Wednesday, July 24, 2024
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रश्मि रविजा का लेख – फील्ड मार्शल सैम मानेकशा

1942 में द्वितीय विश्वयुद्ध चल रहा था. बर्मा में भारत की सेना अंग्रेजों की तरफ से जापानियों से लड़ रही थी. 22 फरवरी 1942 को सैम मानेकशा अपनी बटालियन ‘रायफल कंपनी को कमांड करते हुए ‘पगोडा हिल की तरफ बढ़ रहे थे. जिस पर जापानियों ने कब्जा कर लिया था. बहादुरी से लड़ते हुए कई भारतीय सैनिक शहीद हो गए पर उन्होंने जापानियों को पगोडा हिल से खदेड़ दिया था . सैम मानेकशा अपनी रायफल से एक जापानी को निशाना बना रहे थे तभी दूसरी तरफ से एक दुसरे जापानी ने आकर उनपर गोलियों की बरसात कर दी. मानेकशा ने पलट कर उसे भी मार गिराया पर खुद भी गिर पड़े, उनके पेट में 9 गोलियां लगी थीं. गोलियों ने उनके फेफड़े, किडनी, लीवर सबको डैमेज कर दिया था. उनके शरीर से जगह जगह से खून बह रहा था पर चेहरे पर जीत की मुस्कान थी . मेजर जनरल ‘डी. टी. कोवान’ जो देहरादून मिलिट्री अकादमी में उनके कंपनी कमांडर भी रह चुके थे ‘पगोडा हिल’ पर कब्जे की खबर सुनते ही उन्हें बधाई देने आये. मानेकशा को इस बुरी तरह जख्मी देखकर उन्हें लगा, अब सैम का बचना मुश्किल है. वे उनकी वीरता के लिए उन्हें ‘मिलिट्री क्रॉस पदक देना चाहते थे .पर नियम था कि यह पदक सिर्फ जीवित मिलिट्री ऑफिसर को ही मिलता है. डी. टी. कोवान ने झट अपना मेडल उतारा और सैम मानेकशा की वर्दी पर लगा दिया . सैम के अर्दली सिपाही शेर सिंह ने उन्हें अपने कंधे पर उठाया और कैम्प में इलाज के लिए ले गए .वहाँ से डॉक्टर ने उन्हें ‘पेगु’ के अस्पताल में रेफर कर दिया . अस्पताल तक जाने में ३६ घंटे लग गये. सैम जरा सी आँखें खोलते फिर बेहोश हो जाते . सिपाही शेर सिंह उन्हें बीच बीच में पानी पिलाते रहते और ‘ साहब साहब हिम्मत ना हारो…आँखें खोलो कहते हुए जगाने की कोशिश करते रहते. अस्पताल पहुँचने पर शेर सिंह, उन्हें बेड पर लिटा कर भागता हुआ डॉक्टर को बुलाने गया. ऑस्ट्रेलियन डॉक्टर ने जब सुना कि उन्हें 9 गोलियां लगी हैं और वे छत्तीस घंटे से घायल पड़े हैं तो उनका ऑपरेशन करने से मना कर दिया . कहा कि ‘इतना खून बह चुका है, ये नहीं बचेंगे इनपर समय बर्बाद करने से कोई फायदा नहीं. पर शेर सिंह अड़ गया, “नहीं डॉक्टर, मेरे साहब बहुत हिम्मत वाले हैं. वे बच जायेंगे आपको उनका इलाज करना ही होगा “ और वो जबरदस्ती डॉक्टर को सैम मानेकशा के पास ले आये . उसी वक्त सैम को ज़रा सा होश आया और डॉक्टर ने उनसे पूछा….” आपको क्या हुआ यंगमैन?“ ऐसी घायल अवस्था में भी सैम ने मुस्करा कर कहा, “ कुछ नहीं बस एक शैतान गधे ने लात मार दी “ डॉक्टर हैरान रह गए , ऐसी हालत में भी कोई मजाक कर सकता है. उन्होंने कहा, ‘तुम्हारा सेन्स ऑफ ह्यूमर तो कमाल का है, अब तो तुम्हे बचाना ही होगा “ डॉक्टर ने गोलियां निकालीं, उनकी छोटी आंत के कुछ हिस्से काट दिए. घावों को स्टिच करके उन्हें ‘रंगून के बड़े अस्पताल में भेज दिया.
सैम बिस्तर पर पड़े , खिड़की से कुछ बच्चों को खेलते देखते रहते और अपना बचपन याद करते .वे भी ऐसे ही अपने दोस्तों के साथ खेलते थे .
उनका जन्म 3 अप्रैल 1914 को अमृतसर में हुआ था . सैम अपने छह भाई बहनों में पांचवे नम्बर पर थे और सबके दुलारे थे . शाम को सारे भाई बहन ,पास पड़ोस के बच्चों के साथ खेलते 
.बॉल अक्सर झाड़ियों में चली जाती और जब सारे बच्चे बॉल ढूंढते, सैम भागकर बंगले के बाहरी कमरे में बनी अपने डॉक्टर पिताजी की डिस्पेंसरी में आ जाते. सैम के पिताजी, अमृतसर के प्रसिद्ध डॉक्टर थे . उन्होंने बॉम्बे से आकर अमृतसर में अपना क्लिनिक खोला था . पिताजी कान में आला लगाये मरीजों की जांच करते, मरीज अपनी बीमारी बताते और उनके पिता उन्हें दवाइयां लिख कर देते, यह सब देखना सैम को बहुत अच्छा लगता . उन्हे अपने पिता किसी जादूगर से लगते . उनके पास कभी कोई कराहते हुए आता, कभी किसी के सर से खून बहता रहता. पिता उन्हें दवाएं देते, चोट की मरहम पट्टी कर देते और कुछ दिनों बाद ही वह आदमी हंसता-खेलता-दौड़ता नजर आता. कभी कभी पिता उनकी रूचि देखकर अपने साथ किसी मरीज को देखने उसके घर भी ले जाते. जिस तरह मरीज के घरवाले उनके पिता को भगवान की तरह देखते, उनके आगे पीछे घूमते, उन्हें संतोष हो जाता कि अब मरीज ठीक हो जाएगा. यह सब देख सैम ने सोच लिया.वे भी बड़े होकर डॉक्टर बनेंगे और बीमार लोगों का इलाज करेंगे. और एक दिन अपने पिताजी से कह दिया, ‘पापा मैं भी डॉक्टर बनूंगा और मेडिकल पढने विदेश जाउंगा
पापा खुश हो गए ,बोले, “हाँ ठीक है, तुम्हे जरूर विदेश भेज दूंगा पर इसके पहले बहुत मेहनत से पढाई करनी होगी. अभी तो नैनीताल के शेरवुड कॉलेज में जाकर स्कूली पढ़ाई खत्म करो . और सैम को अपने बड़े भाइयों के साथ शेरवुड कॉलेज के हॉस्टल में भेज दिया गया . सैम ने यह बात दिल से लगा ली. और पूरी तरह पढाई में डूब गए. खेलते-कूदते ,शरारतें भी करते पर पढाई जम कर करते . उन्होंने सीनियर कैम्ब्रिज में टॉप किया. पांच विषयों में डिस्टिंक्शन लाया. 
उत्साह में भरे रिपोर्ट कार्ड लेकर पिताजी के पास गए , ‘देखिये पापा मैंने इतनी मेहनत से पढाई की और टॉप किया है .आपने वायदा किया था , अब आप मुझे मेडिकल की पढाई के लिए लन्दन भेज दीजिये. मैंने टॉप करके अपनी प्रॉमिस निभाई अब आपकी बारी
पिता ने आगे बढ़कर सैम के कंधे पर हाथ रख दिया , “ वेल डन बेटा ,आयम सो प्राउड ऑफ यू .पर तुम अभी पन्द्रह साल के हो. विदेश में अकेले कैसे रहोगे? मुझे अपना वादा याद है. तुम अट्ठारह के हो जाओ फिर मैं तुम्हें विदेश भेज दूँगा. तब तक भारत में ही कॉलेज में एडमिशन ले लो .कहते पिता अपनी डिस्पेंसरी में चले गए. 
सैम को बहुत निराशा हुई और बहुत गुस्सा भी आया .उन्होंने डॉक्टर बनने के लिए इतनी मेहनत की थी और अभी लन्दन नहीं जाने दिया जा रहा . वे घर में किसी से ज्यादा बात नहीं करते. पिताजी से तो बिलकुल नहीं. ज्यादातर अपने कमरे में अखबार पढ़ते रहते . एक दिन अखबार में पढ़ा कि दिल्ली में सेना के प्रशिक्ष्ण के लिए परीक्षा होने वाली है. देहरादून में पहली भारतीय सेना अकादमी की स्थापना होने वाली है. सैम ने माँ से दिल्ली जाने के लिए पैसे मांगे . माँ उन्हें इस तरह चुप देखकर परेशान थीं. उन्होंने झट से रूपये निकाल कर दे दिए कि दिल्ली जाकर बच्चे का मन बहल जाएगा. 
सैम ने परीक्षा दी और पहले बीच के कैडेट्स में उनका चुनाव हो गया. 30 सितम्बर 1932 को उन्होंने मिलिट्री एकेडमी में एडमिशन ले लिया. मिलिट्री एकेडमी में भी वे बड़े लोकप्रिय थे. खेल-कूद ,ट्रेनिंग सबमें अव्वल रहते.वे एकेडमी टेनिस टीम के कैप्टन भी थे. इन सबके साथ वे शरारती भी कम नहीं थे. अपनी शरारतों के लिए सजा पाने वाले वे अकादमी के पहले कैडेट थे. उन्हें पीठ पर बोरी लादकर ग्राउंड के पच्चीस चक्कर लगाने पड़े थे . 
छुट्टी के लिए अर्जी देने वाले भी वे अकादमी के पहले कैडेट थे .सैम अपने पिता से बहुत नाराज़ थे .उन्होंने अट्ठारह महीने उनसे बात नहीं की थी. पर एकेडमी में आकर वे बहुत खुश थे. उन्हें लगा डॉक्टर से ज्यादा उन्हें मिलिट्री औफ्सिर बनने में मजा रहा है. अब उनकी नाराजगी खत्म हो गई थी और अपने पिता से मिलने जाने के लिए उन्होंने छुट्टी मांगी. 
1934 में वे ट्रेनिंग पूरी कर सेकेण्ड लेफ्टिनेंट बन गए. ब्रिटिश इन्फैंट्री बटालियन के सेकेण्ड बटालियन रोयल स्कॉट के साथ काम करने के बाद उनकी नियुक्ति फोर्थ बटालियन, ट्वेल्थ फ्रंटियर फ़ोर्स रेजिमेंट में हुई. 1942 के दूसरे विश्वयुद्ध के समय उनकी बटालियन बर्मा में थी और जापानियों को पगोडा हिल से खदेड़ने के बाद वे बुरी तरह घायल हो अब अस्पताल में थे.
सैम मानेकशा पुरानी यादों में डूबे थे कि वहाँ के ब्रिटिश गवर्नर उनसे मिलने आये. उन्होंने सैम से पूछा, “आपके लिए क्या कर सकता हूँ ?” और सैम ने अपने उसी खिलंदड़ अंदाज़ में कहा, “डॉक्टर से कहिये , वे मुझे रोज रात को डिनर से पहले दो पेग स्कॉच पीने की अनुमति दे. “ पर सैम अपनी बिमारी की गम्भीरता जानते थे . उनके डॉक्टर पिता  ने उन्हें चिट्ठी लिखी थी, ‘तुम्हारे फेफड़े और लीवर डैमेज है अगर सिगरेट और शराब पियोगे तो ज़िंदा रहना मुश्किल होगा “ सैम ने ताजिंदगी अपने पिता की सलाह का ख्याल रखा. 
जब वे पूरी तरह ठीक हो गए तो उन्हें मेडल भी प्रदान किया गया और उन्हें प्रमोशन भी मिली. १९४७ में जब भारत स्वतंत्र हुआ और भारत का विभाजन हुआ तो उन्हें पाकिस्तान जाने का ऑफर भी मिला. वे पारसी थे और पारसी लोग दोनों देशों में आराम से रह सकते थे पर सैम मानेकशा ने भारत में रहना क़ुबूल किया. उन्हें मिलिट्री ऑपरेशन का डायरेक्टर बना दिया गया.  जगह जगह दंगे हो रहे थे और उन्हें वहाँ शांति स्थापित करने के लिए बुलाया जाता. कश्मीर में कबाइलियों ने हमला कर दिया था . राजा हरी सिंह भारत से सेना भेजने की अपील कर रहे थे पर अभी तक उन्होंने भारत में विलय के पेपर पर हस्ताक्षर नहीं किया था. मानेकशा वहाँ पहुँच चुके थे .पर जवाहरलाल नेहरू सैनिक कार्यवाई के लिए खुद को तैयार नहीं कर पा रहे थे .आखिर सरदार पटेल ने फोन पर उनसे जोर से पूछा, ‘नेहरू जी आखिर आपको कश्मीर चाहिए या नहीं, सैनिक कार्यवाई के लिए सेना को अनुमति दीजिये ?” नेहरु जी ने कहा, “बिलकुल चाहिए, कश्मीर हमारा है “ .उनके इतना कहते ही सरदार पटेल मानेकशा की तरफ मुड़े और बोले, “आप कार्यवाई शुरू कीजिये. समझिये आपको ऑर्डर के कागज़ मिल गए हैं .” और मानेकशा ने अपने सैनिकों को भेजकर कश्मीर में शांति स्थापित की. वे कश्मीर में काम कर ही रहे थे कि कलकत्ता में दंगे शुरू हो गए. ब्रिटिश कमांडर इन चीफ ने आकर कहा कि “सरदार पटेल आपको कलकत्ता में बुला रहे हैं. आपको ले जाने के लिए एक प्लेन तैयार खड़ा है.” कलकत्ता में सरदार पटेल के साथ कलकत्ता के मुख्यमंत्री वी.सी. रॉय खड़े थे . उन्होंने मानेकशा से सीधा पूछा, “मुझे कोई बहस नहीं, कोई टालमटोल नहीं सिर्फ एक जबाब चाहिए …अगर मैं सेना को राज्य सौंप दूँ तो आप हमारे कितने बंगालियों को मारेंगे और कितने दिनों में शांति कायम हो जाएगी?” सैम मानेकशा की रगों में जवान खून उबाल मार रहा था .वे नेताओं की तरह घुमा फिरा कर बात करना नहीं जानते थे . वे  साफ़ साफ़ बोलने के लिए बदनाम थे ,उन्हें मुँहफट भी कहा जाता था .मानेकशा बोले, “शायद सौ लोग की जान जा सकती है और एक महीने में शांति लागू हो जायेगी.” सरदार पटेल ने वी सी राय की तरफ मुड़ कर कहा, ‘दंगे में तो हजारों मर रहे हैं “.फिर मानेकशा से बोले, “ “ठीक है …आप कार्यवाई शुरू कीजिये.” मानेकशा ने पूरे कलकत्ता के कोने कोने में अपने जवान तैनात किये और बिना किसी खून खराबे के कुछ ही दिनों में शांति स्थापित कर दी . बाद में सरदार पटेल ने मानेकशा को बुला कर गुजराती में कहा, ‘ “तमे साचो नहीं बोलो ? तमे बोल्यो एक सो बंगालीयो ना मारसो पण एक बी नई मारयो “(तुमने सच नहीं कहा था ? एक सौ बंगाली को मारोगे पर एक को भी नहीं मारा )फिर पास बुलाकर, ‘वेल डन…थैंक्यू’  कहकर उनकी पीठ थपथपाई .  
धीरे धीरे देश में उनकी प्रतिष्ठा बढती गई. वे अपने जूनियर्स के बीच भी बहुत लोकप्रिय थे . अक्सर रात के आठ बजे अपने पैर टेबल पर फैलाए आराम से बैठे वे जूनियर्स से हंसी मजाक करते रहते. उनके जूनियर्स उनसे डरते नहीं थे और अपनी कोई भी परेशानी उन्हें खुलकर बताते थे. 
अपने गोरखा रेजिमेंट के निरीक्षण के वक्त उन्होंने एक सिपाही से पूछा, “क्या अपने चीफ का नाम जानते हो “
उस सैनिक ने हड़बड़ाहट में कह दिया, “सैम बहादुर “ तब से उनका नाम सैम बहादुर ही पड़ गया.  
वे अपने रेजिमेंट से बहुत प्यार करते थे .कहते थे , “ अगर कोई सिपाही कहता है कि वो मौत से नहीं डरता तो फिर या तो वो झूठ बोल रहा होता है या फिर वो गोरखा है.”
 वे पारसी थे पर खुद को गोरखा कहते थे. वे कहते थे , “अगर आप हमारी सेना के पीछे खड़े नहीं होते तो फिर सीमा पर जाकर उनके आगे खड़े हो जाइये
 १९५९ में कमांडेट के रूप में डिफेन्स सर्विसेज़ स्टाफ कॉलेज वेलिंगटन नीलगिरी का कार्यभार सम्भाला. सैम मानेकशा की इतनी लोकप्रियता कई लोगों की आँखों में खटक रही थी. कई बड़े नेता, कुछ सीनियर उनसे जलने लगे थे . सैम मानेकशा मुँहफट तो थे ही. समय समय पर कही गई उनकी बातों को तोड़-मरोड़ कर उनके विरुद्ध इन्क्वायरी बिठा दी गई. उसमें कोई भी सिरियस चार्ज नहीं था ,कुछ बड़ी हास्यास्पद सी बातें थीं. अभी इन्क्वायरी चल ही रही थी कि १९६२ में चीन ने भारत पर आक्रमण कर दिया .नेहरु समेत सभी लोग चकित रह गए. भारत युद्ध के लिए बिलकुल भी तैयार नहीं था. ईर्ष्यावश मानेकशा को युद्ध की गतिविधियों से दूर रखा गया. जब कई मोर्चों पर भारत की हार होने लगी तो सैम मानेकशा के विरुद्ध आरोपों को खारिज कर उन्हें युद्ध की कमान सौंपी गई. पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी. भारत के एक बड़े भू भाग पर चीन ने कब्जा कर लिया था. 
१९६५ में पाकिस्तान ने अटैक कर दिया .इस बार मानेकशा पूरी तरह इन्वॉल्व थे. उनके और दूसरे जाबांज ऑफिसर्स के प्रयासों से भारत इस युद्ध में विजयी रहा. पाकिस्तान के पास अमरीका से खरीदे आधुनिक पैटन टैंक थे. भारत के पास वही द्वितीय विश्व युद्ध के समय के पुराने टैंक थे.पर मशीन से ज्यादा मशीन चलाने वाले पर कोई भी जीत निर्भर करती है. हमारे पास साहस से भरे तेज दिमाग वाले वीर ऑफिसर थे जिन्होंने पाकिस्तान के मंसूबों पर पानी फेर दिया.
1969 में सैम मानेकशा को सेना प्रमुख बना दिया गया. इसी बीच पाकिस्तान में 1970 में आम चुनाव हुए और पूर्वी पाकिस्तान के शेख मुजीबुर्ररहमान ने बहुमत हासिल कर ली थी. यह पश्चिमी पाकिस्तान के रहनुमाओं को बर्दाश्त नहीं हुआ और उन्होंने पूर्वी पाकिस्तान के लोगों पर जुल्म ढाने शुरू कर दिए .पाकिस्तानी सेना ने आम लोगों पर लूट-पाट, बलात्कार, कत्ल शुरू कर दिए. आम लोग जान बचाने के लिए भारत से लगी सीमा वाले गाँवों में भाग कर आने लगे. रोज हजारों लोग पूर्वी पाकिस्तान से भागकर आ जाते. बंगाल, त्रिपुरा, असम के मुख्यमंत्री परेशान हो गए. उन्होंने उस समय की प्रधानमन्त्री इंदिरा गांधी को चिट्ठी लिखी. और इस सम्बन्ध में कुछ करने के लिए कहा. एक ही उपाय था ,भारतीय सेना भेजकर पाकिस्तानी सेना को जुल्म ढाने से रोक दिया जाए. इस सूरत में युद्ध होना ही था. 
अप्रैल 1971 को इंदिरा गांधी ने अपने कैबिनेट की मीटिंग बुलाई और सेना प्रमुख सैम मानेकशा को भी बुलाया. मानेकशा से पाकिस्तान पर आक्रमण के लिए कहा पर सैम मानेकशा ने बिलकुल इनकार कर दिया .उन्होंने कहा, “इस वक्त हमारी सेना युद्ध के लिए बिलकुल तैयार नहीं है. कुछ ही दिनों में मॉनसून आने वाला है. बांगला देश की मिटटी दलदल सी बन जाएगी ,उसमें हमारे टैंक धंस जायेंगे .बारिश के समय वहाँ की नदियाँ छोटे मोटे समुद्र का रूप ले लेती हैं. एक छोर से दूसरा  छोर नहीं दिखता .ऐसे में हम सही तरीके से युद्ध नहीं कर पायेंगे . अभी पंजाब के खेतों में फसल लगी हुई है. सारी फसल रौंदी जाएगी और हमारी मूवमेंट पर भी असर पड़ेगा .इस वजह से इन सारी तैयारियों के लिए मेरी सेना को वक्त चाहिए “ 
रक्षा मंत्री जगजीवन राम जो सैम नहीं कह पाते थे ने भी जोर देकर कहा, ‘साम मान भी जाओ ना “ 
पर मानेकशा ने हाथ जोड़ लिए. जब सबलोग मीटिंग से जाने लगे तो इंदिरा गांधी ने मानेकशा को रुकने के लिए कहा. मानेकशा ने सबके जाने के बाद कहा, “इस से पहले कि आप कुछ कहें .मैं इस्तीफा देने के लिए तैयार हूँ. मानसिक या शारीरिक स्वास्थ्य खराब होने का कोई भी बहाना बना दूँगा. पर इस वक्त मैं युद्ध के पक्ष में बिलकुल नहीं हूँ. १९६२ की तरह हमलोग बुरी तरह हार जायेंगे “  
इंदिरा गांधी ने कहा, “नहीं आपका इस्तीफा नहीं चाहिए. मुझे ये बताइये कि आपको युद्ध की तैयारी के लिए कितना वक्त चाहिए ?” मानेकशा ने कहा, “देश के कोने कोने से अपने सैनिकों को इकट्ठा करने, युद्ध का प्लान बनाने उन्हें प्लान समझाने, सैनिकों को बौर्डर पर तैनात करने में मुझे चार-पांच महीने लग जायेंगे .और युद्ध की तैयारी के बाद मैं आपको भारत की जीत की पूरी गारंटी देता हूँ. “  इंदिरा गांधी ने हामी भरी और मानेकशा युद्ध की तैयारी में लग गए. मानेकशा यह भी चाहते थे कि भारत की शांतिप्रिय देश की छवि को कोई ठेस ना पहुंचे . पूर्वी पाकिस्तान की मुक्ति वाहिनी सेना को भारत की मदद मिल ही रही थी. उनकी योजना थी कि इन सबसे त्रस्त होकर पाकिस्तान खुद ही आक्रमण कर दे. 
मानेकशा ने दिसम्बर में अपनी सेना की पूरी तैयारी की सूचना इंदिरा गांधी को दी. मानेकशा खुद लद्दाख से लेकर पूरे बौर्डर पर जाकर सैनिकों से मिलते और कहते, “हमने आपको ट्रेनिंग दी, हथियार दिए अब आप अपने देश को जीत दिला दो “ सारे जवान सबसे बड़े अफसर को अपने पास देखकर जोश से भर जाते. 
जब इंदिरा गांधी ने पूछा, “अब हम युद्ध के लिए तैयार हैं ? “ मानेकशा ने अपने बेलौस अंदाज में कहा, “येस,वी आर रेडी स्वीटी’ इंदिरा गांधी उनकी बात करने के तरीके से वाकिफ थीं. उन्होंने बिलकुल बुरा नहीं माना और नज़रंदाज़ कर दिया .
3 दिसम्बर 1971 को लड़ाई शुरू हुई और सिर्फ 13 दिनों में मानेकशा के नेतृत्व में भारतीय सेना ने,पाकिस्तानी सेना को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया. युद्ध के दौरान, रोज सुबह मानेकशा इंदिरा गांधी से मिलते और उन्हें पिछले चौबीस घंटे में क्या हुआ और आगे चौबीस घंटे में वे लोग क्या करेंगे.पूरा प्लान बताते. पांचवे दिन मानेकशा कुछ निराश थे .उन्होंने इंदिरा गांधी से कहा, ‘ बुरी खबर है. हमारी नेवी की पनडुब्बी खुकरी डूब गई है. कई वायुसेना के जहाज क्रैश कर गए हैं. पूर्वी पाकिस्तान में हमारी सेना आगे नहीं बढ़ पाई है. इंदिरा गांधी ने उन्हें मुस्करा कर आश्वस्त किया, “एवरी डे, यू कांट विन सैम “ 
उसी दिन, दिन के दस बजे अच्छी खबरे आने लगीं. हर मोर्चे पर सेना आगे बढ़ रही थी. मानेकशा ने इंदिरा गांधी को बताया तो वे बहुत खुश हुईं . प्रधान मंत्री और सेनाप्रमुख  दोनों का एक दूसरे पर भरोसा बहुत जरूरी है. तभी कोई देश आगे बढ़ता है.  
पाकिस्तानी सेना बुरी तरह हार रही थी. मानेकशा को पता था, अब वे लोग सरेंडर कर देंगे . उन्होंने पहले ही सरेंडर के कागज़ात तैयार करवा लिए थे. उन्होंने जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा  से कहा, “ इट्स अ बिग डे इन योर लाइफ. टेक योर वाइफ विद यू.” सैम मानेकशा के मन में औरतों के लिए बहुत इज्जत थी. 
पाकिस्तानी जनरल नियाज़ी के साथ 93 हज़ार पाकिस्तानी सैनिकों ने सरेंडर कर दिया. एक नए देश ‘बांग्ला देश’ का उदय हुआ. पर मानेकशा को बंदी बनाये गए ,पाक्सितानी सैनिकों की ज्यादा चिंता थी. वे उन्हें लेकर भारत आये .उनके आराम का पूरा ख्याल रखा. भारतीय सैनिक टेंट लगाकर सोते थे. जबकि बंदी बनाये गए पाकिस्तानी सैनिक उनके पक्के बैरक में सोते  थे. मानेकशा कैम्प में जाकर सभी से मिलते. पाकिस्तानी सूबेदार से पूछते , बिस्तर में खटमल तो नहीं है. मच्छरदानी है ना. “ फिर उनके किचन में  जाकर खुद खाना खा कर देखते कि खाना ठीक बना है या नहीं. साफ़ सफाई करने वाले से हाथ मिलाने को हाथ बढाया तो उस सफाईकर्मी ने मना कर दिया. मानेकशा ने कहा, ‘क्यूँ कोई नाराजगी है…हाथ क्यूँ नहीं मिलाओगे ?’ उसने हाथ मिलाया जब वे सबसे मिलकर जाने लगे तो पाकिस्तानी सूबेदार ने कहा, ‘गुस्ताखी माफ़ हो हुजुर तो कुछ पूछूँ ?‘ 
मानेकशाने कहा,, ‘आप हमारे मेहमान हैं कुछ भी पूछ सकते हैं. उसने कहा, “अब मुझे पता चल गया कि हिन्दुस्तानी फ़ौज क्यूँ जीती. आप खुद जाकर सिपाहियों से मिल रहे हैं. उनके आराम का ख्याल  रख रहे हैं. उनका खाना चख कर देख रहे हैं. हमारे यहाँ ऐसा नहीं होता. सेना के अफसर अपने आपको नवाबजादे समझते हैं.” 
मानेकशा को ये ख्याल था कि ये पाकिस्तानी अपने गाँव जायेंगे . वहाँ खटिया पर बैठेंगे,  हुक्का पियेंगे. अपने गाँव वालों को युद्ध के किस्से सुनायेंगे .तब वो हमारे बारे में कहेंगे कि हिन्दुस्तान के लोग बुरे नहीं हैं ,उन्होंने हमारा ख्याल रखा. उनके मन में हमारे लिए नफरत का जलजला नहीं होगा.
१९७१ का युद्ध जीतने के बाद मानेकशा बहुत लोकप्रिय हो गए थे . उनका बाहर निकलना मुश्किल हो गया था. हर जगह लोग उन्हें घेर लेते. राजनितिक गलियारों में ये अफवाह फ़ैल गई कि मानेकशा कभी भी सेना की मदद से तख्ता पलट कर सकते हैं. इंदिरा गांधी के मन में भी डर समा गया और एक शाम उन्होंने मानेकशा को फोन किया. मानेकशा चाय पी रहे थे . इंदिरा गांधी ने उन्हें अपने ऑफिस में आने के लिए कहा. मानेकशा ने कह दिया, ‘अभी तो मैं चाय पी रहा हूँ ‘
“आप यहाँ आ जाइए मैं आपको चाय पिलाती हूँ “ इंदिरा जी बोलीं.
“मुझे अपने यहाँ की ही चाय पसंद है ,चाय पीकर ही आऊंगा .”
जब वे इंदिरा गांधी के पास गए और पूछा, “ क्या प्रोब्लम है ? ‘
इंदिरा गांधी ने कहा, “आप मेरी प्रोब्लम हैं . क्या आप तख्तापलट कर मिलिट्री शासन लगाना चाहते हैं ?”
मानेकशा ने कहा, “देखिये आपकी और हमारी दोनों की नाक लम्बी है तो बेहतर यही है कि हम दोनों एक दूसरे के काम में नाक ना घुसाएँ .मेरा राजनीति में आने का कोई इरादा नहीं है. आप निश्चिन्त रहें “ 
१९७२ में उन्हें पद्मविभूषण दिया गया. १९७३ में उन्हें ;फील्ड मार्शल की उपाधि दी गई. वे जीवनपर्यन्त भारत के फील्ड मार्शल रहे. 
रिटायर होने के काफी बाद , मानेकशा पाकिस्तान के न्योते पर वहाँ गए. वहाँ के गवर्नर ने डिनर के बाद उनसे कहा कि उनका स्टाफ उनसे मिलना चाहता है. बाहर कई सिपाही खड़े थे .एक ने अपनी पगड़ी उतार कर उनके कदमो में रख दी और बोला,’ हुज़ूर मेरे पांच बेटे आपके बंदी हैं. आपने उनका इतनी अच्छी तरह ख्याल रखा. उनकी चिट्ठी आती है कि आपने सबको कुरान शरीफ दिया. हम आपके शुक्रगुजार हैं “ 
मानेकशा रिटायरमेंट के बाद भी बहुत सक्रिय थे. अपने भाषण से नवजवानों में नया जोश भर देते. उन्होंने कभी भी अपना सेन्स ऑफ ह्यूमर नहीं खोया. नेताओं और अधिकारियों की जलन की वजह से उनकी रिटायरमेंट के बाद दी जाने वाली बहुत सी सुविधायें उन्हें नहीं मिली. पेंशन भी बहुत कम मिलता था. जब अब्दुल कलाम राष्ट्रपति बने तो उन्होंने उनका अब तक का सारा बकाया जोड़कर देने के आदेश दिए. 2007 में जब मानेकशा  वृद्धावस्था और बीमारी की वजह से बिस्तर पर थे. उन्हें डेढ़ करोड़ रूपये का चेक दिया गया. मानेकशा ने मजाक में कहा, ‘ये चेक बाउंस तो नहीं कर जाएगा ‘ 
एक सार्थक भरी पूरी जिंदगी जीने के बाद 27 जून 2008 को उन्होंने अपनी आँखें सदा के लिए मूँद लीं.
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