साहित्य केवल वर्तमान का चित्र ही प्रस्तुत नहीं करता या दुनिया जैसी है वैसी ही चित्रित होती, बल्कि साहित्य में दुनिया का उन्नत और कल्पित रूप भी प्रस्तुत होता है। दूसरे शब्दों में, दुनिया के आगे के जीवन को भी वह प्रस्तुत करता है, इस दृष्टि से यदि ‘परख’ उपन्यास को देखें तो पाएंगे कि उपन्यास बहुत कुछ भविष्य की झांकी प्रस्तुत करता है और वर्तमान की तमाम तह खोलकर हमारे समक्ष रख देता है। ‘परख’ 1929 ई. में लिखा गया जैनेन्द्र का प्रथम उपन्यास है। तबसे आज तब 95 वर्षों बाद आदर्श के बदलते-बिगड़ते रूप को प्रस्तुत उपन्यास बखूबी दर्शाता है। इस तरह से यह उपन्यास एक नये और विचित्र ढंग से जीवन की उपादेयता और वरीयता के चित्रों को हमारे सम्मुख रखता है। 
कोरे बौद्धिक आदर्श जीवन की भावनाओं रूपी उलझी गुत्थियों को अपनी सुविधानुसार सुलझाकर रख देते हैं। उपन्यास का प्रारम्भ ही आदर्शवाद के प्रसिद्ध नायकों अर्थात् रस्किन, टॉलस्टाय एवं गांधी के नामों से होता है और युवा नायक इन नामों का सहारा लेकर आदर्शवाद के मार्ग पर चलता प्रतीत होता है।
ठीक है कि युवावस्था में महत्त्वाकांक्षाओं के आकाश में मन उड़ने लगता है। लेकिन समय के साथ-साथ आदर्शों को जिस अर्पण की आवश्यकता रहती है उसके स्थान पर उन आदर्शवादी सिद्धान्तों का आरोपण ही रह जाता है और जिन आदर्शों को इष्ट मानकर वह जीवन यात्रा शुरू करता है और चलते-चलते वही आदर्श जब आदर्शवाद बन जाते हैं तो इष्ट न रहकर अनिष्ट सिद्ध होता है।
यह ठीक है कि आदर्श कोई बुरी चीज नहीं हर किसी के जीवन का कोई न कोई आदर्श होता ही है, पर बुराई तब है जब उन आदर्शों को बुद्धि की चासनी मे डुबोकर बौद्धिक आदर्शवाद के मिष्ठान अपनी स्वार्थ सिद्धि हेतु बनाए जाते हैं और उन्हें उपयोगिता के तराजू में तोला जाता है, बुराई उन थोथे बौद्धिक आदर्शवाद बनाम उपयोगितावाद में है जो प्रस्तुत उपन्यास का केन्द्र बिन्दु है।
आदर्शों के महल को किस तरह सहज रूप से ढहाया जा सकता है इसकी कला आती है वकील साहब को “वकील साहब कभी युवा रहे हैं, और दुनिया देखी है। समझ गए, अभी लड़का स्वप्न देख रहा है। सेक्सपियर की पढ़ाई अभी बहुत ताजी है। जरा पढ़ाई ठंडी होने दो, स्वप्न जगत की जगह यह ठोस जगत आने दो, तब वह अपने आप राह पर आ जाएगा। जल्दी की जरूरत क्या है?” अर्थात् उन्हें दृढ़ विश्वास है कि कठोर भूमि के समक्ष सपनों की दुनिया कहाँ तक टिकेगी। एक न एक दिन टूट ही जाएंगे भले ही कुछ समय जरूर लगेगा।
सत्यधन जिस कट्टो से प्रेम करता है, उसका सम्बन्ध बिहारी से जोड़ने के पीछे क्या उसकी उपयोगितावादी समझ काम नहीं कर रही? प्रेम, विवाह से अधिक महत्वपूर्ण है पर वैयक्तिक एवं सामाजिक स्थिरता के लिए विवाह आवश्यक है। तो क्या सत्यधन जिस कट्टो से प्रेम करता है और कट्टों के मन-मंदिर में भगवान के आसन पर आसीन है क्या वह स्वयं उससे विवाह नहीं कर सकता? क्यों वह इस सम्बन्ध के लिए बिहारी को तैयार करता है? केवल कट्टो के वैधव्य उद्धार के दिखावे हेतु ही न? केवल खोखले आदर्शों के ढोल पीटकर उनकी आड़ में हम अपने लाभ-हानि की सहूलियत ही देखते हैं। तभी तो कट्टो की बात बिहारी से करके “सत्य के सिर से बोझ टला”
वस्तुतः बौद्धिक आदर्शवाद में सहानुभूति का प्रदर्शन ही अधिक है मन में सर्वस्व त्याग- समपर्ण का भाव वहाँ? तभी तो सत्य कहता है- “पिताजी गांव में एक लड़की है। मेरे साथ-साथ पढ़ी है। उसका कुछ ठीक हो जाए तो मैं शादी करूँ। मैं तो इधर यों विलास में पड़ जाऊँ, और वह मेरे घर के पास झुरती-झुरती रहे, न, यह मुझसे न होगा” अर्थात यह तय है कि विवाह कट्टों से नहीं गरिमा से ही किया जाएगा बस कट्टो का सम्बन्ध कहीं जुड़ जाय भले ही उस संबंध के लिए कट्टो तैयार हो अथवा न हो। आदर्शवाद की चादर ओढ़े कट्टो के मन-मंदिर के देवता हैं सत्यधन, जो उसका निश्चित रूप से कल्याण करेंगे ही।
दरअसल प्रेम का संबंध हृदय से है और उपयोगिता का संबंध बुद्धि से। बुद्धि जीवन का गणित तय करती है तो हृदय का सहज प्रेम इस गणित से सदैव मुक्त रहता है। इसी बौद्धिकता की आड़ में वह वकील साहब को पत्र लिखते हुए कहता है “उस लड़की से कुछ बातों में बँध बैठा हूँ। वह मुझे न जाने किस ढंग से देखने लगी है। वह समझती है, मैं उसको अपनाऊँगा या तो इस समझ को मुझे अपनी ओर से तोड़ना होगा, नहीं तो किसी तरह से उसी के दिल से यह भाव निकाल देना होगा।” वास्तव में वह केवल अपना हित और उसी के अनुरूप विवाह-संबंध का निर्णय सब कुछ अपने हिसाब से चाहता है पर ”यह अपना मनमाना निर्णय दूसरे से पाकर वह झट उसे मान लेगा।”
सच यह है कि वह दूसरों की ओट लेकर अपनी लालसा पूरी करना चाहता है। जिससे उसके आदर्श रूपी हाथी के दांत (दिखाने के) बने रहे और वह स्वयं अपने सामने अपराधी बनने से बच जाय। तभी तो बाबूजी के उत्तर की प्रतीक्षा में वह तरह-तरह के कयास लगाता है। “अगर बाबूजी ने लिख दिया कि जो चाहे करो… गरिमा का इसी साल मैं कहीं ओर ब्याह कर दूंगा तो? तब तो मैं कहीं का नहीं रह जाऊँगा। यह ठीक नहीं होगा।” हमारे जीवन में क्या जरूरी है क्या नहीं, हमारा कहाँ नुकसान है, कहाँ फायदा यही सोचना तो बुद्धि का कार्य है। आदर्श जब बुद्धि की गिरफ्त में आते हैं तो कैसे व्यक्ति एक-एक कदम नाप-तोलकर चलता है। “सत्य को अब जमीन पर हिसाब-किताब के साथ चलने की अकल सूझी है।
अब वह चारों ओर ठोक बजाकर जांच पड़ताल के बाद, नफे-नुकसान की सारी बातों का लेखा लगा चुकने पर आगे बढ़ना चाहता है। अब उसे हठात् यह सूझ रहा है कि इधर क्या लाभ-हानि है और उधर कितनी है, यह सब देख-भाल लेने की जरूरत है। इस आमद-खर्च की हिसाबी सूक्ष्म बुद्धि पर चढ़कर जब वह तोलने बैठता है तो देखता है कट्टो की ओर आमद नहीं; खर्च ही खर्च हैं दूसरी तरफ आमदनी की कई मदें, खर्च लगभग है ही नहीं। प्रतिष्ठा बढ़ेगी, पैसा आएगा, सुख भी मिलेगा और भी बहुत कुछ। दूसरी तरफ सब कुछ खर्च होगा- मिलेगा क्या? पर अब वह खर्च लेखा देखकर करना चाहता है। आमदनी देख ले, तब दान देगा। बिना पड़ता बिठाए उत्सर्ग करने से वह देखता है कुछ हाथ नहीं आता” सच ही तो है बुद्धि की तराजू पर उपयोगिता के बाट से जब वह एक तरफ कट्टो जिसके पास दुर्भाग्य के कंकड़ पत्थर के अतिरिक्त कुछ नहीं तो दूसरी ओर सोने चांदी की प्रतिमा रूपी गरिमा।
निश्चित रूप से गरिमा का वजन कट्टो से कहीं भारी है। और सत्यधन की उपयोगितावादी बुद्धि भला कंकड-पत्थर लेकर क्या करेगी? इस तरह से उपन्यास में सत्यधन का बुद्धि प्रमाद से उत्पन्न हठ देखा जा सकता है। वास्तव में “बुद्धि समय पर तर्क उपस्थित कर देती है जो स्वार्थ के पक्ष में होता है और फिर विसर्जन की जगह स्वार्थ का अर्जन अधिक संगत और युक्तियुक्त जान पड़ने लगता है। तभी तो वह प्रेम को अधिकार नहीं देना चाहता है और गरिमा को लेकर लौकिक उपयोगितावादी नाना तर्क अपने पक्ष में गढ़ लेता है।” (वही लेखकीय) वस्तुतः “सत्यधन का आदर्श भारतीय युवामन के थोथे आदर्श के प्रतीकार्थ में दिखाई देता है। जो अपने सहज प्रेम को भी एक सहानुभूति के आवरण में बंद कर देता है… बिना किसी यथार्थ दृष्टिकोण के बौद्धिक आदर्श के सहारे जीवन की निष्पत्ति सिर्फ हास्यास्पद हो जाने में ही होती है। जहाँ न तो प्यार रह पाता है और न अपनी स्वार्थपरता में बनाए गए संबंध, वहाँ सिर्फ खोखला जीवन ही रह पाता है। जिसका उचित उदाहरण स्वयं सत्यधन है।” उसके खोखले आदर्श अनेक रूपों में दिखाई देते हैं। गरिमा उससे विवाह अवश्य करती है पर जीवन भर उसे अपनाती नहीं; उसके श्वसुर भी उसे भरोसेमंद व्यक्ति नहीं मानते और “कट्टो जो उसे चाहती तो रहती है पर अंत में कृपा ही करती दिखाई देती है।”
इस तरह परख में खोखले आदर्शों की आड़ में उपयोगितावादी दृष्टि से वर्तमान और भविष्य के चित्र दर्शाये गए हैं। सत्यधन की बनिया बुद्धि तराजू-बाट लेकर जीवन दिशा तय करती है। दरअसल आज के परिवेश में केवल आदर्शों के लिए मर मिटना कितनी मूर्खता है यह आज का युवा भली-भाँति समझता है। इस दृष्टि से देखें तो आज प्रेम और विवाह भी एक व्यवसाय बन गये हैं, और वह भी केवल शुद्ध मुनाफा देने वाला, नुकसान का सौदा भला कौन करेगा? क्यों करेगा? 

प्रो. कमलेश कुमारी
शहीद भगत सिंह कॉलेज
दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली

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