Wednesday, February 11, 2026
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डॉ. उर्मिला पोरवाल की कलम से दोहा-संग्रह ‘आरोही’ की समीक्षा

कृतिआरोही
विधादोहा संग्रह
लेखकज्ञानचंद मर्मज्ञ
प्रकाशकआर.के. पब्लिकेशन मुंबई
प्रकाशन वर्ष 2024
पुस्तक समीक्षकडॉ. उर्मिला पोरवालशिक्षाविद् बैंगलोर
कार्तिक मास, दशमी तिथि अर्थात अक्टूबरमेरा जन्मदिन। वैसे त्योहारों के दिन जन्मदिवस होने का एक फायदा यह है कि पूरी दुनिया हर्षोल्लास के साथ आपके जन्मदिन को मनाती है। इस बार संयोग से जन्मदिन पर भेंट स्वरूप आरोही प्राप्त हुई।
आरोही दोहा संग्रह, शीर्षक पढ़ते ही सर्वप्रथम जो विचार आया
वह यह  था  कि साहित्य जगत में मर्मज्ञ जी को गद्य कार और पद्यकार के रूप में तो प्रसिद्धि प्राप्त है ही अब आरोही के माध्यम से वें छंदकार के रूप में भी पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है। 
आदरणीय मर्मज्ञ जी से मेरा परिचय पहले साहित्यिक है फिर व्यक्तिगत अर्थात मर्मज्ञ जी से मेरा परिचय उनकी कृति निबंध संग्रह संभव है ने करवाया।, जब रचना से रचनाकार को जाना जाता है तो यह परिचय साहित्यिक कहलाता है। महाविद्यालय में स्नातक कक्षा के हिंदी पाठ्यक्रम में मर्मज्ञ जी के निबंध संग्रह संभव है से एक निबंध सम्मिलित हुआ, अध्यापन के दौरान ही एक व्याख्यान का आयोजन किया ताकि विद्यार्थियों को रचना के साथसाथ रचनाकार से भी परिचित होने का अवसर मिले। 
बनारस के समीप कस्बे सैदपुर में जन्मे आदरणीय श्री ज्ञानचंद मर्मज्ञ जी वर्तमान में बेंगलुरु निवासी हैं। शिक्षा से अभियंता,रोजगार से उद्यमी और स्वाभाव से कविलेखक आदरणीय मर्मज्ञजी लंबे समय से साहित्य साधना में लीन है, संभव है , खूंटी पर आकाश ,मिट्टी की पलकें आदि  उनकी चर्चित कृतियां हैं। निःसंदेह  आदरणीय मर्मज्ञ जीकी बहुमुखी प्रतिभा का यह संग्रह एक ओर सोपान है।  कहते है –
छोटे से आकार में, भरे गूढतम अर्थ।
दोहा दुर्लभ छंद है, साधें इसे समर्थ।।
कालजयी छंद ‘दोहा’,अपभ्रंश काल से अब तक अपनी स्वाभाविक चमक  के साथ साहित्य जगत में विद्यमान है, दोहा नाम लेते ही याद आते हैं संत कबीर दास, रहीम दास, तुलसीदास और महाकवि बिहारी। देखा जाए तो दोहा छंद की लोकप्रियता सर्वकालिक होने के साथसाथ सार्वभौमिक भी है, शक्ति, भक्ति, अनुरक्ति, प्रकृतिसभी कुछ, दोहे में समाहित किया जा सकता हैये दो पंक्तियां ही उसका तनमनप्राण हैं, जिसमें दोहे का संपूर्ण व्यक्तित्व निहित है । दूसरे शब्दों में कहूं तो एक बीज की भांति विशाल वृक्ष का भाव दोहे में निहित रहता है ।
आरोही की बात की जाये तो यह मर्मज्ञ जी के प्रतिनिधि दोहों का संकलन है। जिसमे  मर्मज्ञ जी की लेखनी सामाजिक, राजनीतिक,सांस्कृतिक और राष्ट्रीय चेतना से संबंधित विषयों पर मुखरित हुई है। मर्मज्ञजी ने इस दोहा संग्रह को २२ चरणों में विभाजित करके जीवन की लय से लयबद्ध कर १०५ मणके रूपी अध्याय से समृद्ध किया है, कुल मिलाकर प्रस्तुत दोहा संग्रह इंद्रधनुषी रंग लिए हुए हैं। उदाहण देखिये –
मौत संकुचित सोच है, जीवन है विस्तार
चलने को तत्पर रहे , उड़ने को तैयार।।
बचपन लाली भोर की, यौवन चढ़ती धूप।
सांझ बुढ़ापे का प्रहर, रात मृत्यु का रूप।।
हमारी  भारतीय संस्कृति और परंपराएँ एक समृद्ध और विविध धरोहर का हिस्सा हैं, लेखक इस परंपरा का सम्मान करते हुए आरोही का प्रथम चरण सरस्वती वंदना से शुभारंभ करते हुए अंतिम चरण मृत्यु से संग्रह का समापन करते हैं  दूसरे शब्दों में कहूं तो आरोही रूपी माला १०५ रंगीन मोतियों से सुसज्जित है,जिसमे जीवन के हर पड़ाव की यथार्थपरक व्याख्या निहित है । एक उदाहण देखिये –
कोई काम कीजिए, मन में रखकर क्षोभ।
जाना है सब छोड़कर, फिर क्यों इतना लोभ।।
दोहा पढ़नेसुनने एवं सराहने वाले को ऐसा लगाना चाहिए कि कहने वाले ने उसके मन की बात कही है, बस! मर्मज्ञ जी सरल सहज भाषा में लिखते हैं, दोहा दो पंक्तियों का छंद है जिसमें रचनाकार का शब्दों का महारथी होना परमावश्यक  होता है। दूसरे शब्दों में कहूं तो  गागर में सागर भरने की कला दुर्लभ होती है।  यह उनकी लेखनी का ही चमत्कार है कि पाठक रचना से जुड़कर उसमें निहित भावों को आत्मसात करता चलता है। साहित्य के प्रति उनकी समर्पण भावना विशेषकर हिन्दी के प्रति नि:संदेह प्रशंसनीय है। एक उदाहण देखिये –
क्यों इतनी है व्यग्रता, क्यों है आप अधीर।
मन में धारण कीजिए तुलसी और कबीर।। 
मर्मज्ञजी की लेखनी सामाजिक विसंगतियों, रूढ़िवादिता, आडंबरों पर बेबाकी से प्रहार करती है। उनका रचना संसार व्यवहारिकता और प्रासंगिकता की कसौटियों पर खरा उतरता है। मर्मज्ञ जी ने आरोही में  जिन विषयों पर प्रकाश डाला है कहीं ना कहीं उनमें संत कवियों की झलक दिखाई देती है। ऐसा  लगता है कि  वे यह जानते हैं कि बिहारी जैसी समाहारी शक्ति सम्पन्न भाषा, कबीर की सहजता सरलता और रहीम जैसी नीति परकता दोहों को जीवंत बनाती है। एक उदाहण देखिये –
कभी किसी के स्वप्न में,नहीं लगाना आग।
पानी से मिटते नहीं, ऐसे गहरे दाग।।
ऐसा अक्सर होता है, कि जिस विशेषक्षेत्र से रचनाकार का संबंध होता है, वह संकोच रहित होकर उसके ज्ञान का उपयोग करता है। अपनी वर्गीय चेतना को दोहा बध्द करते समय दोहाकार आंचलिकता को महत्व देता है। लेकिन ऐसा  लगता है कि  वे यह भी जानते हैं कि उन्हें दोहों की परिमाणात्मकता की अपेक्षा उसकी गुणात्मक प्रभावोत्पादकता पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए और इसी में दोहा तथा दोहा कार की सफलता सन्निहित है। दोहा कार मर्मज्ञ जी भाषा और छंद के प्रति संवेदित और जीवन के प्रति सदाशयी  नज़र आते  हैं, कुल मिलाकर उन्होंने इस संग्रह में  अपने कुलधर्म का पालन  किया है।   एक उदाहण देखिये –
ऊपर उड़ने की लगी, सब में ऐसी होड़
धन से रिश्ता जोड़ते, मन का रिश्ता तोड़।।
आरोही दोहा संग्रह होने के बाद भी उसको पढ़ते हुए हम एक यात्रा पर चल पड़ते हैं जहाँ धर्म, कर्म, महामारी, त्यौहार, परिवार, देश भक्ति, राजनीति, भाषा आदि  सभी क्षेत्रों के दर्शन हो जाते हैं, कुछ दोहों को पढ़कर हमारी धार्मिक और पारम्परिक चेतना जाग्रत होती है तो कुछ दोहों को पढ़ते हुए माता, पिता, बेटी, नारी और बचपन का महत्व समझ जाता है। कुछ दोहे  हमारी हिंदी की इतनी विशद व्याख्या कर देते हैं कि उसके सामने सारे भाषाई तर्क फीके दिखाई देने लगते हैं। कुछ दोहों में जीवन का श्रृंगार परिलक्षित होता है तो कुछ दोहों में देश की त्रासदी, शहादत और देश भक्ति के दर्शन होते है। ऐसा लगता है मर्मज्ञ जी ने जीवन के प्रत्येक पक्ष को शब्दबद्ध कर दिया हो,
यह एक ऐसा दोहा संग्रह हैं, जिनमें ईश्वर, इंसान, जीवनमृत्यु, दिनचर्याएँचाँदनी रात, बचपनयौवनबुढापा, यथार्थ को देखने का जज्बा, भौतिक वस्तुओं की उपलब्धियां , सर्वमांगल्य भाववसुधैव कुटुम्बकम की परिकल्पना, भाषायी विवादसामाजिक टकरावआतंकवाद, राजनीति का लक्ष्य, स्वार्थ और दिशाभ्रम, धर्मआस्तिकतापाखण्डलाचारी, युवा रोजगार की संभावनाएँ, तकनीकी और अंतरजाल, नौकरी की विवशताएँ, प्रतिभापलायन, सेवानिवृतजीवन, स्त्रीविमर्श, प्रकृति, बदलते मौसम, पर्यावरणप्रदूषण इत्यादि बहुवर्णी विषय हैं। जब मानवमूल्यों में जब गिरावट आती है, समाज की विषमतायें
विद्रूपतायें गहराने लगतीं हैं, तो कविमन व्यथित हो जाता है, उसकी कलम विषबुझे तीरों जैसी व्यंजना देती हैं
सच हैदोहाकार ने महानगरों के आधुनिक जीवन की दुर्बलताओं और संकीर्णताओं को प्राथमिकता से और बेबाकी से उकेरा है
कैसी उल्टी चाल हैकैसी उल्टी रीत।
कोयल कारावास मेंकौवा गाये गीत।।
कुल मिला कर यह कविता संग्रह शीर्षक कि दृष्टि से, विषयवस्तु कि दृष्टि से सम्पूर्णता लिए हुए है   मर्मज्ञजी बड़ी सादगी और सरलता से जीवन का प्रत्येक कोना झाकते हुए इस संग्रह को पूर्ण करते है, लेकिन उनकी विनम्रता भी देखिये कि वे अपने लेखन का श्रेय स्वयं नहीं लेते बल्कि कहते है मैं अज्ञानी क्या लिखूं। 
डॉ. उर्मिला पोरवाल
शिक्षाविद् बैंगलोर
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