Tuesday, July 16, 2024
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पुनीता जैन का लेख – उपेक्षित अतीत और विसंगत वर्तमान में रचनात्मक हस्तक्षेप

आदिवासी उपन्यास लेखन के क्षेत्र में उनके प्रथम उपन्यासकार मेन्नस ओड़ेअ से लेकर पीटर पॉल एक्का, वाल्टर भेंगरातरुण’, मंगल सिंह मुंडा इत्यादि रचनाकारों की कर्मभूमि और रचनाभूमि प्रायः झारखण्ड रही है। झारखंड का स्थानीय परिवेश, प्रकृति, जीवन, संस्कृति, भाषा, धर्म सामाजिक आर्थिक चुनौतियों को उन्होंने अपने रचनाकर्म के केन्द्र में रखा। इस क्रम में हरिराम मीणा के रचनाकर्म का केन्द्र राजस्थान है। राजस्थान का इतिहास, जनश्रुतियाँ, संस्कृति, भाषा, तत्युगीन परिवेश के साथसाथ वर्तमान समय और उसकी परिस्थितियाँ उनके उपन्यासों में प्राथमिकता से अभिव्यक्ति पाते हैं। हरिराम मीणा आदिवासी लेखन में राजस्थान के ऐसे प्रतिनिधि हस्ताक्षर हैं जिन्होंने काव्य और काव्येतर विधाओं में समर्थ उपस्थिति दर्ज की है। ये विधाएँ कहानी है, उपन्यास है और आलोचना भी अपने उपन्यासोंधूणी तपे तीर’ (2008), ‘डांग’ (2019) ‘ब्लैक होल  में स्त्री’ (2023) द्वारा वे राजस्थान के इतिहास और वर्तमान की तहों में प्रामाणिकता के साथ प्रवेश करते हैं।  उनका रचनाकर्म  पर्याप्त शोध का संकेत देता है। इतिहास, लोक जीवन, विसंगतिपूर्ण वर्तमान परिवेश का जीवंत रूपांकन उनके उपन्यास का वस्तु पक्ष निर्धारित करता है।
सत्ता स्वभावतः हाशिये को अधीन रखने में विश्वास  रखती है। हाशिये का अधीनस्थ समाज सजग, सचेत होकर अपना अधिकार माँगने उठ खड़ा हो, यह उसे कतई स्वीकार नहीं यह सत्ता स्वभाव ब्रिटिश शासन ही नहीं देसी रियासतों का भी सत्य है। अतीत में राजस्थान के बांसवाड़ा, डूंगरपुर, सूंथ, ईडर रियासतों ब्रिटिश शासन की यहीं प्रवृत्ति  अपने क्षेत्र के आदिवासियों के प्रति रही है। बांसवाड़ा, डूंगरपुर गुजरात की संत रामपुर रियासत की सरहद में स्थित मानगढ़ (माकणिया) पर्वत पर 17 नवम्बर 1913 को पहला जलियांवाला बाग नरसंहार इन्हीं सत्ता केन्द्रों  द्वारा अंजाम दिया गया था, जिसमें सैकड़ों आदिवासी हताहत हुए।धूणी तपे तीरके केन्द्र में इतिहास में उपेक्षित यही घटनाक्रम है जो इस उपन्यास की कथावस्तु बनता है। मानगढ़ पर्वत पर घटे आदिवासी नरसंहार की दृष्य रचना से पहले उपन्यासकार राजस्थान के इस क्षेत्र की सामाजिक और राजनैतिक परिस्थितियों पर विस्तृत दृष्टि डालते हैं। ब्रिटिश शासन, देसी रियासतों के वर्चस्व और आर्थिक पक्ष संबंधी अपने अपने स्वार्थ तदनुसार उनकी नीतियाँ यहाँ अभिव्यक्त हैं। 
           राजस्थान के बांसवाड़ा, डूंगरपुर, उदयपुर, कुशलगढ़ का विस्तृत क्षेत्र भील, मीणा आदिवासियों का नैसर्गिक निवास स्थल है। यहाँ के जंगल और उसके वनोपज, जंगल साफ कर बनाये गये खेत, उनकी स्वाभाविक आजीविका है। वर्चस्ववादी शक्ति  केन्द्रों की बेगार करना पुरखों से चली रही ऐसी अन्यायपूर्ण परंपरा है, जिसको अनिच्छा से वे वहन करते रहे हैं। इस जमी जमायी व्यवस्था में सेंध लगती है आदिवासी चेतना से, जिसके प्रेरक हैं गोविन्द गुरु, जिनका जन्म बंजारा परिवार में 1858 में हुआ। फिरंगी शासन के प्रति आदिवासी असंतोष और विद्रोह को दिशा दिखाने वाले गोविन्द गुरु इस उपन्यास के नायक हैं, प्रमुख चरित्र हैं। 
हरिराम मीणा ने अपने इस उपन्यास में राजस्थान के उस उपेक्षित समय और समाज की कथा रची है, जिसके संघर्ष, चुनौतियों और चेतना को इतिहास में जगह नहीं मिली है। ब्रिटिश शासन के कायदेकानून हो या फिर वे डूंगरपुर रियासत के महाराजा उदयसिंह के लिए बनने वाली शिकारगाह हेतु लिया जाने वाला बेगार का काम, आदिवासी समाज की सरलता, अज्ञानता उनके शोषण को सतत प्रशस्त करती रही है। गोविन्द गुरु को मिला पुजारी राजगिरी गोसाईं का सान्निध्य ज्ञान चर्चा केवल उनमें चेतना जागृत करता है अपितु अन्याय को देख पाने  वाली यह दृष्टि  अपने उपेक्षित समाज को सचेत, सजग करने का भी प्रण कर लेती है। संप सभा का गठन ऐसा ही मार्ग है, जिसकी स्थापना के साथ गोविन्द गुरु द्वारा धूणी धामों की स्थापना, नशामुक्ति, बेगारी के विरूद्ध चेतना जागृत की जाती है। इस पूरे क्रियाकलाप का वर्णन इस उपन्यास में विस्तार से किया गया है, जो वस्तुतः ब्रिटिश शासन के विविध नियमों तथा देशी रियासतों की उपेक्षा स्वार्थ के समानांतर आदिवासी समाज के संगठित और सचेत होते जाने की कथा कहता है। जंगल की उपज पर सत्ता केन्द्रों द्वारा लगायी गयी पाबंदी, बंजारों द्वारा नमक बेचने पर पाबंदी, जंगल काटकर रेल की पटरी बिछाने से प्रभावित आदिवासी समाज के विद्रोह के फलस्वरूप ऋषभदेव समझौता आदि, आदिवासी समाज के प्रतिरोध की चेतना का समर्थ इतिहास है, जिसे यह उपन्यास पृष्ठभूमि के रूप में प्रस्तुत करता है। बेगारी का विरोध और श्रम का मेहनताना मांगा जाना यदि राजद्रोह माना जाए, तो राज की न्याय दृष्टि पर प्रश्नचिह्न लगना और शोषित पक्ष में असंतोष का बीजारोपण होना स्वाभाविक प्रतिक्रिया कही जानी चाहिए। 
गोविन्द गुरु को इस उपन्यास में केवल विद्रोह के प्रतीक रूप में नहीं प्रस्तुत किया गया है उनकी संप सभा का उद्देश्य धार्मिक के साथ सामाजिक सुधार भी था। आपराधिक वृत्तियों को दूर करना, शराबबंदी, शिक्षा, स्वच्छता के प्रसार के समानांतर ही जुल्म के खिलाफ एकजुटता, इस सभा का ध्येय बना। सन् 1898 में पड़े भयंकर अकाल में अपनी पत्नी और बच्चों को खोने वाले गोविन्द गुरु और उनकी सभा में जुड़ते गये भगत समूह का जंगल की पैदावार पर हक, लगान विरोध, आदिवासियों पर लगे झूठे इल्जामों , भूख, गरीबी  को लेकर किया गया सतत संघर्ष इस सभा के साथ बड़ी संख्या  में आदिवासियों के जुड़ने का कारण था। हालांकि अकाल के कारण लंबे समय तक यह संघर्ष और विद्रोह मौन भी रहा। गोविन्द गुरु का बासिया गाँव से पलायन , पुनर्विवाह, पाँच वर्ष बाद लौटना पुनः संप सभा का सक्रिय होना, युवाओं की इसमें भागीदारी बढ़ना और इन समस्त गतिविधियों का केन्द्र मानगढ़ पर्वत का बननाइस समस्त क्रम को लेखक ने कथा  में रचा और बुना है तथा मानगढ़ पर्वत पर हुए नृशंस नरसंहार की पीठिका को बखूबी आकार दिया है। प्रतिरोध की चेतना के साथ गोविन्द गुरु का स्वयं आदिवासी समाज की भीतरी दुर्बलताओं यथापरस्पर झगड़ेफसाद, बुरी आदतों के सुधार , वनोपज पर पुश्तैनी हक की ओर प्रवृत्त होना अर्थात् धार्मिक के साथ सामाजिक और आर्थिक चेतना की ओर ध्यान केन्द्रित करना, आदिवासी गाँवों का गोविन्द गुरु की ओर आकर्षित होना आदिआदिवासी संगठन के इस क्रम को यह उपन्यास विस्तार से दर्शाता है, बीच में कई अवरोध आते हैं, जिसमें गोविन्द गुरु का हस्तक्षेप और सफलता उन्हें समाज में स्थापित कर विश्वस्त बनाती है। 
यह उपन्यास एक तरफ गोविन्द गुरु की गतिविधियों द्वारा आदिवासी समाज की स्थिति, संघर्ष और अपेक्षा को सामने लाता है वहीं दूसरी ओर इस चेतना को राज के विरोध में देखने वाली देसी रियासतों ब्रिटिश शासन की गतिविधियों प्रवृत्ति को उजागर करता है। देसी रियासतों का और ब्रिटिश शासन का परस्पर वर्चस्व प्राप्ति का प्रयास और खींचतान को लेखक ने उपन्यास में ऐतिहासिक स्रोतों शोध द्वारा उपलब्ध कराया है तो साथ ही सदियों से शोषित आदिवासियों के हकों पर शासन के हस्तक्षेप के फलस्वरूप विरोध के स्वर को दबाने के प्रयास में दोनों सत्ता केन्द्रों की मिलीभगत को भी उपन्यासकार रेखांकित करता चलता है। वस्तुतः आदिवासी  समाज के अंग्रेजी शासन के प्रति विरोध को यह उपन्यास इतिहास के उस अनछुए पहलू के रूप में प्रस्तुत करता है, जहाँ पाठक को ज्ञात होता है कि स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास को जानने के बावजूद वह जंगल और गाँवों में बसे इन आदिम समाजों में अन्याय के विरूद्ध खड़े होने, कई छोटे बड़े विद्रोहों, उसे दबाने वाले अध्यायों से वह किस हद तक अपरिचित है। हरिराम मीणा ऐसे आदिवासी उपन्यासकार हैं जिन्होंने अपने उपन्यास के माध्यम से अतीत के इन्हीं अपठ्य रह गये पृष्ठों को खोला है। 
संप सभा का विस्तार, अनेक गाँवों में धूणी की स्थापना, संप सभा के विविध सम्मेलनों में वृहत् संख्या में आदिवासियों की भागीदारी, उनमें सतत विकसित चेतना का प्रभाव, मानगढ़ पहाड़ परआयोजित सम्मेलन ये सभी कारक आदिवासी असंतोष और  ब्रिटिश सरकार के हमले की पीठिका रचते  हैं। उपन्यासकार ने संप सभा के कार्यों के राज कोष पर विपरीत प्रभाव से चिंतित देसी रियासतों को अनेक अवसरों पर आदिवासी समुदाय गोविन्द गुरु की शिकायत करता हुआ दिखाया है। ये देसी रियासते निश्चित ही आदिवासियों को असभ्य, पिछड़ा  महत्त्वहीन मानती रही होंगी, जिससे बेगारी तो कराई जा सकती है किन्तु जिसे रियाया के अधिकार दिये जाने में कोताही बरती जाती है। बेगार, लगान का विरोध और वनोपज पर हक को राजविरोधी कृत्य माना जाना और सत्ता केन्द्रों गोविन्द गुरु द्वारा मध्यस्थता का प्रयास यह स्पष्ट करता है कि तत्समय आदिवासी समुदाय का असंतोष और प्रतिरोध मुखर था। 
                        वास्तव में एक तरफ आदिवासी समाज की गरीबी, भूख, अशिक्षा, बीमारी थी तो दूसरी ओर पुरखों द्वारा जारी बेगार की परंपरा या जिस खेती की जमीन को इस समुदाय ने स्वयं जंगल साफ करके निर्मित किया, उस पर लगान, लेवी लिये जाने  पर विरोध का तीव्र भाव, यह स्थिति कुरिया भगत जैसे विद्रोही व्यक्तित्व के लिएधूमालका सही समय था, जिसे प्रायः गोविन्द गुरु द्वारा संयमित किया जाता है। यहाँ गोविन्द गुरु के अतिरिक्त पूंजा धीरा, कुरिया, थावला जैसे कई चरित्र आदिवासी समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं। आदिवासी समाज, संप सभा के सदस्यों के क्रियाकलाप, देसी रियासतों महारावलों , जागीरदारों की गतिविधियों के समानांतर उपन्यास अंग्रेजी शासन  की छोटी छोटी इकाइयों की गतिविधियों, इसके स्थानीय स्वरूप को भी पाठक को उपलब्ध कराता है। जिसे केवल शासन करना और निर्बाध स्वार्थपूर्ति करते रहना अभीष्ट था। 
आदिवासी चेतना देसी रियासतों के राजकोष के लिए अनुकूल थी, ही अंग्रेजी शासन के वर्चस्व के लिए फलतः इस चेतना के जागृति केन्द्र गोविन्द गुरु का दोनों के ही निशाने पर होना स्वाभाविक था। वे सामाजिक सुधार, मानव कल्याण के कार्यों को शंका की निगाह से देखते थे। सत्ता केन्द्रों उनके अधीनस्थ जागीरदारों द्वारा किये जा रहे अत्याचार, स्त्री शोषण अन्याय पर गोविन्द गुरु की दृष्टि विरोध के फलस्वरूप धूणी स्थलों को नुकसान पहुँचाने, लगातार संघर्षपूर्ण स्थितियों के निर्माण, झूठे अपराध में गिरफ्तारी, धूणी सभा पर आदिवासी सम्मेलन पर पुलिस की चेतावनी आदि  सभी कारक यहाँ आदिवासी समाज में तीव्र रोष  के कारण रूप में उद्घृत हैं। इसे लेखक मानगढ़ नरसंहार की पृष्ठभूमि के रूप में विस्तार से दर्शाता है। इसी परिदृष्य में गोविन्द गुरु द्वारा मार्गशीर्ष की पूर्णिमा में मानगढ़ पहाड़ पर आयोजित मेले में अधिकाधिक संख्या में आदिवासियों को एकत्र होने हेतु आह्वान किया जाता है। इसे गोविन्द गुरु के नेतृत्व में शासन  के विरूद्ध बगावत की तरह देखा जाता है। 
                     उपन्यासकार इस स्थिति में गोविन्द गुरु को निरंतर संयमित, शांत और अहिंसा के समर्थक के रूप में दर्शाता है, यह स्थिति शासन पक्ष के अत्याचारों शोषण के चरम तक पहुँचने का प्रतिफल थी। गोविन्द गुरु की सतत संयमित प्रतिक्रिया  समझौते के प्रस्तावों तथा फौजी कमिश्नर बोरो द्वारा बातचीत द्वारा सुलह की आखिरी कोशिश असफल होती है। समझौता वार्ता हेतु  गोविन्द गुरु पत्र भेजते हैं किन्तु बड़ी संख्या में सशस्त्र सेना की तैनाती माहौल को तनावपूर्ण बनाती है। ब्रिटिश शासन द्वारा आदिवासियों की वृहद संख्या में सशस्त्र उपस्थिति को राजद्रोह मान कर मानगढ़ खाली कर गाँव लौटने को कहा जाता है किन्तु गोविन्द गुरु माँगें  मानने तक इस प्रस्ताव को नामंजूर करते हुए प्रथम आक्रमण से आदिवासी मोर्चे को रोकते हैं। ब्रिटिश शासन सत्रह नवंबर को मानगढ़ पहाड़ पर कई ओर से चढ़ाई करते हुए अकस्मात् आक्रमण करने की रणनीति  अपनाता है। फौज द्वारा अंधाधुंध फायर करने पर आदिवासियों द्वारा तैयार मोर्चा जल्दी ही बिखर जाता है। सैकड़ों निर्दोष आदिवासी स्त्रीपुरुष  हताहत होते हैं। मशीनगन एक बड़े नरसंहार को अंजाम देती है। गोविन्द गुरु की गिरफ्तारी के बावजूद उपन्यासकार कुरिया भगत को आदिवासी जत्थे के साथ सुरक्षित निकलता हुआ दिखाकर प्रतिरोध की चिंगारी को जीवित रखने में सफल होते हुए दर्शाता है। 
धूणी तपे तीरमें उपन्यासकार प्रमुख पात्र गोविन्द गुरु के रूप में वस्तुतः आदिवासी चेतनाऔर प्रतिरोध’  को ही नायक के रूप में प्रदर्शित करता है। इसके परिणामस्वरूप घटित नृशंस नरसंहार सत्ता की प्रवृत्ति नीयत को दर्शाता है। उल्लेखनीय है आदिवासियों द्वारा स्वायत्तता न्याय की मांग स्वाधीनता आंदोलन के समानांतर सुदूर जंगल, पहाड़ों से उठ रही थी। लेखक ने इतिहास में देसी रियासतों ब्रिटिश सत्ता की छोटी से छोटी इकाइयों के वास्तविक चेहरे को उद्घाटित करने का प्रयास किया है। आदिवासी चेतना और प्रतिरोध के अहिंसक रूप को गांधी जी के विचारों का प्रभाव भी कहा जा सकता है।  इतिहास में उपेक्षित मानगढ़ नरसंहार को सम्मुख लाने के साथ उपन्यास आदिवासी समाज के जमीनी यथार्थ और उसकी स्थितियों को भी विस्तार से जगह देता है। यह उपन्यास इतिहास में मानगढ़ पर्वत को आदिवासी चेतना पर वर्चस्व के हिंसक प्रहार के रूप में  देखने का प्रयास है।     
धूणी तपे तीरउपन्यास यदि राजस्थान के बांसवाड़ाडूंगरपुर क्षेत्र के आदिवासियों की आर्थिक, सामाजिक स्थिति और राजनैतिक चेतना को केन्द्र में रखकर इतिहास की एक उपेक्षित संवेदनशील घटना की कथा कहता है, तोडांगउपन्यास इसी राजस्थान की उस भौगोलिक भूमि की विषम और जटिल परिस्थितियों  को सम्मुख लाता है जहाँ अभिशप्त और रहस्यमयी कही जाने वाली चंबल नदी बहती है, जहाँ  धौलपुर, झालावाड़, राजाखेड़ा, करौली आदि की जमीन के यथार्थ की कई परतें हैं, जिनको यह उपन्यास खोलता है, जहाँ की विषमताएँ बागी तेवरों की जन्मदात्री हैं, जहाँ के दस्यु, शासनप्रशासन राजनेताओं से ज्यादा अपने हैं। सम्पूर्ण कृति में अधिकांश घटनाक्रम और उससे संबंधित कथाएं यदि एक ओर  अपना स्वतंत्र महत्त्व रखती है तो साथ ही डांग क्षेत्र के भूगोल के अलगअलग केन्द्रों  में घटित होकर भी अन्तर्सूत्र से परस्पर बंधी लगती हैं।डांग के चराचर जीवनवृत्त’  में लेखक ने यहाँ की प्रकृति, दुर्गप्रासाद, मंदिर, बीहड़ जंगल, पशुपक्षी, ऋतुओं, पर्वों, लोक जीवन, दस्युसमस्या, प्रशासन, दलाल, राजनेता, पत्रकार, आपराधिक , असामाजिक तत्त्वों के समवेत रूप को उपन्यास में पिरोया है, जहाँ विविधताओं से पूर्ण मरूस्थल सा कठिन मनुष्य जीवन है। 
           इस डांग क्षेत्र उसके जनजीवन को स्वयं लेखक इस दृष्टि से देखता है– ‘‘जितना बदमाश इलाका है डांग का उतना ही भोला। आदमी की आदमियत हर तरफ झलकती है। इस आदमियत के दो छोर है एक से बदमाशी और दूसरे से नेकमाशी पैदा होती रहती है। यह बात मनुष्यों पर ही नहीं बल्कि पूरी भौगोलिकता पर लागू हो रही है। नेता हैं, सेठ हैं, अफसर हैं, उनके भ्रमण हैं, उनके केंप लगते हैं, जनकल्याणकारी  संगठनों के बहुप्रचारित कार्यक्रमों के उद्घाटन होते हैं और उनके साथ होता है पूरा का पूरा सरकारी लवाज़मा, सजावट, ढोलढमाकामीडिया लेकिन भौतिक यथास्थिति  बरकरार है। सरकारी नीतियाँ हैं, योजनाएँ हैं, बजट है, फाइलें बनती हैं, निस्तारित होती हैं किन्तु लोगों की जीवन-दशा में कोई परिवर्तन नहीं।’’ (पृष्ठ 73)  स्पष्टतः उपन्यास यह रेखांकित करता है कि दुनिया की प्रगति के बरअक्स डांग क्षेत्र की सुई ठहर गयी है। कोई परिवर्तन नहीं। सुविधाओं का अभाव और विपन्नता यहाँ की वास्तविकता है। सारे बदलाव विशिष्ट वर्ग के खाते में अर्थात् खास की खुशहाली, आम की बदहाली। खास की धूर्तता, आम की सरलता  
          भौतिक, आर्थिक विकास से वंचित यह क्षेत्र व्यवस्था की अनदेखी का शिकार है। यहाँ डाकुओं का जन्म बहुत हद तक विवशता   के कारण होता है।  उपन्यासकार ने डांग के परिवेश और उसके प्रभाव को इस तरह विस्तारपूर्वक दर्शाया है– ‘‘इस डांग में दस्युओं का जन्म अभाव और अन्याय की धरती से होता रहा है। डाकू बनना कोई नहीं चाहता। यह भौतिक विवशता   है जो ताकतवर होते होतेनायकत्वकी छवि ग्रहण करने लगती है। दस्यु कितना भी बुरा हो, किन्तु डांग का यथार्थ यह है कि यह सेठ, साहूकारों और राजनेता अफसरों से बुरा नहीं होता।’’ (पृष्ठ 76) ‘डांगउपन्यास की विविध कथाएँ इन्हीं टिप्पणियों को प्रतिपादित करती चलती है। उमराव गूजर जैसे नौजवान के दस्यु बनने की स्थितियाँ इसकी बानगी प्रस्तुत करती है। वहीं डाकू मोहर सिंह का कथनजब तक अन्याय है, बागी पैदा होते रहेंगे’, भी यह सिद्ध करता है कि अन्याय, शोषण  से   विवश   होकर, जमींदारों के खिलाफ बगावत करके कई सामान्य व्यक्ति बागी बनते गये।  अन्याय की यह  शृंखला घुमंतू समुदाय की नटनीअमलीतक जाती है। 
इस उपन्यास में एक ओर दस्यु रामदुलारे शर्मा द्वारा पुलिस डी.आई.जी. के रूप में बैंक डकैती की कथा सन्निहित है तो  वहीं फिरौती के लिए चार वर्षीय बच्चे के अपहरणकर्ता के रूप में महेन्द्र सिंह फौजी की कथा भी यहाँ कही गयी है। डकैत बाबू गूजर, जगन गूजर, जसंवत गूजर, सरताम सिंह गूजर के किस्से हों या मीणागूज़र टकराव से उत्पन्न जातीय वैमनस्य संघर्ष या पुराने फौजी रहे दस्यु जगबीर सिंह गूजर में उत्पन्न देशप्रेम या फिर डाकू रामसिंह गूजर और सूरज मीणा में गैंगवारयह उपन्यास विविधवर्णी किस्सों से आकार ग्रहण करता है। कई सामाजिक कारण, सरकारी व्यवस्था, सत्ता केन्द्रों की मिलीभगत  और स्वार्थ सिद्धि आदि ऐसे कारण थे कि अभिशप्त चंबल की धरती में दस्यु कुल पर कभी विराम नहीं लगा। पुलिस आदि के कारण शांतिप्रिय जीवन जीने वाले नागरिक तक बदला लेने के लिए हथियार उठाते रहे। जगजीवन परिहार, बागी नारायण से लेकर मलखान सिंह डकैत तक इस श्रेणी में आते हैं। ऐसे समय पुलिस खुद अपनी कमाई के कारण इस समस्या का अंत नहीं चाहती थी। लेखक ने यहाँ खुलकर  व्यवस्था और राजनीति की तिकड़मों को सम्मुख लाने का कार्य किया है। दस्यु उन्मूलन की गुप्त खबरें पहुँचाना हो या डकैतों को प्रश्रय देना, चंबल की जटिल परिस्थितियों के साथ व्यवस्था का चरित्र दिखाने में लेखक ने कोताही नहीं बरती। इन्ही स्थितियों में यह मलखान सिंह, मोहर सिंह, पुतली बाई, सरदार कल्लन, सुल्तान सिंह, पंचम सिंह की जन्मस्थली बनी। यहाँ बाद में दस्यु बजरीरेत माफिया, चौथ वसूली, अपहरणकर्ता से लेकर राजनेता तक बनते रहे। हालांकि डांग क्षेत्र मेंसाहसिक पर्यटन’, चंबल सफारी नाम से पर्यटन शुरु किये जाने से लेकर दस्यु निरपराधीकरण, दस्यु उन्मूलन, आत्मसमर्पण, अभयारण्य और विकास से परिवर्तित छवियों को भी उपन्यासकार कृति के उत्तरार्ध में रेखांकित करता है। 
इस रचना में दस्यु और व्यवस्था के कई चरित्र अंकित हैं किन्तु संत हरजीनाथ, पत्रकार प्रेमराज तिवारी और पुलिस महानिदेशक पी. जगन्नाथन  तीन ऐसे चरित्र हैं जो पूरी कृति में यत्रतत्र उपस्थित हैं, अन्यथा शेष  उपन्यास में स्वतंत्र घटनाक्रम और स्थिति के अनुसार भिन्न भिन्न  पात्र सम्मुख आते हैं। डांग और चंबल क्षेत्र का स्थानीय संसार , प्रकृति, परिवेश, देशकाल, जनजीवन, विविध पात्र, कथाएँ, समस्याएँ और चुनौतियाँ यहाँ प्रतिबिंबित है। वस्तुतःडांगशब्द ही एक निश्चित भूगोल को इंगित करता है, यह उपन्यास इसी भूगोल के कई रंगों से निर्मित हैं प्रत्येक घटनाक्रम स्वतंत्र भी है और दस्यु समस्या से संबंधित भी। किन्तु अपने इसी रंग चरित्रों द्वारा वह डांग क्षेत्र को अपने वैशिष्ट्य, विडंबनाओं, विसंगतियों के समवेत रूप से आकार देता है।  यहाँ सभी दस्यु बुरे नहीं हैं, व्यवस्था और व्यवस्था की नियंत्रक शक्तियाँ असली दस्यु हैं। यह उपन्यास कुछ पात्रों और किसी प्रमुख कथा या उपकथा से भी नहीं बंधा है। यहाँ पात्र अलगअलग रंगों के हैं किन्तु प्रायः सभी स्थितियों, घटनाओं, चरित्रों के पीछे परिवेश या परिदृष्य एक ही काम कर रहा है। परस्पर जुड़कर भी यहाँ प्रस्तुत लघु कथाएँ एक दूसरे के साथ खड़ी होकर अपनी अन्तर्सूत्रता में एक बड़ा फलक बनाती हैं। डांग क्षेत्र का लोक, देश, काल, प्रकृति, परिवेश यहाँ प्रसरित है। प्रत्येक डकैत  एक स्वतंत्र चरित्र है और उसके समानांतर है प्रशासन, परिस्थितियाँ, जनजीवन और उत्पीड़न के कई कई रूप अभिशप्त चंबल की बीहड़  परिस्थितियाँ और बीहड़ जीवन को यह उपन्यास अपने छोटे कलेवर में ही भरपूर विस्तार देने में समर्थ सिद्ध हुआ है। स्पष्ट है कि अंचल विशेष की भिन्न भिन्न कथाएँ मानवीय संवेदनाओं के कई द्वार खोलती हैं। 
सत्ता के केन्द्र चाहे राजनैतिक हो या सामाजिक, अन्याय और शोषण उसकी मूल प्रवृत्ति रही है। यह अन्याय यदि आदिवासियों के साथ होता रहा है तो स्त्रियों के साथ भी। इसके प्रतिरोध स्वरूप मानगढ़  नरसंहार घटित होता रहा है तो कई बार बगावत करके चंबल के बीहड़ में शरण भी ली गयी है।धूणी तपे तीरऔरडांगजैसे उपन्यास के बाद लगभग उसी भूगोल (धौलपुर) से हरिराम मीणा अन्याय और शोषण के एक और दृश्य को रचते हुएब्लेक होल में स्त्री’  (2023)  उपन्यास प्रस्तुत करते हैं। इस तीसरे उपन्यास के केन्द्र में स्त्री देह शोषण है जो समाज में कई रूपों में विद्यमान रहा है। घुमंतू बेड़िया समाज की कुप्रथा जिस्मफरोशी को केन्द्र बनाकर इस उपन्यास का वस्तु पक्ष गढ़ा गया है। 
            पितृसत्तात्मक समाज ने स्त्री उत्पीड़न के कई रूप गढ़े हैं, इसमें उसकी देह सर्वाधिक शिकार बनी है। आभिजात्य परिवार की निशा का दुर्घटनावश पूनम बेड़िन के हत्थे चढ़ जाना और उमा नाम में रूपांतरित की जाकर देह व्यवसाय में झोंक दिया जाना, इसी उत्पीड़न , अन्याय और शोषण का कटु रूप है। वह डांग क्षेत्र जिससे संबंधित दस्यु कथाओं को लेखक ने पूर्व में प्रस्तुत किया, उसी क्षेत्र के धौलपुर के बेड़िया समुदाय  में प्रचलित जिस्मफरोशी की शिकार निशा की सतीश द्वारानथ उतराईसे प्रारंभ यह कथा मुंबई की बार नृत्यांगना बनने और वेश्यावृत्ति उन्मूलन से जुड़ने तक जाती है।      
            पूरे उपन्यास में लेखक  देह व्यापार, पुरुष  की कामनाओं, स्त्री की स्थिति अन्तर्द्वन्द्व पर   विशदता से विचार करता चलता है। ऋषिमुनियों, राजामहाराजाओं से लेकर पुलिसमजिस्ट्रेट तक की वास्तविकता से पर्दा हटाने का कार्य यहाँ किया गया है। पूरे उपन्यास में निशा के दैहिक संघर्ष के समानांतर मानस के द्वन्द्व को पौराणिक आख्यानों, ऐतिहासक संदर्भों वर्तमान की विसंगतियों के साथ जोड़कर स्त्री उत्पीड़न के अतीत वर्तमान को देखासमझा गया हैं तथा मुंबई के कमाठीपुरा से लेकर राजस्थान के होपपुरा, कलकत्ता के सोनागाछी  तक की स्त्रियों के दर्द, समस्याओं पर दृष्टि डाली गयी है। निशा की पीड़ा, आत्मसंघर्ष को दिखलाने के लिए लेखक बारबार आख्यानों और इतिहास की ओर जाता है। स्त्री शोषण उत्पीड़न से जुड़े कईकई नाम इस उपन्यास में प्रयुक्त हुए हैं, देह शोषण के अनेकानेक संदर्भ एक साथ बहुतायत में यहाँ  नत्थी कर दिये गये हैं। कई बार संदर्भों का अतिरेक मूलकथा को अवरुद्ध भी करता है।डांगउपन्यास के दस्यु उन्मूलन की तरह इस उपन्यास का चरम भी वेश्यावृत्ति उन्मूलन की दिशा की ओर जाता है।  
बहरहाल, हरिराम मीणा अपने तीनों उपन्यास में समाज के उपेक्षित पक्ष को अपनी लेखनी का केन्द्र बनाते हैं। आदिवासी समाज, बागी जीवन और जिस्मफरोशी के लिए विवश समुदाय के जीवन संघर्ष पर विस्तृत दृष्टि डालते हुये वे शोधपूर्ण अध्ययन से विषय की गहराई में उतरने का प्रयास करते दिखते हैं।धूणी तपे तीरउपन्यास में यदि वे इतिहास में ब्रिटिशकालीन भारत के समय में प्रवेश करते हैं तोडांगउपन्यास में राजस्थान के विशिष्ट क्षेत्र के अतीत के पन्ने खोलते हैं औरब्लेक होल में स्त्री’  उपन्यास के द्वारा अपने समय के विसंगत वर्तमान में हस्तक्षेप करते हैं। एक ओर वे आदिवासी जीवन संघर्ष के उपेक्षित अतीत को लिखित बाना पहनाते हैं  तो दूसरी ओर वे दस्यु जीवन और स्त्रीमन की संवेदना भूमि को कईकई कोण से देखते दिखाते हैं। निश्चित ही उनकी इन कृतियों के भीतर व्यक्त तनाव, भविष्य में बेहतर और न्यायपूर्ण दुनिया की मांग तो करता ही है
पुनीता जैन
प्राध्यापकहिन्दी
बाबूलाल गौर शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय 
भेल, भोपाल  मो. 9425010223
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2 टिप्पणी

  1. काफी लम्बा लेख है पुनीता जी! यह लेख ऐसा नहीं है जिसे सहजता से और सरलता से पढ़ा जा सके फिर भी हमने इसे आधा तो पूरा ही पूरा पढ़ा है ।आधे पर अभी सरसरी
    दृष्टि डाली है ।लेकिन इसको बहुत ध्यान से, समय लेकर एकाग्रता से पूरा पढ़ना बहुत जरूरी है। हरिराम मीणा द्वारा गोविन्द गुरु को केन्द्र में रखकर लिखे गए उपन्यास “धूणी तपे तीर” में आदिवासियों के बारे में लिखा गया सच स्तब्ध करता है। हमने दलितों पर लिखी बजरंग बिहारी तिवारी की पुस्तक “केरल का सामाजिक आन्दोलन और दलित साहित्य” को जब पढ़ा था तो हम स्तब्ध हो गए थे ।हम कल्पना भी नहीं कर सकते कि सामंतवादी लोग और उनकी सोच और अपने आप को भगवान के ठेकेदार मानने वाले पुजारी और पंडित लोग दलितों को इंसान ही नहीं समझते थे उनके प्रति होने वाले अत्याचारों ने दिल दहला दिया था। हमको काफी वक्त लगा उस किताब को पढ़ने में। क्योंकि कई पेज तो ऐसे थे जिनको पढ़ने के बाद मन इतना विचलित हुआ कि कई दिन उस किताब को उठाया ही नहीं।
    आज इस लेख को पढ़ने के बाद भी वही स्थिति है। उड़ीसा और छत्तीसगढ़ में रहते हुए हमने वहाँ के आदिवासियों की स्थिति को बचपन में देखा था पर आज भी मानस पटल पर जीवित हैं वो दृश्य।
    हर बार यह बात लगती है कि इंसान बस इंसान भर नहीं हो पता और नृशंसता के मामले में जानवर बनने में वह कोई कसर नहीं छोड़ता।
    इस तरह की लेख हमें बहुत तकलीफ देते हैं। अपने आप से एक युद्ध करते हुए महसूस करते हैं। ऐसा लगता है कि क्या करें कि परिवर्तन हो जाए।
    बचपन से किशोरावस्था तक हम राजस्थान में ही रहे आसपास के गांँवों में घूम कर हमने वहाँ की सामाजिक स्थिति को समझने का प्रयास किया है। जहाँ तक याद है जब हम आठवीं क्लास में थे तब हम लोगों को सप्ताह में एक बार के हिसाब से कब से कम से कम चार- पांच बार वहाँ के गाँवों में जागृति लाने के उद्देश्य से जाना होता था। शिक्षा का महत्व समझाना। साफ-सफाई का महत्व समझाना।उनकी समस्याओं को सुनना व समझना। समाधान का रास्ता सुझाना। यह काम था। वनस्थली की पंचमुखी शिक्षा पर गाँधी जी का प्रभाव सील ठप्पे की तरह था। किसी तरह के किसी काम को करने में हम लोगों ने कभी शर्म महसूस नहीं की । किसी काम के लिए ना कहना नहीं सीखा। राजस्थान की कोई भी बात हमें अपने घर की बात सी लगती है।
    मोबाइल में बहुत लंबा एक साथ पढ़ना आजकल तकलीफदेह लगता है।फिर भी हम इसे फिर पढ़ेंगे। हम उपन्यास भी पढ़ना चाहेंगे।
    एक महत्वपूर्ण लेख पढ़वाकर आपने हमें उपकृत किया।
    इस लेख के लिए पुरवाई का तहेदिल से शुक्रिया।

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