कवि उद्भ्रांत की आत्मकथा : काली रात का मुसाफिर
प्रकाशक – अमन प्रकाशन, रामबाग, कानपुर-208012
पृष्ठ संख्या – 440, मूल्य ₹499/- (पेपरबैक)
कवि उद्भ्रांत हिंदी साहित्य के महत्वपूर्ण और बहुआयामी रचनाकार हैं। वे कवि, नवगीतकार, ग़ज़लकार, कथाकार, समीक्षक और अनुवादक के रूप में पहचाने जाते हैं। अपने काव्य पाठ से उन्होंने काव्य मंचों को भी गरिमा प्रदान की है। आधुनिक समय में उन्हें ‘मिथक काव्य’ के सफल सर्जक के रूप में जाना जाता है। उनके काव्य में पौराणिक पात्रों को आधुनिक और प्रगतिशील चेतना के साथ प्रस्तुत किया गया है। साहित्य की विभिन्न विधाओं में उद्भ्रांत की सौ से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।
कवि उद्भ्रांत इन दिनों अपनी आत्मकथा को लेकर चर्चा में हैं। उनकी आत्मकथा ‘मैंने जो जिया’ के पहले दो खंडों ने पाठकों के बीच गहरी छाप छोड़ी थी। अब इसका तीसरा खंड ‘काली रात के मुसाफ़िर’ नाम से प्रकाशित होकर सामने आया है। यह खंड एक ईमानदार इंसान के सरकारी तंत्र में व्यक्तिगत संघर्षों की दास्तान है। इसके समानांतर परिवार की व्यथा कथा है। साथ ही यह उस दौर के साहित्यिक और सामाजिक परिदृश्य का एक ऐसा आईना है, जिसमें कई चेहरे बेनक़ाब होते नज़र आते हैं। एक कवि के रूप में उनकी रचना प्रक्रिया और उनके समकालीन साहित्यकारों के साथ उनके संबंधों का भी इसमें विस्तार से वर्णन है।
यह किताब मेरे लिए बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें वर्णित कई घटनाओं का मैं भी साक्षी रहा हूँ। नब्बे के दशक में बतौर निदेशक मुम्बई दूरदर्शन में पदभार संभालते ही उद्भ्रांत जी ने कविता पाठ के पहले कार्यक्रम का लाइव प्रसारण किया और संचालन की ज़िम्मेदारी मुझे सौंपी थी। तबसे हमारी दोस्ती आज भी क़ायम है। मुम्बई दूरदर्शन के स्टूडियो में साहित्यिक परिचर्चाओं के माध्यम से उन्होंने कैसे एक रचनात्मक माहौल तैयार किया उसकी झलक इस आत्मकथा में मौजूद है। मुम्बई के पाटकर हाल में मंचीय कवियों के सामने तरन्नुम में एक दिलकश ग़ज़ल सुनाकर उन्होंने कैसे मंच पर कामयाबी का परचम लहराया उसकी दास्तान भी इस किताब में है। शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ और गोपाल दास ‘नीरज’ जैसे काव्य मंचों के शीर्ष कवियों की मौजूदगी भी इस आत्मकथा को एक नया रंग देती है।
उद्भ्रांत की लेखनी की सबसे बड़ी विशेषता उनकी बेबाक़ी है। ‘काली रात के मुसाफ़िर’ में उन्होंने उन सच्चाइयों को कहने का साहस दिखाया है, जिन्हें अक्सर लोग रिश्ते ख़राब होने के डर से दबा जाते हैं। वे केवल दूसरों की कमियां नहीं गिनाते बल्कि एक सच्चे आत्म-अन्वेषी की तरह अपनी स्वयं की कमियों और कमज़ोरियों को भी ज़ाहिर करने से नहीं हिचकते। यही ईमानदारी इस आत्मकथा को विश्वसनीय और पठनीय बनाती है। अभिनेता अभिताभ बच्चन के आवास पर जाकर मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने जब डॉ हरिवंश राय बच्चन को यश भारती पुरस्कार भेंट किया तो उद्भ्रांत जी वहाँ अपनी कैमरा टीम के साथ मौजूद थे। किसी की नाराज़गी की परवाह न करते हुए उद्भ्रांत जी ने उस दृश्य में कुछ छुपाने योग्य बातों को जिस साहस के साथ साकार किया है वह अद्भुत और अविस्मरणीय है।
साहित्य की दुनिया बाहर से जितनी शांत और गंभीर दिखती है भीतर से वह उतनी ही राजनीतिक चालबाज़ियों और षड्यंत्रों से भरी है। उद्भ्रांत ने इस कथा में साहित्यिक जगत के जुड़ते-टूटते रिश्तों को बहुत बारीक़ी से उकेरा है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि कैसे गुटबाजी और ईर्ष्या के चलते योग्य लेखकों के मार्ग में बाधाएं उत्पन्न की जाती हैं। किसी को मिलने वाला पुरस्कार किसी और को मिल जाता है। उनके इस प्रहार से कई नामचीन साहित्यकारों के असली चेहरे सामने आए हैं। भाई भतीजावाद वाली राजनीति सामने आई है।
लेखक ने केवल क़लमकारों की दुनिया ही नहीं, बल्कि सरकारी तंत्र के भीतर व्याप्त भ्रष्टाचार, चालाकियों और साज़िशों को भी उजागर किया है। एक रचनाकार जब सरकारी तंत्र का हिस्सा बनता है, तो उसे किन मानसिक दबावों और प्रशासनिक बाधाओं से गुजरना पड़ता है इसका सजीव चित्रण यहाँ मिलता है। इस आत्मकथा की एक विशेष बात इसकी शैली है जिसकी साहित्य जगत में काफ़ी तारीफ़ हो रही है । उद्भ्रांत ने इसे ‘अन्य पुरुष’ (Third Person) में लिखा है। इसके चलते पाठक को ऐसा महसूस होता है जैसे वह कोई कहानी या रोचक उपन्यास पढ़ रहा हो। वैसे इस आत्मकथा में कथा साहित्य जैसा प्रवाह है भी जो पाठक को बांधे रखता है। जीवन की चुनौतियों का सामना करते हुए एक लेखक कैसे एक नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ता है और इस उथल-पुथल तथा परेशानियों के बीच अपनी रचनात्मकता यात्रा कैसे जारी रखता है उसकी प्रेरक दास्तान इस किताब का उज्जवल पक्ष है।
उद्भ्रांत की आत्मकथा केवल उनके जीवन की घटनाओं का विवरण नहीं है, बल्कि उनके अंतर्मन, रचना प्रक्रिया और उस युग की साहित्यिक चेतना का दर्पण है। एक साहित्यकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती ख़ुद का सामना करना है। उद्भ्रांत ने यह काम बख़ूबी किया है। अपनी सफलताओं के साथ-साथ उन्होंने अपनी विफलताओं और कमजोरियों को भी निडर होकर स्वीकार किया है। मुश्किलें आईं मगर कभी भी उन्होंने अपने स्वाभिमान पर आंच नहीं आने दी। सन् 1994 में वरिष्ठ पत्रकार नंदकिशोर नौटियाल के सम्पादन में मुम्बई के साप्ताहिक ‘नूतन सवेरा’ में उनकी कृति ‘प्रज्ञा वेणु’ (गीता का काव्यानुवाद) का धारावाहिक प्रकाशन शुरू हुआ। उनकी अनुमति के बिना कुछ शब्दों में तब्दीली की गई तो अर्थ का अनर्थ हो गया। उद्भ्रांत जी सीधे अख़बार के कार्यालय पहुंच गए और प्रकाशन बंद करवा दिया। सम्पादक से टकराने की ऐसी हिम्मत विरले लेखकों में ही होती है।
उद्भ्रांत की आत्मकथा उस समय के सामाजिक परिस्थितियों के जीवंत चित्रण के साथ ही उस समय के रचनात्मक वातावरण को भी असरदार तरीके से सामने लाती है। संघर्षों की आंच से गुज़रते हुए उद्भ्रांत कभी कभी अध्यात्म की शरण में भी जाते हैं। अपनी बात को रोचक और प्रभावशाली बनाने के लिए बीच-बीच में काव्यात्मक अभिव्यक्ति का भी सहारा लेते हैं। काव्य और गद्य का यह संगम इस आत्मकथा को एक अलग ऊँचाई प्रदान करता है। हिंदी साहित्य में कवि हरिवंशराय बच्चन की आत्मकथा को एक मील का पत्थर माना जाता है। उद्भ्रांत की यह आत्मकथा ‘काली रात के मुसाफ़िर’ भी उसी श्रेणी में खड़ी नज़र आती है। यह केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है बल्कि बदलते हुए समाज और समय का महत्वपूर्ण दस्तावेज़ भी है। यह उन सभी के लिए एक प्रेरणा की मशाल है जो अंधेरों (काली रात) के बीच उजालों की तलाश रहे हैं।
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देवमणि पांडेय
बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा,
गोकुलधाम, फ़िल्मसिटी रोड,
गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063
Mobile: +91 98210 82126
देवमणि जी का हार्दिक आभार
इस सुन्दर समीक्षा के प्रकाशन के लिए “पुरवाई” के संस्थापक सम्पादक तेजेन्द्र जी का हार्दिक आभार