जिसकी इच्छाओं की नसें बचपन में ही काट दी गयी हों, ऐसे इंसान पर ठंडे- गरम, दुःख- सुख, अच्छे- बुरे का असर होना बंद हो जाता है। कहते हैं, सांप के काटे को ज़हर ही काट सकता है। ऐसे ही एक दुःख दूसरे दुख का साथी बन जाता है। पैसा खत्म, मदारी बैक इन ट्रैवल मोड।
समुद्र किनारे ट्रेपीज़ की रस्सी पर हाथ में पांच मीटर लम्बा डंडा थामे नटनी का ध्यान अपने पर गड़ी आंखों से ज़्यादा सांप सी झूलती रस्सी पर जड़ा था …..वो जानती थी, उसके अस्तित्व का दायरा हवा में लहराती इस तीन- चार मीटर की सीधी रेखा से चौड़ा नहीं था। आँख ज़रा भी रस्सी से हटी, तुरंत दुर्घटना घटी।
उस लड़की को सड़क पर बेतहाशा दौड़ती चमकती चमकीली गाड़ियां, पेंसिल हील पहन खुशबू से महकती जींस टॉप में लड़कियां, हवा में सिगरेट के धुएं छल्लों में उड़ाते लंपट लड़के, सी ब्रीज़ पब से आता डिस्को का म्यूज़िक, तूफान में उफन के आती समुद्र की लहरें की कोई सुध नहीं थी …. उसकी आंख तो बस अर्जुन के समान उस रस्सी के पार सधी थी, जहां दो जून की रोटी और रात को इज़्ज़त से सर छुपाने की छत उसके इंतज़ार में उबासियाँ ले रही थी ।
“ बंबई की रेत पर रात को केकड़े रेंगते है, लाडो,” अम्मा अक़्सर कहती।” तू रस्सी का साथ कभी नहीं छोड़ना!” जब अम्मा रही नहीं, वह रस्सी को गले में नहीं डाल पाई। अब आसमान और ज़मीन के बीच त्रिशंकु सी गति ही उसकी नियति है।
नहीं, नहीं… सुनिए, आप लोग शायद गलत समझ बैठे हैं…ये किसी राह चलते मदारी और रस्सी पर चलती बंजारन नटनी की कहानी नहीं है …ना ना…. ये हिंदुस्तान की डेढ़ बिलियन आबादी में से एक, बिना बालकनी के माचिस की डिब्बी जैसे किराये के घर में रहने वाली मालती की कहानी है। मालती आपको कभी राह चलते मिल जाए, तो आप शायद उसे एक बार भी पलट के नहीं देखेंगे। ऐसा नहीं कि मालती खूबसूरत नहीं है, इस उम्र में भी बहुत खूबसूरत पर आप की आँख तो आपके फ़ोन में रहते फ़र्ज़ी वाड़े की दुनिया पर गड़ी होगी, आप कहाँ मालती को देख पाएंगे ।
१९८४ की मिस भोपाल रही मालती वर्मा की एक नज़र के कायल, घायल पुरुष अब भी उन्हें याद करते आहें भरते होंगे। ये बात अलग है कि यूनियन कार्बाइड कांड के समय थोड़े दिनों के लिए लोगों का ध्यान सुंदरता की जगह मानवी कुरूपता की ओर चला गया था और उनके ब्यूटी पेजेंट की स्टोरी साथ में ख़त्म हो गयी । फिर, १८ बरस की उम्र में मालती मिस भोपाल से मिस्सस श्रीवास्तव बन बंबई आ गयी और अगले ४० बरस में दस बाय दस के दो कमरों के दायरे में सीमित हुई ५ फुट ४ इंच की मालती का अस्तित्व और बौना हो गया।
रसोई की मसालेदानी से उड़ उड़ नमक कालीमिर्ची अब मालती के सर चढ़ गई, उसे खुद पता नहीं चला । नयी शादी, बीमार सास ससुर, फ़िर बैक टू बैक दो बच्चे। बड़ा लड़का, आर्यन…छोटी लड़की, सुनयना। कुछ साल पहले अपने पंख फैलाए दोनों मालती के छोटे से घोंसले से निकल कर विदेश जा बसे। आर्यन सिंगापुर में सॉफ्टवेयर इंजीनियर, सुनयना न्यूजीलैंड में रीसर्च स्कॉलर।
झरोके से समुद्र किनारे हवा में रस्सी पर चलती नटनी से ध्यान हटाकर मालती ने बिस्तर पर रखी जामुनी रंग की सिल्क साड़ी को उठाया और मैचिंग गोल्ड ज्वैलरी पहन, माथे पर बड़ी सी बिंदी लगा कर शीशे में खुद को निहारने लगी।बढ़ती उम्र ने उसके चेहरे और ज़मीर पर निशान तो छोड़े थे पर सुनयना अक़्सर कहती,” अच्छे से तैयार हुआ करो, माँ। थोड़ा मेक अप करके तुम अब और भी शोख़ लगती हो।”
दीवार पर धूल लगे शीशे पर पुराना तिकोना क्रैक उसकी मुस्कान को खंडित कर रहा था। वो हल्के से मुस्कुराई और आँखों में उमड़ आए आंसू पोंछ डाले। वैसे सुधीर एक अच्छे पति थे, उसका बहुत ध्यान रखते, कभी नौकरी करने का ज़ोर नहीं डाला, बच्चों के साथ साल में महाबलेश्वर खंडाला के दो हॉलिडे, त्यौहारों पर उसके मायके भोपाल के दो ट्रिप ।मालती दिनों तक घर से बाहर नहीं निकलती और जब सुधीर टूर पर नहीं होते तो सुधीर बाज़ार का भी सारा काम खुद ही करते, पर कभी बहुत थक जाते तो यूं ही झुंझलाहट में किसी दिन….
खैर, टूटे शीशे और चटके रिश्ते में यही समानता है कि उनकी ‘ यूसेबिल्टी’ कभी खत्म नहीं होती। और बच्चे नाम की ‘बैंडेड’ हर ज़ख्म पर खींच कर दोबारा पुराने ज़ख्मों को भर ही देती है।
मालती ने हल्का सा दरवाज़ा खोल कर बाहर झांका तो सुधीर बड़ी तन्मयता से “ ओ मेरे दिल के चैन “ गुनगुनाते हुए अपने सर के बाल रंग रहे थे। मालती ने उनका सलेटी रंग का सफ़ारी सूट प्रेस करके बिस्तर के दूसरी तरफ़ रखा छोड़ा था। आज सुधीर की रिटायरमेंट पार्टी थी। साठ के होते मेरे सुधीर ५० साल से एक दिन ऊपर नहीं लगते, मालती मन ही मन सोच कर मुस्कुरा दी।
सुनयना मज़ाक मज़ाक में उसे “ओ माई फ़नम्बुलिस्ट” कहती। रस्सी पर चलने वाली नटनी को अंग्रेज़ी में फ़नम्बुलिस्ट कहा जाता है।” क्या कलाबाज हो तुम, मां! पापा का चेहरा तो बस हमें होली, दिवाली, हॉलीडेज और हमारी बर्थडे पार्टी से याद है, पर तुमने अकेले दादू दादी के साथ साथ हमारे स्कूल, ट्यूशन, हार्ट ब्रेक्स, नौकरी, कर्म कांड सब कैसे हैंडल कर लिए! “
” बहुत अकेले संभाल लिया आपने सब, बट फ्रॉम नाउ आन्वर्ड्स , पापा इस ऑल योर्स।” कल रात वह फोन पर यूं बोली, तो मालती की हंसी छूट गई। पिछले तीन सालों से आर्यन और सुनयना की नज़रों से वो दुनिया घूम रही थी। बच्चे कितना कहते, माँ कुछ दिन के लिए आ जाओ, पर ” जब पापा फ्री हो जाएंगे, तब दोनों साथ में आएंगे, कह कर टाल देती। “एम्प्टी नेस्टर” मालती को सांय सांय करता खली घर काटने को दौड़ता। सुधीर ज़्यादातर टूर पर रहते , तो उन्हें बिना बताये सुनयना की मदद से उसने दिन में ऑनलाइन ट्यूशन पढ़ाने का काम शुरू कर दिया।
ऐसा नहीं कि अकेलेपन से झूझती मालती की हालत उसके मम्मी पापा से शुरू से छिपी थी। फ़ोन पर अपना माँ बाप के आगे दुःख उंडेल देती तो पापा कहते, ” बेटा, हौसला रख, सास ससुर के बाद सब ठीक हो जाएगा!” फिर बोले, ” बच्चे सेटल हो जाए, फ़िर देखना तुम्हारी ज़िंदगी कैसे बदलती है!” सुधीर रिटायर हो जाने के बाद बोलने से पहले पापा ने दुनिया से रुख़सत ले ली। बेटा आख़िर बेटा होता है कहने वाले पापा विदेश में रहने वाले अपने एकलौते बेटे को एक आखिरी बार देखने के लिए तरस गए और जाने से पहले भाई को बिना बताए उनकी तीमारदारी करती मालती के नाम भोपाल में उनका एक पुराना पुश्तैनी घर कर गए।
बम्बई में कुएं की मेंढक की तरह रहती मालती नींद में अक्सर बड़बड़ाती, “ टूटा फूटा घर ही सही, पर नेमप्लेट पर मेरा नाम होगा। … उसकी गुलाबी दीवारों पर मीठे बोसे मेरे होंठों के होंगे, मेरा अपना किताबों का कोना…. छोटे से बाग में मधु मालती की क्यारियां और रात की रानी की महक से चहक उठेगा मेरा घर। मैं बरसों बाद तीज त्यौहार पर आम के पेड़ से टंगे झूलों पर झूम पाऊंगी। हाथ में कलाई बाजू के ऊपर तक मेहँदी , पांव में आलता और रोज़ न्यू मार्केट में क्वालिटी पर ब्लूबेरी आइसक्रीम खाने का वादा ख़ुद से रोज़ सपने में करती।
देखा जाए तो बंबई शहर का दिल तो बड़ा है पर कमरे बहुत छोटे हैं। लोग अच्छे हैं पर उनके पास दूसरों के लिए वक्त नहीं है। अपने ख्याली पुलाव पर ईंधन जलाते मालती की नज़र यकायक बिस्तर पर रखे सुधीर के फोन पर पड़ी जो लगातार बजे जा रहा था।
वैसे सुधीर की मालती को सख्त हिदायत थी कि वह सुधीर का फोन कभी न उठाए, पर न जाने क्यूँ आज उसका मन उद्दंडता पर उतर आया था, तो उसने फोन उठा लिया ।
फ़ोन के व्हाट्स ऍप पर आयी तस्वीर में ४०- ४५ साल की एक औरत हूबहू वैसी ही लाल बनारसी साड़ी में थी, जैसी सुधीर ने उसे पांच साल पहले बनारस से ला कर दी थी। तस्वीर ने नीचे लिखा था, ” लुकिंग फॉरवर्ड टू आवर फॉरएवर टूगेदर फ्रॉम हियर आन” …. मालती को सुधीर ने वो साड़ी सख्त हिदायत के साथ दी थी कि वह उसे आर्यन की शादी पर ही पहनेगी।
अचानक शॉक में आ गयी मालती को लगा, जैसे हम औरतें नहीं, कठपुतली हैं । पति ने जैसा चाहा नचा दिया, तोड़ा मरोड़ा, जब मन हुआ नोच डाला या सर घुमा दिया। फ़िर एक दिन यूं अचानक, खेल तमाशा खत्म। और गुड़िया वापस धूल भरे डब्बे में बंद। बहरूपिया के एक और स्वांग प्रसंग का दी एंड।
मूढ़ लोगों के ज़हन में ये बात धीरे ही उतरती है कि पचास या साठ पार प्रौढ़ स्त्रियों के सीने में भी इच्छाएं धधक सकती हैं। सुंदर दिखना, अच्छा पहनना-ओढ़ना, छोटे बड़े काम पर अपनी तारीफ़ सुनना, प्रेम में होना, दिल टूटना। घर परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभालती बरसों तक छाती में दबी अधूरी इच्छाएं कब रुद्राग्नि का स्वरूप ले लेती है, उन्हें खुद पता नहीं चलता।
५८ साल की मालती को ६० साल के सुधीर से रोमांस करने का मौका अब ४० साल बाद मिलने वाला था । उसे माँ, बहु, गृहणी, पत्नी बनने के बाद प्रेमिका बनने का मौका अब मिलने वाला था।उनका बेंजमिन बटन प्रेम। भोपाल का घर और एक महीने का ‘आल इंडिया टूर फॉर टू’ उसका सुधीर के रिटायरमेंट पर सरप्राइज़ गिफ्ट था।
बच्चों के विदेश जाने के बाद पिछले तीन सालों में कई बार भोपाल जा जा कर मालती ने बड़े जतन से घर तैयार किया था। और जिसके साथ रोज़ सांध्य काल में साथ बैठ कर चाय पीने के लिए उसने अपनी जीवन भर जमा की हर गुल्लक तोड़ दी थी, उस पत्नी का दिल तोड़ने में सुधीर को ज़्यादा वक्त नहीं लगा।
सुधीर के इस भद्दे मज़ाक पर पता नहीं क्यूँ मालती को हंसी आ गयी । शायद उस फोन वाली दफ्तरी चुडैल को ये साड़ी आज ऑफिस की रिटायरमेंट पार्टी में पहने की हिदायत उसी ने दी होगी। ऐसा नहीं कि बरसों तक उसके कान तक फुसफुसाते किस्से नहीं पहुंचे, पर बंद आंख कबूतर की तरह मालती भी ये मानती रही कि बिल्ली उसके ४० साल के गृहस्थ जीवन पर पंजा नहीं मारेगी।सब उड़ती ख़बरों को सुधीर का “ मिडलाइफ़ क्राइसिस” सोच कर रफ़ा दफ़ा कर दिया। पर अपनी ४० साल की ब्याहता बीवी को सरेआम फेयरवेल पार्टी में इस तरह ये जताने का प्लान कि वह उसे छोड़ने वाला है, थोड़ा कैजुअल था।
पांच साल! पांच साल! पांच साल! मालती का सर भन्ना रहा था।
दिल्ली की कांफ्रेंस, मसूरी की ऑफसाइट, वाराणसी का नया लांच। पुणे का लॉन्ग प्रोजेक्ट, महीनों तक घर से दूर रहना ! कैसी बुड़बक थी, मैं ! मालती हंस पड़ी। सब मेरी आँखों के सामने घट रहा था पर मैं समझ ही नहीं पाई।
पर क्या मजाल, कि मालती की आंख में एक आंसू गिरा हो। जिसकी इच्छाओं की नसें पहले की काट दी गईं हो, उसे ठंडे – गरम, दुःख – सुख, अच्छे – बुरे का असर होना खत्म हो जाता है। सांप के काटे को ज़हर ही काटता है। एक दुःख दूसरे दुःख का साथी बन जाता है। पैसा खत्म, मदारी बैक इन ट्रैवल मोड। द एक्सपर्ट नटनी विल बी बैक आन ट्रेपीज़, बैलेंसिंग हर लाइफ, आल अलोन।
मालती ने धीरे से कमरे का दरवाज़ा बंद करके कुण्डी लगायी और पांच साल से अलमारी में बंद पड़ी चटक लाल रंग की बनारसी सिल्क साड़ी के साथ एक धारदार कैंची निकाली। फ़िर, अपना फोन उठा कर ट्रैवल एजेंट को फोन किया।
” मोटा भाई, वो इंडिया टूर का एक टिकट कैंसिल करना पड़ेगा ।” बाहर सुधीर ज़ोर ज़ोर से दरवाज़ा खटखटा रहा था। “ नहीं, नहीं, पैसा रिफंड नहीं चाहिए। और जो आप बता रहे थे न, अगले महीने के यूरोप टूर के बारे में , उसमें वो पैसा एडजस्ट कर लेना । सिंगल टिकट। मैं कल आकर बाकी हिसाब कर दूँगी ।”
Very well articulated story dear Gaytri Manchanda and intense too. Thoroughly enjoyed reading this.
बहुत खूब। बधाई
गायत्री जी!
आपकी कहानी नटनी पढ़ी।
शीर्षक प्रतीकात्मकता में है। वास्तव में स्त्री का जीवन किसी नटनी से कम नहीं होता।
सौंदर्य प्रतियोगिता में मिस भोपाल रही किसी लड़की को जब अपना जीवन पूरी तरह से परिवार के लिए होम करना पड़ जाए तो सपनों के बिखरने की तकलीफ तो होती है। उसके बावजूद भी सब भुलाकर वह अपने परिवार पर ही केंद्रित हो जाती है ।पति और बच्चों के लिए पूरी तरह समर्पित । नटनी की तरह…. परिवार रुपी रस्सी पर चलते हुए वह अपनी नजरों को एक जगह स्थिर रखती है पति और बच्चों पर। और उस वक्त उसे धोखा मिलता है वह भी पति से… जब वह एक बार पुन: अपने सपनों की उड़ान के लिए तैयार रहती है अपने पति के साथ।
अंततः वह ठोस निर्णय लेती है।
विश्वास की नींव पर स्थापित वैवाहिक संबंधों के मध्य छल की कहानी है यह। अपना पूरा जीवन होम करके भी अंत में जब उपेक्षा का अनुभव होता है तो तकलीफ होती है। स्वाभिमान को चोट पहुँचती है।सिर्फ स्वाभिमान ही नहीं, बहुत अंदर तक, बहुत कुछ टूटता है और बहुत कुछ छूट भी जाता है।
आजकल लंबे टूर पर जाने वाले पतियों के प्रति स्त्रियों को सावधान रहने का संकेत देती कहानी है यह।
बेहतरीन कहानी के लिए बधाई
मर्मस्पर्शी कहानी और न जाने कितनी महिलाओं की आपबीती। सुदृढ़ शब्द रचना। बधाई