Wednesday, February 11, 2026
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अहमद अली सिद्दीकी से फ़ीरोज़ अहमद की बातचीत

द्विवेदी युग के प्रख्यात साहित्यकार ज़हूर बख़्श ने लगभग 175 पुस्तकों का सृजन किया है। बाल साहित्यकारों में उनका नाम अग्रगण्य है। उनके बिना बाल साहित्य का परिदृश्य अधूरा है। समाज का अग्निकुंड, शबनम, देवी सीता, देवी सती, मुस्लिम महिला रत्न, आर्य महिला रत्न आदि पुस्तकें हिन्दी साहित्य में मील का पत्थर मानी जाती हैं। ज़हूर बख़्श जी के बारे में जानने के लिए उनके पुत्र श्री अहमद अली सिद्दीकी से बातचीत प्रस्तुत है-                                                                                                                                                                                                                                                       
प्रश्न – आप अपने परिवार के बारे में विस्तार से बतायें। 
उत्तर- सिपाही करीम बख़्श के दो पुत्र और एक पुत्री थी। पहले ज़हूर बख़्श और दूसरे रमजान खाँ और पुत्री सुगराबी। ज़हूर बख्श का जन्म 12 मई 1897 कमरया की पायगा सागर में एक किराये के कमरे में जन्म हुआ, गरीबी के कारण ज़हूर बख़्श उच्च शिक्षा से वंचित रहे। छठवीं कक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात् नार्मल ट्रेनिंग स्कूल जबलपुर से शिक्षण प्रशिक्षण प्राप्त कर प्राथमिक विद्यालय गोपालगंज सागर में अध्यापक पद पर जुलाई 1913 में नियुक्त हुए। यहीं से उनकी साहित्यिक यात्रा आरम्भ हुई जो अबाध गति से अनवरत 8 नवम्बर 1964 तक उनकी मृत्युपर्यन्त तक चलती रही।
ज़हूर बख़्श की पाँच संतानें हुईं, उनमें तीन पुत्रियाँ और दो पुत्र हुए। प्रथम पुत्री मुबारक जहाँदूसरी फातमा बेग़म और तीसरी नूरजहाँ। वरिष्ठ पुत्र मुबारक अली ने अध्यापक रहते हुए बाल साहित्य के क्षेत्र में पर्याप्त कार्य किया और मैं (अहमद अली सिद्दीकी) सहायक प्राध्यापक पद से सेवानिवृत्त। मैंने व्यंग्य लेख, कहानियाँ और संस्मरण लिखे हैं, यत्र-तत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं। पार्किंसन की बीमारी के कारण पिछले एक दशक से लेखन कार्य से वंचित हूँ।
ज़हूर बख़्श के जीवन में एक बहुत दुःखद घटना हुई, उन्होंने मोहल्ला मछरियाही सागर में दो मंज़िला मकान बना लिया था। जिसमें उन्होंने लगभग 17 हजार पुस्तकें एकत्र कर रखी थीं। 9 फरवरी सन् 1961 को उषा भार्गव काण्ड जो जबलपुर से संबंधित है उसके लपेटे में सागर भी आ गया, उसमें मेरे पिता यानी ज़हूर बख़्श जी का मकान और पुस्तकालय भी आग के हवाले दंगाइयों ने कर दिया।
विपन्न अवस्था में हम लोग भोपाल आ गये और यहीं बस गये। सन् 8 नवम्बर 1964 को साहित्यकार ज़हूर बख़्श जी का निधन हुआ और कब्रिस्तान जहाँगीराबाद (भोपाल) में दफ़न किया गया। बाद में सन् 1966 में मैंने अपने पिता जी की कब्रिस्तान का एक मकबरे के रूप में निर्माण कराया।
प्रश्न – आपके पिता जी का किन-किन साहित्यकारों से परिचय अर्थात् किन लोगों के साथ उठना-बैठना था?
साहित्यकार ज़हूर बख़्श समन्वयवादी विचारक-लेखक थे। पंडित कामता प्रसाद गुरु एवं उनके पुत्रों से पिता जी का सम्बन्ध रहा। जबलपुर में शिक्षक प्रशिक्षण के दौरान पंडित मातादीन शुक्ल, रामानुजलाल श्रीवास्तव, पंडित मधुमंगल मिश्र, नर्मदा प्रसाद मिश्र, पंडित द्वारका प्रसाद मिश्र से पत्र-व्यवहार और कभी-कभी मिलना-जुलना रहा। सागर मध्य प्रदेश में सैयद अमीर अली मीर, मास्टर बलदेव प्रसाद, मास्टर अब्दुल गनी, लोकनाथ द्विवेदी सिलाकारी, सलाम सागरी, डॉ. कृष्णलाल हंस, हर प्रसाद द्विवेदी, श्री हरी, माधवराव सप्रे, हाफ़िज़ मोहम्मद अज़ीम इत्यादि।
महान साहित्यकारों से मिलना और पत्र-व्यवहार आदि होता रहा, जिनमें प्रमुख इस प्रकार हैं- वृंदावनलाल वर्मा, महावीर प्रसाद द्विवेदी, हरिवंशराय बच्चन, मैथिलीशरण गुप्त, शिवपूजन सहाय, प्रेमचन्द, दुलारे लाल भार्गव, महाकवि निराला, माखनलाल चतुर्वेदी, ख्वाजा अहमद अब्बास, धर्मवीर भारती इत्यादि से पत्रव्यवहार था।
प्रश्न – क्या आपको लगता है कि आपके पिता जी को जितना सम्मान मिलना चाहिए था उतना मिला?
उत्तर – जितने सम्मान के वो हक़दार थे उतना उन्हें नहीं मिला।
प्रश्न – कुछ साहित्यकारों ने आपके पिता जी पर आरोप लगाया कि आप हिन्दू समाज के बारे में गलत लिखते हैं?
उत्तर – पिता जी का लेखन चिंतनपूर्ण एवं अनुभव पर आधारित है, वे हिन्दू और हिन्दी के प्रति असीम अपनापन रखते थे। जिस जमाने में उनका लेखन कार्य चल रहा था। उस समय हिन्दू समाज और हिन्दू स्त्रियों का भविष्य चिंताजनक था। वे पूर्ण रूप से महिला सुधार के लिए पक्षधर थे। उन्होंने हिन्दू नारी के उन्नयन के लिये बहुत कुछ लिखा। देवी सीता, देवी पार्वती, देवी सती, आर्य महिला रत्न इस बात के प्रमाण हैं। अन्य स्फुट लेख और कहानियाँ भी बड़ी संख्या में हैं। उन्हें कुछ साहित्यकारों ने अलग दृष्टिकोण से देखा है।
प्रश्न – आपके पिता जी की कहानियाँ किन-किन पत्र-पत्रिकाओं में छपी थीं?
उत्तर – उनकी कहानियाँ हिन्दी के समस्त प्रसिद्ध पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुआ करती थीं, जिनमें सरस्वती, चाँद, माधुरी, अवन्तिका, आजकल, धर्मयुग, कल्पना, सरिता, साप्ताहिक हिन्दुस्तान इत्यादि। बाल कहानियाँ चंपक, नन्दन, किशोर, पराग आदि प्रसिद्ध पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। इनसे पूर्व अनेकानेक पत्रिकाओं और कोर्स बुक्स में प्रकाशित होती रहीं।
प्रश्न – जब आपके घर की लाइब्रेरी में आग लगाई गयी थी उस समय की मनःस्थिति के बारे में बताएँ। आपकी और आपके परिवार की?
उत्तर – हम पाँच बहन-भाई, पिता जी कागज़ की नाव के सवार रहे हैं। उन्हें मकान जल जाने का उतना दुःख नहीं था जितना पुस्तकालय के जल जाने का था। उनके संग्रह में कुछ प्राचीन दुर्लभ पुस्तकें भी थीं। समस्त आर्य साहित्य, वेद, पुराण, महाभारत, गीता, रामायण, रामचरितमानस, साकेत आदि शोभायमान थे। इस्लाम धर्म और उर्दू साहित्य की प्रसिद्ध पुस्तकों के हिन्दी संस्करण विद्यमान थे। सन् 1913 के पश्चात् के अनेक प्रसिद्ध साहित्यकारों के पत्रों का विशाल संग्रह था। सागर नगर से उन्हें असीम प्रेम था। जिस स्थान पर उन्होंने प्रतिष्ठा अर्जित की थी, वहीं सर्वनाश होने का दुःख उन्हें अन्दर से कचोटता रहा जिससे वृद्धावस्था में वे रक्तचाप से पीड़ित हो गये। भोपाल आगमन मजबूरी थी। यही उनके असमय निधन का कारण बना। हम पाँचों बहन-भाइयों को सागर से बहुत प्रेम था। इस बारे में ही गृह-विहीन होने का दुःख अपार था। हम तीन बहन-भाई का भविष्य ही जल गया। हम सभी की मनःस्थिति बहुत दुःखद थी।
प्रश्न – आपके पिता जी का स्वभाव कैसा था?
उत्तर – पिता जी का स्वभाव मिलनसार, मधुर और विनोदी था। उन्हें क्रोध आता था लेकिन जल्दी शान्त हो जाता था और अपने कार्य में व्यस्त हो जाते थे। उनमें स्वाभिमान और स्वावलम्बन बहुत था।
प्रश्न – क्या आपके पिता जी ने पहले उर्दू में लिखना शुरू किया था? बाद में हिन्दी में किया?
उत्तर – नहीं! उन्होंने लेखन कार्य हिंदी में प्रारम्भ से ही किया। बाद में कुछ उर्दू की रचनाओं का रूपान्तरण हिन्दी में किया जिनमें प्रमुख रूप से- गुलिस्ताँ, बोस्ताँ, मौलाना रूमी की मसनवी और शौकत थानवी के हास्य-व्यंग्य लेखों का अनुवाद किया था।
प्रश्न – उनकी कुछ बातें बताएँ जिनसे हिंदी जगत अब तक अछूता रहा है?
उत्तर – ज़हूर बख़्श जी में निम्नलिखित खूबियाँ थीं
  1. वे किसी भी प्रकार का नशा आदि नहीं करते थे।
  2. वे आतिथ्य प्रेमी थे।
  3. समाज के सभी वर्गों से उनका सम्पर्क था और उनकी पहुँच में जिसका जो कार्य होता था, उसको वे अवश्य करते थे।
  4. वे बहुत उदार और दानी थे।
  5. वे परम देशभक्त थे।
  6. छोटों से स्नेह और बड़ों के प्रति उनमें आदर भाव था।
  7. सभी वर्गों के लोग उनका सम्मान करते थे।
  8. समस्त वर्गों की पंचायतों में उन्हें आमंत्रित किया जाता था। लोगों का विश्वास था कि पिता जी का मुंशिफाना फैसला रहेगा।
  9. वे हिन्दू, मुस्लिम एकता के पक्षधर थे। उनकी ईद, दीवाली के आयोजन प्रसिद्ध थे।
  10. वे हल्के श्यामल शरीर और स्थूल देहयष्टि, बिखरे हुए सफेद बाल, बड़ी मूँछें, गहरे नेत्र और प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनी थे।
प्रश्न – आपके पिता जी को सागर का प्रेमचन्द कहा जाता है। किस कारण से कहा जाता है?
उत्तर – प्रेमचन्द कहानी सम्राट कहे जाते हैं। शैक्षणिक गतिविधियों से भी उनका संबंध रहा है। ठीक इसी प्रकार ज़हूर बख़्श जी का भी सम्बन्ध कहानियों से और शैक्षणिक गतिविधियों से रहा है। ज़हूर बख़्श जी ने कहानी के क्षेत्र में विशिष्ट कार्य किया है। स्वलेखन के अलावा उन्होंने विशेष रूप से आदिवासियों की कहानियाँ, बुन्देलखंडी कहानियाँ, जाटों की कहानियाँ, अफीमचियों की कहानियाँ, मनोहर कहानियाँ, ऐतिहासिक कहानियाँ और विस्तृत रूप से लोक कथाओं के संकलन प्रकाशित कराये हैं। ज़हूर बख़्श जी क्योंकि अध्यापक थे, इसलिए हर प्रेरक बात पर उनकी तीव्र दृष्टि रहती थी। उस पर वो शीघ्र कहानी रच देते थे। उनका व्यक्तित्व में मास्टरी रचा-बसा था। उनका कहानियों का क्षेत्र बहुत व्यापक है। जिसमें परोपकार, वीरता, स्वदेश प्रेम, भाईचारा, हिन्दू-मुस्लिम एक्य में पगी हुई कहानियाँ प्रेमचन्द की कहानियों के समकक्ष पहुँच जाती हैं। इसलिए उन्हें सागर या मध्य प्रदेश का प्रेमचन्द कहा जाता है।
प्रश्न – आपके पिता जी अध्यापन के साथ-साथ और क्या कार्य करते थे?
उत्तर – पिता जी साहित्यकार के अलावा और भी कलाओं से जुड़े रहे। उनकी हैंड राइटिंग अत्यन्त सुन्दर, सन्तुलित और व्यवस्थित थी। यही कारण है कि उनके बनाये हुए एटलस, बाल मैप आदि शालाओं में इस्तेमाल किये जाते रहे हैं। उनकी लिपि पुस्तकें शालाओं में उपयोग में लाई जाती रहीं। अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं के नाम के रूप में उनके ब्रश और कलम से बनाये गये। स्थापत्य कला में भी उनकी बहुत रुचि थी। भवन निर्माण में लोग उनसे सुझाव लिया करते थे। ज़हूर बख़्श भूगोल, इतिहास के अच्छे अध्येता थे। उनकी लिखी हुई कुछ पुस्तकें मर्यादा पुरुषोत्तम राम, भारत के सपूत, मिडिल स्कूल, भूगोल दर्पण और नवीन अंकगणित आदि दशकों तक ओल्ड सी.पी. बरार, उत्तर प्रदेश और बिहार की प्राथमिक और माध्यमिक कक्षाओं में कोर्स के अन्तर्गत पढ़ाई जाती रही हैं। हिन्दी अक्षर विज्ञान के बड़े जानकार थे। वर्षों तक उनके अक्षरों की अनुकृति में हिन्दी पुस्तकें प्रकाशित होती रही हैं। ज़हूर बख़्श प्रेस के कार्यों से भी भली-भाँति परिचित थे। वे सागर जिला टीचर एसोसिएशनके अध्यक्ष रहे। उन्होंने आकाशवाणी पर कहानी पाठ भी किया। ज़हूर बख़्श हरफन मौला व्यक्तित्व के धनी थे।
प्रश्न – क्या आपको नहीं लगता है कि आपके पिता जी को हिंदी जगत ने भुला दिया?
उत्तर – पिता जी को हिंदी जगत ने पूर्ण रूप से नहीं भुलाया। समय-समय पर उनकी चर्चा होती रहती है। उनकी कहानियाँ, उनके लेख और उनके संस्मरण, द्विवेदी युग के साहित्यकारों में उन्हें प्रतिस्थापित करते हैं। द्विवेदी युग के वे अंतिम बड़े लेखक माने जाते हैं। ‘धर्मयुग’ ने ही इसी बात पर बल दिया है। प्रचलन में वे भले उतने न हों लेकिन स्थायित्व में वे अडिग हैं, उन्हें भुलाना आसान नहीं है। समय की कठोर शिला पर उनके हस्ताक्षर चिह्नित हैं।
प्रश्न – ज़हूर बख़्श को भुला देने में आपके परिवार के लोग भी शामिल हैं। इसमें क्या सच्चाई है?
उत्तर – ये बात बिल्कुल गलत है। उनके दोनों पुत्र मुबारक अली और अहमद अली समय-समय पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में उनके विषय में कुछ-न-कुछ लिखते रहे हैं। वाड्.मय पत्रिका के ज़हूर बख़्श अंक में अहमद अली सिद्दीकी के ज़हूर बख़्श से संबंधित तीन लेख प्रकाशित हैं। वे अन्य पत्र-पत्रिकाओं में भी लिखते रहे हैं। सन् 1966 में उन्होंने अपने पिता का मकबरे का निर्माण भी कराया। मेरी पुत्री डॉ. नाहिदा जहाँ सिद्दीकी ने रिसर्च स्तर के ग्रंथ का लेखन किया है। न केवल परिवार-जन बल्कि सागर और भोपाल के शिक्षित लोगों में उनकी छवि उज्ज्वल बनी हुई है।
प्रश्न – आज के दौर में उनकी अधिकांश किताबें अप्राप्त हैं, क्या कभी और लोगों ने ऐसा प्रयास किया कि वे प्राप्त हो जाएँ?
उत्तर – ज़हूर बख़्श जी 1913 से 1964 तक निरन्तर लिखते ही रहे। उनका लेखन बहुत-सी प्रकाशन संस्थाओं से हुआ। उनकी अधिकांश पुस्तकें जिन प्रकाशन संस्थाओं से प्रकाशित हुईं थी, वे प्रकाशन संस्थायें बन्द हो चुकी हैं लेकिन उनके सागर स्थित घर में समस्त प्रकाशित व अप्रकाशित साहित्य उपलब्ध था। लेकिन अग्निकांड के बाद सब नष्ट हो गया। अग्निकांड के पश्चात् भोपाल में साढ़े तीन वर्ष की अल्प अवधि में ज़हूर बख़्श जी जो कुछ प्राप्त कर सकते थे किया लेकिन वह अल्प मात्रा में था। उनके निधन के पश्चात् उनके पुत्र अहमद अली सिद्दीकी ने कुछ सामग्री प्राप्त की। लेकिन वह भी अपर्याप्त थी। उनके अप्रकाशित साहित्य में एक अमूल्य ग्रंथ था जिसका शीर्षक है- हिन्दी अक्षर विज्ञान जिसे उन्होंने वर्षों के परिश्रम से तैयार किया था। जिसके जल जाने का उन्हें बहुत दुःख था।
प्रश्न – आपके पिताजी का व्यक्तित्व कैसा था?
उत्तर – पिता जी का व्यक्तित्व एक तपोनिष्ठ व्यक्ति का था। श्रम और अध्ययन में तपोनिष्ठ, किंचित् श्यामल देहयष्ठि, बिखरे हुए श्वेत केशराशि, बड़ी श्वेत मूँछें, गहरे अनुभवी नेत्र, बुलंद मंजी हुई आवाज़, पुरअसर ऐसा लगे, रेडियो पर देवकी नन्दन पांडे बोल रहे हैं। क्या मज़ाल के स्लिप ऑफ टंगहो जाये। उन्हें सैकड़ों दोहे, हजारों शेर, पचासों आयतें, बड़ी मात्रा में संस्कृत के श्लोक और किंवदंतियाँ और मुहावरे याद थे। जिस कारण उनका व्यक्तित्व अत्यन्त आकर्षण और प्रभावशाली बन बड़ा था। महाकवि तुलसीदास और मैथिलीशरण गुप्त उनके सर्वाधिक प्रिय कवि थे।
प्रश्न – क्या उनके मन में पुरस्कार-सम्मान आदि को लेकर किसी तरह की अभिलाषा थी?
उत्तर – वे कर्म में विश्वास करते थे। पुरस्कार की राजनीति से उन्हें कोई लगाव नहीं था। स्वयं ही किसी ने पुरस्कार दे दिया तो ले लिया वरना स्वयं की न तो कोई कोशिश करते और न कोई जोड़-तोड़। वैसे मध्य प्रदेश शासन की ओर से उनके दो कहानी-संग्रह शबनमऔर हम प्रेसीडेन्ट हैं’, ‘धन्य ये बेटियाँ’, केन्द्रीय भाषा विभाग से पुरस्कृत हैं। मरणोपरान्त मध्य प्रदेश भाषा विभाग द्वारा बाल साहित्य की वर्ष की सर्वश्रेष्ठ कृति पर ‘ज़हूर बख़्श पुरस्कार’ दिया जाता रहा है।
प्रश्न – मुस्लिम समाज को लेकर ज़हूर बख़्श की क्या राय थी?
उत्तर – अधिकांश मुस्लिम समाज अंधविश्वासी रहा है। समय-समय पर सुविज्ञ लोगों ने इस जड़ता को दूर करने के उपाय बताये और प्रयास भी किये। ज़हूर बख़्श उन सुविज्ञ लोगों में से एक हैं। विरोध होने के बाद भी उन्होंने अपनी तीनों बेटियों को शिक्षित कर अध्यापकीय कार्य में लगाया। उन्होंने विरोध की कभी परवाह नहीं की।
प्रश्न – भारत की किस आबादी को उन्होंने अपनी कहानियों में अधिक स्थान दिया?
उत्तर – ज़हूर बख़्श जी की कहानियों में मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार के सामाजिक वातावरण का आभास होता है। उनके कहानी पात्र अधिकतर हमारे इर्द-गिर्द के ही हैं। सच्चा कहानीकार निकटवर्ती पात्रों में पैठ बनाकर वास्तविक भावों को, अपने विचारों को खोज लाने का प्रयास करता है।
प्रश्न – उस समय सागर के लोगों की ज़हूर बख़्श के बारे में क्या राय थी?
उत्तर – ज़हूर बख़्श के सम्बन्ध में समाज कई भागों में विभक्त था। शिक्षित वर्ग में अधिकांश प्रशंसक तथा कई ईष्यालु थे। मुस्लिम समाज जनाब जी कहकर आदर तो करता था लेकिन उनका हिन्दी प्रेम देखकर अन्दर-ही-अन्दर कुढ़ता भी था और चिढ़ता भी था। कट्टर हिन्दू विचारधारा के लोग उन्हें संदेहास्पद दृष्टि से देखते थे और उदारवादी हिन्दू श्रद्धा की दृष्टि से। कुछ ऐसा ही विचार मुस्लिम समाज में भी था। दो पाटों के बीच में पिसते हुए भी ज़हूर बख़्श अपने लेखन कार्य से विमुख नहीं हुए।
प्रश्न – मध्य प्रदेश सरकार ने क्या इनके संबंध में कभी कोई बयान दिया था? क्या उनकी रचनाओं का संज्ञान लिया?
उत्तर – मध्य प्रदेश सरकार में बैठे हुए कुछ मंत्रियों और अधिकारियों की दृष्टि उन पर मेहरबान होती रही। मध्य प्रदेश के शासन के स्वास्थ्य विभाग की ओर से जयप्रकाश चिकित्सालय में उनकी चिकित्सा के लिये निर्देश दिये गये। ऊषा भार्गव अग्निकांड के पश्चात् घर-सुधार के लिये कुछ धनराशि स्वीकृत की गयी थी। मध्य प्रदेश भाषा विभाग की ओर से उन्हें वह वृत्ति भी प्रदान की गई जो साहित्यकारों और कलाकारों को प्रदान की जाती रही। उनकी मृत्यु उपरान्त उनकी धर्मपत्नी रज़िया खातून को मृत्युपर्यन्त उक्त वृत्ति प्राप्त होती रही। पाठशालाओं की पुस्तकों में उनकी रचनाएँ यथेष्ठ मात्रा में रचनाएँ प्रकाशित होती रहीं।
प्रश्न – ज़हूर बख़्श का नाम बाल कहानी के क्षेत्र के साथ-साथ बाल काव्य में भी प्रसिद्ध है। आप इनमें से किसे अधिक पसंद करते हैं?
उत्तर – यूँ तो ज़हूर बख्श जी ने बाल उपयोगी कविताएँ भी लिखी हैं परन्तु सर्वाधिक प्रभावित उनकी बाल कहानियाँ करती हैं।
प्रश्न – ज़हूर बख़्श ने बाल-साहित्य के अलावा अन्य साहित्य की रचना भी पर्याप्त मात्रा में की थी? किस प्रकार के सृजन में उनका मन अधिक रमता था?
उत्तर – ज़हूर बख़्श जी का कहानी साहित्य बहुत विराट् है। बड़ों की कहानियाँ और बाल कहानियाँ तथा अन्य साहित्य की रचना में यह कहना कठिन है कि उनका मन किस प्रकार की कहानियों में रमता था, दोनों प्रकार की कहानियाँ समान रूप से प्रभावित करती हैं। उनका पूरा जीवन ही कहानीमय था।
प्रश्न – वर्तमान समय में ज़हूर बख़्श के संपूर्ण सृजन की प्रासंगिकता और महत्व आपकी दृष्टि में क्या है?
उत्तर – वर्तमान समय मोबाइल से बच्चों के समक्ष ऐसी सामग्री परोसी जा रही है जिससे बच्चों की मानसिकता बिगड़ रही है। आवश्यक है कि बच्चे पुस्तकें पढ़ें। विभिन्न आयु वर्ग के बच्चों के लिए ज़हूर बख़्श ने बहुत-सी पुस्तकों की रचना की, उनकी कहानियों से देश-प्रेम, हिन्दू-मुस्लिम भाईचारा, वतन के लिये प्राण-न्यौछावर करने का जज़्बा, माता-पिता और गुरु के प्रति श्रद्धा और भक्ति भाव पैदा होते हैं। वर्तमान समय में शालाओं में ज़हूर बख़्श जैसे अध्यापक और लेखक, बाल साहित्य की पुस्तकें पढ़ाई जायें तो बाल-जगत को निश्चित ही लाभ होगा। उनकी समीचीनता आज भी बरकरार है और आगे भी रहेगी।
ज़हूर बख़्श जी के कई पत्र उनके पोते-पोतियों और सम्बन्धियों के पास हैं, परन्तु अनेक कारणवश यह सामग्री मुझे प्राप्त नहीं हो पाई है। यदि यह सामग्री प्राप्त हो जाए तो ज़हूर बख़्श जी के व्यक्तित्व और कृतित्व के बारे में और अधिक जानकारी प्राप्त हो सकेगी। इसी आशा में मैं अनवरत रूप से इस दिशा में प्रयासरत हूँ।
डॉ. एम. फ़ीरोज़ खान
जन्म: 1976, टाण्डा-अम्बेडकरनगर (उ.प्र.)
मूल आलोचनात्मक कृतियाँ : 1. मुस्लिम विमर्श साहित्य के आईने में 2. हिंदी के मुस्लिम उपन्यासकार : एक अध्ययन 
सम्पादित प्रकाशित कृतियाँ : 1. राही मासूम रज़ा एवं बदीउज्जमाँ मूल्यांकन के विविध आयाम 2. साहित्य के आइने में आदिवासी विमर्श 3. आदिवासी साहित्य: दशा एवं दिशा 4. आदिवासी साहित्य की हकीकत उपन्यासों के आईने में 5. नासिरा शर्मा : एक मूल्यांकन 6. कुँइयाजान: एक मूल्यांकन 7. ज़ीरो रोड एक मूल्यांकन 8. नारी विमर्श : दशा एवं दिशा 9. दलित विमर्श और हम 10. हिंदी के मुस्लिम कथाकार 11. नई सदी में कबीर 12. हिंदी साक्षात्कार उद्भव और विकास 13. नये संदर्भों में दलित विमर्श 14. हिंदी के मुस्लिम कथाकार शानी 15. हिंदी उपन्यास के शिखर 16. हिंदी काव्य के विविध रंग 17. कथाकार कुसुम अंसल : एक मूल्यांकन 18. कथाकार अब्दुल बिस्मिल्लाह मूल्यांकन के विविध आयाम 19. थर्ड जेंडर हिंदी कहानियाँ 20. थर्ड जेंडर : अनुदित कहानियाँ 21. थर्ड जेंडर कथा आलोचना 22. प्रवासी महिला कहानीकार 23. थर्ड जेण्डर और जिन्दगी 50-50 24. थर्ड जेण्डर और साहित्य 25. थर्ड जेण्डर अतीत और वर्तमान 26. सिनेमा की निगाह में थर्ड जेण्डर 27. थर्ड जेण्डर पर केन्द्रित हिन्दी का प्रथम उपन्यास ‘यमदीप’ 28. थर्ड जेण्डर : तीसरी ताली का सच 29. हमख्याल (समलैंगिकता पर केन्द्रित कहानी-संग्रह) 30. हम भी इंसान हैं 31. दरमियाना आधी हकीकत आधा फसाना 32. किन्नर कथा तीसरी दुनिया का सच 33. थर्ड जेंडर : आत्मकथा और जीवनसंघर्ष 34. प्रवासी साहित्य की हकीकत 35. भारतीय मन और प्रवासी महिला कहानीकार 36. प्रवासी साहित्यकारः पुष्पिता अवस्थी 37. प्रवासी महिला कहानीकार : स्त्री विमर्श की कहानियाँ 38. हौसला 39. तवायफ
विविध : राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में 40 शोध आलेख प्रकाशित एवं दर्जन से अधिक संगोष्ठी में शोध पत्र प्रस्तुत
शोध परियोजना : हिंदी के मुस्लिम कथाकार मूल्यांकन, उपलब्धियाँ और सीमाएँ
अनुवाद : राही मासूम रज़ा कृत कारोबारे तमन्ना और कयामत
संपादन : वाङ्मय पत्रिका, 2004 से निरंतर (रजि.) अलीगढ़
सम्पर्क : 205, फेज-1, ओहद रेजीडेन्सी, दोदपुर रोड, अलीगढ़
ई-मेल: [email protected]


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8 टिप्पणी

  1. सफलतम साहित्यकार हिन्दू मुस्लिम और धर्मांधता का पक्षधर नहीं होता। वो जो सोचता और करता है पूर्णतः साहित्याभिमुख की भावना से करता है। यह साक्षात्कार साहित्य लेखन, पठन और मनन में आपकी रुचि और प्रेम का तत्वदर्शी है। आपको कोटिश : बधाई एवं अनन्य शुभकामनाएं।

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