विश्व में कुल 22 प्रजातियों के गिद्ध पाए जाते हैं। भारत में 9 प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जिनमें से केवल मध्यप्रदेश में 7 प्रजातियों के गिद्ध पाए जाते हैं। मध्यप्रदेश में सफेद गिद्ध, चमर गिद्ध, देशी गिद्ध, पतली चोंच गिद्ध, राज गिद्ध, हिमालयी गिद्ध, यूरेशियाई गिद्ध और काला गिद्ध की मौजूदगी मिली है। यह लिखते हुए मैं सोच रहा था कि क्या गिद्धों के बारे में आज लिखा जा सकता है कि उनकी प्रजातियाँ पाई जाती हैं? सच तो यह है कि आज हमें दुखी मन से कहना होगा कि कभी भारत में भी गिद्ध हुआ करते थे।
हम किताबों में पढ़ते हैं कि कभी डायनासोर हुआ करते थे। समय के साथ-साथ उनकी प्रजातियाँ विलुप्त होती चली गईं। हमने उन्हें कभी देखा नहीं था, इसलिए वे सच्चाई से कहीं अधिक जुरासिक पार्क वाली कल्पना ही लगते हैं। हमें उनके होने या न होने से कोई फ़र्क महसूस नहीं होता। मगर हम इतने आत्मकेंद्रित हो चुके हैं कि हम अपने पर्यावरण के बारे में कुछ भी नहीं सोच पाते। हमें पता ही नहीं चलता कि हमारे आकाश से गिद्ध नामक पक्षी विलुप्त होने की कगार पर खड़ा है।
गिद्ध की भारतीय संस्कृति और परंपरा में एक महत्वपूर्ण भूमिका है। रामायण काल में जब रावण माता सीता का हरण कर आकाश मार्ग से उन्हें लंका ले जा रहा था, तो गिद्ध सम्राट जटायु ने ही उसे ऐसा कुकृत्य करने से रोकने का प्रयास किया। इस दौरान उसने अपने प्राण त्याग करना स्वीकार किया, मगर अपने सामने ऐसा अन्याय होते हुए देखकर चुप रहना उचित नहीं समझा।
प्रकृति के अनुसार गिद्धों को ‘म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन ऑफ नेचर’ का सफाई विभाग माना जाता है। जब कभी कोई जानवर जंगल में या खेतों में मर जाता था, तो गिद्ध अपना सफाई का काम शुरू कर देते थे और कुछ ही पलों में उस जानवर का मांस शरीर से अलग हो जाता था तथा केवल ठठरी बाकी रह जाती थी। इस तरह बिना किसी इंसानी उपाय के प्रकृति अपना काम स्वयं कर लेती है। गिद्ध देखने में सुंदर पक्षी नहीं लगता, मगर हमारे लिए बहुत ही महत्वपूर्ण काम करने वाली प्रजाति है।
विश्व में कुल 22 प्रजातियों के गिद्ध पाए जाते हैं। भारत में 9 प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जिनमें से केवल मध्यप्रदेश में 7 प्रजातियों के गिद्ध पाए जाते हैं। मध्यप्रदेश में सफेद गिद्ध, चमर गिद्ध, देशी गिद्ध, पतली चोंच गिद्ध, राज गिद्ध, हिमालयी गिद्ध, यूरेशियाई गिद्ध और काला गिद्ध की मौजूदगी मिली है। यह लिखते हुए मैं सोच रहा था कि क्या गिद्धों के बारे में आज लिखा जा सकता है कि उनकी प्रजातियाँ पाई जाती हैं? सच तो यह है कि आज हमें दुखी मन से कहना होगा कि कभी भारत में भी गिद्ध हुआ करते थे।
गिद्धों की एक विशेष पहचान है कि प्रत्येक बार भोजन ग्रहण करने के पश्चात वे स्नान करते हैं। स्नान के कारण खून आदि उनके पंखों, त्वचा और चोंच पर नहीं लगा रहता। गिद्ध अपने अनिवार्य स्नान के लिए प्राकृतिक जल स्रोतों के पास ही निवास बनाते हैं। इनमें नदी, नाला, तालाब, झील या कोई भी बारहमासी जलस्रोत हो सकता है, जहाँ उनकी सुविधाजनक पहुँच हो।
एक समय ऐसा भी था जब भारत में पाँच करोड़ से अधिक गिद्ध पाए जाते थे, मगर वर्ष 1990 के बाद गिद्धों की संख्या अचानक कम होने लगी। 1996 के आसपास पाया गया कि गिद्धों की संख्या में खतरे की हद तक कमी हो गई है। विशेषज्ञों ने जब इस ओर ध्यान दिया तो पाया कि गिद्धों के थोक में मरने का कारण ‘डिक्लोफेनिक सोडियम’ नाम की दवा है। इस दवा का इंजेक्शन गाय, भैंसों और अन्य पशुओं को दर्द-निवारक दवा के रूप में दिया जाता था।
यही दवा गिद्धों के लिए काल साबित हुई। इस दवा को खाने वाले मवेशियों की जब मृत्यु हो जाती थी और गिद्ध उनके मांस को खा लेते थे, तो ‘डिक्लोफेनिक सोडियम’ के कारण उनके गुर्दों पर बुरा असर पड़ता था और वे काम करना बंद कर देते थे। यही उनकी मृत्यु का कारण बन जाता था। ‘डिक्लोफेनिक सोडियम’ का इस्तेमाल न रोके जाने के कारण भारत में गिद्धों की तीन प्रजातियों को सबसे अधिक नुकसान हुआ। इनमें सफेद पंख वाला गिद्ध, भारतीय गिद्ध और लालसर गिद्ध शामिल थे। इन तीन प्रजातियों की संख्या लगभग 98 प्रतिशत तक कम हो गई है।
जब गिद्धों की प्रजातियाँ विलुप्त होने का डर सिर पर आ पहुँचा तो भारत में हंगामा मच गया। वर्ष 2006 में मवेशियों को दिए जाने वाले ‘डिक्लोफेनिक सोडियम’ के इंजेक्शनों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। ऐसा सुनने में आया है कि इससे गिद्धों की संख्या में कुछ बढ़ोतरी हुई है, मगर चिंता अभी भी बनी हुई है।
2006 में प्रतिबंध लगने के बावजूद भारतीय गिद्धों की आबादी इस आपदा से शायद कभी पूरी तरह उबर न पाए। गिद्धों को यौन परिपक्वता प्राप्त करने में कई वर्ष लग जाते हैं और वे बहुत कम संतान पैदा करते हैं। एक जोड़ा प्रति वर्ष केवल एक ही चूजे को जन्म देता है और उसका जीवित रहना भी सुनिश्चित नहीं होता।
सच तो यह है कि भारतीय गिद्धों की संख्या में गिरावट संयुक्त राज्य अमेरिका में पैसेंजर कबूतर के विलुप्त होने के बाद से दर्ज की गई, जो किसी भी पक्षी प्रजाति की सबसे तेज और सबसे बड़ी गिरावट मानी जाती है।
जब गिद्ध गायब हो जाते हैं, तो आबादी वाले इलाकों के बाहरी क्षेत्रों में तथाकथित “पशु लैंडफिल” कहलाने वाले स्थानों पर छोड़े गए शव जमा होने लगते हैं। सड़ते हुए मांस का यह ढेर आवारा कुत्तों और चूहों सहित अन्य जानवरों को आकर्षित करता है। भारत में आवारा कुत्ते अक्सर लोगों, विशेषकर छोटे बच्चों पर हमला करते हैं, जिसके घातक परिणाम होते हैं। इसके अलावा, भारत रेबीज़ का एक वैशिक केंद्र है, इसलिए किसी भी जानवर के काटने से मृत्यु हो सकती है। यह मात्र संयोग नहीं है कि 1994 और 2005 के बीच डाइक्लोफेनैक के उपयोग के बाद रेबीज़ के टीके की बिक्री में वृद्धि हुई।
जब गिद्धों की संख्या में निरंतर कमी होती रही, तो उनकी जगह लेने के लिए कुत्ते और चूहे पहुँच गए। कुत्तों और चूहों को बड़ी मात्रा में उनका पसंदीदा भोजन मिलने लगा, तो अचानक उनकी आबादी में आश्चर्यजनक वृद्धि होने लगी। कुत्तों की संख्या सत्तर लाख से बढ़कर तीन करोड़ हो गई। चूहों की आबादी को गिनना तो कठिन था, मगर उसे महसूस किया जा सकता था।
एक रिपोर्ट के अनुसार, गिद्धों के मरने से कुत्तों की संख्या में जो वृद्धि हुई, उसके परिणामस्वरूप रेबीज़, यानी कुत्तों के काटने से मृतकों की संख्या में 48 हज़ार की वृद्धि हुई। मैंने हमेशा कहा है कि इंसान द्वारा बनाई गई हर वस्तु प्रकृति का नुकसान करती है। चाहे इंसान चाँद और मंगल पर नगरी बसाने के सपने देखे, सच तो यह है कि धरती का पूरी तरह से सत्यानाश करने के लिए इंसान ने कमर कस रखी है।
भारत में एक ऐसा समुदाय भी है, जो ईरान में इस्लाम के आक्रमण के बाद भारत में आकर बस गया था। इस समुदाय को पारसी कहा जाता है। इनकी खासियत यह है कि संख्या में सबसे कम होने के बावजूद इनका भारत की अर्थव्यवस्था में योगदान अत्यधिक है। टाटा समूह और गोदरेज समूह जैसे नाम इसी समूह से आते हैं। इनका अपने प्रियजनों के अंतिम संस्कार का एक तरीका है कि वे अपने प्रियजनों की लाश को “टॉवर ऑफ साइलेंस” में छोड़ देते हैं और गिद्ध आकर उनके मांस को खा लेते हैं। इस प्रकार जो प्रकृति से आया है, वह वापस प्रकृति में चला जाता है। मगर गिद्धों की संख्या में कमी होने के कारण उनके मुर्दे “टॉवर ऑफ साइलेंस” में पड़े सड़ते रहते थे। उन्हें इस विषय पर फिर से गहराई से विचार करना पड़ा।
साइरस मिस्त्री, जो टाटा संस के पूर्व चेयरमैन थे, की सड़क दुर्घटना में मृत्यु के बाद उनके अंतिम संस्कार के साथ ही यह मुद्दा फिर से चर्चा में आ गया। वर्ष 2015 से पारसी समुदाय के बीच अंतिम संस्कार के तरीके में बदलाव आया है और मुंबई में इलेक्ट्रिक शवदाह गृह के जरिए अंतिम संस्कार के कई मामले सामने आए हैं। पारसी धर्म के लोग प्रगतिशील हैं। उन्होंने तय किया कि निर्धारित रस्मों को पूरा करने के बाद पार्थिव शरीर को इलेक्ट्रिक मशीन के हवाले कर दिया जाए। साइरस मिस्त्री के अंतिम संस्कार के दौरान भी यही किया गया।
एक चिंता की स्थिति पारसी समाज को लेकर भी है। पारसी समुदाय के लोगों की संख्या में भी तेजी से गिरावट आ रही है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में केवल 57,264 पारसी बचे थे। सरकार के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय ने समुदाय की आबादी में गिरावट को रोकने के लिए कई उपाय किए हैं, जिनमें “जियो पारसी” पहल शुरू करना शामिल है।
समस्या विकट है। भारत का सबसे अधिक प्रगतिशील पारसी समुदाय विलुप्त होने की कगार पर है और दूसरी तरफ उनके अंतिम संस्कार से जुड़े गिद्ध पहले ही डायनासोर बनने की प्रक्रिया में शामिल हो चुके हैं। हम सबको एक मुहिम चलानी होगी कि विलुप्त होती प्रजातियों-चाहे वे मनुष्य हों अथवा पक्षी (पारसी समुदाय और गिद्ध), उनकी संख्या में वृद्धि के लिए जुटकर काम करें। यही सही मायनों में भारत के हित में होगा।
आपने पर्यावरण संबंधी महत्वपूर्ण विषय उठाया है। मानवों की जनसंख्या धरती पर उपलब्ध स्थान और साधनों की अपेक्षा सभ्यता की उत्पत्ति और प्रगति के अनुपात में कई गुना बढ़ी है जिसके और निर्बाध शहरीकरण के कारण बेहिसाब फैलते कंक्रीट के जंगल उग आए हैं। जानवरों, पक्षियों और कीट पतंगों के लिए उनका प्राकृतिक वातावरण नाम मात्र ही बचा है। बीते दिनों गांवों और शहरों के बाहर खूब खुली जगह रहती थी जहां मवेशियों की लाशों पर गिद्दों के समूह बैठे दिखते थे। जहां कहीं भी कोई मरा जानवर दिखाई देता, गिद्ध शीघ्र ही पहुंच जाते। अब तो उनको देखना तक दुर्लभ हो गया है। डिक्लोफेनेक के अलावा इन कारणों से गिद्ध प्रजाति प्राय विलुप्त हो रही है। पारसी समुदाय की जनसंख्या में कमी की वजह है कम शादियां और कम बच्चे पैदा करने की प्रवृत्ति। दूसरे, इस समुदाय में अंतरधार्मिक विवाह की मान्यता नहीं हैं। यदि कोई लड़की गैर पारसी से शादी करती है तो उसे समुदाय से बेदखल कर दिया जाता है। हालांकि, अब सर्वोच्च न्यायालय के फैसले ने ऐसी लड़कियों को अपने मां बाप की अंत्येष्टि में भाग लेने का अधिकार लौटाया है।
भाई बिमल जी, आपकी टिप्पणी हमेशा की तरह ज्ञानवर्द्धक है। हार्दिक धन्यवाद।
ग़ज़ब विषय पर संपादकीय, साधुवाद
धन्यवाद आलोक।
शुभ प्रभात की अशेष मंगलकामनाए। सादर प्रणाम भाई । एक बार फिर बहुत ही सुंदर सारगर्भित संपादकीय पढकर आपकी शोधपरक दृष्टि को नमन करने की इच्छा होती है।इस बार आपने तेजी से विलुप्त हो रहे गिद्धों की प्रजातियों पर लिखा है।सचमुच इस ओर कम.ही लोगों का ध्यान गया है।मैने बनारस में बिताये अपने बचपन में कई बार घर की छत पर बैठे हुए गिद्धों को देखा है।विशेष रुप से गंगा किनारे मणिकर्णिका घाट पर उनकी सैकडों की संख्या देखी है।यह बात आश्चर्यजनक लग सकती है कि गंगा में बहाये गये शवों को नष्ट करने के लिए हमारे ये प्राकृतिक सफाई कर्मचारी सदैव सजग व.कर्मरत रहते हैं। जैसा कि आपने संपादकीय में लिखा है *गिद्धों की एक विशेष पहचान है कि प्रत्येक बार भोजन ग्रहण करने के पश्चात वे स्नान करते हैं। स्नान के कारण खून आदि उनके पंखों, त्वचा और चोंच पर नहीं लगा रहता। गिद्ध अपने अनिवार्य स्नान के लिए प्राकृतिक जल स्रोतों के पास ही निवास बनाते हैं।* मैने काशी में ही पंचगंगा घाट से थोड़ी दूरी पर इन गिद्धो के सामूहिक स्नान को भी देखा है।संपादकीय पढते हुए बहुत कुछ याद आ रहा है।रामायण में जटायु की सहायता सै ही सीता का पता लगा और रावण वध हुआ था।आपने इस प्रसंग के माध्यम से पौराणिकता से भी उनके महत्व को जोडा है।जमशेदपुर में रहते हुए टाटा स्टील के चेयरमैन साइरस मिस्त्री और जे जे इरानी के निधन पर भी उनके अंतिम संस्कार को लेकर लंबा विमर्श चला था अंतत: दाह-संस्कार ही किया गया ।यहां एक *फायर टेंपल* भी है जिसकी छत पर शवों को रख दिया जाता है और गिद्ध तथा अन्य मांसाहारी पक्षी आकर उन्हे खाते थे।लेकिन अब वै भूले से भी नहीं दिखते। आपकी चिंता महत्वपूर्ण और जायज है। सडकों पर आवारा घूमने वाले कुत्तो की संख्या इधर बढी है।नगर निगम उन्हे हटाने की बहुत कबहुत कोशिश करता है पर उनकी संख्या घटती नहीं।कुत्ते, चूहे बीमारियाँ फैलाते हैं पर किसी का ध्यान नहीं जाता।यह सजगता हमें अपनी सोच में लानी होगी।आपके संपादकीय ने हमारी आखें खोली हैं ।हृदय से अशेष धन्यवाद आभार भाई इस विचारणीय मुद्दे को उठाने और हमें अपना दृष्टिकोण बदलने की प्रेरणा के लिए।..सादर प्रणाम
प्रिय पद्मा, तुम्हारी टिप्पणी हमेशा हमें उत्साहित करती है कि हम हर बार कोई नई विषय-वस्तु पर कलम चला सकें। इस गहराई से परिपूर्ण टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद।
बहुत ही महत्वपूर्ण पर गहन जानकारी के लिए आपको बहुत-बहुत हार्दिक आभार गिद्धों की कमी के कारण ही कुत्तों की जनसंख्या में इतनी तेजी से बढ़ोतरी हुई है यह बात भी स्पष्ट हो गई और पारसी समुदाय की जनसंख्या में भी कमी आना थोड़ा अजीब सा है
धन्यवाद संगीता। समर्थन बनाए रखें।
प्रकृति संरक्षण में गिद्ध की भूमिका
एक नए विषय पर सम्पादकीय पढ़ने मिली ।
पशु, पक्षी ,जीव जंतु ,पेड़ पौधे या इंसान
किसी भी प्रजाति का विलुप्त होना प्रकृति में असंतुलन पैदा करता है ।
इन खतरों को समझना सरकार और समाज के लिए अनिवार्य है ।
Dr Prabha mishra
हार्दिक धन्यवाद प्रभा जी। आपने विषय की गंभीरता को समझा और अपना समर्थन दिया।
एक गंभीर मुद्दे को इस बार के संपादकीय में उठाया गया है। गिद्धों का महत्व उनके द्वारा सदियों से कम से कम भारत वर्ष जैसे साधन विहीन और लापरवाह समाज का पालन पोषण से रेखांकित होता है।पर्यावरण और मानव जनित मांसाहार या प्राकृतिक कारणों से निकलते कूड़े का निस्तारण एक ऐसा विषय है जो अहम ही नहीं ,हमारे स्वास्थ्य की पक्की गारंटी हुआ करता था।अब यही लैंडफिल सियासती मुद्दा हो गया है और दिल्ली वासियों से अधिक इस से कोई और जनसमूह कुप्रभावित हुआ है यह जानना अभी शेष है ।
यूं भी साहित्य और संस्कृति में गिद्ध का स्थान तो है यह हमारी भाषा के मुहावरों में भी अहम है और आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन भी करता है उदाहरण के तौर पर
गिद्ध दृष्टि बकुल चेष्टा
गिद्ध व्यवहार
गिद्ध की भांति मंडराना
गिद्ध की भांति झपटना
सम्पादक महोदय ने गिद्धों की मृत्यु दर्द निवारक और पशुओं से जबरन दूध निकालने के इंजेक्शन से निसरत डाइक्लोफेनेक सोडियम को भी सटीकता से बताया है। इस से पहले भी हिन्दू और कुछ चुनिंदा अखबारों ने इस पर लिखा है पर यह सभी लेख आलेख अंग्रेजी अनुवाद की छाया से ग्रस्त और त्रस्त रहे हैं।पुरवाई का यह संपादकीय पूर्णतः समग्र,अद्यतन और हिंदी पाठकों की मानसिकता के साथ तादात्म्य बैठा कर चलता है
उपयोगी रोचक और अद्यतन संपादकीय हेतु बधाई।
भाई सूर्यकांत जी आप विश्व के किसी भी कोने में हों… पुरवाई आप तक पहुंच ही जाती है। और संपादकीय पर आपकी टिप्पणी तो हमारा हौसला बढ़ाती ही है।
आदरणीय सर, सादर प्रणाम।
आपका यह संपादकीय हमारे समय की एक अत्यंत गंभीर और मर्मस्पर्शी सच्चाई को उजागर करता है। आपने केवल एक पक्षी के विलुप्त होने का शोक नहीं मनाया, बल्कि पारिस्थितिकी तंत्र और मानव संस्कृति के बीच के उस टूटते तार को दिखाया है जिसे हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं। डिक्लोफेनिक जैसी एक छोटी सी दवा का पूरी प्रजाति को लील जाना इस बात का प्रमाण है कि मानवीय हस्तक्षेप प्रकृति के लिए कितना घातक हो सकता है।
गिद्धों को ‘म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन ऑफ नेचर’ कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं है, बल्कि उनकी उपयोगिता का सबसे सटीक वर्णन है। जिस कार्य को वे बिना किसी शोर-शराबे और खर्च के अंजाम देते थे, उनके अभाव में आज वही काम बीमारियों और आवारा कुत्तों की बढ़ती आबादी के रूप में हमारे सामने एक विकराल संकट बनकर खड़ा है। आपने जटायु के पौराणिक संदर्भ और पारसी समुदाय की ‘टॉवर ऑफ साइलेंस’ परंपरा का उल्लेख कर यह स्पष्ट कर दिया है कि गिद्धों का अस्तित्व केवल जीव विज्ञान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक विरासत का भी अभिन्न हिस्सा है।
पारसी समुदाय और गिद्धों की घटती संख्या के बीच जो तुलना आपने की है, वह सोचने पर मजबूर करती है कि कैसे एक प्रगतिशील समाज और प्रकृति के रक्षक साथ-साथ हाशिए पर जा रहे हैं। साइरस मिस्त्री के अंतिम संस्कार का उदाहरण इस संकट की गहराई को और अधिक स्पष्ट करता है। यह संपादकीय हमें आत्ममुग्धता से बाहर निकालकर यह सोचने पर विवश करता है कि यदि हमने आज भी अपनी जीवनशैली और पर्यावरण के प्रति अपने दृष्टिकोण को नहीं बदला, तो आने वाली पीढ़ियां गिद्धों को भी डायनासोर की तरह केवल किताबों और फिल्मों में ही देख पाएंगी। यह महज एक संपादकीय नहीं, बल्कि एक चेतावनी है कि प्रकृति के साथ किया गया हर खिलवाड़ अंततः मानवता के विनाश का मार्ग प्रशस्त करता है। हमें वास्तव में ‘जियो पारसी’ और ‘गिद्ध संरक्षण’ जैसे अभियानों को एक जन-आंदोलन बनाने की आवश्यकता है।
भाई चंद्रशेखर जी,
आपने संपादकीय को सांस्कृतिक विरासत के कोण से परखने के साथ-साथ वर्तमान स्थितियों को भी समझाया है। पाठकों को आपकी टिप्पणी संपादकीय समझने में सहायक सिद्ध होगी। हार्दिक धन्यवाद
एक बार फिर से एक ज्वलंत एवं महत्वपूर्ण समस्या को आपने अपने सम्पादकीय के माध्यम से अवगत कराया है। वास्तव में यह विचारणीय मुद्दा है। गिद्धों की प्रजातियों का विलुप्त होना, कुत्तों, चूहों की संख्या का बढ़ना और पारसी समुदाय की जनसंख्या का कम होना चिंताजनक है। इस चेतावनी को हमें गंभीरता से लेना होगा।
ज्ञानवर्धक सम्पादकीय के लिए साधुवाद।
सुदर्शन जी, इस हौसला अफ़ज़ाई करने वाली टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद
ज्ञानवर्धक एवं विचारणीय सम्पादकीय सर।
हार्दिक धन्यवाद आशुतोष