किया। प्रकृति के नियमों को सूक्ष्मता से जाँचने के बाद यह निष्कर्ष निकाला गया कि प्रकृति की दिशा वास्तव में ‘दाएँ से बाएँ’ है, न कि ‘अंग्रेज़ी घड़ी की दिशा’ के मुताबिक। इसलिए उन्होंने सन् 2000 में एक ऐसी घड़ी का आविष्कार किया, जिसकी सुइयाँ  दाएँ से बाएँ घूमती हैं, जो प्रकृति की सही दिशा मानी जाती है।”

अपनी बात जारी रखते हुए वे कहते हैं, “आज इस घड़ी की ख्याति पूरे देश में फैल चुकी है। देश के 18 राज्यों में इस घड़ी का इस्तेमाल हो रहा है… आदिवासी वर्ग के अधिकतर लोग अब इसी घड़ी का इस्तेमाल करते हैं। बाकी लोग भी लगातार इस घड़ी के बारे में पूछते हैं… मैं उन्हें यह घड़ी उपहार भी देता हूँ ।  जिस घड़ी का उपयोग दुनिया करती है… जो बाएँ से दाएँ चलती है, वह प्रकृति के दिशा से उल्टी है। इस हिसाब से हमारे लिए वह घड़ी उल्टी है, जबकि हमारे द्वारा बनाई यह घड़ी, जो दाएँ से बाएँ की ओर सफर करती है, सही मानी जाती है। वास्तव में यही सीधी और सही दिशा है, जो प्रकृति की दिशा भी है। ”

मरपच्ची का कहना है कि इस घड़ी का नामकरण वे “गोंडवाना बेरा” करवाना चाहते हैं, क्योंकि दुनिया के पाँचों महाद्वीपों में सबसे पहले गोंडवाना लैंड का ही जिक्र आता है | देश गोंडवाना धरती पर ही बसा हुआ माना जाता है, इसलिए इस घड़ी का नाम शाश्वत पुरातन परंपरा से जुड़ा होना चाहिए। इसी कारण इसका नामकरण “गोंडवाना बेरा” करने का प्रस्ताव रखा गया है। इसके पेटेंट करवाने की प्रक्रिया भी जारी है। वर्तमान में इस घड़ी को छत्तीसगढ़ बेरा, गोंडवाना टाइम, गोंडवाना समय आदि नामों से जाना जाता है। आदिवासी समाज से आने वाले लोगों में यह घड़ी काफ़ी लोकप्रिय है। ज़िले के आदिवासी इसका उपयोग कर रहे हैं।

यह भी सच है कि घड़ी समेत तमाम मॉडर्न आविष्कार यूरोप, अमरीका, ब्रिटेन और जापान में हुए हैं। ये तमाम देश उत्तरी गोलार्ध में स्थित हैं। यदि घड़ी का आविष्कार दक्षिणी गोलार्ध के किसी देश में हुआ होता तो घड़ी शुरू से ही बाएं से दाएं की ओर चलती दिखाई देती।

साहिर लुधियानवी ने लिखा है- “आदमी को चाहिए वक़्त से डर कर रहे / कौन जाने किस घड़ी वक़्त का बदले मिज़ाज।” घड़ी की सुइयाँ चाहे दाएँ से बाएँ चलें या फिर बाएँ से दाएँ, वक़्त अपनी चाल पर कायम रहता है। सच तो यह है कि पहले घड़ी में समय देखा जाता था और आज पढ़ा जाता है। किसी ने कहा है- “जैसे-जैसे मेरे ज्ञान में वृद्धि होती है, मुझे अपने ज्ञान की सीमा का आभास होता रहता है।”

तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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46 टिप्पणी

  1. मेरे लिए नई जानकारी -आत्मीय आभार आपका और साधुवाद
    हर बार अचंभित हो जाती हूँ

  2. संपादक महोदय ! आपका बहुत-बहुत आभार एक नई जानकारी से जोड़ने के लिए।
    आपके संपादकीय को पढ़कर मैं भी सोचने लगा कि बात तो सही है। गोंडवाना टाइम वाकई प्राकृतिक समय है। एंटी क्लाकवाइज ही दरअसल प्राकृतिक चक्रीय गति है।
    पहली बार संपादकीय के अतिरिक्त साक्षात्कार, लघु कथा और कविताएं भी पढ़ पाया। पुरवाई पत्रिका के संपादन का नैरंतर्य उसके पाठकों को तरोताजा रख रहा है। आपकी जय हो। ईश्वर आपको शक्ति और ऊर्जा से सदा लैस रखें और आपकी सृजनात्मकता अग्रगमन करती रहे।

  3. गोंडवाना की इस उल्टी घड़ी से हम अनभिज्ञ थे। यह संपादकीय पढ़कर सच में ऐसी वास्तविकताओं पर ध्यान गया जिनके बारे में सोचना तो दूर हमने जिनको कभी नोटिस भी नहीं किया था। बेल के चढ़ने की दिशा, पानी में पड़ते भंवर की दिशा इत्यादि यह स्पष्ट करते हैं कि प्रकृति भी एक set pattern पर चलती है । किन्तु इस सम्पादकीय में यह बात स्पष्ट नहीं हुई कि घड़ी की दिशा में परिवर्तन से क्या समय में भी परिवर्तन आ जाता है अथवा यह महज़ दिशा परिवर्तन है !
    जानकारियों से भरपूर आज का सम्पादकीय रुचिकर लगा; साधुवाद!

    • रचना, हमारे आसापास ऐसी बहुत सी चीज़ें हैं जिनसे हम अनभिज्ञ होते हैं। पुरवाई पत्रिका का प्रयास रहता है कि ऐसे सत्य उजागर करती रहे। आपका स्नेह और समर्थन हमारे लिये अमूल्य है।

  4. ये गोंडवाना टाइम्स तो वाकई ग़ज़ब की जानकारी है और तारीफ़ ये कि उनके तर्कों को भी आप ग़लत नहीं ठहरा सकते हैं और ऐसे में क्या ही किया जाए उस टाइम और घड़ी का जिससे हम चल रहे हैं? ये ऐसा यक्ष प्रश्न है जिसका जवाब दे तो मरे और न दे तो भी मरे.. लेकिन इसका कारण ये है कि हम लोग western world जो कहता है उसे ही मानते हैं, एक उदाहरण ले सकते हैं कि योग जब तक था तब तक बस था लेकिन जैसे ही वो योगा बन गया वो महान हो गया, बहरहाल इस नई जानकारी का शुक्रिया

  5. पाठक की उत्सुकता को आरंभ से ही आकर्षित करने वाला आपका ये संपादकीय वैचारिक व ऐतिहासिक दृष्टि से उल्लेखनीय है। संस्कृति और समय के संबंधों को नवीन दृष्टि प्रदान करने वाला यह ज्ञानवर्धक लेख,
    जिसमें आदिवासी समाज की सांस्कृतिक चेतना और प्रकृति पर आधारित दृष्टिकोण को प्रस्तुत किया गया है, इसके माध्यम से गोंड समुदाय द्वारा घड़ी की दिशा को प्राकृतिक दिशा मानकर उससे संदर्भित विभिन्न उदाहरण जैसे पृथ्वी की गति, रहट, विवाह के समय लिए जाने वाले फेरे,बेल और भंवर का उदाहरण अत्यंत प्रासंगिक और चिंतन की गहनता को उद्वेलित करने की प्रेरणा प्रदान करता है। इस लेख के माध्यम से यह स्पष्ट होता है की मुख्य धारा का समाज जिसे उल्टा मानता है वह गोंड समुदाय व किसी भी अन्य सांस्कृतिक समुदाय के लिए कितना तर्कसंगत, स्वाभाविक और वैज्ञानिक सिद्ध होता है। परंपरा, समय और आधुनिकता के अंतर्संबंध की प्रस्तुति रोचक है।
    इस प्रकार आपका यह संपादकीय महत्वपूर्ण और ज्ञानवर्धक होने के साथ ही साथ लीक से हटकर और स्थापित सत्य की सीमाओं को लांघकर नए दृष्टिकोण खोजने की चुनौती भी देता है।
    शुभकामनाएँ।

    • ऋतु जी, आपकी टिप्पणी हमारे प्रयासों को उत्साहित करती है। स्नेह बनाए रखें। हार्दिक आभार।

  6. वाह बहुत ही अद्भुत समय की जानकारी …कोरबा की यह बात नहीं ज्ञात थी बहुत ही आभार तेजेन्द्र जी बहुत मेहनत करते हैं एक संपादकीय बनाने में वाह बहुत ही धन्यवाद और स्नेह..

  7. पुरवाई के इस अंक में
    “वक्त से दिन और रात “
    शीर्षक सम्पादकीय के लिए प्रतिष्ठित कथाकार / सम्पादक श्री तेजेंद्र शर्मा जी को बहुत बधाई ।
    रोज़मर्रा के सामान्य लगने वाले विषयों को आप विचारों के टकसाल में डाल कर सोच का नया आकार प्रदान कर देते हैं । यह आपके व्यक्तित्व का कमाल है ।
    काल बोधक – चक्र में जीवन की गति – प्रगति को महाभारत सीरियल से संदर्भित कर प्राचीन और अर्वाचीन आविष्कारों की वैज्ञानिक शृंखला को क्रमशः विश्लेषित किया गया है । घड़ी की गति और दिशा सूचक विचार सराहनीय –
    “यदि घड़ी का आविष्कार दक्षिणी गोलार्ध के किसी देश में हुआ होता तो घड़ी शुरू से ही बाएं से दाएं की ओर चलती दिखाई देती।”
    अंक में कविताएँ, लेख आदि भी उत्कृष्ट और पठनीय हैं ।
    बहुत बधाई ।
    —-
    मीनकेतन प्रधान ,
    भारत

    • भाई मीनकेतन जी, आप अपनी व्यस्तता के बावजूद पुरवाई पत्रिका को समय दे पाते हैं, हम आपके हृदय से आभारी हैं।

  8. आदरणीय तेजेन्द्र शर्मा जी ने घड़ी संबंधी बहुत गहरी और नवीन जानकारी दी। घड़ी के इन अनछुए पहलुओं से परिचित होने के साथ – साथ गोंडवाना घड़ी के माध्यम से मूल प्रकृति को भी समझा।
    हाथ पर घड़ी के प्रयोग को भी जाना।

    हमेशा की तरह तेजेन्द्र जी के संपादकीय में ज्ञानवर्धक जानकारी निहित है।
    बहुत धन्यवाद
    पद्मा शर्मा

  9. आदरणीय भाई,
    सादर प्रणाम।
    एक बार पुन: आपका संपादकीय चौंका गया।आपकी सूक्ष्म दृष्टि नवीनतम शोध के उन बिंदुओं तक जा पहुंचती है जहां हमारी सोच मौन हो जाती है।जीवन के आरंभ से लेकर अंत तक यह समय चक्र हमारे साथ साथ चलता रहता है। समय अर्थात आज की घड़ी की बात जो एक अनिवार्य आवश्यक आवश्यकता है।घड़ी की घूमती सुईयों के साथ घूमती है हमारी जिंदगी भी।पर प्राकृतिक सूर्यघडी से आज हाथों में बांधने वाली घड़ी की कहानी भी रोचक ज्ञानवर्धक और चमत्कृत करने वाली है।जैसा कि अपने संपादकीय में आपने ” गोंडवाना ” घड़ी के बारे में बताया कि उसकी सुईयां दांयें से बांये अर्थात वर्तमान घड़ी के विपरीत घूमती हैं।यह झारखंड के आदिवासियों की प्रचलित परंपरागत घड़ी है जो सर्वमान्य है यहां के गोंडवाना समुदाय में।मैने भी सुना था पर उस समय इस बात का विश्वास नहीं हुआ था।आज संपादकीय में चर्चा हुई तो सत्यता की जानकारी मिली।आप हमेशा एक सर्वथा नवीन संदर्भ ले आते हैं संपादकीय में,और हम.ज्ञान पिपासा बन एक श्रेष्ठ छात्र की तरह बहुत कुछ सीखते रहते हैं।
    आपने जैसा कि अपने संपादकीय में लिखा है –”
    गोंड समुदाय के लोग जीवन-चक्र का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि खेत जोतते समय बैल का घूमना, कुएँ से पानी निकालते समय रहट का घूमना और सबसे महत्वपूर्ण, विवाह में फेरे भी इसी दिशा में लिए जाते हैं। पेड़ पर बेल के लिपटने की दिशा भी प्राकृतिक रूप से दाहिने से बाएँ, यानी कि एंटी-क्लॉकवाइज़ होती है। सोचने की बात तो यह है कि तालाब में पड़ने वाला भँवर भी दाएँ से बाएँ ही घूमता है।”
    बहुत ही सुंदर सार्थक जानकारी प्रदान करता आपका संपादकीय मेरे लिए तो एक शिक्षक की तरह है।बहुत बहुत बधाई हो भाई आपको।अशेष आभार।
    पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर

    • प्रिय पद्मा, तुमने लिखा है कि – आप हमेशा एक सर्वथा नवीन संदर्भ ले आते हैं संपादकीय में,और हम ज्ञान पिपासा बन एक श्रेष्ठ छात्र की तरह बहुत कुछ सीखते रहते हैं। – यह तो पुरवाई के लिये अत्यंत संतोष की बात है। हार्दिक धन्यवाद।

  10. नए सुंदर संपादकीय के लिए बधाई।

    मैं तो ऑस्ट्रेलिया में रहता हूं। हमारे लिए धरती एंटीक्लॉक वाइज़ घूमती है। मैं गोंडवाना समय का समर्थन करता हूं।

    जानता हूं, सचमुच यह अनिवार्य हो गया तो ज्यादा तकलीफ मुझे ही होगी। दिल से ऐसा नहीं चाहूंगा , पर आप तो जानते हैं हर भारतीय आधा पॉलिटीशियन होता है।

  11. हमेशा की तरह इस बार का सम्पादकीय भी जरा हटके है. आमतौर पर घड़ी के बारे में लोग इतना नहीं सोच पाते जितना आपने लिख दिया है. इसे पढ़कर मैं अभी भी बाएं – दाएं तथा दाएं – बाएं के फेर में अटका हूँ. हाथ घड़ी का प्रयोग अब नहीं करता लेकिन दीवार पर टंगी घड़ी को दो बार गौर से देखा. उनकी सुइयों और चलने की दिशा पर गौर किया. फिर अचरज हुआ कि गोंड समाज के लोग भला ऐसे कैसे देश दुनिया के विपरित घड़ी का प्रयोग करते हैं और उसे तर्क के साथ सिद्ध भी करते हैं कि उनकी घड़ी सही है. संक्षेप में कहें तो इस बार का सम्पादकीय भी ज्ञानवर्धक है. एक नई जानकारी मिली. अब जब कभी गोंड समाज से मिलने का मौका मिलेगा तो निश्चित रूप से उनकी गोंडवाना घड़ी देखने की लालसा बनी रहेगी.
    इस महत्वपूर्ण जानकारी के लिए भाई तेजेंद्र जी को साधुवाद. शुभकामनाओं सहित.

    डॉ. रमेश यादव, मुंबई.

    • प्रिय भाई रमेश जी, आपने कहा है कि – संक्षेप में कहें तो इस बार का सम्पादकीय भी ज्ञानवर्धक है. एक नई जानकारी मिली. अब जब कभी गोंड समाज से मिलने का मौका मिलेगा तो निश्चित रूप से उनकी गोंडवाना घड़ी देखने की लालसा बनी रहेगी – यह इस संपादकीय की उपलब्धि है।

  12. बहुत बढ़िया संपादकीय, मेरे लिए एकदम से नई जानकारी। घड़ी, कहीं उलटी दिशा में भी चलती है, ये मेरे लिए अजूबा है। हर सप्ताह कुछ न कुछ नई जानकारी से अवगत कराने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद , नमस्कार

  13. कमाल का संपादकीय रोचकता तथ्यों और जानकारी से भरपूर ।पुनः चमत्कृत हुआ। इस गोंडवाना समय को तो कम से कम देश में स्वीकृति और अपनापन मिलना ही चाहिए ।
    बहुत बहुत बधाई
    घड़ी के बारे में समय के बारे में काल के बारे में इस पल सोच रहा हूँ ।

  14. नई -नई जानकारियों से लबरेज़ संपादकीय एक अहम विषय पर केंद्रित किया गया है।गोंडवाना घड़ी का उल्टा मान्य चलना और पाठकों को उसे अजीबो गरीब न दिखाने हेतु कई ऐसे उदाहरण प्रस्तुत करना जो प्रकृति जन्य ही हैं यथा वायु भंवर।
    समय,घड़ी और प्रकृति के अद्भुत तारतम्य बिठा कर एक रोचकता,कौतूहलता,वैज्ञानिकता के साथ साहित्य संस्कृति की आभा से परिपूर्ण संपादकीय कैसे लिखे जाते हैं! यह नज़ीर है एक अमृत वर्ष के पार गए भारतीय आत्मा के साहित्यकार की,,,जिस से वे व्यक्ति वे संस्थान और विशेष रूप से साहित्य अकादमी सरीखे संस्थान जो प्रवासी की बीन पर मस्त और व्यस्त हैं। ऐसे संस्थानों को एक न एक दिन ,चाटुकारिता के चाशनी वाले निजामी और सियासी बंदों को मना करना होगा ताकि भारतीय संस्कृति वैश्विक स्तर पर साँस लेकर कह सके कि हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के समूचे विश्व के साहित्यकार उनके ही हैं।
    खैर बात संपादकीय की,,,,गणितीय समीकृत सा सहज और औचित्य पूर्ण संपादकीय लिखने हेतु
    आदरणीय संपादक को एक मुस्कुराहट भरा साधुवाद तो बनता ही बनता है।

    • प्रिय भाई सूर्य कांत जी, आपकी स्नेह से ओतप्रोत टिप्पणी ने दिल को भीतर तक छू लिया। आपको धन्यवाद या आभार कहने के लिए शब्द नहीं हैं।

  15. संपादकीय शीर्षक ‘वक्त से दिन और रात… ‘ समय बताने वाली घड़ी पर बहुत ही शोधपूर्ण एवं तथ्यात्मक संपादकीय लिखा गया है। तथ्यों में कुछ छूटा नहीं है। गोंडवाना घड़ी के आविष्कार को इसमें जोड़कर ज्ञानवर्धक बना दिया गया है।
    वर्तमान में हम आविष्कारों के युग में जी रहे हैं। जीवन के हर क्षेत्र में इन्हीं का बोलबाला है। हम इन्हें सीधे तो ग्रहण कर लेते हैं पर उसकी रचनात्मकता पर कम ध्यान दे पाते हैं । साधारणतया लोग आविष्कारों पर मीन-मेख नहीं निकालते । ये आविष्कार इतने उपयोगी और जीनियस होते हैं कि हमारी दिनचर्या में स्वाभाविक रूप से आत्मसात हो जाते हैं। जहां मान लिया जाता है कि ये आप्त आविष्कार हैं। इन पर तर्क करना समय और ऊर्जा की बरबादी है। जबकि आविष्कार कभी आप्त नहीं होते हैं। ये निरंतर शोधे जाते रहते हैं।
    जिस घड़ी को हम हाथ में पहनते हैं, वह एंटीक्लॉकवाइज चलती है। क्यों चलती है, इस पर कभी ध्यान ही नहीं दिया है। यदि इस संपादकीय को न पढ़ा होता तो कभी ध्यान ही न देते। हम तो यह भी न जान पाते कि झारखंड के गोंडवाना क्षेत्र के आदिवासी बाएं से दाएं चलने वाली सुइयों वाली घड़ी पहनते हैं। यह उनका अपना आविष्कार है और उनकी मान्यता प्रकृति के कार्य व्यापार के अनुरूप है।
    मैं इस तरह की चीजों पर कम सोचता हूं। रात में टिमटिमाते आकाश के तारों को देख लेता हूं और उनके बारे में सोचता रहता हूं। तह तक नहीं जाता हूं।
    जीनियस की जिस परिभाषा को आपने कोट किया है, उससे पूर्णतया सहमत हूं। इस तरह की बातें या तो जीनियस सोचता है या पागल।
    प्रश्न करना और उनके उत्तर तलाशना जीनियस लोगों का स्वभाव होता है। साधारण सी दिखने वाली चीजों को, जो कि अपने मूल में असाधारण होती हैं, उनको रचना में ढाल देना बिना प्रतिभा के संभव नहीं हो सकता है।
    आदरणीय सर, आपके इस संपादकीय ने सचमुच लोहा मनवा लिया । बहुत-बहुत बधाई आपको सर

    • भाई लखन लाल पाल जी, लगता है जैसे यह टिप्पणी लिखते समय आपका उद्देश्य मेरी ऑंखों में गीलापन लाना था। इतना स्नेह और समर्थन संभाल पाना आसान नहीं होता। बस स्नेह बनाए रखें।

  16. जितेन्द्र भाई; सदा की तरह आपका इस सप्ताह का सम्पादकीय भी बहुत ही ज्ञानवर्धक और रुचिकर है। बात “मैं समय हूँ” से शुरू करके इसे आप कहाँ की कहाँ ले गए। बहुत बहुत साधुवाद। न जाने मैं ने अपने ही घर में अपनी पीठ पीछे दीवार पर लगी हुई घड़ी को सामने वाली दीवार पर लगे शीशे में कितनी बार देखा होगा। आज आपका सम्पादकीय पढ़ने के बाद उसी कुर्सी पर बैठ के उसी शीशे में उसी घड़ी को जब देखा तो मुझे ऐसा लगा जैसे गोंडवाना घड़ी समय दिखा रही हो। आपका लेख पढ़कर घड़ी की शीशे में परछाई देखी तो उसको देखने का नज़रिया कुछ और ही था। और इस बदलते हुए नज़रिए को श्री मरपच्ची ने साबित भी कर दिया कि आदिवासीयों की सोच में दम हैं।

    वैसे आदिवासीयों की सोच, समझ, रहन सहन और बातों का हम केवल मज़ाक ही नहीं उड़ाते बल्कि उन्हें सब तरह से इगनोर भी करते हैं। आज पता चला कि बाएं से दाएं का चक्कर ग़लत है। एक बार फिर, आपको हर सप्ताह नए नए और अनोखे विषय साझा करने के लिए दिल से बहुत बहुत ससाधुवाद।

    • विजय भाई संपादकीय ने आपके भीतर के बालक को शीशे में घड़ी देखने के लिए प्रेरित किया… जानकर प्रसन्नता हुई। आदिवासी समाज के बारे में आपकी टिप्पणी बेहतरीन है।

  17. आपका संपादकीय हमेशा नयी जानकारी लेकर आता है. मेरे जैसे अनेक लोग इससे समृद्ध होते हैं और प्रसन्नता का अनुभव करते हैं. यह मेरे लिए सर्वथा नयी जानकारी है. बहुत आभार.

  18. आदरणीय तेजेन्द्र जी!

    संपादकीय का प्रारंभ हमेशा की तरह रोचक और वस्तुनिष्ठ रहा। यह संपादकीय की विशेषता सदैव से देखी, जब से पुरवाई का संपादकीय पढ़ना शुरू किया।

    बहुत लंबे समय के बाद महाभारत के समय की आवाज संपादकीय के माध्यम से स्मृतियों में मुखरित हुई और उस धीर- गंभीर आवाज के साथ हमारा बहुत प्रिय गाना “वक्त के दिन और रात” भी याद आया। वक्त का महत्व देखते हुए घड़ी का इतिहास संपादकीय के माध्यम से पता चला।

    आज आपके संपादकीय के द्वारा घड़ी के जन्म का इतिहास विधिवत पता चला। सामान्य और जीनियस व्यक्ति में यही अंतर है कि वैज्ञानिक व तथ्यात्मक धरातल तक सामान्य आदमी की सोच नहीं पहुँच पाती।

    चक्रवात या साइक्लोन, नदी में उठने वाली भँवर, यहाँ तक की प्रकृति प्रदत्त लताएँ भी दाएँ से बाएं ओर फैलती हैं,पर‌ किसी का ध्यान इस ओर गया ही नहीं। एक नियम की तरह सब होता रहा।

    उल्टी घड़ी की जानकारी हमें तो काफी पहले से थी। पर कारण नहीं पता था। घड़ी समय सही देती है बस उसका चक्र उल्टा रहता है। लेकिन शेष जानकारी आपके संपादकीय से मिली।

    मरपच्ची संभवतः इसलिए इसका नाम ‘गोंडवाना बेरा’ रखना चाह रहे हैं क्योंकि यह गोंडवाना क्षेत्र से प्रचलित हुई है और छत्तीसगढ़ में ‘बेरा’ का अर्थ समय होता है। उनके हिसाब से गोंडवाना समय ठीक रहेगा, ऐसा उन्हें लगता होगा।

    यह बात आपने सोलह आने सच कही है कि जब भी कोई इंसान या व्यक्तियों का समूह प्रणाली के विरुद्ध कुछ करता है तो सभी को हैरानी होती है और दिमागी तौर पर इसे स्वीकार करना मुश्किल होता है।

    पढ़ कर अच्छा लगा कि “अंग्रेजी के व्यंग्यकार जोनाथन स्विफ़्ट के अनुसार, “एक पागल और जीनियस में बहुत सूक्ष्म अंतर होता है, इसीलिए कहा जाता है कि हमें जजमेंटल नहीं होना चाहिये।” कुछ सूत्र वाक्य और भी है इसमें समय को लेकर जो बहुत-बहुत पसंद आए।

    यह पढ़ते हुए चेहरे पर मुस्कान उभर आई कि – प्रथम विश्व युद्ध के समय प्रथम विश्व युद्ध से पहले जब घड़ी लोकप्रिय थी *कलाई पर बांधने वाली घड़ी केवल अमीर लोगों का चोंचला थी।*

    संपादकीय धीरे-धीरे ज्ञान के राह पर साप्ताहिक रूप से ही सही, हाथ पकड़ कर, लेकर चल रहा है। वह बात अलग है कि उसका सिरा कभी नहीं आएगा। क्योंकि ज्ञान असीम है। साप्ताहिक रूप से ही सही एक न एक विशेष विषय से रूबरू होते हैं।

    एक बार फिर इस विशिष्ट जानकारी से अवगत कराने के लिये आपका तहे-दिल से शुक्रिया।

    • आदरणीय नीलिमा जी आपने संपादकीय के तमाम पहलुओं पर नज़र डालते हुए सार्थक टिप्पणी की है। आपने सच कहा है कि ज्ञान असीम है… मगर मेरे ज्ञान की तो सीमा है ही।

  19. हमेशा की तरह बेहतरीन संपादकीय समय का चक्र कब किधर घूम जाए कुछ नहीं पता
    अंत में साहिर लुधियानवी जी की बात बहुत अच्छी लगी

  20. संपाद्क
    पुरवाई
    नमस्कार

    आपने समय और घड़ी के बारे में जो विस्तृत जानकारी दी है, वह अद्भुत है । क्लॉक, अनक्लॉक रुप में भी चल सकती है, ये बात पहली बार पता चली ।

    जो समय की कद्र नहीं करते, समय उनकी कद्र नहीं करता, हर काम समय पर कर लेना चाहिए, और कबीर दास जी का अनमोल कथन, … काल करे सो आज कर, आज करे सो अब… वगैरह वगैरह, ये सब तो हम जन्म से ही सुनते आ रहे हैं । लेकिन …. लेकिन ….. लेकिन घड़ी और घड़ी हाथ में पहनने का इतिहास जो आपने समझाया है, वह अद्भुत है । अभिनंदन है आपका !

    समय की महत्ता समझने का ज्वलंत उदाहरण तो आप स्वयं हैं । वर्षों से हम देख रहे हैं, व्यस्ततम दिनचर्या होने के बावजूद, हर रविवार को, अनूठी जानकारी से भरे संपाद्कीय के साथ, पुरवाई हमारे समक्ष होती है । ऐसा नहीं है कि सिर्फ संपाद्कीय ही लिखना है, या पुरवाई का ही कार्य देखना है । रेलवे की नौकरी है, साहित्य सृजन है, सामाजिक कार्य हैं, यहाँ तक कि स्वयं का स्वास्थ्य भी ठीक न होने पर भी किसी भी कार्य में कोई रुकावट नहीं । यह, कार्य के लिये सच्चे समर्पण, सच्ची लगन और समय बद्धता का प्रतीक है । नमन है आपको ।

    इन सभी सफलताओं का गूड रहस्य है, समय का ध्यान रखना । फिर ये तो हमको याद ही है, दो पल के ठहर जाने से दूर हो गईं मंजिलें….

    घड़ी का बाएँ से दाएं चलना और गोंडवाना के स्थानीय लोगों का तर्कसंगत तर्क, आज के संपाद्कीय के द्वारा ही पता चला है ।

    सच है ! जितनी हमारे ज्ञान में वृद्धि करते हैं, उतनी ही हमें, हमारे सीमित ज्ञान के बारे में पता चलता है ।

    बहुत-बहुत धन्यवाद l

    उषा साहू,
    मुंबई

    • आदरणीय उषा जी, इस सार्थक एवं सारगर्भित टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद।

  21. हमेशा की तरह ज्ञानवर्द्धक एवं अचम्भित कर देने वाला सम्पादकीय।घड़ी के पूरे इतिहास के साथ बाएँ से दाएँ की ओर चलने वाली घड़ी की के बारे में पहली बार जाना है।आपका समर्पण, सोच, शोध और तथ्यों के साथ, रोचक ढंग से विषय की जानकारी देने की कला को नमन। सप्ताहांत आपके सम्पादकीय की प्रतीक्षा और उत्सुकता बनी रहती है। हमारे ज्ञान में वृद्धि करने के लिए साधुवाद तेजेन्द्र जी।

    • सुदर्शन जी किसी भी संपादक के लिए यह जानकारी अद्भुत संतुष्टि देती है कि प्रबुद्ध पाठक भी उसके संपादकीय की प्रतीक्षा करते हैं।

  22. सादर नमस्कार सर…
    अद्भुत जानकारी के साथ यह संपादकीय पाठकों के लिए महत्वपूर्ण बन जाता है और नवीन स्वर धारण करता है। इस बारे में पहलीबार जान रही हूँ। समय तो वही है.. जो सदियों से था… हमारी स्थिति जब बदलती है.. हम समय को दोष देते हैं.. या उसकी प्रशंसा करते हैं…
    मैंने आजतक कभी घड़ी नहीं पहनी सर…. पर कभी विलम्ब नहीं हुई…. आजकल तो मोबाइल में time देख लेती हूँ यदि आवश्यकता हो तो….
    वाह्ह्ह बहुत ही सुंदर.. शोधपूर्ण संपादकीय…. साधुवाद सर…

    • आदरणीय अनिमा जी, आप संपादकीय के साथ स्नेह बनाए रखें। हार्दिक धन्यवाद।

  23. अद्भुत सूचना देता संपादकीय। हम सब भारत में रस्ते हैं पर हमें अपने देश के इस सच से अनभिज्ञ ने। जबकि अखबार और सोशल मीडिया के संपर्क में भी हैं ही पर फिर भी गोंडवाना घड़ी के बारे में आपके संपादकीय के माध्यम से ही पता चला। सबसे पहले गोंडवाना ही था
    यह तो जानकारी थी परंतु वहां की समय घड़ी एंटीक्लॉकवाइज चलती है , नई जानकारी के लिए धन्यवाद।

  24. आपने अपने संपादकीय में घड़ी के इतिहास के बारे में बताते हुए आज आपने अपने पाठकों को गोंडवाना घड़ी के बारे में बताते हुए नई जानकारी दी है। उदाहरण सहित आपने बताया है कि यदि हम प्रकृति का नियम समझने का प्रयास करें तो ब्रह्मांड में अधिकांश चीज़ें एंटी-क्लॉकवाइज़ दिशा में घूमती हैं। पृथ्वी अपनी धुरी पर पश्चिम से पूर्व दिशा में घूमती है। चंद्रमा पृथ्वी के चारों ओर एवं पृथ्वी सूर्य के चारों ओर एंटी-क्लॉकवाइज़ दिशा में चक्कर लगाती है।
    आपने गोंडवाना घड़ी का उदाहरण देते हुए यह भी बताया है कि खेत जोतते समय बैल का घूमना, कुएँ से पानी निकालते समय रहट का घूमना, विवाह में फेरे, यहाँ तक कि पेड़ पर बेल के लिपटने की दिशा भी प्राकृतिक रूप से दाहिने से बाएँ तथा तालाब में पड़ने वाला भँवर भी दाएँ से बाएँ अर्थात एंटी क्लोकवाइज होता ही है।

    हम सब यह देखते हैं लेकिन कोई व्यक्ति ही इनको देखकर किसी नई वस्तु का निर्माण कर पाता है। यह जानना भी महत्वपूर्ण है कि देश के 18 राज्यों में इस घड़ी को उपयोग में लाया जा रहा है।
    आपके हर संपादकीय से नई जानकारी मिलती है अतः इंतजार रहता है।
    साधुवाद आपको।

    • सुधा जी, आपने संपादकीय में ब्रह्मांड में प्रकृति के नियम को रेखांकित करते हुए सार्थक टिप्पणी की है। आपका हृदय से आभार।

  25. आदरणीय सर,
    सादर प्रणाम।
    ‘पुरवाई’ के इस अंक में ‘वक्त से दिन और रात…’ शीर्षक से लिखा गया आपका संपादकीय समसामयिक वैश्विक हलचलों के बीच एक बेहद विचारोत्तेजक, अत्यंत भावप्रवण और गहरी मानवीय संवेदना से ओतप्रोत विमर्श खड़ा करता है। हमेशा की तरह, इस बार भी आपकी पारखी और संवेदनशील दृष्टि दैनिक जीवन के उस सबसे सामान्य यंत्र ‘घड़ी’ पर गई है, जिसे हम सब यांत्रिक रूप से स्वीकार कर चुके हैं। इस आलेख के माध्यम से आपने स्थापित सामाजिक और वैश्विक प्रतिमानों को प्रकृति की अनमोल रीती के धरातल पर जिस आत्मीयता से परखा है, वह पाठकों के भीतर सोई हुई चेतना को जगाने और उनकी वैचारिक जड़ता को पूरी तरह तोड़ने के लिए पर्याप्त है।
    ​लेख के पूर्वार्ध में घड़ी के इतिहास और उसकी मनुष्य की कलाई तक पहुँचने की यात्रा को आपने अत्यंत सजीव और मर्मस्पर्शी रूप में चित्रित किया है। महान दार्शनिक ब्लेज़ पास्कल द्वारा काम की सहजता के लिए एक साधारण रस्सी से जेब घड़ी को अपनी कलाई पर बाँधने का प्रसंग हो, या प्रथम विश्व युद्ध के दारुण काल में ब्रिटिश सैनिकों की व्यावहारिक ज़रूरत के चलते कलाई घड़ी का जन-जन तक पहुँचना—यह पूरा विवरण आलेख को एक ठोस और जीवंत ऐतिहासिक आधार देता है। अंग्रेजी के कालजयी व्यंग्यकार जोनाथन स्विफ्ट के इस गहरे विचार को उद्धृत करना कि ‘एक पागल और जीनियस में बहुत सूक्ष्म सा अंतर होता है’, गद्य को एक गहन दार्शनिक और बौद्धिक ऊंचाई प्रदान करता है। यह प्रसंग पाठकों को लीक से हटकर सोचने वाले अनूठे लोगों के प्रति अधिक सहिष्णु, संवेदनशील और अनुदार न होने का एक मूक मगर बेहद सशक्त आग्रह करता है।
    ​पूरे आलेख का सबसे चमत्कृत कर देने वाला, अंतर्मन को छूने वाला और खोजी हिस्सा वह है, जहाँ आपकी लेखनी झारखंड और छत्तीसगढ़ के एकांत अंचलों में रचे-बसे गोंड समुदाय के ‘गोंडवाना टाइम’ (गोंडवाना बेरा) के शाश्वत सत्य को पूरी आत्मीयता से सामने लाती है। जिसे मुख्यधारा का तथाकथित आधुनिक समाज अपनी अज्ञानता में ‘उल्टी घड़ी’ या ‘दाएँ से बाएँ’ (एंटी-क्लॉकवाइज़) चलने वाली सुइयाँ कहकर अचंभित होता है या उपहास उड़ाता है, उसे आदिवासियों के सहज, अकाट्य और प्रकृति से जुड़े वैज्ञानिक तर्कों के माध्यम से आपने पूरी तरह न्यायसंगत और वंदनीय सिद्ध किया है।
    ​इस प्रसंग में आपकी भाषा की संवेदना तब अपने चरम पर पहुँचती है, जब आप आदिवासियों के जीवन-चक्र के सुंदर बिम्बों को गद्य में पिरोते हैं। पृथ्वी का अपनी धुरी पर पश्चिम से पूर्व की ओर मौन घूमना, चंद्रमा और सूर्य की अनंत परिक्रमाएँ, कुएँ से पानी खींचते रहट का पारंपरिक संगीत, खेतों को जोतते समय बैलों का घूमना, सावन में पेड़ों पर आलिंगनबद्ध होती कोमल बेलों की प्राकृतिक दिशा और यहाँ तक कि जल की अगाध छाती पर पड़ने वाले भँवर का दाएँ से बाएँ घूमना—इन अनुपम उदाहरणों के माध्यम से आपने यह सत्य स्थापित कर दिया है कि जिसे यह स्वार्थी दुनिया उल्टा समझकर उपेक्षा करती रही है, वास्तव में वही प्रकृति की सबसे सीधी, पवित्र और स्वाभाविक अनूठी दिशा है।
    ​इसके साथ ही, भौगोलिक और ऐतिहासिक आधार पर आपका यह सूक्ष्म विश्लेषण गद्य-शिल्प की एक अनूठी और अद्भुत उपलब्धि है कि यदि आधुनिक युग के ये यांत्रिक आविष्कार उत्तरी गोलार्ध के देशों के बजाय दक्षिणी गोलार्ध के जंगलों और वादियों में हुए होते, तो आज पूरी मानव सभ्यता की घड़ियाँ शुरू से ही इसी प्राकृतिक दिशा में चल रही होतीं। आदरणीय श्री मरपच्ची के वर्षों के एकांत शोध और सन् २००० में उनके द्वारा आविष्कृत इस प्रकृति-सम्मत घड़ी का देश के १८ राज्यों के आदिवासी आँगनों तक विस्तार पा जाना यह अकाट्य प्रमाण है कि यह केवल एक राजनीतिक अस्मिता या प्रतीक नहीं है, बल्कि इसके पीछे सदियों की संचित वैज्ञानिक चेतना और अपनी जड़ों के प्रति अगाध समर्पण छिपा है।
    ​अंतिम पंक्तियों में शायर साहिर लुधियानवी के गहरे शेर के साथ समय की निर्दयी और अपरिवर्तनीय सत्ता को रेखांकित करना आलेख को एक सुंदर और प्रभावी मोड़ देता है। सुइयों की दिशा चाहे जो हो, वक़्त अपनी बेधड़क, निरंकुश और रहस्यमयी चाल से चलता रहता है, मगर दुनिया के थोपे हुए कृत्रिम सत्यों के सामने आदिम संस्कृति और प्रकृति की इस शाश्वत, कोमल रीती को इतनी भावप्रवणता से एक सूत्र में पिरो देना ही इस पूरे लेखन की सबसे बड़ी विशिष्टता और सार्थकता है।

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