Sunday, July 21, 2024
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डॉ प्रवीण कुमार अंशुमान का लेख – दृश्यम 2 मात्र एक फ़िल्म नहीं है!

दृश्यम 2, मात्र एक फ़िल्म नहीं है। ये अपने आप में एक क्लास है; एक ऐसा क्लास जो हमारे जीवन की एक ऐसी सच्चाई को बयाँ करता है, जो किसी की भी फेमिली के साथ कभी भी घट सकती है और जिसके कारण किसी का भी परिवार पूरा का पूरा बर्बाद हो सकता है।
मगर दृश्यम 2 को भूलकर भी इसके पहले भाग #दृश्यम को बिना देखे, देखने मत चले जाइएगा वरना फ़िल्म का सारा मज़ा किरकिरा हो जाएगा और फ़िल्म कुछ भी समझ में न आ सकेगी।
अजीब है कि हमारे कानून में उस व्यक्ति को भी सजा दे दी जाती है जिससे अनजाने में कोई अपराध हो जाता है । जो घटना अनजाने में घट जाए, और जिसके लिए व्यक्ति वस्तुतः जिम्मेदार न हो, उसके लिए सजा पाना कहाँ का न्याय है? मगर हमारी न्याय-व्यवस्था में अभी तक शायद ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जिससे कि अनजाने में घटी घटनाओं के लिए व्यक्ति को बरी किया जाय; उसे सुकून से रहने दिया जाय; उसे और उसकी फेमिली को कभी तंग न होने दिया जाए।
ऐसी परिस्थिति में व्यक्ति की अपनी सूझबूझ ही उसकी मुक्ति का मार्ग बन सकती है। इसी सूझबूझ की पराकाष्ठा का अप्रतिम उदाहरण है #दृश्यम 2, जिसकी कहानी एक साधारण फ़िल्म की तरह लगभग अंत तक जाती है। आश्चर्य और दुःख होता है कि अपनी फैमिली को बचाने वाल विजय सलगांवकर (मुख्य किरदार) का अंतिम हस्र यही होना था। इसमें कुछ भी नया नहीं था। इसमें कुछ भी ख़ुश होने जैसा नहीं था। क्योंकि एक ऐसे व्यक्ति को सजा मिलने जा रही थी, जिसने अपराध नहीं किया था। और जिस (अपनी) फेमिली को बचाकर उसने सारा इल्ज़ाम अपने सिर पर लिया, वो परिवार भी अनजाने में उस घटना का शिकार हो जाता है, जिसे न तो वे कभी करना चाहते थे, न करने की ज़रा-सी भी मंशा रखते थे।
यह बात ही ऑडियंस को पचती ही नहीं है कि विजय, जिसकी कहानी पुलिस विभाग को पूरी पता थी और जिसे साबित करने में वे पूरे के पूरे नाक़ाम थे, को अंततः आत्मसमर्पण करना पड़ा। क्योंकि इस फ़िल्म की सबसे बड़ी ख़ास बात ही यही है कि उस गुनाह के लिए किसी व्यक्ति को सजा क्यूँ जिसे उसने जानबूझकर किया ही न हो। मगर विजय की इस मजबूरी को देखकर ऑडियंस को बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता है और तभी फ़िल्म में आता है कभी न सोचा जाने वाला एक ऐसा ट्विस्ट या यूँ कहूँ कि ट्विस्ट पर ट्विस्ट जो फ़िल्म की पूरी पटकथा को तोड़मरोड़कर रख देता है और पूरे पुलिस विभाग को चारों खाने चित्त कर देता है, उस विभाग को जो पूर्व आई.जी. मिसेस देशमुख के बेटे की काली करतूतों पर एक तरफ़ पर्दा डालने की कोशिश करती है और दूसरी तरफ़ विजय और उसकी फेमिली को हवालात में डालने की। मगर मुख्य किरदार विजय अपनी बुद्धि और परिवार के प्रति प्रेम के बल पल अपने परिवार के साथ ख़ुद को भी बचाने का सफल कार्य करता है।
फ़िल्म में, विजय ने अपने परिवार के प्रति अपने प्रेम को प्रकट किया, ख़ुद को बचाकर यह साबित किया कि यदि उसने गुनाह नहीं किया है तो उसे सजा नहीं मिलनी चाहिए, और साथ ही देशमुख परिवार को उनके मरे हुए पुत्र की अस्थियाँ लौटाकर उन जैसे अभागे माता-पिता पर मानवता की दृष्टि से उपकार भी किया। मगर देशमुख परिवार ने यह उपकार विजय पर नहीं किया। फ़िल्म के पहले भाग #दृश्यम में यह जानने के बाद कि उनका बेटा कैसा था, जिसके कारण वह उस घटना का शिकार हो जाता है जिसमें विजय की फेमिली अनजाने में फँस जाती है, वो विजय से बदला लेने पर उतारू हो जाते हैं। मगर विजय ने अपनी दूरदर्शिता से वो प्लान रचा था जिससे हर कोई विजय को बस सल्यूट ही कर सकता है।
विजय की बात मन में हमेशा गूँजती है – “आदमी की तीन दुनियाँ होती हैं। एक, उसके भीतर की। दूसरी, उसके बाहर की। और तीसरी, इस दोनों के बीच जो वो अपनी एक दुनियाँ बनाता है।”
“आदमी अपनी फैमिली के बिना नहीं रह सकता। उसको बचाने के लिए वो कुछ भी कर सकता है। और इसमें कुछ भी गलत या सही नहीं है।”
फ़िल्म की सबसे बड़ी खूबसूरत बात यह है कि वो किसी क्राइम का बचाव नहीं कर रही है। शायद विजय इस तरह से नहीं करता यदि कोई व्यक्ति सचमुच किसी क्राइम को अंजाम देता। विजय एक अनजाने में घटी घटना से ख़ुद को और अपनी फैमिली को बचा रहा है, जिससे बचने के रास्ते कानून की दुनियाँ में नहीं है। और न ही इसे बताने पर कोई भी ऑफ़िसर इसे समझकर उसे बरी करने वाला है। इसलिए विजय का एक-एक क़दम उसके लिए मुक्तिदायी सिद्ध होता है और ऑडियंस को पुलिस की असफलता पर अत्यंत ख़ुशी मिलती है।
अजय देवगन की अदाकारी का क्या कहना! उनकी अदाकारी की वजह से तो इस फ़िल्म का स्तर बहुत ही ऊँचा उठ जाता है। और फ़िल्म! फ़िल्म तो अद्भुत है। अंतिम 15 मिनट तो ऐसे हैं कि पहली दृश्यम को यदि 10 गुना और धारदार बनाएंगे तब जाकर शायद दृश्यम 2 का मुकाबला कर सके।
मगर इन सबके बाद दृश्यम और दृश्यम 2 दोनों ने हमारे सामने एक सवाल छोड़ा है जिसका जवाब यदि न मिले, तो ऐसी फ़िल्मों को बनाने का मक़सद खो जाता है। वह सवाल है – “अपने बचाव में अनजाने में किसी घटना का घट जाना? उसे अपराध मानना। उसे अपराध मानकर उन अमुक व्यक्तियों को सजा देना। उनकी साधारण-सी ज़िन्दगी को बर्बाद कर देना।
विजय बहुत बुद्धिमान था। वो बहुत दूर तक की सोच लेता था। वो कुछ बातों को किसी से भी नहीं कहने की क्षमता रखता था। मगर हर कोई तो ऐसा नहीं होता। अगर विजय इतना दूरदर्शी न होता तो? अगर विजय अपने दिल की बात अपनी पत्नी से कह देता तो?
कहने का आशय बस इतना-सा है कि विजय के परिवार की क्या गलती है जब कोई उसके परिवार पर बुरी नज़र डालता है? क्या गलती है जब वे लोग अपनी रक्षा करने की कोशिश करते हैं? क्या गलती है जब ख़ुद को बचाने के प्रयास में उस दानव की मृत्यु हो जाती है? उसकी मृत्यु के लिए तो वह स्वयं ही जिम्मेदार है। उसके लिए विजय की फेमिली कैसे जिम्मेदार हो सकती है? उस दानव ने एक परिवार की बेटी का बाथरूम में वीडियो बनाया, उस अमुक लड़की से सौदा करना चाहा, उसका और उसकी माँ का शोषण करना चाहा। ये सारी बातें तर्क-वितर्क एवं विचार-विमर्श से क्यूँ बाहर हैं? यदि वह दानव विजय की फेमिली को परेशान नहीं करता, उसके घर पर उनको शोषण करने के दृष्टि से न जाता, तो क्या विजय की फैमिली कभी इस घटना का शिकार बनती? वह दानव विजय की फैमिली के घर यदि आता है तो क्या इसमें विजय की फेमिली की गलती है? उनका शोषण करना चाहता है तो क्या विजय की फेमिली की गलती है? जब विजय की फेमिली की गलती ही नहीं है तो उन्हें सजा क्यूँ?
दृश्यम और दृश्यम 2 ने एक वाज़िब प्रश्न खड़ा कर दिया है कि हमारे कानून में यदि यह प्रावधान नहीं है तो इसका प्रावधान होना चाहिए कि अनजाने में घटी घटनाओं के लिए न कोई व्यक्ति कभी परेशान हो और न ही उसका परिवार कभी उसका शिकार हो। और यदि किसी की करतूतों का शिकार एक सामान्य परिवार हो जाता है, तो उस करतूत करने वाले या उससे सम्बन्धित लोगों को ऐसी सजा का प्रावधान हो कि किसी परिवार पर बुरी नज़र डालने वाले की रूह कांप जाए। तब जाकर #दृश्यम वह दृश्य दिखाने में क़ामयाब हो पाएगी जिसे वह दिखाना चाहती है।
डॉ प्रवीण कुमार अंशुमान
डॉ प्रवीण कुमार अंशुमान
डॉ० प्रवीण कुमार अंशुमान असोसिएट प्रोफ़ेसर अंग्रेज़ी विभाग किरोड़ीमल महाविद्यालय दिल्ली विश्वविद्यालय। ईमेल: [email protected]
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