Wednesday, February 11, 2026
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निधि अग्रवाल की कहानी – तितली और तिलचट्टा

“दीदी… दीदी… रुक जाओ!” मीनल बदहवास- सी पुकार रही थी। मैंने एक नज़र उसको देखा और छलाँग लगा दी। ‘छपाक’… की आवाज़ और पूल का सब पानी बाहर। कुछ मछलियाँ टायल्स के फर्श पर गिरकर तड़पने लगीं।
“आपको तैरना आता है क्या दीदी?”
“एक बर्तन में पानी लाकर मछलियाँ उसमे डाल दे मीनल?”
“मछलियों को चलना नहीं आता?”
“निरी बुद्धू ही रही तू मीनल। इतनी सारी मछली इतने छोटे बर्तन में कैसे आएँगी भला?”
“दूसरा लाऊँ?”
“नहीं, मर जाएँगी तब तक। छोटी-छोटी डाल दे।”
बड़ी मछलियाँ तिलचट्टे में बदल गईं। मीनल डर कर इधर-उधर भागने लगी। छोटी मछलियाँ तितली बन फूलों पर मंडराने लगीं।
“दीदी उठो…गेट लगा लो। मैं जा रही हूँ।” मीनल मेरा हाथ खींच रही थी।
मैंने आँखें खोली। सामने मीनल का चेहरा। चौबीस साल की यौवना…साँवले रंग पर उज्ज्वल मुस्कान का दुशाला ओढ़े!
“मैं डूबी नहीं?” मैंने पूछा।
“क्या?” वह हँसने लगी। हँसी की तरंगें पूरे कमरे में फैल गईं। छोटी-छोटी रंग-बिरंगी मछलियाँ उन तरंगों पर तैरने लगीं।
“चाय ले आऊँ दीदी? बहुत सोईं आज तो आप। तबियत सही नहीं क्या?”
मैंने दोनों हाथों से अपना सिर थाम लिया। दर्द का एक बवंडर पूर्ण वेग से चलायमान था। 
“हाँ, चाय ले आ।”
“नाश्ते में क्या लेंगी? आलू के परांठे की तैयारी करी मैंने।” वह जाते- जाते बोल रही थी। मीनल की आवाज़ कहीं दूर से आती प्रतीत हो रही थी।
“आप उठी नहीं?” वह जल्द ही वापस आ गई थी।
 “बुखार है क्या?”  माथा छूते हुई बोली।
“नहीं, बस सिरदर्द।” मैंने चाय का कप लेते हुए कहा।
“तू वहीं डाइनिंग टेबिल पर रख नाश्ता, मैं आ रही हूँ।” मैं कप वापस ट्रे में रखते हुए बोली।
मैंने बिस्तर के चार कोनों से शरीर बमुश्किल समेटा। कुल्ला किया… बाल कस कर जूड़े में बाँधे। समय देखा ग्यारह बज रहे थे। सुबह वॉक से आने के बाद नहा कर फिर सो गई थी। तब से सोती ही रही। अनिकेत के कपड़े बाथरूम में फैले पड़े थे। साबुन पानी मे डूबा दम तोड़ रहा था। ‘मीनल ने करवा दिया होगा नाश्ता’ मैंने मन में सोचा। बाहर आ गई।
“मैं जाऊँ दीदी?”
‘रोकने से कोई रुकता है क्या ?’ मन बुदबुदाया,प्रकट में कहा, “हाँ, चली जाओ।”
नाश्ता करते *शहज़ाद भाभी सामने आ बैठी। एक चम्मच मक्खन परांठे पर रगड़ दिया। चाय में चीनी घोल दी।
“मेरी ज़िंदगी में भी *शबनम लाना चाहती हो क्या?” मैंने घूरा।
वह हँस पड़ी। अधेड़ उम्र की औरत की बेशऊर हँसी खिन्नता उत्पन्न करती है।
‘शबनम भी तो *शहज़ाद ही बन गई थी न! आजकल न शबनम मिलती हैं न शहज़ाद! सब की सब मिस्री रक्कासा बन गईं हैं। बताना अपनी *इस्मत चुग़ताई को।’ वह मायूस थीं। मैंने सिर झटक कर विचारों की शृंखला को तोड़ा। बर्तन समेट सिंक में डाले। एक कप चाय पतीले में पकने रखी। अचानक सिंक से एक काला… मोटा… घिनौना तिलचट्टा बाहर निकलने की कोशिश करने लगा। कैसी जिजीविषा है जीने की। ड्रेन पाइप, सीलन, अँधेरा कहीं भी रह लेता है। छि:! पेस्ट-कंट्रोल का नम्बर ढूँढ़ फोन मिलाया। शनिवार को आएँगे।
फोन रखा तो तिलचट्टा और चाय दोनों ही जा चुके थे। गैस बंद की और कुछ देर स्लैब से फर्श पर रिसती चाय को देखती रही। फैलाना कितना आसान है… समेटना कितना मुश्किल! यूँ ही छोड़ वापस कमरे में आ गई।
(2)
झिलमिल की शादी… मानो कल की ही बात हो। गुलाबी फ्राक पहन तोतली भाषा में पूरे घर को लुभाती… नन्ही सी झिलमिल अब लाल जोड़े में सज किसी दूसरे घर की मर्यादा बन जाएगी। पूरे 10 साल छोटी है मुझसे। कहने को चचेरी बहन लेकिन मुझे बेटी सी लगती है। वही है जिसने दस साल की छोटी उम्र में ही मुझमें मातृत्व जगा दिया। शनाया की अर्धवार्षिक परीक्षा है लेकिन कोई बात नहीं। मेडिकल बनवाना कोई मुश्किल काम तो नहीं। आजकल तो स्कूलों में सालभर ही एग्जाम चलते हैं। शादियाँ कौन-सी रोज़ होती हैं। घर की शादी में ही सबसे मिलना-मिलाना हो पाता है।
जाना तय होते ही मन फूलों-सा हल्का हो चला। मैं तितली बन हफ़्ते भर बाज़ार घूमती रही। अनिकेत के लिए बंद गले का अचकन और चूड़ीदार… शनाया के लिए सफेद फ्रिल की फ्रॉक और मैचिंग बैलीज़। मेरा मन जिस साड़ी पर अटका उसका टैग सब बजट बिगाड़े दे रहा था। अनिकेत बोले- ‘और देख लो!’ पर वही मन में बसी रही। अनिकेत ने कहा-” यही ले लो तब।”
शादी के समय लड़कियों पर जाने कहाँ से रूप बरसता है। झिलमिल ने लाल नहीं हल्के बादामी रंग का लहँगा पहना। कहते हैं हर  रंग का अपना एक ‘औरा’ होता है। शायद इसी कारण पूर्वजों ने स्त्रियों को रंगों में बाँध दिया था।रंगों में बँधी रंगहीन ज़िंदगी देने की उनकी यह कोशिश सफल भी तो रही। उचित ही है जो अब नई पीढ़ी ने रंग और ढंग सब अपने पक्ष में बदल डाले हैं।
दूल्हा-दुल्हन और उनके दोस्त रस्मों में व्यस्त रहे और हम सभी भाई-बहनों ने बर्फी, इको-दुको, विष-अमृत सहित पूरा बचपन पुनः जी लिया।
“अब सब कितना बदल गया न।” मैंने मायूसी से कहा।
“तू भी तो कितना बदल गई।” प्रणव ने मेरे बढ़े वजन को इंगित कर, हाथ फैलाकर इशारा करते हुए कहा।
एक ज़ोरदार ठहाका…
“कुछ करती क्यों नहीं?”
‘समेटना कितना मुश्किल है!’ मन में सोचा। कुछ और इधर-उधर की बातें उचटते मन से सुनी और फिर शनाया को सुलाने के बहाने कमरे में आ गई।
अनिकेत टीवी देख रहे थे। शनाया को लिटा, अपने बाल खोलने लगी। जितने बाल नहीं होते उससे दुगनी चिमटी फँसा देती हैं पार्लर वाली एक जूड़ा बनाने में।
“साड़ी मत बदलना अभी।” अनिकेत की आवाज़ आई।
मैंने लाचारी से पीछे देखा, “थक गई हूँ।”
“अच्छा कोई हल्की साड़ी पहन लो तो।”
“अरे… समय तो देखो… रात के तीन बजे हैं।” तितलियाँ मेरे बदन को गुदगुदा रही थी।
“हम्म…. इस समय कुछ न पहनना ही सही…” उसने गम्भीर चेहरा बना कर कहा लेकिन होठों के पास दो तितलियों ने सरगोशी कर दी। मैंने पलंग पर बैठ उसके होंठो का वह कोना चूम लिया। सुबह आँख खुली तो पूरे कमरे में फूलों की महक थी। अनिकेत की बलिष्ठ भुजाएँ लताओं की तरह मुझे लपेटे थी। मैंने पकड़ कुछ ढीली कर उसकी ओर करवट ली। सिरहाने से कुछ तितलियाँ उड़ खिड़की पर जा बैठीं।             
(3)
क्या हुआ था……कुछ भी तो नहीं, मैंने याद करने की कोशिश की। रात के दूसरे पहर बेध्यानी में हाथ अनिकेत की कमर पर रखा गया और वह तिलमिला कर उठ खड़ा हुआ, “क्यों मेरी जान के पीछे हो?” तकिया ज़मीन पर फेंक मारा और अपना सिर दीवार में।
मैं ठगी-सी उठ बैठी। अनिकेत तकिया उठा दूसरे कमरे में चला गया और मैं उनींदी आँखों को खोल देखने का प्रयास कर रही थी कि वह अकेले गया या उसके पीछे कोई शबनम या मिस्री रक्कासा भी गई थी।
मैं जब भी उसके पास पहुँचती हूँ *ग्रेगर मेटामॉर्फिसम से तिलचट्टा बन जाता है। अनिकेत दो कदम पीछे हट जाता है। *ग्रेटा चिल्लाती है, “If only he understood us…”
*मैक्स से पूछना चाहती हूँ कि काफ्का ने तितलियों के बारे में क्यों नहीं लिखा? कुछ अंश डायरी में ही अप्रकाशित छूटे या मेरे घर के शीशे ही झूठे हैं। मैं शीशे के सामने खड़े होती हूँ तो अनिकेत को शीशे में तिलचट्टा दिखता है और मुझे उड़ने को आतुर तितली।
रात गहराने पर शीशा स्याह हो निर्रथक हो जाता है। अनिकेत के मचलते हाथों को तिलचट्टे का कोई खुरदुरा पैर नहीं महसूस होता, बचती है तो केवल तितली के कोमल पंख की कोमलता……हथेलियों में सहेजने लायक! यह कैसा उन्माद होता है पुरुषों में? खूबसूरती की परिभाषा बदल जाती है या आँखों की दृश्यशक्ति या फिर किसी शबनम या रक्कासा की सुखद कल्पना शहज़ाद भाभी के शरीर के सभी बेडौल उभारों में लावण्य भर देती है।
(4)
शाम का धुंधलका गहरा ही रहा था कि चिल्लाने की आवाज़ आई –
“दीदी…. जल्दी आओ!”
मीनल की आवाज पर मैं रसोई की ओर भागी। फर्श पर जमी हुई चाय के निशान की ओर इशारा कर वह कहती है, “देखो!”
वही घिनौना तिलचिट्टा अपनी दो बड़ी- बड़ी श्रंगिकाएँ ताने हुए सशंकित-सा खड़ा था।
“झाड़ू…” कहते हुए मीनल ने कदम बढ़ाया।
वह भी कुछ हिला।
मीनल ठहर गई। आहिस्ता से पैर से चप्पल निकाल तिलचट्टे पर बजा दी।
मेरी आँखें डर और आश्चर्य से फैल गईं।
“मीनल…” मैंने रोकने की आस में पुकारा।
तिलचट्टा उलटा पड़ा था। जीवन द्रव्य रिस रहा था। तीन जोड़ी पैर चलायमान थे… न जाने डर से, वेदना से या जीवन की आखिरी उम्मीद लिए पुनः सधने की आशा में।
मीनल ने सिंक के नीचे बनी अलमारी में से हिट निकाल, मुँह पर साड़ी का पल्ला रखते हुए कहा, “दीदी बाहर जाओ।”
वह उस अधमरे तिलचिट्टे पर स्प्रे कर रही थी। धीरे- धीरे वह पूर्णतः शांत हो गया। मरी हुई तितलियों की दुर्गंध कमरे में भरती जा रही थी।
“क्यों मारा मीनल?” मैं बदहवास-सी चीख रही थी, “कुछ स्नेह और हिम्मत दे हम उसे तितली भी बना सकते थे।” अपनी आवाज़ के आतंक से ढह मैं कुर्सी पर बैठ रोने लगी।
मीनल अवाक खड़ी रही!
*इस्मत चुग़ताई की कहानी ‘भाभी’ के पात्र
* काफ़्का की कहानी मेटामॉर्फिसीस, ग्रेटा इसी कहानी की पात्र।
* मैक्स लेखक काफ़्का के मित्र जिन्होंने उनकी रचनाएँ प्रकाशित कराईं।


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3 टिप्पणी

  1. निधि अग्रवाल जी की कहानी सीधी नहीं है जैसे काफ्का की मैना मार्फ़त नहीं थी समझने के लिये दो तीन बार पढ़ना पढ़ा था। इस्मत चुग़ताई को भी पढ़ा है मैने पर शहज़ाद और शबनम वाली कहानी नहीं पढ़ी । ख़ैर प्रतीकों से भरी अच्छी कहानी लगी जो महिला और पुरुष की वैचारिक भिन्नता को दिखाती है। अच्छी कहानी समझने के लिये ज़ोर डालना पड़ता है ज़रा फिर इस्मत चुनौती और काफ़का को जानना भी ज़रूरी हो जाता है।

  2. निधि जी!
    आप की कहानी समझ में नहीं आई वह एक अलग बात है पर लिखा आपने अच्छा। भाषा तो है आपके पास और आपकी अपनी शैली भी। इस्मत आपा को हमने बिल्कुल भी नहीं पढ़ा। हमने मंटो और अमृता प्रीतम को भी नहीं पढ़ा है।
    फ्रांज के बारे में गूगल से पूछ कर जाना और जानकर बहुत अच्छा लगा कि फ्रांज कौन थे-

    “फ्रांज काफ्का के मित्र मैक्स ब्रॉड ने उनकी मृत्यु के बाद उनकी अधिकांश रचनाएँ प्रकाशित कराईं। मैक्स ब्रॉड एक जर्मन-यहूदी लेखक, संगीतकार और जीवनीकार थे।
    अधिक विस्तार से:
    काफ्का ने अपने दोस्त मैक्स ब्रॉड से अपनी मृत्यु से पहले उनकी सभी रचनाओं को जलाने का अनुरोध किया था।
    हालांकि, ब्रॉड ने काफ्का की इच्छा को नहीं माना और उनकी रचनाओं को प्रकाशित करने का फैसला किया।
    ब्रॉड के प्रयासों से काफ्का की कुछ सबसे प्रसिद्ध रचनाएँ, जैसे “द ट्रायल” और “द मेटामॉर्फोसिस”, दुनिया के सामने आई।
    ब्रॉड काफ्का के जीवन और लेखन के बारे में एक महत्वपूर्ण व्यक्ति थे, जिन्होंने काफ्का की विरासत को सुरक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।”

    आपकी कहानी से कम से कम एक अच्छे लेखक से हमारा परिचय हुआ। शुक्रिया आपका।

  3. तितली और तिलचट्टा कहानी एक ख्याली पुलाव की तरह हैं और पुलाव अच्छा पका।

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