परमसत्ता की महत्ता को रेखांकित करने के लिए यत्र–तत्र उसको कालातीत भी कहा जाता है। सृष्टि निर्माण में समय के योगदान को स्वीकार करते हुए प्राचीन आचार्यों ने लिखा—जल की अवस्था से उन्नत होकर इस जगत का विकास समय, संवत्सर अथवा वर्ष, इच्छा या काम,एवं बुद्धिरूपी पुरुष तथा तप की शक्तियों से हुआ था।’ (भा।द। पृष्ठ 83)। इसमें समय तथा ‘संवत्सर अथवा वर्ष’को अलग–अलग लिखा हुआ है। जबकि व्यवहार में संवत्सर और वर्ष समय के ही मात्रक हैं।
समय को लेकर वैदिक आचार्यों की दो स्पष्ट प्रतीतियां थीं। पहली उसे अनंत, ब्रह्मांडनुमा सत्ता मानती थी। उसके अनुसार समय को स्थिर, विचलनहीन और अनंत विस्तारयुक्त सत्ता माना गया, जिसमें सबकुछ घटता रहता है। जो घटनाओं का क्रमानुक्रम मात्र न होकर अंतहीन त्रिविमीय फैलाव है। चराचर जगत का सहयात्री न होकर सर्वस्व द्रष्टा है। जिसका न आदि है न अंत। जो इतना विस्तृत है कि कोटिक कोटि ग्रह–नक्षत्र–नीहारिकाएं उसमें सतत गतिमान रहती हैं—या जो कोटिक घटनाओं, गतियों का एकमात्र द्रष्टा एवं साक्षी है।
दूसरी प्रतीति के अनुसार समय भूत, वर्तमान तथा भविष्य के रूप में परिलक्षित होने वाली,नदी–सम निरंतर प्रवाहशील एकविमीय संरचना है। घटनाओं के साथ घटते जाना उसका स्वभाव है। वह न केवल घटनाओं के क्रमानुक्रम का साक्षी है, बल्कि उनका हिसाब भी रखता है।मगर है आदि–अंत से परे। उनकी न शुरुआत है न ही अंत।समय को लेकर ये दोनों ही धारणाएं कमोबेश आज भी उसी रूप में विद्यमान हैं। इस तरह यह संभवतः अकेली अवधारणा है जिसके बारे में मनुष्य के विचारों में शुरू से आज तक बहुत कम परिवर्तन हुआ है।
इतना अवश्य है कि समय जब तक दर्शन का विषय था, तब तक उसे लेकर वस्तुनिष्ठ ढंग से विचार होता रहा। विशेषकर जैन और बौद्ध दर्शन में समय की सत्ता पर गंभीर चिंतन हुआ। कालांतर में समय के दार्शनिक–वैज्ञानिक पक्ष पर विचार करने के बजाय केवल उसके व्यावहारिक पक्ष पर विमर्श होता रहा। आगे चलकर जीवन में स्पर्धा और सामाजिक विभाजनकारी स्थितियां बढ़ीं तो पोंगा पंडितों ने समय को प्रारब्ध से जोड़ दिया।

एक निरपेक्ष सत्ता को नियामक सत्ता मान लिया गया। इससे मानवमन में समय के प्रति अतिरिक्त श्रद्धाभाव उमड़ने लगा। उसके पीछे समय को जानने की वांछा कम, डर और समर्पण का अंश कहीं अधिक था। समय के प्रति डर,अविश्वास एवं स्थूल चिंतन का दुष्प्रभाव यह हुआ कि उसे लेकर दार्शनिक चिंतन लगभग ठहर–सा गया। इससे उन पोंगापंथियों को सहारा मिला जो समय को लेकर लोगों को डराते थे।
समय का बोध मानवीय बोध के साथ जन्मा और उतना ही पुराना है। सवाल है कि समय की उत्पत्ति कब हुई? क्या समयबोध के साथ? अथवा उससे पहले? इस मामले में वैदिक ऋषि और वैज्ञानिक दोनों एकमत थे कि समय का जन्म सृष्टि के जन्म के साथ हुआ। उससे पहले समय की कोई सत्ता नहीं थी। हालांकि दोनों की मान्यताओं का आधार अलग–अलग है। स्वाभाविक रूप से वैज्ञानिक इसकी व्याख्या तार्किक आधार पर करना चाहते हैं, जबकि वैदिक आचार्यों का द्रष्टिकोण अध्यात्म–प्रेरित था।
अंतरिक्षीय महाविस्फोट द्वारा सृष्टि–रचना के सिद्धांत में विश्वास रखने वाले वैज्ञानिक मानते हैं कि उससे पहले ब्रह्मांड अति उच्च संपीडन की अवस्था में था। इस तरह विज्ञान की दृष्टि में ब्रह्मांड और समय दोनों एक ही घटना का उत्स हैं, जिसे वैज्ञानिक महाविस्फोट का नाम देते हैं। इसलिए ‘समय का संक्षिप्त इतिहास’ लिखने के बहाने स्टीफन हाकिंग जैसे वैज्ञानिक प्रकारांतर में इस ब्रह्मांड का ही इतिहास लिख रहे होते हैं।ब्रह्मांड के जन्म की घटना से पहले समय की उपस्थिति को नकारना वैज्ञानिकों की मजबूरी थी। क्योंकि उससे पहले समय की उपस्थिति स्वीकार करने के लिए उनके पास कोई तार्किक आधार नहीं था।
समय ही प्रतीति घटित होने से जुड़ी हुई है और उच्च संपीडन की अवस्था में घटना का आधार ही गायब था। ऐसा कोई कारण नहीं था जिससे समय की उपस्थिति प्रमाणित हो सके। समय के बारे में एक महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक द्रष्टिकोण आइंस्टाइन के शोध में मिलता है। सापेक्षिकता के सिद्धांत की खोज के बाद घटना विशेष के संदर्भ में दिक् और काल को अपरिवर्तनशील एवं निरपेक्ष मानना संभव नहीं रह गया था। वे प्रभावशाली मात्राएं बन गई थीं, जिनका स्वरूप पदार्थ और ऊर्जा पर निर्भर था।
सापेक्षिकता का सिद्धांत महाविस्फोट से पहले समय की संभावना को नकारता है। उसके अनुसार समय और दिक् की परिकल्पना केवल ब्रह्मांड के भीतर रहकर संभव है। उससे पहले चूंकि घटनाओं के बारे में कुछ भी दावे के साथ नहीं कहा सकता,अतएव यह माना गया कि समय की परिकल्पना केवल ब्रह्मांड की संभावनाओं में संभव है। इसके बावजूद समय की निरपेक्ष तस्वीर कुछ वैज्ञानिकों को आज भी लुभाती है।हालांकि 1915 में आइंस्टीन द्वारा जनरल थ्योरी आफ रिलेटिविटी का क्रांतिकारी सिद्धांत पेश होने के बाद उसपर दृढ़ रहना आसान नहीं रह गया था।
सापेक्षिकता के सिद्धांत को स्वीकृति मिलने के बाद स्पेस और टाइम किसी घटना के स्थिर आधार जैसे अपरिवर्तनशील और निरपेक्ष नहीं रह गए।बल्कि वे बेहद प्रभावशाली मात्राएं बन गईं, जिनकी रूपरेखा पदार्थ और ऊर्जा से तय होती है। यह मान लिया गया कि दिक्, काल की व्याख्या केवल ब्रह्मांडीय सीमाओं में संभव है।तदनुसार ब्रह्मांड के जन्म से पहले दिक्, काल की परिकल्पना करना बिल्कुल बेमानी हो गया|
डॉ. राधाकृष्णन के अनुसार—ऋग्वेद की प्रवृत्ति एक सीधा–सादा–सरल यथार्थवाद है…।(वह) केवल एक जल की ही परिकल्पना करता है। वही आदिमहाभूत है, जिससे धीरे–धीरे दूसरे तत्वों का विकास हुआ।’ (भा. द. पृष्ठ 83)। लेकिन सृष्टि की रचना अकेले जल द्वारा संभव न थी। जल की अवस्था से आकाश, अग्नि, जल, वायु के विकास के बीच सुदीर्घ अंतराल है।
नासदीय सूक्त के अनुसार आरंभ में न दिन था न रात। इसलिए समय का बोध कराने वाले भूत–भविष्य आदि का भी लोप था। इस तरह महाशून्य अवस्था से दिन–रात से भरपूर ब्रह्मांड में आने के बीच जो लाखों, करोड़ों वर्ष बीते, उनसे समय की उपस्थिति स्वतः सिद्ध है। कह सकते हैं कि सृष्टि के निर्माण में पंच–तत्वों के सहयोग के अलावा समय का भी योगदान रहा। वैदिक ऋषियों को लगा होगा कि सतत परिवर्तनशील जगत की व्याख्या के लिए अंतरिक्ष अपर्याप्त है। उससे सृष्टि के विस्तार और व्याप्ति की परिकल्पना तो संभव है, मगर चराचर जगत की परिवर्तनशीलता एवं क्रमानुक्रम की व्याख्या के लिए, कुछ ऐसा भी होना चाहिए जो अंतरिक्ष जैसा अनादि–अनंत होकर भी वस्तुजगत की गतिशीलता की परख करने में सक्षम हो।
अंतरिक्षनुमा होकर भी उससे भिन्न हो। जिसमें वह अपने होने को सार्थक कर सके। अपनी चेतना को दर्शा सके। जिसके माध्यम से घटनाओं के क्रम तथा उनके वेग आदि की व्याख्या भी संभव हो। जो सकल ब्रह्मांड के चैतन्य का साक्षी,उसकी गतिशीलता का परिचायक एवं संवाहक हो।यह धारणा भी बनी रही कि चराचर जगत में जो कुछ बनता–मिटता है, समय उसका साक्षी है। काल नहीं मिटता, हम ही बनते–मिटते हैं—कहकर समय की परमसत्ता को स्वीकृति दी गई। उसे अजेय माना गया।

