Wednesday, February 11, 2026
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दीपक गिरकर की कलम से – अश्विनीकुमार दुबे का व्यंग्य लेखन (विचार और विश्लेषण)

पुस्तक  : अश्विनीकुमार दुबे का व्यंग्य लेखन (विचार और विश्लेषण)
संपादक  : सूर्यकांत नागर
प्रकाशक  : अमरसत्य प्रकाशन, 109, ब्लॉक-बी, प्रीत विहार, दिल्ली – 110092
आईएसबीएन : 978-93-94469-80-8  
मूल्य   : 595/- रूपए
अमरसत्य प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तक “अश्विनीकुमार दुबे का व्यंग्य लेखन (विचार और विश्लेषण)” का संपादन वरिष्ठ साहित्यकार सूर्यकांत नागर ने किया है। यह पुस्तक साहित्यकारों, समीक्षकों, आलोचकों, शोधार्थियों, पाठकों के विवेक को समृद्ध करने वाली पुस्तक है। “अश्विनीकुमार दुबे का व्यंग्य लेखन (विचार और विश्लेषण)” पुस्तक में चौबीस समीक्षकों के समालोचनात्मक मानीखेज आलेख, एक संस्मरण और दो साक्षात्कार शामिल किए हैं जो अश्विनीकुमार दुबे के व्यंग्य लेखन को समग्रता से समझने के लिए नई रोशनी देते हैं। अश्विनी कुमार दुबे के अभी तक सोलह व्यंग्य संग्रह, सात उपन्यास, तीन कहानी संग्रह, शास्त्रीय संगीत पर एक पुस्तक, वैचारिक निबंध पर एक पुस्तक प्रकाशित हो चुके हैं। दुबे जी मूलत: कहानीकार एवं उपन्यासकार होने के बाद भी व्यंग्य लेखन में इनकी पकड़ मजबूत है। अश्विनीकुमार दुबे ने लिखे व्यंग्य संग्रह और व्यंग्य उपन्यास गत कुछ वर्षों में ही इतना अधिक चर्चित हुए कि साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में इनके व्यंग्य संग्रह और व्यंग्य उपन्यास की बहुत अधिक समीक्षाएँ और आलोचनाएँ प्रकाशित हुई।
सूर्यकांत नागर ने अपने प्राक्कथन में लिखा हैं – अश्विनीजी का साहित्य प्रतिरोध का साहित्य है। वे प्रतिबद्ध रचनाकार हैं। अनैतिकता का भंजन करने के लिए व्यंग्य का इस्तेमाल एक हथियार की तरह करते हैं। उनकी प्रतिबद्धता असंदिग्ध है। अधिकाँश समालोचकों और समीक्षकों के अनुसार दुबेजी की व्यंग्य रचनाएँ कथात्मक हैं। कहानी की ज़मीन पर खड़ी हैं। दुबेजी की कहानियों में व्यंग्य और व्यंग्य में कहानीपन मौजूद है। दुबेजी के कई व्यंग्य करुणा-सिक्त हैं। उनमें मानवीय करुणा की अंतर्धारा प्रवाहित है। 
वरिष्ठ साहित्यकार एवं समीक्षक डॉ. श्यामसुंदर दुबे ने अपने समीक्षात्मक आलेख “जीवन से फूटती व्यंग्य-भाषा” में अश्विनीकुमार दुबे की व्यंग्यकारिता की शैली का गहरा और विचारशील चित्रण किया गया है। डॉ. श्यामसुंदर दुबे के अनुसार, अश्विनीकुमार दुबे की व्यंग्य रचनाएँ, टुच्चाई और छलकपट को बिना किसी उत्तेजना के बहुत सटीक तरीके से उजागर करती हैं। उनका यह तरीका किसी व्यक्ति की छवि या छद्मसत्य को धीरे-धीरे और सूक्ष्म रूप से नष्ट करने जैसा है, जैसे कोई अपने कपड़े उतारते हुए उसे धीरे-धीरे नंगा कर दे। यह किसी भी प्रकार के कूटनीतिक या पाखंडपूर्ण व्यवहार को सादा और स्पष्ट रूप से सामने लाने का तरीका है, जिससे वह अपनी वास्तविकता से अपरिचित रहते हुए उसे पहचान नहीं पाते। डॉ. श्यामसुंदर दुबे लिखते हैं कि यह एक प्रकार की दुरंगी चाल है, जिसका अर्थ है कि व्यंग्यकार स्थिति को सीधे तौर पर नहीं चुनौती देता, बल्कि उसके भीतर की सच्चाई को धीरे-धीरे उजागर करता है। वे किसी व्यक्ति की छवि को उसके भीतर की असलियत से बाहर लाकर उसे तोड़ते नहीं, बल्कि उसके अंदर की सच्चाई को बड़ा और स्पष्ट बनाते हैं। इस प्रक्रिया में वह व्यक्ति जो भी छवि अपनाए हुए होता है, वह अपने आप दरक कर टूट जाता है। अश्विनीकुमार दुबे की व्यंग्यकारिता का यही मूल विचार है कि वे सत्ता, समाज, और संस्थाओं के अंदर की सच्चाई को पूरी तरह से उजागर करने के लिए किसी भी व्यक्ति की छवि को बिगाड़े बिना उसकी असलियत को सामने लाते हैं।
वरिष्ठ साहित्यकार एवं आलोचक डॉ. आनंदप्रकाश त्रिपाठी के आलेख “व्यंग्य को मुकम्मल मुकाम तक पहुँचाने की सार्थक कोशिश” से स्पष्ट होता है कि अश्विनीकुमार दुबे की व्यंग्य रचनाएँ न केवल समाज की कमजोरियों को उजागर करने का कार्य करती हैं, बल्कि उनका उद्देश्य पाठक को सच्चाई से साक्षात्कार कराना और समाज को जागरूक करना है। त्रिपाठी के अनुसार, दुबे की लेखनी ने हमेशा सामाजिक और नैतिक मुद्दों को गंभीरता से लिया है और उनके व्यंग्य का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि एक गहरी आलोचना और सुधार की दिशा में प्रेरणा देना है। अश्विनीकुमार दुबे ने जिन विषयों को उठाया है, वे समाज के विभिन्न पहलुओं से संबंधित हैं: सरकारी नीतियाँ, समाज की मानसिक जड़ता, चारित्रिक दुर्बलताएँ, अफसरशाही, रिश्तों में कड़वाहट, जीवन में गिरावट और मूल्यहीनता। इन तमाम मुद्दों पर उन्होंने अपनी लेखनी से प्रहार किया है, लेकिन अश्विनीकुमार दुबे का तरीका हमेशा सीधे और हिंसक तरीके से नहीं होता। वे व्यंग्य के माध्यम से समाज के इन पहलुओं पर कड़ी चुटकी लेते हैं और कभी-कभी मारक प्रहार भी करते हैं, लेकिन उनका उद्देश्य किसी को आहत करना नहीं, बल्कि समाज को जागरूक करना होता है। त्रिपाठी का यह भी कहना है कि दुबे का व्यंग्य केवल आलोचना तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह एक सुधारात्मक दृष्टि भी प्रस्तुत करता है। वे उन कुप्रवृत्तियों से मुक्ति पाने के लिए पाठकों को सीख और मार्गदर्शन प्रदान करते हैं, जो भ्रष्टाचार, अन्याय और जीवन के पतन के रूप में समाज में व्याप्त हैं। इस प्रकार, अश्विनीकुमार दुबे का व्यंग्य केवल हँसी का साधन नहीं है, बल्कि यह एक गंभीर और प्रभावशाली समाज सुधारक भूमिका निभाता है।
वरिष्ठ साहित्यकार एवं आलोचक डॉ. विजयबहादुर सिंह ने अपने आलेख “व्यंग्य एक शल्यक्रिया है” में लिखा है – हरिशंकर परसाई कहा करते थे कि जिस समाज में जितनी अधिक असंगतियाँ  होंगी, लेखन की मुद्रा उतनी ही व्यंग्यपूर्ण होती जाएगी। इसमें कोई शक या बहस नहीं कि व्यंग्यात्मक लेखन का यही गर्भ-केंद्र है।  
अश्विनीकुमार दुबे के लेखन का भी यही स्वभाव है। वे भाषा और शब्द-प्रयोग में भले ही हमें सरल लगते हों, किन्तु स्थितियों के चित्रण में इतने पटु हैं कि लोक यथार्थ की विसंगत मुद्राएँ हमें झकझोरने लगती हैं। अश्विनीकुमार दुबे की निगाह भी परसाई, शरद जोशी और ज्ञान चतुर्वेदी आदि की तरह व्यंग्यात्मक है।   
वरिष्ठ साहित्यकार एवं आलोचक रमेश दवे ने अपने आलोचनात्मक आलेख “समकाल का व्यंग्य-काल” में लिखा हैं – अश्विनीकुमार दुबे के एक व्यंग्य-संग्रह की पहली रचना “थाने में बजरंगबली” शीर्षक पढ़ते ही हरिशंकर परसाई का “इंस्पेक्टर मातादीन चाँद पर” और शरद जोशी का “पोस्ट ऑफिस”, “आसनसोल” और श्रीलाल शुक्ल का उपन्यास “रागदरबारी” एक साथ स्मृति में दीप्त हो उठते हैं। 
रमेश दवे इसी आलेख में लिखते हैं – “हिंदी साहित्य में कई काल हैं। वीरगाथा-काल, रीतिकाल और भक्तिकाल, ये अतीत की बातें हैं। अब साहित्य में रुदनकाल चल रहा है।” अश्विनीकुमार दुबे ने जिसे साहित्य का रुदन काल कहा है, सच पूछिए तो यह हमारे समग्र विकास की बढ़-चढ़कर चारणगिरि करती राजनीति, व्यवस्था और सामाजिक-नियत एवं नियति का भी रुदनकाल ही है। इस रुदन के अंदर से यदि हमारे समकाल का व्यंग्यकार होंठों पर आनंद की स्मृति-रेखा उभार देता है तो क्या इस समकाल को साहित्य का व्यंग्य-काल नहीं कहा जा सकता?      
वरिष्ठ साहित्यकार एवं आलोचक प्रहलाद अग्रवाल अपने आलेख “रचना क्षेत्र अत्यंत व्यापक है” में लिखते हैं कि अश्विनीकुमार दुबे अपने समकालीन लेखकों, विशेषकर हरिशंकर परसाई और शरद जोशी से प्रेरित हैं, लेकिन उनका अनुकरण नहीं करते। वे अपनी स्वतंत्र और विशिष्ट शैली का निर्माण करते हैं, जिसमें वे समाज और जीवन की विसंगतियों पर तीखा प्रहार करते हुए भी मानवीय संवेदनाओं और करुणा को अपने लेखन में बनाए रखते हैं। दुबे की लेखन शैली में व्यंग्य के माध्यम से समाज की समस्याओं को उजागर करना एक महत्वपूर्ण पहलू है, लेकिन वे कभी भी अतिवादिता या विध्वंसक शौर्य को अपनाने के पक्षधर नहीं रहे। इसका मतलब यह है कि उनका लेखन न केवल तीव्र और विचारोत्तेजक होता है, बल्कि उसमें एक गहरी मानवीयता और संवेदनशीलता भी होती है। उनकी यह विचारधारा न केवल व्यंग्य लेखन को एक नई दिशा देती है, बल्कि समाज के प्रति उनके दृष्टिकोण को भी स्पष्ट करती है, जिसमें निरपेक्षता और करुणा का संयोजन है।
वरिष्ठ साहित्यकार एवं समीक्षक डॉ. रमेश तिवारी ने अपने आलेख “संयमित, अनुशासित व्यंग्यकार के लेखन पर एक दृष्टि” में लिखा है कि अश्विनीकुमार दुबे की रचनाएँ उत्तेजना या सनसनी फैलाने की बजाय संयमित और सधी हुई होती हैं। वे न तो अत्यधिक भावुक होते हैं और न ही अपनी रचनाओं में ऐसी कोई सनसनी पैदा करने की कोशिश करते हैं, जो पाठक को अस्थिर कर दे। अश्विनीकुमार दुबे के लेखन में भावनाएँ जरूर हैं, लेकिन वे भावुकता के बजाय ठहराव और परिपक्वता से प्रेरित हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि उनके लेखन में भावनाओं का अभाव है, बल्कि यह है कि वे भावनाओं को नियंत्रित और संतुलित तरीके से व्यक्त करते हैं। उनकी रचनाओं में एक ठहराव और स्थिरता है, जो उन्हें एक जिम्मेदार और परिपक्व लेखक के रूप में प्रस्तुत करता है। दुबे की लेखनी में यह परिपक्वता और ठहराव उन्हें अत्यधिक प्रभावशाली बनाती है, क्योंकि यह दर्शाता है कि वे समाज और जीवन की विसंगतियों का निरीक्षण एक जिम्मेदारी के रूप में करते हैं, न कि किसी उत्तेजक या सनसनीखेज दृष्टिकोण से। यही कारण है कि उनका लेखन प्रभावी, गंभीर और सम्मानजनक है।
वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. सीमा दीक्षित ने अपने आलेख “नौकरशाही और राजनीति को बेनकाब करने की कोशिश” में लिखती है – अश्विनीकुमार दुबे अपनी भाषा में समाज की विद्रूपताओं, विसंगतियों और छटपटाहट को एक संयमपूर्ण और सृजनात्मक तरीके से व्यक्त करते हैं। दुबे के लेखन में सत्य की खोज और समाज के कूड़े का परिशोधन करने का उद्देश्य है, जो उनके लेखन को एक गहरी जिम्मेदारी और उद्देश्य से प्रेरित करता है। उनकी लेखन शैली बहुत सहज और सरल है। वे छोटे, सपाट और साधारण वाक्यों में अपनी बात रखते हैं, लेकिन इन वाक्यों में इतनी वाक्पटुता और निपुणता होती है कि पाठक स्वतः ही उन्हें दोबारा पढ़ने के लिए आकर्षित हो जाता है। इस शैली में एक हल्की सी मुस्कान और आत्मविभोरता की भावना आती है, जो पाठक को अपने विचारों में डूबने का अवसर देती है। इसके अलावा, दुबे के व्यंग्य लेखन में मुहावरों और कहावतों का इस्तेमाल भी महत्वपूर्ण है। ये मुहावरे और कहावतें न केवल उनकी भाषा को अधिक प्रभावशाली बनाती हैं, बल्कि समाज की समस्याओं और विसंगतियों को प्रस्तुत करने के उनके तरीके को और भी सटीक और प्रासंगिक बनाती हैं। इस प्रकार, दुबे की भाषा सरल होते हुए भी गहरे अर्थों और प्रभावों से भरी होती है।
वरिष्ठ साहित्यकार एवं समालोचक डॉ. पुरुषोत्तम दुबे ने अपने आलेख “बेहतर मानव-जीवन की चिंता में रचना-कर्म” में लिखते हैं – अश्विनीकुमार दुबे और हरिशंकर परसाई के व्यंग्य लेखन में समानता यह है कि वे समाज में व्याप्त विसंगतियों, विडंबनाओं, और असमानताओं को बड़ी प्रभावशाली और तीव्रता से प्रस्तुत करते हैं, लेकिन उनका उद्देश्य कभी भी केवल हंसी उड़ाना या मजाक बनाना नहीं होता। उनका मुख्य उद्देश्य समाज की वर्तमान व्यवस्था में सुधार लाना और लोगों को जागरूक करना होता है। हरिशंकर परसाई की व्यंग्य शैली में जो मुहावरा और चुटीलेपन का प्रभाव दिखाई देता है, वह अश्विनीकुमार दुबे की शैली में भी दृश्यमान है। परसाई की तरह ही दुबे के व्यंग्य भी तीखे और प्रभावशाली होते हैं, जो पाठक को न केवल हंसी के लिए प्रेरित करते हैं, बल्कि समाज की समस्याओं पर विचार करने का अवसर भी प्रदान करते हैं। इस प्रकार, दुबे के व्यंग्य लेखन में परसाई की शैली का स्पष्ट प्रभाव है, और यह दोनों लेखकों के उद्देश्य की समानता को भी दर्शाता है — वह है समाज और व्यवस्था में सुधार लाने की गंभीर पहल।
वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. बहादुर सिंह परमार ने अपने आलेख “बेबाक और बेख़ौफ़ लेखन” में लिखा हैं – अश्विनीकुमार दुबे की रचनाएँ मानव जीवन के विविध पहलुओं को छूती हैं, और उनका लेखन हमेशा मानव कल्याण और समाज में संवेदनाओं की वृद्धि के उद्देश्य से प्रेरित होता है। उनका लेखन न केवल समाज की विद्रूपताओं पर प्रहार करता है, बल्कि मनुष्य के सूक्ष्म भावनात्मक पहलुओं को भी प्रकट करने में सक्षम है। दुबे ने अपनी शासकीय सेवा के दौरान जो अनुभव किए, जैसे शासकीय प्रक्रियाओं में व्याप्त धींगा-मस्ती, राजनीतिक हस्तक्षेप, और स्थानांतरण, ये अनुभव उनके व्यंग्यात्मक लेखन में स्पष्ट रूप से झलकते हैं। इन अनुभवों के कारण उनके लेखन में एक तीखा और सटीक आलोचनात्मक स्वर आता है, जो उन व्यंग्यकारों की शैली से मिलता-जुलता है जो सत्ता और व्यवस्था की विडंबनाओं को उजागर करते हैं। इस प्रकार, अश्विनीकुमार दुबे का लेखन समाज की विसंगतियों और सत्ता की गलतियों पर गहरी चोट करने का एक प्रयास भी है, जो मानवता और संवेदनाओं के पक्ष में खड़ा है।
वरिष्ठ व्यंग्यकार ज्ञान चतुर्वेदी ने अपने आलेख में अश्विनीकुमार दुबे के व्यंग्य लेखन की विशिष्टता और उनके लेखकीय दृष्टिकोण को स्पष्ट रूप से व्यक्त किया हैं। ज्ञान चतुर्वेदी के अनुसार अश्विनीकुमार दुबे समकालीन व्यंग्य लेखन की “भेड़चाल” से बिलकुल अलग हैं, और उनका लेखन न केवल गहरे विचारों से भरपूर होता है, बल्कि एक संयमित और व्यवस्थित तरीके से पाठक तक पहुंचता है। दुबे व्यंग्य में वे किसी प्रकार का ‘संदेश थोपने’ की कोशिश नहीं करते; वे पाठक को आहिस्ता-आहिस्ता गहरी सोच की ओर प्रेरित करते हैं, और सारी बातें विवेक पर छोड़ देते हैं। उनका लेखन किसी प्रकार के शोर या उत्तेजना से बचता है, और वे अपनी बात सीधे, स्पष्ट और गंभीर तरीके से कहते हैं, बिना किसी अतिरेक के। वे शैलीगत प्रयोगों या भाषा के खेल में विश्वास नहीं रखते, क्योंकि उनके लिए मुख्य बात यह है कि उनका लेखन आमजन की समस्याओं और संघर्षों को उजागर करे। दुबे का व्यंग्य इस तथ्य से मजबूत होता है कि उन्होंने खुद अपने जीवन में सत्ता, राजनीति और अफसरी की विद्रूपताओं का सामना किया है। यही अनुभव और उनकी आमजन के प्रति गहरी चिंता उनके व्यंग्य को शक्ति प्रदान करते हैं। इस दृष्टिकोण के कारण उनका व्यंग्य न केवल समाज की विडंबनाओं को उजागर करता है, बल्कि यह उन लोगों के संघर्षों और संघर्षों की पहचान भी करता है, जिन्हें सत्ता और व्यवस्था की विडंबनाओं का सामना करना पड़ता है। इस प्रकार, दुबे का व्यंग्य लेखन उनकी गहरी सोच, संवेदनशीलता, और समाज के प्रति उनकी निष्कलंक प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
वरिष्ठ व्यंग्यकार प्रेम जनमेजय ने अश्विनीकुमार दुबे के बारे में लिखा हैं कि अश्विनीकुमार दुबे हिंदी व्यंग्य के एक स्थापित और प्रमुख हस्ताक्षर हैं, और उनके लेखन की विशेषता यह है कि वे व्यंग्य के मुहावरे और व्यंग्यकार की तीव्र दृष्टि का प्रभावी उपयोग करते हैं। उनके व्यंग्य में केवल चुटीले या तीखे कटाक्ष नहीं होते, बल्कि वे हर रचना में एक गहरी सोच और सार्थकता को भी स्थान देते हैं। दुबे का दृष्टिकोण हमेशा सकारात्मक रहता है, जिससे उनके व्यंग्य में सिर्फ आलोचना या व्यंग्यात्मक टिप्पणी नहीं होती, बल्कि वे समाज और राजनीति की विसंगतियों पर गंभीर चिंतन और विश्लेषण भी प्रस्तुत करते हैं। वे केवल सामयिक घटनाओं पर प्रतिक्रिया नहीं देते, बल्कि उन पर गहरे विचार करते हुए समाधान या सुधार की दिशा में भी सोचते हैं। इसके अतिरिक्त, दुबे की रचनाओं में कहानी का जीवित होना और कथा के माध्यम से विद्रूपताओं का अभिव्यक्त होना उनकी शैली की विशेषता है। वे व्यंग्य के माध्यम से कहानी की ताकत का उपयोग करते हुए समाज के विभिन्न पहलुओं की आलोचना करते हैं, जिससे उनके लेखन में न केवल विचारों का प्रवाह होता है, बल्कि वे पाठक को सोचने के लिए मजबूर भी करते हैं।
वरिष्ठ व्यंग्यकार सेवाराम त्रिपाठी ने अपने आलेख “व्यंग्य की तासीर” में लिखते हैं –  अश्विनीकुमार दुबे एक अनुभव संपन्न लेखक हैं, जिनका लेखन परंपरा और यथार्थ दोनों से गहरे जुड़े हुए हैं। वे किसी भी तरह के विवाद या उखाड़-पछाड़ से बचते हुए अपनी सहजता और सरलता के साथ लिखते हैं, जो इस दौर में एक विशेष आकर्षण का कारण बनता है। दुबे की लेखनी हरिशंकर परसाई, शरद जोशी, ज्ञान चतुर्वेदी और प्रेम जनमेजय जैसे वरिष्ठ लेखकों की परंपरा में है। यह परंपरा केवल व्यंग्य लेखन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज की वास्तविकताओं और विडंबनाओं को समझने और प्रस्तुत करने की कला से भी जुड़ी है। उनकी रचनाओं में न कोई भ्रम होता है, न किसी तरह का संकोच। वे बिना किसी दिखावे के अपनी बात सीधे, सरल और प्रभावी तरीके से रखते हैं, जो पाठकों को गहरी सोच की ओर प्रेरित करता है। उनकी लेखनी में सादगी और मनुष्यता की गहरी झलक है, जो न केवल उनके लेखन को अधिक मानवीय बनाती है, बल्कि समाज के प्रति उनके दृष्टिकोण को भी उजागर करती है। यह विशेषता उन्हें समकालीन व्यंग्यकारों से अलग करती है, क्योंकि वे अपने विचारों को बिना किसी हड़बड़ी के, पूरी सहजता और गहराई से प्रस्तुत करते हैं। इस प्रकार, दुबे का व्यंग्य लेखन न केवल सरल और सटीक है, बल्कि वह एक साथ गंभीर और प्रभावशाली भी है।
वरिष्ठ समालोचक राहुल देव ने अपने आलेख “नई किस्म की व्यंग्य रचनाशीलता” में लिखा हैं – हिंदी व्यंग्य में अश्विनीकुमार दुबे की तरह बहुत कम ही लेखक हैं जो अपने व्यंग्य में खुलकर डिटेलिंग करते नजर आते हैं। वे व्यंग्य लिखने के दौरान किसी जल्दबाजी में नहीं रहते बल्कि विषय को विकसित होने देते हैं और फिर उसे अपनी वैचारिकी में पकाकर आराम से प्रस्तुत करते हैं।  
वरिष्ठ साहित्यकार एवं समीक्षक प्रकाश कान्त अपने आलेख “व्यंग्य का अपना तेवर” में लिखते हैं – अश्विनीकुमार का व्यंग्य लेखन अधिकतर प्रवृत्तिमूलक और परिस्थितिजन्य होता है, जिसमें वे समाज की बुराइयों और असंगतियों को किसी एक विशिष्ट व्यक्ति के बजाय व्यापक रूप से टारगेट करते हैं। वे मनुष्य की मानसिकता, सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश को गहरे से समझते हैं और उसे व्यंग्य के माध्यम से उजागर करते हैं। उनके लेखन में शिकार करने या टूट पड़ने का वह तेज तेवर नहीं मिलता, जैसा कि कुछ अन्य व्यंग्यकारों में देखा जाता है। बल्कि, उनका रचनात्मक दृष्टिकोण अधिक संयमित और सुसंगत है, जहां वे अपने विषयों को सूक्ष्म और गंभीर रूप से प्रस्तुत करते हैं। इसके अतिरिक्त, दुबे के व्यंग्य लेखन में भी विविधता है, जहां रचनात्मक स्तर पर वे विषय की जटिलताओं को और अधिक प्रभावी तरीके से सामने लाने की कोशिश करते हैं। उनके लेखन में यह विविधता न केवल शिल्प में, बल्कि विचार और दृष्टिकोण में भी दिखाई देती है, जो व्यंग्य लेखन को और अधिक समृद्ध और गहराई से भर देती है। 
वरिष्ठ साहित्यकार चन्द्रभान राही ने अपने आलेख में लिखा हैं – अश्विनीकुमार दुबे प्रतिबद्ध रचनाकार हैं। उनके पास कहने को बहुत कुछ है। उन्होंने स्वयं अपने जीवन में विसंगतियों को खूब भोगा है। उनकी रचनाएँ कथ्य प्रधान हैं।  उनकी भाषा सहज, सरल और बोलचाल की है।  उनके लेखन की शैली मौलिक और चमत्कारिक है। 
सुपरिचित साहित्यकार एवं समीक्षक दीपक गिरकर अपने आलेख “समय से संवाद करती व्यंग्य रचनाएँ” में लिखते हैं – अश्विनीकुमार दुबे व्यवस्था में फैली अव्यवस्थाओं, विसंगतियों, विकृतियों, विद्रूपताओं, खोखलेपन, पाखंड इत्यादि अनैतिक आचरणों को उजागर करते हैं। दुबे ने कथात्मक शैली में व्यंग्य को सरलता, पठनीयता प्रदान की है। अश्विनीकुमार दुबे जीवन के विभिन्न पहलूओं पर सामान्य प्रसंगों द्वारा विसंगतियों की तह में चले जाते हैं और कथा के माध्यम से विसंगतियों की गांठें खोलकर पूरे परिवेश का चित्र उकेरते हैं और आम आदमी की व्यथा को प्रकट करते हैं। 
वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. महेश दुबे ने अपने आलेख में लिखा हैं – अश्विनीकुमार दुबे के व्यंग्य हमें अहिंसक होना सिखाते हैं। दुबे की लेखकीय चिताओं का रेंज अत्यंत विस्तृत और व्यापक है। इनकी रचनाओं में जीवन का सच प्रतिबिंबित है इसलिए ये रचनाएँ हर हाल में सच बोलती हैं। इनके व्यंग्यों में शब्दों और विचारों का संयोजन चमत्कारपूर्ण है। इनकी व्यंग्य रचनाओं में एक अपरिभाषित उदास दार्शनिकता पसरी हुई सी प्रतीत होती है। 
सुपरिचित व्यंग्यकार एवं समीक्षक विवेक रंजन श्रीवास्तव अपने आलेख “लेखन में वैज्ञानिक दृष्टि” में लिखते हैं – अश्विनीकुमार दुबे की व्यंग्य रचनाओं में कहानी ज़िंदा है। वे विद्रूपताओं को कथा के माध्यम से अभिव्यक्त करने में यकीन रखते हैं। इनकी व्यंग्य रचनाओं से गुजरते हुए कथ्य की अभिव्यक्ति और संप्रेषण में वैज्ञानिकता का बोध मिलता है। 
सुपरिचित साहित्यकार संतोष मोहंती ने अपने आलेख “एक साहित्य साधक” में लिखा हैं – अश्विनीकुमार दुबे की रचनाओं में सामाजिक व्यवस्था का विशेष शैली में उल्लेख होता है। वे अपनी बात को इतनी सहजता से अपनी रचनाओं में रखते हैं कि उनका वह विचार, वह संदेश मन-मस्तिष्क पर अपना प्रभाव छोड़ जाता है। 
वरिष्ठ साहित्यकार प्रभु त्रिवेदी ने अपने आलेख “विसंगतियों को उद्घाटित करती व्यंग्य रचनाएँ” में लिखा हैं – अश्विनीकुमार दुबे ने अपनी कहानियों को ही व्यंग्य का आधार बनाया है। उनके व्यंग्य कथात्मक हैं। उनकी कहानियों के पात्र शोषक और शोषित दोनों हैं। उनके व्यंग्य का उत्स इसी में है कि शोषक वर्ग समाप्त हो। वे व्यंग्य इसलिए रचते हैं काकि सामाजिक विद्रूपताएँ उन्हें परेशान करती हैं। परसाईजी की तरह दुबेजी की कहानियाँ भी फ्रेम से बाहर झाँकती प्रतीत होती हैं।  
वरिष्ठ कथाकार सुषमा मुनीन्द्र ने “ये व्यंग्य कथाएँ” में लिखा है – अश्विनीकुमार दुबे के साहित्य का मूल स्वर प्रतिरोध का है। कहानियों में भी व्यंग्य का प्रहार और कौतुक दोनों व्यवस्थित रूप में देखने को मिलता है। वे व्यवस्था के भीतर की अव्यवस्था, व्यवस्था के समानांतर पनप गई सुविधाजनक गलत व्यवस्था जैसी बेतुकी स्थितियों की अच्छी धरपकड़ करते हैं। क्लास हो या मॉस दोनों के भीतरघात, अनीति, अमानवीयता, अव्यावहारिकता को बेनकाब करते हैं। 
वरिष्ठ व्यंग्यकार डॉ. स्नेहलता पाठक ने “हमारे समय की व्यंग्य-कथाएँ” में लिखा हैं – अश्विनीकुमार दुबे अपनी ज़मीन, अपनी हैसियत और अपने लोगों से, अपने आसपास के वातावरण से जुड़े रहना चाहते हैं। उनके इसी सोच ने उनकी रचनात्मकता को मजबूती प्रदान की है। दुबेजी दूसरों की पीड़ा को अपनी निजी पीड़ा के रूप में देखते हैं। इस प्रकार उनके सोचने का ढंग उनकी व्यंग्य रचनाओं को व्यष्टि से समष्टि की ओर ले जाता है। अश्विनीकुमार दुबे ने हितोपदेश की कहानियों को आज के सन्दर्भ में जोड़कर जो प्रासंगिकता पैदा की है, वह सर्वथा नई सोच पैदा करने वाली है। 
वरिष्ठ साहित्यकार राजेंद्र वर्मा ने अपनी समालोचना में लिखा हैं कि “किसी शहर में” एक सफल व्यंग्य उपन्यास है। उपन्यासकार ने अपने उपन्यास में व्यंग्य की तत्वों को सम्मिलित करने की कोशिश की है, लेकिन वह व्यंग्यात्मक भाषा का पूरी तरह से पालन नहीं कर पाए। उन्होंने यह स्वीकार किया है कि भाषा का चमत्कार, जो व्यंग्य में होता है, इस उपन्यास में पूरी तरह से कायम नहीं रह सका। हालांकि, उन्होंने कथा की प्रवाह को बनाए रखते हुए करुणा की अंतर्धारा को अंत तक जीवित रखा है, जो पाठकों को भावनात्मक रूप से प्रभावित करती है। उपन्यास में विवरण रोचक हैं, और उनके बीच व्यंग्य का असर देखने को मिलता है, हालांकि भाषा में व्यंग्य की प्रचुरता नहीं है। इसके बावजूद, जिस उद्देश्य से व्यंग्य का उपयोग किया गया है, वह प्रभावी रूप से अपना काम करता है, जिससे कथा में गंभीरता और हलके-फुलके दृष्टिकोण का संतुलन बना रहता है। कुल मिलाकर, यह उपन्यास एक मिश्रित प्रयास का परिणाम है, जिसमें व्यंग्यात्मक भाषा की कोशिश तो की गई है, लेकिन वह अपेक्षित रूप से पूरी तरह से सफल नहीं हो पाई है, फिर भी इसके भीतर करुणा की गहरी लहर बनी रही है।  
वरिष्ठ साहित्यकार पुष्पेंद्र दुबे ने “किसी शहर में” उपन्यास को स्वानुभूत सत्य की सामाजिक अभिव्यक्ति कहा है। “किसी शहर में” उपन्यास के माध्यम से लेखक ने उस समाज की पीड़ा को उजागर किया है, जिसमें लोग मन मसोसकर जीने को मजबूर हैं, और उनका जीवन संघर्ष से भरपूर होता है। उपन्यास में सज्जनता जैसे गुणों की हानि और सत्य के प्रति आग्रह की कठिनाइयों को प्रमुख रूप से चित्रित किया गया है। पात्र देवदत्त का संघर्ष उनके रिश्तेदार दीनानाथ से मकान खाली कराने के लिए दर्शाया गया है, जिसमें वह छोटे-छोटे प्रयासों से अपनी समस्या का समाधान ढूंढते हैं, लेकिन सीधे रास्ते से समाधान नहीं निकल पाता। यह संकेत करता है कि समाज में कई बार नैतिकता और सत्य की राह में कई तरह की बाधाएँ आती हैं, और अक्सर सच्चाई को प्राप्त करने के लिए लोगों को तात्कालिक और व्यावहारिक तरीके अपनाने पड़ते हैं। कुल मिलाकर, यह उपन्यास समाज की असमानताओं, संघर्षों और नैतिक मूल्यों की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित करता है, और यह दिखाता है कि सत्य की राह पर चलने के बावजूद जीवन में कई बार समझौते और अन्याय का सामना करना पड़ता है। 
वरिष्ठ साहित्यकार सुनील चतुर्वेदी ने “किसी शहर में” उपन्यास को एक मुकम्मल उपन्यास कहा है। सुनील चतुर्वेदी के अनुसार, इस उपन्यास को केवल व्यंग्य उपन्यास की सीमा में बांधना इसके व्यापक और गहरे आयामों को समेटने जैसा होगा। उनका कहना है कि यह उपन्यास एक सशक्त कथानक के माध्यम से आगे बढ़ता है, जो पाठक को हरबोंगापुर नामक शहर की यात्रा पर ले जाता है। इस यात्रा के दौरान लेखक कथानक में ऐसा रस और आकर्षण भरते हैं कि पाठक को कथा से जुड़े रहना बहुत लुभावना लगता है। उपन्यास को पढ़ते वक्त, ऐसा लगता है जैसे वह खुद को पढ़वाने की जिद करता है, और इस तरह से पाठक को पूरी किताब पढ़ने की प्रेरणा मिलती है। 
वरिष्ठ व्यंग्यकार गिरीश पंकज ने अपने संस्मरण में लिखा हैं कि मेरे परम मित्र अश्विनीकुमार दुबे दूर होकर भी हृदय के पास हैं। समकालीन कहानी में जिस तरह की अश्लीलता का तड़का दिया जा रहा है, उस समय अश्विनीकुमार दुबे शालीन तरीके से कहानी कह रहे हैं, यह बड़ी बात है।  
वरिष्ठ साहित्यकार महावीर अग्रवाल और वरिष्ठ साहित्यकार सतीश राठी ने अश्विनीकुमार दुबे से व्यंग्य विधा को लेकर कई प्रश्न पूछे। वरिष्ठ साहित्यकार महावीर अग्रवाल और वरिष्ठ साहित्यकार सतीश राठी ने अश्विनीकुमार दुबे के व्यक्तित्व-कृतित्व, हास्य और व्यंग्य में अंतर, व्यंग्य की भाषा, व्यंग्य में वस्तु और शिल्प, रचना प्रक्रिया, आलोचना, व्यंग्य का मूल्यांकन, समकालीन व्यंग्य-लेखन का परिदृश्य, हिंदी व्यंग्य का भविष्य इत्यादि बिंदुओं पर विस्तार से चर्चा की। वरिष्ठ साहित्यकार महावीर अग्रवाल और वरिष्ठ साहित्यकार सतीश राठी की अश्विनीकुमार दुबे के साथ बातचीत से व्यंग्य विधा के नये रचनाकार व्यंग्य विधा को समझकर निश्चित ही लाभान्वित होंगे।                               
यह पुस्तक अश्विनीकुमार दुबे की व्यंग्य रचनाओं पर आलोचनात्मक दृष्टि से चर्चा करती है और उनकी लेखन शैली की विशेषताओं को उजागर करती है। समीक्षकों, आलोचकों, साहित्यकारों ने इस पुस्तक में अश्विनीकुमार दुबे के व्यंग्य लेखन पर गहरा विश्लेषण किया है। यह किताब, जो वरिष्ठ व्यंग्य लेखक और संपादक सूर्यकांत नागर द्वारा संयोजित और संपादित की गई है, दुबे के व्यंग्य लेखन को केंद्र में रखते हुए व्यंग्य की सौंदर्यशास्त्र पर गहरी बातचीत प्रस्तुत करती है। अश्विनीकुमार दुबे पर आलोचनात्मक कार्य समय-समय पर होता रहा है, लेकिन इस किताब के माध्यम से उसे एकत्रित और संयोजित किया गया है, जिससे पाठक उनके सृजन संसार को अधिक स्पष्ट रूप से समझ सकते हैं। इसके अलावा, किताब व्यंग्य विधा में अश्विनीकुमार दुबे के योगदान को रेखांकित करती है, जो परसाई और शरद जोशी जैसे प्रमुख लेखकों के बाद की पीढ़ी के एक महत्वपूर्ण व्यंग्यकार के रूप में उनके स्थान को स्थापित करती है। इस प्रकार, यह किताब न केवल अश्विनीकुमार दुबे के लेखन पर चर्चा करती है, बल्कि व्यंग्य लेखन के विभिन्न आयामों को भी विस्तार से प्रस्तुत करती है, जिससे शोधार्थियों, साहित्यकारों, समीक्षकों, आलोचकों और पाठकों को एक नई समझ प्राप्त होती है। निश्चय ही वरिष्ठ साहित्यकार सूर्यकांत नागर बधाई के पात्र है। आशा है कि सूर्यकांत नागर के संपादन में संकलित पुस्तक “अश्विनीकुमार दुबे का व्यंग्य लेखन (विचार और विश्लेषण)” का हिन्दी साहित्य जगत में भरपूर स्वागत होगा।
दीपक गिरकर
समीक्षक
28-सी, वैभव नगर, कनाडिया रोड,
इंदौर452016
मोबाइल : 9425067036
मेल आईडी : [email protected] 
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