यह कहानी है स्त्री की,नारी की या यूं कहिए लड़की होकर जन्मी हर उस मासूम की कहानी। आप सोच रहे होंगे यह तो आधुनिक दौर है और आज हर एक नारी हर क्षेत्र में आगे है। पर जरा परदा हटा कर स्त्री की उस स्थिति की तरफ़ भी ध्यान दीजिए, जहां वह एक तरफ़ समाज तो दूसरी तरफ अपने पारिवारिक अत्याचारों में झुलस रही है। मायके से ससुराल तक सफर करते करते वह आज एक ऐसे कोने में खड़ी है जहां न केवल वह एक बेटी है बल्कि एक पत्नी बहू का किरदार निभाते निभाते आज ऐसे कोने में खड़ी है जहां उसे समझने वाला कोई नहीं है।
फ़िर भी वह अपनी ज़िन्दगी जी रहीं हैं। सिर्फ अपने बच्चों के लिए, अपने बच्चों का भविष्य बनाने के लिए। हर बार, बार बार नारी को समझौता करना पड़ता है। जैसे उसका ख़ुद का कोई अस्तित्व ही न हो।
         भले ही आज नारी स्वावलंबी हो गई है। अपने मर्ज़ी से जीवन व्यापन कर रहीं हैं। पर यह सिर्फ़ बीस पच्चीस प्रतिशत महिलाओं का जीवन है। बाकी अस्सी प्रतिशत तो संघर्षमय जीवन जी रही है। नारी विमर्श, नारी संघर्ष पर सालों से बात होती आ रही है। पर जरा सोचिए इन बातों से समाज पर कितना प्रभाव पड़ा है? क्या स्त्री के प्रति समाज का दृष्टिकोण बदल गया है?
             उदाहरण स्वरूप मैं यहां एक बात केहना चाहूंगी। जब हम एम ए में पढ़ते थे तब हर बार संगोष्ठियों का आयोजन होता था। जहां नारी पर प्रपत्र प्रस्तुत किए जाते थे। तब हम सोचते थे कि, क्यों हर बार नारी पर प्रपत्र प्रस्तुत किए जाते हैं दूसरा कोई टॉपिक हैं ही नहीं क्या? पर आज पूरे दस साल बाद जहां हम खड़े हैं तो अहसास हो गया कि, सच में नारी जीवन कितना संघर्षमय है। हर बार अपनी इच्छाओं की आकांक्षाओं की आहूति देनी पड़ती हैं।
             अपने परिवार और जिम्मेदारियों को संभालते संभालते वह रोज़ तिल तिल मर रहीं हैं। यह बात सही हैं की, घर परिवार संभालना हर एक स्त्री का कर्तव्य होता हैं। पर कर्तव्य के नाम पर अगर उसपर अत्याचार हो तो, अपने कर्तव्यों का निष्ठा से पालन करनेवाली स्त्री की मनोदशा कैसी हो सकती हैं। एक तरफ वह अपना कर्तव्य निभाएं और दूसरी तरफ उसे समझना तो दूर उसपर अत्याचार हो तो, फ़िर वह कहा का न्याय? कहा का इन्साफ?
                 बातें तो सुनी अनसुनी कर देता हैं समाज, पर जो लिखा है उसे पढ़ कर समझ कर उनका पालन करेंगे, तभी तो स्त्री के प्रति समाज का दृष्टिकोण है, उसे हम बदल सकते है। घूम फिर कर एक ही सवाल सामने आकर खड़ा होता हैं। कब सब ठीक होगा? कब हर नारी निडर होकर जिएगी? कब नारी शोषण खत्म होगा? या फ़िर आज हम लिख रहे हैं, क्या आनेवाले समय पर हमारे आगे की पीढ़ी भी नारी व्यथाएं गाती रहेंगी? लिखती रहेगी? न्याय की कुहार लगाती रहेगी? सिर्फ सवाल पर सवाल,पर सही जवाब आज तक नहीं मिल पाया है। फ़िर अब क्या कहें? क्यों कहें?
…………. क्यों बात करें हम अब नारी की
क्यों सुनाए व्यथा हम नारी की
हर बार सुनी अनसुनी कर देता हैं समाज
नारी की मनोव्यथा पर हँसता दिखाई देता है
हर चेहरा, फ़िर क्यों? सुनाएं नारी की अंतर्मन की पीड़ा। अत्याचारों की ज्वाला में तपकर
झुलस रही है आज नारी
बस अब खाक होने की देरी है
फ़िर मिट्टी में मिल जाएगी
हर एक नारी की कहानी
रह जाएगी सिर्फ और सिर्फ़ राख
ओ भी हवा के हल्के झोखें से
इधर उधर बिखर जायेगी
उसको भी रौंदता हुआ जाएगा हर इन्सान
जहां औरत जिंदा होकर भी
 लाश बन कर जी रहीं हैं
वहा फ़िर इस राख की क्या कीमत
क्या औकात…. फ़िर हम क्यों सुनाएं व्यथा नारी की…………

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