जहां क्रिस हैलेंगा जैसे लोग आगे आकर अपना ‘लिविंग फ़्यूनरल’ करवाने का निर्णय ले रहे हैं वैसे-वैसे ही पारंपरिक फ़्यूनरल एजेंट भी ‘लिविंग फ़्यूनरल’ की सेवा अपने मीनू कार्ड में शामिल करने लगे हैं। ये ‘लिविंग फ़्यूनरल’ बिना लाश के होते हैं। लाश का चर्च में होना आवश्यक नहीं। इन्सान चाहे तो स्वयं उपस्थित भी रह सकता है या फिर घर से ज़ूम इत्यादि पर शामिल हो सकता है। अब मौत के बहुत से इंद्रधनुष आसमान में दिखाई देने लगेंगे… सब का अपना-अपना इंद्रधनुष!

मुझे दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रो. कमलेश कुमारी ने बताया था कि मैं लगभग पच्चीस से तीस कहानियां मृत्यु जैसे विषय पर लिख चुका हूं। इससे पहल भोपाल से भाई मनोज कुमार श्रीवास्तव ने भी अपने एक आलेख में इस बात का ज़िक्र किया। देहरादून की डॉ. किरण सूद ने तो मेरी 24 ऐसी कहानियों का एक संकलन ही प्रकाशित करवा दिया जो कि मृत्यु के भिन्न पहलुओं पर आधारित हैं और उसे शीर्षक दिया – मृत्यु के इंद्रधनुष। यह संकलन इंडिया नेटबुक्स के डॉ. संजीव ने प्रकाशित किया था।
मृत्यु के इस इंद्रधनुष में से मैं पुरवाई के पाठकों के लिये एक विशेष रंग लेकर इस संपादकीय के ज़रिये उपस्थित हुआ हूं। हालांकि यह बात करीब पांच से छः वर्ष पूर्व ख़बरों में आई थी कि कोरिया में कुछ लोग अपना अंतिम संस्कार अपने जीवन में ही कर रहे हैं। यहां लंदन में भी एक समाचार सुर्खियों में आया था कि एक्ट्रेस डॉन फ़्रेंच ने अपनी सैंतीस वर्षीय मित्र क्रिस हैलेंगा के आग्रह पर उसके ‘लिविंग फ़्यूनरल’ (मृत्यु से पहले अंतिम संस्कार) में अपने लोकप्रिय टीवी सीरियल 1994-2020 के लोकप्रिय चरित्र जेराल्डीन ग्रेंजर के संवाद बोल कर दिखाए।
आख़िर यह ‘लिविंग फ़्यूनरल’ होता क्या है और क्यों होता है? कौन हैं वो लोग जिन्हें अपना अंतिम संस्कार देखने की चाह होती है? दक्षिण कोरिया में इस सोच से बहुत से लोग प्रभावित हैं। वे अपनी मृत्यु तक इंतज़ार नहीं करना चाहते। वे चाहते हैं कि उनकी आँखों के सामने ही उनके मित्र, रिश्तेदार, चाहने वाले उनके जीवन की उपलब्धियों के बारे में, उनकी विशेषताओं के बारे में चर्च में खड़े होकर बात करें।
विश्व के बहुत से देशों में माना जाता है कि ‘अंतिम संस्कार’ और ‘जीवन का जश्न’ दो अलग तरीके हैं मृतक का सम्मान करने के लिये। अंतिम संस्कार आमतौर पर गंभीर आयोजन होता है जहां इन्सान की मृत्यु हो चुकी होती है और इसे एक धार्मिक अनुष्ठान के तौर पर देखा जाता है जो कि परंपराओं के अनुसार होता है।
वहीं ‘लिविंग फ़्यूनरल’ में ऐसा कोई धार्मिक बंधन नहीं है। ऐसे आयोजन में मौज मस्ती भी हो सकती है क्योंकि व्यक्ति की अभी मृत्यु हुई नहीं है। ऐसे आयोजन में मरने वाले के जीवन की अच्छाइयों का ज़िक्र उसके सामने किया जाता है।
एक बात और अंतिम संस्कार इन्सान की मृत्यु के तुरन्त बाद होता है जबकि ‘लिविंग फ़्यूनरल’ या ‘जीवन का जश्न’ इन्सान के जीवन काल में कभी भी किये जा सकते हैं। और फिर अंतिम संस्कार के लिये शव या अस्थियां ज़रूरी हो जाती हैं जबकि ‘जीवन का जश्न’ के लिये ऐसी कोई आवश्यकता नहीं होती है।
यह बताया जाता है कि दक्षिण कोरिया की राजधानी सियोल में ह्योवोन हीलिंग नामक सेंटर है जो फ्यूनरल सर्विस नामक कंपनी की वित्तीय मदद से इच्छुक व्यक्तियों का नकली अंतिम संस्कार से संबंधित कार्यक्रम का आयोजन करता है। बताया जाता है कि अब तक हजारों लोग इस प्रकार अपना अंतिम संस्कार करवा चुके हैं।
इस कार्यक्रम में पहले एक भाषण होता है जिसमें तमाम अंतिम संस्कार से जुड़ी तमाम सूचनाएं प्रतिभागियों को दी जाती हैं। उन्हें कुछ निर्देश दिए जाते हैं और साथ ही एक वीडियो दिखाया जाता है। उसके बाद शामिल हुए लोगों को एक ऐसे कमरे में ले जाया जाता है जिसमें हल्की रौशनी होती है और जो गुल-दाउदी के फूलों से सजा होता है।
वहां बैठकर लोग अपनी वसीयत लिखते हैं। फिर उन्हें ताबूत में लिटा दिया जाता है। काले कपड़े पहना एक कठोर-सा दिखता आदमी ताबूतों को बंद करता है और प्रतिभागियों को दस मिनट अपने-अपने ताबूत में बिताने पड़ते हैं। इस नकली अंतिम संस्कार कार्यक्रम में शामिल हुए एक प्रतिभागी ने अपने ब्लॉग में लिखा था, “ताबूत के अंदर रोशनी की एक भी किरण नहीं आ रही थी, और दस मिनट तक उस अंधेरे, दम घुटने वाले माहौल में बिताते हुए मुझे रोना आ रहा था।”
याद रहे कि इन अंतिम संस्कार आयोजनों में शामिल होने वाले कुछ लोग ख़ासे बीमार होते हैं तो कुछ मानसिक रूप से परेशान होने के कारण आत्महत्या की बात सोच रहे होते हैं। एक प्रतिभागी ने अपने अनुभव के बारे में लिखते हुए कहा था कि ताबूत में घुसने से पहले तक उसके दिमाग़ में आत्महत्या करने का विचार बहुत प्रबल था। मगर दस मिनट ताबूत में बिताने के बाद मेरे मन से आत्महत्या के विचार पूरी तरह से निकल गये।
2012 से लेकर अब तक हज़ारों लोग इन कार्यक्रमों में हिस्सा ले चुके हैं। संस्था के निर्देशक जियोंग ऐसे लोगों पर विशेष नज़र रखते हैं जिनमें आत्महत्या करने की प्रवृत्ति महसूस की जाती है। आयोजन की समाप्ति पर वे प्रतिभागियों से बातचीत करते हैं और कहते हैं, “आपके जीवन का पुराना आवरण उतर गया है। यह आप लोगों का पुनर्जन्म है; इसलिये इसे अब एक नये सिरे से जियें।”
अधिकांश लोगों का कहना है कि इस कार्यक्रम में शामिल होने के बाद से वे तरोताज़ा महसूस कर रहे हैं, और अब उन्हें जीवन को देखने का एक नया नज़रिया मिल गया है। अढ़ाई घंटे के इस कार्यक्रम की समाप्ति के बाद प्रतिभागियों को सहज होने में कुछ समय तो लगता ही है। मगर शीघ्र ही वे बातचीत करने लगते हैं और आपस में हंसने लगते हैं। और हाँ… अपने-अपने ताबूत के साथ सेल्फ़ी भी लेने लगते हैं।
सच तो यह है कि आज के दौर में बहुत से लोग कई कारणों से अवसाद से ग्रस्त हो जाते हैं। फ़िलहाल तो हम दक्षिण कोरिया की बात कर रहे हैं मगर जस्टिन बीबर (कनाडा का एक लोकप्रिय सिंगर) जैसे लोग भी मरने से पहले अपने अंतिम संस्कार की तैयारी कर चुके हैं।
जीवन ही की तरह मृत्यु भी एक शाश्वत सत्य है। हम इससे कितना भी भागने का प्रयास कर लें, मृत्यु तो एक न एक दिन हर किसी को आनी ही है। इसलिये बेहतर तो यही होगा कि जीवन की अंतिम सच्चाई को जितनी जल्दी स्वीकार कर लिया जाए और इसकी तैयारी भी कर ली जाए, उतना ही बेहतर होगा।
जहां दक्षिण कोरिया में यह आयोजन सामूहिक रूप से होता है, अन्य देशों में लोग निजी तौर पर अपना अंतिम संस्कार अपने जीवन काल में कर लेते हैं। आज के सोशल मीडिया के जीवन में तो यह जानने की भी उत्कंठा बनी रहती है कि किसी के मरने की ख़बर वाली पोस्ट पर कितने लाइक या कमेंट मिल रहे हैं। मरने वाला जानना चाहता है कि उसके मरने के बाद उसके मित्र, दुश्मन, रिश्तेदार उसकी मृत्यु की पोस्ट पर क्या-क्या टिप्पणियां करते हैं।
क्रिस हेलेंगा और डॉन फ़्रेंच
क्रिस हैलेंगा को 2009 में कैंसर की चौथी स्टेज होने के कारण डॉक्टरों ने केवल दो वर्ष तक जीवित रहने का समय दिया था। मगर अपने जीवट के कारण वह 14 साल तक जी गयी। मगर जब कैंसर की चौथी स्टेज ने उसे पूरी तरह से तोड़ दिया तो उसके मन में यह इच्छा जागी कि वह अपने लिये ‘लिविंग फ़्यूनरल’ करवा ले। अपने इस ‘जीवन के जश्न’ में अपनी मित्र डॉन फ़्रेंच से कहे कि वह अपने टीवी सीरियल वाले संवाद उसके अंतिम संस्कार के आयोजन में बोले।
डॉन फ़्रेंच ने अपने किरदार जेराल्डीन ग्रेंजर जैसे कपड़े पहन कर अपने संवाद भी बोले और अपनी मित्र क्रिस हैलेंगा के जीवन के बारे में सभी उपस्थित मेहमानों को बताया भी।
जहां क्रिस हैलेंगा जैसे लोग आगे आकर अपना ‘लिविंग फ़्यूनरल’ करवाने का निर्णय ले रहे हैं वैसे-वैसे ही पारंपरिक फ़्यूनरल एजेंट भी ‘लिविंग फ़्यूनरल’ की सेवा अपने मीनू कार्ड में शामिल करने लगे हैं। ये ‘लिविंग फ़्यूनरल’ बिना लाश के होते हैं। लाश का चर्च में होना आवश्यक नहीं। इन्सान चाहे तो स्वयं उपस्थित भी रह सकता है या फिर घर से ज़ूम इत्यादि पर शामिल हो सकता है। अब मौत के बहुत से इंद्रधनुष आसमान में दिखाई देने लगेंगे… सब का अपना-अपना इंद्रधनुष!
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.

76 टिप्पणी

  1. जीते जी अंतिम संस्कार। 2016 में मेरे एक परम मित्र हैं अध्यात्म जैसे जटिल विषय पर पीएचडी हैं उन्होंने कहा था कि वे जीते जी अपना अंतिम संस्कार कर रहे हैं अपने जन्म दिन पर। लोगों ने मजाक उड़ाया पर मैं उनकी आध्यत्मिक चेतना को समझता हूं अतः विषय पर गभीर चिंतन और चर्चा की। आज आपका लेख पढ़ कर बहुत कुछ याद आया। इसके आध्यात्मिक पहलू पर आपसे चर्चा करना चाहूंगा।

    • अत्यंत हीं गूढ़ व गंभीर संपादकीय। बहुत सोंचने के बाद भी शब्द नहीं मिले क्या लिखा जाए। प्रगतिशीलता की दिशा यदि ऋणात्मक हो तो परिणाम संभवतः अवनतिशीलता हीं होगी। ऐसा मुझे लगता है। जीते जी अंतिम संस्कार वस्तुतः दुसरा अंतिम (2nd last) संस्कार तो हो सकता है परंतु सचमुच का अंतिम नहीं हो सकता। मृत्यु सत्य है। परंतु मृत्यु से पहले मृत्यु का जश्न सत्य है या नहीं यह समझ से बाहर है।

  2. धन्यवाद तेजेन्द्र जी
    बड़ा अलग है यह विचार व विषय! भौतिक जीवन की वास्तविकता से रूबरू करवाता संपादकीय कई मायनों में महत्वपूर्ण है। जन्म जैसे ही मृत्यु भी जीवन का सत्य है। उसे स्वयं जीना एक बड़ा उत्सव है।
    सुंदर संदेशपूर्ण संपादकीय!
    साधुवाद

  3. अत्यंत रोचक संवाद एवं गहन चिंतन से परिपूर्ण…. मृत्यु का आगमन केवल एक सत्य ही नहीं…जीवन का अंतिम पर्व भी है

  4. आज के संपादकीय में जीते जी अपना अंतिम संस्कार !?एक अलग अजीब परंतु सत्य और वह भी शाश्वत,लगता है आदरणीय तेजेंद्र शर्मा जी ने अपने सभी पाठकों मित्रो और परिचितों को अपनी सर्जना से सराबोर करने की ठान रखी है। और संपादकीय में विभिन्न देशों की परंपराओं का ब्यौरा बेहद माइक्रो अंदाज़ में देना है किसी के बूते की बात नहीं है।सालों पहले समाचार पत्रों में लंदन के हवाले से एक कॉलम की खबर आई थी कि अपना फ्यूनरल यानी अंतिम संस्कार का जिम्मां आप हमें दे दें।मैने भी एक कविता यथा कफ़न दफ़न के शीर्षक से अमर उजाला पटल पर पोस्ट की थी।
    परंतु यह संपादकीय समग्र रूप से प्रस्तुत है और पाठकों को एक विचारोतेजक बातचीत के लिए विवश सा करता लगता है।
    हमारे देश और बॉलीवुड की फिल्मों में भावनाओं की पराकाष्ठा के रूप में कुछ नियत संवाद आपको सुनाने को मिल सकते है,,,मेरा मरा मुंह देखेगा, मैं अब ज़िंदगी में तेरा मुंह नहीं देखूंगा या गि,मेरे मरने पर आ या ना आना,और हां तू हमारे लिए मर गया या गई ,,,बेटे बेटी या किसी भी रिश्ते से नाराज़ होने पर पिंड दान कर देना,,,,।
    देश के विभाजन त्रासदी से जूझते लोगों में तो अपने अंतिम संस्कार की व्यवस्था की बात सुनी हैक्योंकी वह केवल परिस्थिति जन्य सोच रही थी।
    तिस पर भी हमारे यहां पर इन सभी चर्चाओं को अच्छा नहीं माना जाता।पारिवारिक व्यवस्था होने के कारण ,कभी मृत्यु या अंतिम संस्कार की चिंता कभी भारतीय चिंतन का अहम हिस्सा नहीं रही।वर्तमान की बदलती परिस्थितियों में, कोरोना की पृष्ठभूमि से अब इस विषय पर सोचना नितांत आवश्यक है।
    आदरणीय श्री तेजेंद्र शर्मा जी को
    साधुवाद। साधु साधु साधु

    • भाई सूर्यकान्त शर्मा जी आपने एक ही टिप्पणी में इतना कुछ कह डाला… हार्दिक आभार।

    • सम्पादकीय को पढ़ते हुए मृत्यु गीत लिखने को जी चाहता है ।आपकी कहानियाँ भी इसी विषय पर हैं ।
      आज जन्म का होना सुविचारित होता जा रहा है तो मृत्यु भी योजनाबद्ध होने की ओर है ।
      समाज की दिशा अपने लिए जीने की तरफ जा रही है तो अपने लिए मौत का चुनाव भी अच्छी अवधारणा है ।
      ये परिवर्तन भी विकासवादी है ।
      साधुवाद
      Dr Prabha mishra

  5. इन्सान जो ना करे वो थोड़ा…। यदि यह मनोचिकित्सा की तौर पर किया जाता तो तार्किक है। लेकीन इसलिए कि मौत के बाद क्या होगा यह देखने के लिए यह प्रक्रिया की जाये तो ‘खाली दिमाग़ की ख़ुराफात’ से अधिक कुछ भी नहीं।
    वास्तव में इन्सानी जीवन अत्यधिक सुविधा सम्पन्न हो गया है। पहले दो वक्त की रोटी कमाना और पका कर खाना भी श्रमसाध्य था। तमाम खतरे, रोग-बीमारियां, दूरियांँ आदि दिक्कतों में जिन्दगी जीने की जद्दोज़हद चलती रहती थी, तो मौत के जश्न की बात जहन में कैसे आती?
    एक कहावत बड़ी सटीक लगती है, “मोटान खसी (बकरी) लकड़ी चबाये”…
    यह जानकारी नयी है, उसे मनोरंजक ढंग से लिखा है। हर बार की तरह। हार्दिक आभार ऐसे विषयों पर लेखनी चलाने के लिए।

  6. यह ख़बर चौंका रही है जबकि,यह पहले से हो रहा है।
    हमारे यहाँ एक ख़बर पढ़ी गयी कि लव जेहादी से ब्याह रचाने बाली बेटी का अंतिम संस्कार उसके परिवार ने जीते जी कर दिया।
    यह दुःख का मनोविज्ञान है।जीते जी यह देखना हौसले का सबब है। हमारे यहाँ आदमी की प्रशंसा मरने के बाद होती है।यह मृत्यु- पर्व है।।हमारे यहाँ यह हौसला आने में शायद देर लगेगी। यह होगा भी तो विलाप और कृन्दन ही होगा।मरने वाला बुक्का फाड़कर रोयेगी।
    यह रोचक है।

    • मीरा जी आपने इस संपादकीय के भावनात्मक पक्ष को अपनी टिप्पणी में उभारा है। हार्दिक आभार।

  7. अजब गजब है दुनिया, इसमें जो खर्च होता है उससे किसी गरीब व्यक्ति की सेवा कीजिए, मदद कीजिए, मदद से बड़ा सुख नहीं और न ही जीवन

    • इस तरह तो दीवाली, ईद, क्रिसमिस – सब बन्द कर दिये जाने चाहियें और ग़रीबों की मदद करनी चाहिये।

  8. ‘लिविंग फ्यूनरल’ की अवधारणा को अभिव्यक्त करती संपादकीय के लिए तेजेंद्र शर्मा जी को हार्दिक बधाई , हर बार की तरह इस बार भी समाज के बदलते परिवेश से नकाब उतारने का साहस किया है . इंसान की खुरापात क्या-क्या और कैसी -कैसी सोच को जन्म देती है तभी तो कहा जाता है इंसान को संसार का खतरनाक प्राणी माना जाता है . खैर, तेजेंद्र शर्मा जी की नवोन्मेषी मेधा समाज की विकृतियों को कथा साहित्य में अभिव्यक्त करती है और सामाजिक- यथार्थ से पाठकों को रूबरू कराते हैं . मृत्यु के विविध रूप / स्वरुप आपकी कहानियों में इस तरह चित्रित हुए हैं कि पाठक कहानी पढ़ते – पढ़ते हर दृश्य को अपने सामने घटित होते देखता है .

    • दीपक आपकी सारगर्भित टिप्पणी बहुत कुछ कह रही है। मेरा प्रयास रहता है कि मेरे भीतर का कहानीकार संपादकीय लिखने वाले पत्रकार का साथ दे।

  9. महत्वपूर्ण जानकारी।यह कुछ ऐसा लगा जैसे समाधि ली गई हो फर्क इतना है कि व्यक्ति इसमें मरता नहीं बस मृत्यु के संस्कारों को इंजॉय कर रहा है।
    बदलाव हर चीज, विचार और संस्कृति में आ चुके हैं तो आश्चर्य नहीं होगा कि भारत में भी ऐसा ही कुछ शुरू हो जाए।अंतिम संस्कार कराने वाली ऐजेंसियों ने भारत में काम शुरू कर ही दिया है।

    • दिव्या विश्व बदल रहा है। तकनीकी क्रान्ति ने सब कुछ बदल दिया है। नई नई बातें सुनने और देखने को मिलेंगी।

  10. लिविंग फ्यूनरल जैसे बकवासी कर्मकांड को मैं पश्चिम के बैठे ठाले लोगों का शगल मानता हूं। मुझे कहीं से नहीं लगता कि ऐसे ताबूत में बंद होकर कोई अवसाद से मुक्त हो सकता है और न ही इसका कोई वैज्ञानिक आधार है। मुझे लगता है कि सनातन धर्म का अंतिम संस्कार और राम नाम का जप ही सर्वश्रेष्ठ अन्तिम आयोजन है क्योंकि विज्ञान भी स्वीकार करता है कि प्रार्थना फलदायी होती है और अग्निप्रवेश के पश्चात मृत देह की दुर्दशा होने की भी कोई आशंका नहीं रहती तथा शरीर के पंच तत्वों में वापस जाकर मिलने की संकल्पना भी मुझे समुचित प्रतीत होती है। फिर भी आपका संपादकीय लिविंग फ्यूनरल की अवधारणा को समझाने में सफल रहा है, ऐसा मेरा अभिमत है।

    • पुनीत लेखकीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी विशेषता है कि हम सब एक ही विषय पर अलग अलग विचार रख सकते हैं। आपकी टिप्पणी पाठकों को एक नई दिशा देगी।

  11. बहुत सुंदर सर मैंने अभी पढ़ा और पढ़ कर भाव विभोर हो उठा। मेरे परिवार के जैसे हालात हैं उससे आप और बहुत से लोग वाकिफ हैं। ना मां ना बाप ना भाई बहन का अब पहले जैसा सहयोग और भावनाएं। मनुष्य कितना भावनाओं से हीन हो चुका है। अब समझ आता है कि मां बाप के सिवा कोई आपका अपना नही दुनिया में।आप कितना ही पढ़ लिख जाएं दुनिया की भलाई के कितने ही काम कर लें। लेकिन आपके जीवन में गलती से भी किसी एक भी इंसान का दिल दुखा दिया गया हो तो बस आपको बुरा सुनने को मिलता है। अधिकतर तो हमारे जीते जी सुन लेते हैं। मरने के बाद तो क्या ही होता होगा। मैं एकल परिवार वाला भी नहीं हूं कायदे से देखा जाए तो। इसलिए मुझे भी यह भय अधिक सताता है कई बार कि मुझे कोई जलाने भी आयेगा या नहीं। शादी करना नही चाहताफिर मेरे जैसे लड़के से शादी करेगी कौन जिसके आगे पीछे कोई नहींजिसके पास अभी नोकरी भी नहीं। कल को नोकरी लग भी गई तो अकेले लड़के को लड़की कौन देगा। हर किसी का अरमान होता है अपनी बेटी को शान से विदा करे फिर कितना ही गरीब क्यों ना हो वो बाप। इसलिए ही मैं भी अपना पहले से फ्यूनरल बुक करने के बारे में आपसे बात कर रहा था। क्योंकि हमें अपने अगले पल का भी नहीं मालूम कि हम रहेंगे या नहीं। फिर आपने कहा था भारत में अभी यह विश्वसनीय नहीं है। आपकी बात सही थी क्योंकि यहां भी भ्रष्टाचार देखने को मिल सकता है। ऐसी कंपनियों पर अभी भारत में भरोसा नहीं किया जा सकता। क्योंकि आज भी जैसे पुनीत सर ने कहा कि हमारे यहां रीत रिवाज और संस्कार के अलग तरीके हैं पश्चिम के मुकाबले। और मैं तो व्हाट्स एप पर स्टेट्स भी इसलिए डालता हूं रोजाना ताकि लोगों को यह महसूस होता रहे की मैं जिंदा हूं। मेरे जितना बदकिस्मत तो शायद ही कोई होगा। और मेरे जैसी किस्मत दुश्मनों को भी ना मिले मैं यही अरदास भोले बाबा से करता हूं आपने फिर से संपादकीय के माध्यम से मेरे उस दिल कोने में कुछ छेड़ दिया है जिसके बारे में आपसे बात की थी। हमारे गुरु जी हैं शांति कुंज हरिद्वार के पंडित श्री राम शर्मा आचार्य स्वतंत्रता सेनानी भी थे और मां गायत्री को सिद्ध भी किया था उन्होंने 3400 के लगभग किताबें लिखी जिसमें एक किताब यह थी। *मृत्यु के बाद हमारा क्या होता है*
    तेजेंद्र सर भारत से एक बार आपको मैं पुनः प्रमाण करता हूं और आपसे जब पहली बार मिला आपको छूने आपके हाथ में हाथ रखकर उस ऊर्जा को महसूस करने की अनुमति मांगी थी वह आज फिर से मेरी आंखों के सामने घूम रही है। बहुत बहुत बहुत अकेला महसूस करवा दिया है आपने मुझे फिर से। कोई नहीं दुनिया में आपका बस अपना काम करते चलो किसी का जाने अंजाने दिल ना दुखे ये कोशिश करते रहो प्रणाम सर

    • तेजस बहुत भावुक कर दिया तुमने। हमेशा ही तुम्हारे व्यवहार से स्नेह टपकता है। मेरी आशीर्वाद हमेशा तुम्हारे साथ है। मैं महूसूस कर रहा हूं कि तुमने संपादकीय को बहुत गहराई से आत्मसात किया है, केवल पढ़ा नहीं है।

      • Your Editorial of today touches upon a very delicate n awesome subject like death and the curiosity about how one’s friends n relatives will take to a dear one’s death leading to this new practice of ‘a living funeral’k is interesting and was not known to me.
        Much can be said in its favor as well in its condemnation.
        You have brought forth both these views here.
        Warm regards
        Deepak Sharma

        • Deepak ji thanks a lot for your intervention. It has been my earnest endeavour as the editor of Purvai to bring matters unknown to my readers. Dwelling the mystery of unknown has its own peasures.

  12. तेजेन्द्र जी, पहली बार आपसे बात कर रही हूँ…लिविंग फ्यूनरल जैसी अभिनव संकल्पना को मैं दूसरे तरीके से देखती हूं, जहां मौत का गुमां नहीं होता. मौत तो आनी है, उसे किस तरह से स्वीकारना है, यह हम पर निर्भर करता है. आपने अपने गहन संपादकीय से उसकी ओर देखने का सकारात्मक नजरिया प्रस्तुत किया है. हम हिंदू भी इसे अलग तरीके से मना सकते हैं. लेकिन मृत्यु जैसी अनिवार्य बात को आपने अभिनव दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया है. हम आपकी सोच के कायल हैं. सादर

    • सुलभा जी आपका पुरवाई के मँच पर स्वागत है। आप हम सबके लिये आदरणीय हैं। इस सारगर्भित टिप्पणी के लिये हार्दिक आभार।

  13. जैसा आपने लिखा है सर इस ‘लिविंग फ्यूनरल’ से एक बात सीख सकते हैं, कि”जीवन ही की तरह मृत्यु भी एक शाश्वत सत्य है। हम इससे कितना भी भागने का प्रयास कर लें, मृत्यु तो एक न एक दिन हर किसी को आनी ही है। इसलिये बेहतर तो यही होगा कि जीवन की अंतिम सच्चाई को जितनी जल्दी स्वीकार कर लिया जाए और इसकी तैयारी भी कर ली जाए, उतना ही बेहतर होगा।”हम हमारे जीवन में कई बार मौत को करीब से देखते हैं जरूरी नहीं कि वह मौत हमारी अपनी ही होने वाली है, मौत के कारण जब अपने हमसे बिछड़ते हैं , तो सहज होने में समय लगता है । हम सभी को मृत्यु से साक्षात्कार करना ही है,इसके लिए स्वयं ताबूत में बैठकर देखने की वैसे आवश्यकता होनी नहीं चाहिए,पर सबके अपने-अपने तरीके हो सकते हैं भारत जहाँ मृत्यु के बाद जलाने का प्रावधान है वहाँ इस तरह की संकल्पना को स्वीकार्यता मिलना आसान नहीं । फिर योग और ध्ययान से समृद्ध परंपरा है। शवासान जैसे आसान भी है जो आपको अपने बारे में सोचने समझने के लिए एक अवसर प्रदान करते हैं , ध्यान की मुद्रा भी है जो जीवन और मृत्यु के विविध पक्षों से आपको परिचित कराते हैं। इसलिए देखा जाए तो भारत बहुत प्रौढ़ देश है।

    • डॉ. रक्षा आपने संपादकीय को अपने दृष्टिकोण से देखा है। वैसे ब्रिटेन और अन्य पश्चिमी देशों में CREMATION और BURIAL एक ही स्थान पर होते हैं जिसे CREMETORIUM कहते हैं। वहां भारतीय पद्धति के अनुसार भी सब हो सकता है। बस ताबूत में मुर्दा नहीं होगा… भारत की परंपराएं तो हमेशा से विश्व को राह दिखाती रही हैं।

  14. जीते जी अपना अंतिम संस्कार – यह शब्द हम जैसे सासंरिक लोगो को दुख की अनुभूति होती है। क्या कोई अपना नही है जो मरने के बाद मृतक का अंतिम संस्कार कर सके।
    दूसरी ओर यह भावना बलवती होती है कि, लो जी! हमने जीते जी अपना अंतिम संस्कार कर दिया अब हमे संसार का मोह नही, इस नाशवान श्री के प्रति भी लेशमात्र आसक्ति नही है।
    यदि यही भावना है तो उत्तम है लेकिन जीते जी अपना अंतिम संस्कार इसलिए कर रहे कि पता नही कोई करेगा भी या नही।
    तो यह स्थिति तकलीफदेह है। कम से कम हमारे लिए तो है ही।

    • संगीता जी आपने अपने उल्लेखनीय विचारों से हमारी बातचीत को समृद्ध किया है। हार्दिक आभार।

  15. बहुत ही रोचक विचार…!
    मरने के बाद आप अपने मित्रों की भावनाओं को कहाँ जान पाएंगे. वही जीते जी जानने का आनंद ही कुछ और होगा.
    हमें तो ख्याल पसंद आया…!

  16. नमन तेजेंद्र जी , ऐसे अद्भुत विषय को अपने संपादकीय का विषय बनाने के लिए।
    मृत्यु से पूर्व ही अपना अंतिम संस्कार करने की परंपरा भारत में अनसुनी नहीं रही है ।मैंने अपनी माता के मुख से इस परंपरा के बारे में सुना था कि कई धनवान लोग जब चार धाम की यात्रा के लिए जीवन के चौथेपन में निकलते हैं तो अपना अंतिम संस्कार करवा कर जाते हैं । मनुस्मृति के अनुसार यात्रा का फल आप तभी प्राप्त कर सकते हैं जब आपकी सभी सांसारिक जिम्मेदारियां पूरी हो गई हों। तो जब जिम्मेदारियां पूरी हो गई हैं और कठिन यात्रा पर जाना है अपना अंतिम संस्कार करवा कर संतानों को इस कर्तव्य से भी मुक्त कर देना इस परंपरा का आशय था ‌। भारतीय आध्यात्म के अनुसार अंतिम संस्कार आनंद की लिए नहीं बल्कि आत्मा की मुक्ति और सद् गति का साधन था। परंतु पश्चिमी ढंग से तो यह एक उत्सव जैसा ही हो गया । लाइक्स और डिसलाइक्स का दम छल्ला जोड़कर तो आपने इसे और भी अधिक रोचक बना दिया। नए ढंग के संपादकीय के लिए एक बार फिर बधाइयां।

    • सरोजिनी जी, आपने अपनी टिप्पणी के माध्यम से हमारे पाठकों को उल्लेखनीय जानकारी दी है। हार्दिक आभार।

  17. आदरणीय वास्तविकता यही है यही शाश्वत सत्य है कि एक न एक दिन सभी को जाना है लेकिन इस कटु सत्य ो हम हम स्वीकार नहीं करते। वास्तव में आपकी संपादक को पढ़कर लोगों की मानसिकता बदल जाएगी आत्महत्या के प्रति।
    यह सच है कि व्यक्ति का अंत हो जाता है उसे पता भी नहीं रहता कितने उसके चाहने वाले लेकिन अपने जीते जी इस संस्कार में शामिल होकर वह जान जाता है की वास्तविकता क्या है।
    शानदार अभिव्यक्ति हार्दिक बधाई

  18. आपका लेख पढ़कर मुझे किशोर कुमार द्वारा गाया हुआ गाना याद हो आया । उसमे एक पंक्ती थी, पीने वालों को पीने का बहाना चाहिए । वोह इसलिए कि अगर आप कोई पार्टी या जश्न मनाना चाहते हैं तो आप कभी भी, कहीं भी मना सकते हैं । अगर खुशी का माहौल होगा तो बहुर सारे आपका निमंत्रण पाकर आ जाएंगे और न भी मिला तो जबरदस्ती आ जाएंगे जिसे पश्चिमी समाज में ‘gate crash’ कहा जाता है । अगर दुखद माहौल होगा और फिर भी आपके जीवित रहने के कारण आप ही ने आंतन्त्रित किया है तो आएंगे । पार्टी जो ठहरी !! जीवित रहते हुए आप अपना अंतिम संस्कार की रसमे देखना चाहते हैं का मतलब है आप एक बार फिर सबसे अच्छे शब्द सुनना चाहते हैं । है किसमे इतना दम के आपकेजीते जी आपको भरा – बुरा कह दे ? नोच न ले उसे ?

    कोई भी हो, उस व्यक्ति की किसी न किसी समय मृत्यु निश्चित है । इस पर इतना विचार क्यों करना ? कोई यां तो रसमों के साथ आपको बिदा करेगा नहीं तो आप किसी के खाने का स्रोत बनेगे – कीड़े मकौड़े हों या फिर जंगली जानवर । आप को तब क्या फ़र्क पड़ना है ? मिट्टी में ही तो मिल जाना है ।

  19. तेजेन्द्र जी: आपके इस रोचक सम्पादकीय के लिये बहुत बहुत साधुवाद। कुछ समय पहले एक प्रवचन में मेरी एक स्वामीजी से भेण्ट हुई थी। एक दिन बातौ ही बातों में मैं ने उन से उनके सन्यास लेने से पहले जीवन के बारे में कुछ जानना चाहा। मेरी बात सुनकर हँसकर उन्होंने कहा कि उस जन्म का तो वो त्याग कर चुके हैं और यह जन्म उनका नया पुनर्जन्म हैं। इसी तरह एक बार योगी आदित्यानाथ जी ने भी एक इन्ट्रव्यु में जब अपनी पीढ़ियों का उल्लेख किया था वो उनके biological parents न होकर नके के गुरूजनों का उल्लेख था। अपनी गृहस्थी को त्याग के सन्यासी बन जाने की प्रतिक्रिया को लिविंग फ़्युनरल नहीं तो और क्या कहेंगे?

  20. तेजेन्द्र जी: आपके इस रोचक सम्पादकीय के लिये बहुत बहुत साधुवाद। कुछ समय पहले एक प्रवचन में मेरी एक स्वामीजी से भेण्ट हुई थी। एक दिन बातौ ही बातों में मैं ने उन से उनके सन्यास लेने से पहले जीवन के बारे में कुछ जानना चाहा। मेरी बात सुनकर हँसकर उन्होंने कहा कि उस जन्म का तो वो त्याग कर चुके हैं और यह जन्म उनका नया पुनर्जन्म हैं। इसी तरह एक बार योगी आदित्यानाथ जी ने भी एक इन्ट्रव्यु में जब अपनी पीढ़ियों का जो उल्लेख किया था वो उनके biological parents न होकरर उनके गुरूजनों का उललेख था। अपनी गृहस्थी को त्याग के सन्यासी बन जाने की प्रतिक्रिया को लिविंग फ़्युनरल नहीं तो और क्या कहेंगे?

  21. अपनी मृत्यु को जीना, एक अनोखा प्रयोगं है। इसे मानसिक संतुष्टि का एक नवीन आयाम कहा जा सकता है। क्या मृत्यु का यह अहसास हम सबने कोरोना काल में नहीं जिया है। इसके लिए एक व्यक्तित्व डॉ के के अग्रवालका सामने आ जाता है, जो खु मृत्यु के मुँह में बैठकर जिजीविषा बाँट रहे थे। कितने उस प्रेरणा से बचे थे। शायद यही प्रयोग लोगों को अवसाद या आत्महत्या के निर्णय से मुक्त करा पाता है।

  22. आदरणीय तेजेन्द्र जी!
    आपके इस संपादकीय का शीर्षक ही पहले तो झकझोर गया। एकाएक विश्वास नहीं हुआ। जीते जी अंतिम संस्कार वाली बात कहना एक गहरे विमर्श का विषय है।यह सब पढ़कर अजीब सा ही लगा।क्योंकर इंसान के मन में इस तरह का भाव आया होगा?हम क्यों अपने मृत्यु के बाद का जश्न अपने जीवनकाल में देखना चाहते हैं?
    हमने देवों के देव महादेव सीरियल में देखा था कि शिव जी के द्वारा ब्रह्मा जी के झूठ बोलने वाले एक सर को काट देने के कारण दक्ष ने शिव को शत्रु माना प्रजापति के अधिकार के चलते शिव जी को पूजा के अधिकार से वंचित कर दिया ।पर इच्छा के विरुद्ध सती के विवाह के चलते जीते जी सती का पिंडदान करने की तैयारी करी ,पर फिर दूसरी बेटी के मना करने पर नहीं किया।इधर हिन्दुस्तान में भी कभी-कभी इस तरह की कुछ खबर सुनने में आ रही हैं। शायद कोरोना काल में मौत का तांडव और लाशों की दुर्दशा देखकर इंसान के मन में इस तरह की स्थिति या दुर्भावना उत्पन्न हुई होगी जो संभावित भी है।
    इसके दो कारण हो सकते हैं। जैसा कि संपादकीय में लिखा भी है-
    १-अतिरिक्त अवसाद ग्रस्त मनोदशा या
    २-फिर वह अति उच्च आकांक्षाएँ जिसके चलते यह जानने की चाहत होती है कि हमारी मृत्यु के उपरान्त हमारे बारे में कौन कितना और क्या-क्या सोचता है?
    यह एक सनक की तरह ही लगता है।आपके जीते-जी जो भी होगा वह दिखावे से ज्यादा कुछ नहीं।आप उस अधखिचड़ी सच्ची-झूठी प्रशंसा की क्षणिक खुशियों से फूल सकते हैं। इससे ज्यादा कुछ नहीं होगा।
    इंसान अपने सत्कर्मों से, सद्विचारों से, सद्भाव से ही लोगों के दिलों में जगह पाता है और साथ ही आत्मिक संतुष्टि भी और यही सब आपके अंतिम संस्कार में पता चलता है।
    कोरोना काल एक अप्रत्याशित स्थिति थी जिसकी याद कोई स्वप्न में भी नहीं चाहता।
    तेजेंद्र जी !आपके इस संपादकीय को पढ़ते हुए।हमें रायपुर के एक वृद्ध आश्रम की अचानक याद आ गई। वह रायपुर में हमारे घर से थोड़ी दूर पर ही है ।तब हम रायपुर में थे। रायपुर हमारा मायका है। 5 जून को हमारे पिताजी की पुण्यतिथि रहती है। उस दिन हर वर्ष भाई वृद्ध आश्रम में खाना खिलाता है। खाना वहीं वृद्धाश्रम में वे स्वयं बनाते हैं ।मीनू बताना होता है और पैसे देना होता है । पर भोजन वहाँ उनके स्वास्थ्य को ध्यान रख बनता है।आपको कुछ एक चीज अपनी तरफ से बना कर ले जा सकते हैं। उसे भी पहले आपको ही अधिकारी के सामने खाकर शुद्धता का प्रमाण देना होगा और अगर आप चाहे तो अपने हाथ से परस सकते हैं
    वहांँ जाकर उन लोगों को देखना और सब जानना एक अभूतपूर्व अनुभव रहा। वहांँ हमने सारी जानकारियांँ लीं।
    अच्छी व्यवस्था थी वहांँ की। सिंधियों के उस वृद्ध आश्रम में वर्ष में एक बार समर्थ वृद्धों को तीर्थ के लिए भी ले जाते हैं। जहांँ संभव होता ।अगर कभी कोई मृत्यु हो जाती और उनके घर का कोई नहीं होता था तो उसका अंतिम संस्कार बहुत धूमधाम से होता था, बाजे गाजे के साथ और उसमें कलेक्टर, एसपी ,विधायक, संस्था के सभी सम्माननीय सदस्य और सम्मानित गण साथ रहते। शालीनता से अंतिम यात्रा निकलती थी।
    यह सब बड़ा सुखद व अच्छा लगा।
    मुंशी प्रेमचंद जी की पंच परमेश्वर कहानी का एक अंश याद आता है।
    *किन्तु धर्म का पालन मुख्य है। ऐसे सत्यवादियों के बल पर ही धरती थमी है नहीं तो कब की रसातल में चली जाती।*
    अच्छे लोग भले ही कम हों पर हैं तो !यह अहसास हुआ।
    लिविंग फ्यूनरल की जरूरत का महसूस होना एक गहरे अवसाद की खुशनुमा प्रतिक्रिया है जिसका कोई औचित्य ही नहीं।
    भारतीय संस्कृति 16 संस्कारों पर आधारित है। हर संस्कार के अपने नियम है और अंतिम संस्कार का भी अपना एक नियम है। एक ऐसा संस्कार जो विधिवत किया जाता है क्योंकि उसके साथ बहुत सी ऐसी बातें जुड़ी है जो हमारे अगले जन्म से संबद्ध होती हैं ।
    लेकिन आप किसी से जबरदस्ती नहीं कर सकते। भारत में ऐसा मुश्किल लगता है। आप अपनी मांँ जबरदस्ती में भले ही कर लें लेकिन वह हमारी समझ से तो निष्फल ही रहेगा। पिंडदान को ग्रहण करने वाले अधिकृत देव जो भी हों, वे लोग जीवित का पिंडदान क्योंकर स्वीकार करेंगे?
    आदरणीय! आपने एक ऐसा विषय उठाया है जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती परंतु आपका लेख बता रहा है कि जो आपने लिखा है वह असत्य तो कतई ही नहीं।पर सच में! दिल इस सच्चाई को स्वीकार करने की हिम्मत नहीं कर पा रहा है।
    कभी-कभी लगता है कि क्या यही वह विकास या प्रगति है ,जिसकी कल्पना करके हम कदम दर कदम आगे बढ़ रहे हैं एक नई दुनिया की संरचना में? क्या इसी को आगे बढ़ाना कहते हैं? क्या यही प्रगति कहलाती है? ईश्वर सबको सद्बुद्धि दे यही प्रार्थना है।
    आपको पहली बार पढ़ा पर धमाकेदार पढ़ा बहुत-बहुत शुक्रिया आपका।

    नीलिमा करैया

    • नीलिमा जी आपकी विस्तृत टिप्पणी ने तो संपादकीय की पूरी विवेचना कर डाली है। हार्दिक आभार।

  23. एक नए विषय पर अनोखा संपादकीय, जिसे पढ़ते समय निराशा, अवसाद, अकेला पन जैसे कई शब्द मन में किसी सितार से बजते रहे l पढ़ने के बाद भी चिंतन-मनन काफी समय तक चलता रहा l आपकी एक कहानी से अपनी कब्र की प्री बुकिंग के बारे में पता चल था, अभी कुछ दिन पहले भारत में भी अकेले रहने वाले लोगों के लिए अंतिम यात्रा बुकिंग जैसी किसी योजना के बारे में पढ़ा तो लगा हम कितने अकेले होते जा रहे हैं l रिश्तों में जीते हुए भी चार कंधे अंतिम समय में नसीब हों, इसकी भी गारंटी नहीं है l मृत्यु जीवन का अंतिम सत्य है और कितनी बार हम यूँही कह देते हैं कि इससे तो अच्छा मर जाते, परंतु जिंदगी भर मृत्यु के भय से ग्रस्त रहते हैं l आध्यात्मिक राह में दैहिक मृत्यु मान ली जाती है, खाते-पीते, सोते जागते देह से परे l अपनी मृत्यु का अभिनय करने वाले कई कलाकारों ने ये बात कही है कि अभिनय के बाद जीवन के महत्व का एहसास हुआ l निजी अनुभव से कहूँ तो अपने प्रिय लोगों को कुछ दिन की जद्दो-जहद के बाद दुनिया से विदा होते देखा l उस समय यही जाना कि जाते हुए प्राणी की प्रशंसा, अपना दुख, उसके प्रति प्रेम जैसी कोई बात ना करो, हो सके तो उसे मोह से मुक्त कर उसकी अंतिम यात्रा को आसान बनाओ l कठिन है पर वास्तविक प्रेम में ये करना पड़ता है l वहीं ये जरूर कहूँगी अवसाद से लड़ने, अतीत को भूल कर नई शुरुआत करने या गंभीर रोगियों को मृत्यु भय से आजाद करने में संभवतः कुछ सहायक हो परंतु जैसा की आपने लिखा है कि “पारंपरिक फ़्यूनरल एजेंट भी ‘लिविंग फ़्यूनरल’ की सेवा अपने मीनू कार्ड में शामिल करने लगे हैं।“ तो इसके बाजार के हाथों पड़ने की पूरी संभावना लगती है l जैसा की बाजार हर सार्थक प्रयास के लिए करता हैl “जीवन का जश्न” मृत्यु का अनुभव कर भय से मुक्ति या जीवन की गहन समझ के लिए होने के स्थान पर एक ‘नया अनुभव’ ले कर पार्टी करने की ओर बढ़ जाने का खतरा भी है l
    जो भी हो एक गंभीर विषय पर जानकारीयुक्त, सुचिंतित संपादकीय के लिए आपका बहुत आभार सर

    • वंदना जी आप जैसी प्रबुद्ध हस्तियां जब हमारे संपादकीय पर टिप्पणी करती हैं, तो संपादकीय टीम का उत्सह बढ़ता है। हार्दिक आभार।

  24. आज का आपका संपादकीय ‘जीते जी अंतिम संस्कार ‘पढ़कर मुझे आपकी कहानी याद आ गई जिसमें कहानी का नायक सोशल मीडिआ पर अपनी मृत्यु का सन्देश देकर लाइक और कमेंट की प्रतीक्षा कर रहा है। एक बात मुझे आज तक समझ में नहीं आई कि लोग किसी की मृत्यु की समाचार पर कमेंट तो ठीक है पर लाइक क्यों करते हैं।
    मृत्यु एक शाश्वत सत्य है, इस बात को इंसान समझ ले, तो कभी मोह माया से ग्रसित ही न हो पर लंदन और कोरिया में लिविंग फ़्यूनरल’ या ‘जीवन की जश्न’ बारे में इतना ही कहना चाहूँगी… अपने -अपने शौक।

  25. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में तेहरवीं संस्कार व्यक्ति के जीवन के बाद का अहम संस्कार होता है। मेरे गॉव के एक व्यक्ति सन्तान विहीन थे, उन्होंने अपने जीवन मे तीन बार अपनी तेहरवी का भोज यानी मृत्यु भोज दिया। उन्हें लगता था कि मेरे बाद कोई भोज देगा या नहीं इसलिए अपने जीते जी कर देता हूँ।
    आपका सम्पादकीय रोचक है।

  26. जिसे हम नकार नहीं सकते वह यह कि मृत्यु शाश्वत है। फिर भी सिर्फ नजरिए में अंतर है कोई मृत्यु का जश्न मना रहा है तो कोई अपना पिण्ड दान करा रहा है। पिंडदान भी मृत्यु के पश्चात कराया जाता है आज भारत में ऐसे अनेक बुजुर्ग हैं जो अपने बच्चों से उपेक्षित होकर अपना पिंडदान कर रहे हैं। या यह कह लीजिए आज भी पश्चिमी संस्कृति और भारतीय संस्कृति में जमीन आसमान का अंतर है

  27. मानव में भावनाओं का स्लखन हो चुका है। भावनाओं की जगह व्यवहारिकता और तार्किकता ने ले ली है। कहीं ना कहीं हम सब ने मान लिया है कि हम भीड़ में भी अकेले हैं यही कारण है भरे पूरे परिवार में होते हुए भी आज हम जीते जी अपना फ्यूनल कराने के लिए विचार करते हैं।
    आपका संपादकीय ने भावनाओं को झकझोर कर रख दिया और बस यही याद आता है “हम कौन थे क्या हो गए हैं और क्या होंगे अभी”

  28. ग़ज़ब सम्पादकीय। आप द्वारा चुना गया विषय तथा इतने सधे हुए तरीक़े से उसकी प्रस्तुति दोनों ही अनुपम है। जीते जी अपना अंतिम संस्कार करवाना समय के साथ बदल गई हमारी मानसिकता को दर्शाता है। आज की दुनिया में इंसान इतना अकेला हो गया है कि उसे यह उत्सुकता आतंकित करती है कि उसके अंतिम संस्कार के लिए कोई उपस्थित होगा भी कि नहीं। और अगर होगा तो लोगों के उसके और उसके जीवन के बारे में क्या विचार होंगे।
    इस नए रिवाज से लोगों के जीवन में आते सकारात्मक पहलुओं का भी आपने ज़िक्र किया है। शायद पूरी तरह से टूट चुके और अवसाद ग्रस्त लोग मृत्यु से आँखें चार होने पर यह समझ जाते होंगे कि जीवन एक वरदान है।
    कुल मिलाकर आपके इस लेख ने विचलित भी किया है और बहुत प्रभावित भी।
    आप बस यूँ ही लिखते रहिए और हमारे ज्ञान एवं जीवन को समृद्ध करते रहिए।

    • प्रगति आपने अपनी दिल से महसूस की गई टिप्पणी से संपादकीय को सही अर्थ दिये हैं। हार्दिक आभार।

  29. बहुत सुंदर, वर्तमान युग में नए-नए आयाम स्थापित होते जा रहे हैं । अब चाहे ये रूमानी हों, ज़ज्बाती हों; रिश्ते-नाते या कोई भी जीवन का पक्ष। बड़े भैया आपका लेख पढ़कर मेरी विस्मृति, स्मृति में बदल गई, ऐसा मेरी जानकारी में आंखों देखा हाल, वर्षों पहले हमारे एक बुज़ुर्ग ने जीते जी तेरहवीं माना मरणोपरांत होने वाले समस्त संस्कार, ब्रह्मभोज इत्यादि किए थे ।
    नई सदी की नई परंपराएं ।

  30. लेखनी से उतरती आपकी सम्पादकीय , हर बार नया और सार्थक विषय उठाते हैं, नमन है आपको । इस बार की अतिविशिष्ट संपादकीय ने तो मानव व्यवहार पर सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या इंसान इतना अकेला और मानसिक रूप में इस कदर विकलांग हो गया है अथवा अत्याधिक परिपक्व हो गया है। जो जीते जी अन्तिम संस्कार करवा कर उसे पार्टी के रूप में सेलेब्रेट कर रहे हैं। मनोवैज्ञानिक इलाज के तहत यदि किया जाय तब भी इसकी स्वीकार्य ता नजर आए किन्तु,, भारतीय जीवन पद्धति में जीते जी अन्तिम संस्कार कुछ विशेष परिस्थितियों में सम्पन्न किए जाते हैं। यह सत्य है किन्तु एजेन्ट इसे अपने कार्ड में लिख रहे हैं। यह बाजारीकरण मानव जीवन के साथ घातक सिद्ध होने की सम्भावना प्रबल दिखाई देती है। यह चिंता का विषय है। समान्य जीवन जीते हुए य़ह मानसिक दिवालियेपन की निशानी के तौर पर दिखाई देता हुआ प्रतीत हो रहा है। तथाकथित जीवित योनियों में मनुष्य रूप सबसे अधिक विकसित प्राणी माना जाता है। कहीं यह जीवन को एक घने अंधेरे की तरफ धकेलने की प्रक्रिया तो नहीं है। चिंतनीय विषय है कि मनुष्य किस दिशा में जा रहा है। जीते जी आँखों के सामने अपनी अन्तिम तारीफ सुनने की चाह देखकर मालूम चलता है मनुष्य के स्वार्थ का मानसिक स्तर कहाँ पहुँच गया है। पढ़कर लगा जैसे इस दुनिया की बात नहीं हो रही । सादर

    • विजय लक्ष्मी, आपकी टिप्पणी आज देखी… आपने गहराई से संपादकीय को पढ़ा है और गहरी चिन्ता व्यक्त की है। आभार।

  31. सर!आपकी अनेक कहानियों में मृत्यु के अनेक रूप देखने को मिले हैं उस मृत्यु का जीवन रहते हुए संस्कार करना नितांत अनूठा प्रयोग है, आपके संपादकीय के माध्यम से यह नवीन प्रथा ज्ञात हुई पर ये प्रथा उनके लिए तो ठीक है जो आत्महत्या जैसे विषाद से गुजर रहे थे या किसी बीमारी से हताश थे उनके लिए कुछ सीमा तक संजीवनी जैसा अन्यथा ये एक प्रकार का बाह्य आडम्बर जैसा ही है या कुछ लोगों के लिए एक और बड़ा व्यय

  32. जीवन मृत्यु
    अत्यंत गहराई वाला विषय है बढ़िया आलेख इसके माध्यम से बहुत जानकारी मिली बहुत-बहुत धन्यवाद

  33. लिविंग फ्यूनरल अनूठी जानकारी है, मानसिक अवसाद से मुक्ति तक तो ठीक है किंतु जैसे ही इस जश्न का बाजारीकरण होगा वैसे ही हम हमारी संस्कृति,परंपराओं और मान्यताओं से और विमुख हो जाएंगे, भारत में अंतिम संस्कार करने यदि पुत्र -पुत्री उपस्थित न हों तो परिजन व पड़ोसी भी आगे आ जाते हैं क्योंकि मृत्यु को सम्मान देना एक पवित्र धर्म यानी कर्तव्य माना गया है, मानवता मानी गई है किंतु पश्चिम से जैसे ही यह भारत में जोरशोर से आयातित होगा मानवता का ह्रास और सामाजिक संकट आने वाले समय में स्पष्ट दिखाई दे रहा है ।

    भारतीय मध्यवर्गीय मानव अभी तक जीवन के संस्कारों से जुड़े अनुष्ठानों के लिए खर्च करता दिखाई देता है कर्ज आदि लेकर, अब उसके ऊपर यह आर्थिक बोझ भी बढ़ जाएगा और इसका सीधा फायदा बाजार को होगा और आम मानव सच में मरने से पहले मर ही जाएगा
    रोचक संपादकीय के लिए हार्दिक बधाई!

    • सुनीता आपने बाज़ारवाद की दृष्टि से संपादकीय को देखा। अच्छा लगा। हार्दिक आभार।

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