वरिष्ठ कथाकार अवधेश प्रीत के साथ
‘पुरवाई’ पत्रिका की उप-संपादक नीलिमा शर्मा की बातचीत।
नीलिमा शर्मा – रंगमंच से आपका जुड़ाव देखने को मिलता है। नृशंस, बाबूजी की छतरी , ग्रासरूट, हमजमीन, चांद के पार एक चाबी आदि जैसी आपकी कई कहानियों के मंचन हुए हैं। कई कहानियों पर टेलीफिल्म्स भी बनी हैं। इस जुड़ाव के बारे में कुछ बताइये।
अवधेश प्रीत – देखिए, बतौर कहानीकार मैं कहानियां लिखता हूं तो उसमें जो कथ्य होता है वह जितना महत्वपूर्ण होता है, उतना ही महत्वपूर्ण होता है उसका ट्रीटमेंट। इस ट्रीटमेंट में पात्रों का चरित्र चित्रण,परिवेश की दृश्यात्मकता, कथा की गति में संवादों की संगति और ओवरऑल प्रभावोत्पादकता आदि शामिल होती है। शायद मेरी कहानियों में ये तत्व होते हैं, जो रंगकर्मियों को मेरी कहानियों के मंचन के लिए प्रेरित करते हैं। इस जुड़ाव की एक वज़ह यह भी है कि मैं स्वयं रंगमंच से जुड़ा रहा हूं, इसलिए भी मेरी कहानियों में हो सकता है, रंगमंच के अनुकूल नाटकीयता मंचन के लिए सुविधाजनक होती हैं।
नीलिमा शर्मा – आप अपनी कहानियों के विषय कैसे चुनते हैं। इसमें आपबीती या जग-बीती का कितना अनुपात रहता है। मतलब आपके अनुभव कैसे और किस रूप में कहानियों की शक्ल अख़्तियार करते हैं।
अवधेश प्रीत – मुझे लगता है, अपनी कहानियों के लिए विषय मैं नहीं चुनता, बल्कि विषय मुझे चुनते हैं। इसे मैं इस तरह कहना चाहूंगा कि आपकी दृष्टि, संवेदना और पक्षधरता जिस घटना, परिस्थिति और मुद्दे से जुड़ती है और जब वह बतौर लेखक मुझे उद्वेलित करती है, मुझे लगता है, कि इस विषय के साथ मैं वह कह सकता हूं, जो इस विषय में छुपा है, अदीठ है और कहे जाने की ज़रूरत है, तो मैं स्वतः उस विषय से एकमेव हो जाता हूं।
यहां मैं कथा आलोचक सुरेन्द्र चौधरी के मार्फ़त अपनी बात पुष्ट करना चाहूंगा। वह कहते हैं,’ कथाकार की रचना का उपादान उसकी प्रतीति-क्षमता है। यह प्रतीति-क्षमता प्रत्यक्ष ज्ञात हेतुक या कल्पित हो सकती है। प्रत्येक स्थिति में कथाकार अपनी प्रतीति सत्यों को रूपांतरित कर अपनी रचना का स्वरुप-विधान करता है। उसकी प्रतीति-क्षमता को हम उसके विषय क्षेत्र के विस्तार, उदबोध और तत्परता से माप सकते हैं। जब वह निर्विशेष रूप से वस्तु-जगत का प्रेक्षण करता है, तो उसे अपने विषय के अनुरूप वर्णय प्राप्त होते हैं।’ मेरी कहानियों में जो आपबीती होती है, वह जगबीती भी होती है।
दरअसल आप आपबीती को किस तरह एक व्यापक अर्थ विस्तार देते हैं कि, वह आपबीती न होकर जगबीती हो जाती है, बात वही है आपका विज़न।विज़न एकांगी है, तो रचना आपबीती होकर रह जायेगी। विज़न व्यापक है तो वह अपने कहन में जगबीती में रूपांतरित हो जायेगी। अनुभव और अवलोकन बेहद ज़रूरी होता है। ज़्यादातर कहानियों के कथ्य मेरे अनुभव में दर्ज़ होते रहते हैं और एक अरसे तक वे अपने कहे जाने की राह की प्रतीक्षा में पड़े रहते हैं। जब इन्हें प्रस्फुटित, अंकुरित होने की कोई अनुकूल उत्प्रेरक परिस्थिति बनती है, तो वह कथ्य एक कहानी का स्वरुप ले लेता है। मेरी अधिकांश कहानियां इसी तरह संभव हुई हैं। रही बात आपबीती और जगबीती के अनुपात की तो यह गणित मेरी समझ से बाहर है। विषय के साथ जब मैं जुड़ जाता हूं तो उसकी संवेदना, संभावना, विस्तार और विचार का जो संतुलन होता है, उस में से किसी को आनुपातिक रूप से अलगाना संभव नहीं होता। वह संपूर्णता में एक कहानी के होने के आवश्यक तत्व होते हैं।


बहुत ही ऑब्जेक्टिव प्रश्न और युवाओं,विद्यार्थियों ,शोधार्थियों के लिए यह प्रश्न और बातचीत का सिलसिला एक नज़ीर बन सकता है कि कैसे प्रश्न हों और हां सामने कौन सी शख्सियत है जिसका दीदार महज़ अल्फाज़ से पढ़ने वालों को कराना है।
बधाई नीलम जी को और पुरवाई पत्रिका के संपादक श्री तेजेंद्र शर्मा जी और परिवार को।
बहुत शानदार सवाल और मानीखेज उत्तर , बहुत बधाई
महत्वपूर्ण साक्षात्कार है यह नीलिमा शर्मा जी का! वैसे भी साक्षात्कार महत्वपूर्ण ही होते हैं। उन्हें जरूर पढ़ा जाना चाहिए।उससे बहुत कुछ सीखने को मिलता है ,अगर आप में सीखने की जरा सी भी ललक है,जिज्ञासा है तो।
इसके पहले जो साक्षात्कार पढ़ा था, वह पंकज सुबीर जी का था।
हमने एक बात तो नोट की, कि कहानी लेखक तो बहुत हैं पर कहानी लेखन की विशेषताओं पर जो विस्तार से चर्चा करते हैं जो कहानीकार के लिए या जो कहानी लिखना चाहता है उसके लिए प्रेरणा तत्व की तरह हैं, उन पर एक तेजेन्द्र जी, एक पंकज सुबीर जी और आज यह तीसरा साक्षात्कार अवधेश जी का है।
अगर वास्तव में कोई अच्छी कहानी लिखना चाहता है तो उस कहानीकार को इन साक्षात्कारों को जरूर पढ़ना चाहिये।
बहुत सारा लिख-लिख कर, ढेर सारी किताबें छपवा कर कोई बड़ा साहित्यकार नहीं बनता है, उन किताबों के अंदर जो लिखा गया है वह क्या है और कितना प्रभाव डालता है? यह अधिक मायने रखता है।
चंद्रधर शर्मा गुलेरी जी ने सिर्फ तीन कहानियाँ लिखीं। और *उसने कहा था* कहानी ने उन्हें श्रेष्ठ कहानीकार की पंक्ति में खड़ा कर दिया। भले ही कम लिखें पर अच्छा लिखें।
कहानी की अपनी ही कुछ विशेषताएँ होती हैं और अगर कोई रंगकर्मी होने के साथ-साथ कहानीकार भी है तो वह इस बात को बेहतर समझ पाता है कि किसी भी कहानी में ,अगर उसे रंगमंच पर प्रस्तुत करना हो तो कथोपकथन या संवाद का बहुत अधिक महत्व रहता है। प्रभावशीलता का दारोमदार इस पर ही निर्भर करता है।
यह बात अवधेश जी ने बिल्कुल सही कही कि “अनुभव और अवलोकन बेहद ज़रूरी होता है।” किसी भी रचनाकार के लेखन में उसके अनुभव निश्चित रूप से दर्ज होते हैं और साथ ही यह भी कि वह जो भी देखते हैं उसे किस नजरिया से देखते हैं।
नीलिमा शर्मा जी की इस बात के लिए तो तारीफ की जानी चाहिये कि साक्षात्कार के लिए प्रश्नों का चयन बेहद सावधानी से करती हैं और उन प्रश्नों के उत्तर में लगभग वह सभी कुछ समाहित हो जाता है जिसके उत्तर अपेक्षित व महत्वपूर्ण रहते हैं।
आपकी एक बात से हम पूरी तरह से सहमत हैं अवधेश जी! आपकी इस बात से हम भी पूरी तरह सरोकार रखते हैं कि व्यक्ति के तौर पर हम सभी को अपनी आस्थाओं के प्रति संवेदनशील होते हुए भी विविध आस्थाओं के साथ रहते हुए, एक दूसरे के लिए समान भाव वाला सामाजिक भाव बनाना चाहिये।यह आसान नहीं होता। आपने सही कहा कि यह हमें अर्जित करना पड़ता है। यह अर्जित होता है एक दूसरे के साथ रहते हुए, एक दूसरे के प्रति सम्मान और संयम के दीर्घकालिक अभ्यास व साथ रहते हुए हुए ही संभव है।
आपकी लंबी कहानी ‘चांद के पार एक चाबी’के बारे में पढ़कर इस कहानी को पढ़ने की इच्छा जागृत हुई अगर यह पुरवाई पत्रिका में आ सके तो पढ़ कर अच्छा लगेगा।
कथेतर साहित्य एवं बेस्ट सेलर टर्म के बारे में आपके विचारों को जानकर अच्छा लगा हम भी किसी हद तक कि आपकी बात से सहमत हैं।
एक साहित्यकार को कैसे लोगों से मित्रता रखनी चाहिए ? मित्रों का चुनाव कैसे किया जाना चाहिए? नीलिमा जी के इस प्रश्न के जवाब में अवधेश जी ने बहुत ही सुंदर उत्तर दिया कि,” यदि आप साहित्यकार हैं, तो आपसे उदारता और उदात्तता दोनों की अपेक्षा की जाती है, इसलिए आप अपने परिवेश, समाज और सरोकारों के प्रति कितने सजग, संवेदनशील हैं, यह आपकी मित्रता से समझा जा सकता है। मित्र थोड़े हों लेकिन वे संवेदनशील हों, एक-दूसरे के प्रति स्नेह और सम्मान की भावना रखते हों और ईर्ष्यालु तो कतई न हों।
आपकी एक बात से हम पूरी तरह से सहमत हैं, हमें बहुत पसंद आई है यह बात और आपकी इस बात से हम भी पूरी तरह सरोकार रखते हैं कि व्यक्ति के तौर पर हम सभी को अपनी आस्थाओं के प्रति संवेदनशील होते हुए भी विविध आस्थाओं के साथ रहते हुए, एक दूसरे के लिए समान भाव वाला सामाजिक भाव बनाना चाहिये।यह आसान नहीं होता। आपने सही कहा कि यह हमें अर्जित करना पड़ता है। यह अर्जित होता है एक दूसरे के साथ रहते हुए, एक दूसरे के प्रति सम्मान और संयम के दीर्घकालिक अभ्यास से।
आपकी लंबी कहानी ‘चांद के पार एक चाबी’के बारे में पढ़कर इस कहानी को पढ़ने की इच्छा जागृत हुई अगर यह पुरवाई पत्रिका में आ सके तो पढ़ कर अच्छा लगेगा।
नीलिमा शर्मा जी का अंत से दूसरा प्रश्न काफी महत्वपूर्ण है कि,” जब कभी हिन्दी साहित्य की बात होती है, कोई भी साहित्यकार भारत से बाहर लिखे जा रहे साहित्य के बारे में दो शब्द भी नहीं कहता। क्या आपको लगता है कि भारत के बाहर रचा जा रहा हिन्दी साहित्य इतना कमज़ोर है कि उस पर बात करना समय की बरबादी होगी या फिर उसे पढ़ा ही नहीं जाता।
अवधेश जी ने इसका बहुत सटीक उत्तर दिया। वे स्वीकार करते हैं इस प्रश्न के महत्व को।वे इसे बहुत अहम सवाल मानते हैं और इस सवाल को बार-बार उठाये जाने की जरूरत महसूस करते हैं। अवधेश जी ने स्वीकार किया है कि ,”भारत से बाहर लिखा जा रहा साहित्य कई मायनों में महत्वपूर्ण है। सभी प्रवासी लेखक हिन्दी साहित्य के एम्बेसडर हैं, और यह एक बड़ा योगदान है। इस तरह हिंदी साहित्य को ग्लोबल स्वरूप मिलता है। हिन्दी के अनुभव का संसार में व्यापक इज़ाफ़ा होता है। वह अपने लेखन से, अपनी उपस्थिति से भारत के मन की अभिव्यक्ति कर रहे होते हैं अत: यह किसी प्रकार से भी कमतर नहीं है।”
आने वाली पीढ़ी के लिए अवधेश जी का संदेश है कि,”आने वाली पीढ़ी मनुष्यता के पक्ष में अपना साहित्य रचेगी और एक बेहतर दुनिया के निर्माण के स्वप्न को जिंदा रखेगी। ”
इस बेहतरीन साक्षात्कार के लिए नीलिमा शर्मा जी का बहुत-बहुत शुक्रिया।
अवधेश जी को बहुत-बहुत बधाइयाँ।
प्रस्तुति के लिए तेजेंद्र जी का शुक्रिया और पुरवाई का आभार तो बनता ही है।